पूज्य बापू जी का संदेश

ऋषि प्रसाद सेवा करने वाले कर्मयोगियों के नाम पूज्य बापू जी का संदेशधन्या माता पिता धन्यो गोत्रं धन्यं कुलोद्भवः। धन्या च वसुधा देवि यत्र स्याद् गुरुभक्तता।।हे पार्वती ! जिसके अंदर गुरुभक्ति हो उसकी माता धन्य है, उसका पिता धन्य है, उसका वंश धन्य है, उसके वंश में जन्म लेने वाले धन्य हैं, समग्र धरती माता धन्य है।""ऋषि प्रसाद एवं ऋषि दर्शन की सेवा गुरुसेवा, समाजसेवा, राष्ट्रसेवा, संस्कृति सेवा, विश्वसेवा, अपनी और अपने कुल की भी सेवा है।"पूज्य बापू जी

यह अपने-आपमें बड़ी भारी सेवा है

जो गुरु की सेवा करता है वह वास्तव में अपनी ही सेवा करता है। ऋषि प्रसाद की सेवा ने भाग्य बदल दिया

अपने रक्षक आप बनो-(राजा भर्तृहरि जीवन प्रसंग)

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अपने रक्षक आप बनो-(राजा भर्तृहरि जीवन प्रसंग)

राजा भर्तृहरि ने राजपाट का त्याग किया और गोरखनाथजी के चरणों में जा पहुँचे। उनसे दीक्षित हुए और उनकी आज्ञानुसार कौपीन पहन के निकल पड़े।

भर्तृहरि किसी गाँव से गुजर रहे थे। वहाँ किसी हलवाई की दुकान पर गरमागरम जलेबी को देखकर मन ललचाया। वे दुकानदार से बोलेः “थोड़ी जलेबी दे दो !” दुकानदार ने डाँटते हुए कहाः “अरे मुफ्त का खाने को साधु बना है ? जरा काम-धंधा करो और कुछ टका कमा लो, फिर आना।”

दिन भर तालाब की मिट्टी खोदी, टोकरी भर-भरकर फेंकी तो दो टका मिल गया। जलेबी ले आये। रास्ते में से भिक्षापात्र में गोबर भर लिया। तालाब के किनारे जाकर बैठे और खुद से ही कहने लगेः ʹदिन भर की मेहनत का फल खा ले।ʹ होठों तक जलेबी लाये और दूसरे हाथ से मुँह में गोबर भर दिया और जलेबी तालाब में फेंक दी। ʹराजपाट छोड़ा, सगे-सम्बन्धी छोड़े, फिर भी अभी स्वाद नहीं छूटा ? तो ले, खा ले।ʹ ऐसा कहकर फिर से मुँह में गोबर ठूँस लिया। मुँह से थू-थू होने लगा तब भी वे कहते हैं- ʹनहीं-नहीं, अभी और खा ले….ʹ ऐसे एक-एक करके उन्होंने सारी जलेबियाँ तालाब में फेंक दीं।

अब आखिरी जलेबी बची थी हाथ में। मन ने कहाः ʹदेखो, इतना मुझे सताया है, दिन भर मेहनत करके थकाया है, चलना भी मुश्किल हो रहा है। अब कुल्ला करके एक जलेबी तो खाने दो।ʹ
ʹअच्छा तो अभी मेरा स्वामी ही बना रहना चाहता है तो ले।ʹ तपास से जलेबी तालाब में डाल दी और कहाः ʹअब और जलेबी कल ला दूँगा और ऐसे ही खिलाऊँगा।ʹ

अब भर्तृहरि का मन तो मानो उनको हाथ जोड़ता है कि ʹअब जलेबी नहीं खानी है, कभी नहीं खानी है। आप जो कहोगे अब मैं वही करूँगा।ʹ अब मन हो गया नौकर और खुद तो हैं ही स्वामी।

जब कभी मन में विकार आये तो उसका बलपूर्वक सामना करो। विकारों का सामना नहीं करोगे और मन को जरा-सी भी छूट दे दोगे कि ʹजरा चखने में क्या जाता है…. जरा देखने में क्या जाता है…ʹ ऐसे जरा-जरा करने में मन कब पूरा घसीटकर ले जाता है, पता भी नहीं चलता है। इसलिए मन को जरा भी छूट मत दो। अपने रक्षक आप बनो।
जवाब दें और जीवन मे लायें।
राजा भर्तृहरि ने जलेबियाँ क्यों खायीं ?
आप अपने मन को अपना नौकर बनाने के लिए क्या करोगे ?

Sant Shri Asaram ji Ashram (Tejasvi Bano Book)

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