किसी व्यक्ति के किडनी ( गुर्दो ) में जब कोई विकार उत्पन्न हो जाता है तो उसके गुर्दो की कार्यक्षमता कम होने लगती है यानी समय समय पर, रक्त में अवांछित तत्त्वों को अलग करना तथा रक्त में पानी की मात्रा नियन्त्रित करने का जो काम गुर्दे करते हैं। इस काम में कमी होने लगती है, बाधा होने लगती है। ऐसी स्थिति में उचित इलाज और औषधि सेवन करने के साथ ही व्यक्ति को ऐसा आहार लेना बहुत ज़रूरी हो जाता है जिसके सेवन से किडनी ( गुर्दो ) पर दबाव न पड़े और गुर्दो की कार्य क्षमता में कमी न हो।

आहार चयन में ध्यान रखने योग्य बातें :

आहार के मामले में विशेष ध्यान रखने योग्य बात यह भी है कि ऐसा आहार ज़रूर लिया जाए कि शरीर को आवश्यक ऊर्जा बराबर मिलती रहे ।सुपाच्य, स्वास्थ्य वर्द्धक और सन्तुलित आहार लेने से जहां किडनी ( गुर्दो ) में उत्पन्न विकार का बढ़ना रुकता है। वहीं शरीर का वज़न, रक्तचाप, कोलेस्टेरोल, रक्तशर्करा आदि भी सामान्य अवस्था में बने रहते हैं। इस मामले में शरीर की सही स्थिति जानने के लिए रक्त की जांच और किडनी की सोनोग्राफी की जाती है जिससे रक्त में क्रिटिनाइन, ब्लड यूरिया, कोलेस्टेरोल ब्लड शुगर आदि की स्थिति का पता चल जाता है और यदि शरीर में कोई विकृति या असामान्य स्थिति हो तो तुरन्त उसकी चिकित्सा कर उसे दूर करने की कोशिश शुरू की जा सकती है। इस तरह गुर्दो की स्थिति को और बिगड़ने से रोका जा सकता है और यदि सम्भव हो तो स्थिति को ठीक भी किया जा सकता है।

गुर्दो में कोई विकार होने से विकृति पैदा हो जाए तो प्रत्येक रोगी के शरीर की लम्बाई, वज़न और गुर्दो की बची हुई कार्य क्षमता के आधार पर प्रत्येक रोगी की स्थिति और इसकी आवश्यकताएं अलग होती हैं। अधिकांश रोगियों को तरल पदार्थों, प्रोटीन तथा सोडियम युक्त पदार्थों का सेवन चिकित्सक द्वारा निर्देशित मात्रा में ही करना ज़रूरी होता है। कुछ रोगियों को तो पोटेशियम, फास्फोरस और कैल्शियम युक्त पदार्थों का भी सीमित मात्रा में ही सेवन करना ज़रूरी होता है। हर रोगी के लिए अनुकूल और उचित आहार किन किन पदार्थों वाला होगा और कौन कौन से पदार्थों वाला नहीं होगा इसका निर्णय और निर्देश सिर्फ एक कुशल और अनुभवी ऐसा चिकित्सक ही दे सकता है जो कुशल आहार विशेषज्ञ (Nutrition) भी हो। साथ ही यह रोगी का भी परम कर्तव्य है कि वह ऐसे आहार-सम्बन्धी निर्देशों और नियमों का सख्ती से पालन करे सिर्फ दवा-इलाज के भरोसे पर न रहे क्योंकि निर्देशित नियमों का पालन न करने पर दवा इलाज का भी पूरा और आवश्यक असर नहीं हो सकेगा।

इस लेख में विस्तार से उचित (पथ्य) आहार के पदार्थों और त्यागने योग्य (अपथ्य) आहार के पदार्थों के विषय में विस्तार से चर्चा न करके सिर्फ कुछ सामान्य बिन्दुओं पर ही प्रकाश डाल रहे हैं। ताकि जब आपका चिकित्सक या आहार विशेषज्ञ आपको, आपकी स्थिति के अनुकूल, आहार सम्बन्धी सलाह दे तो
आपको समझने में आसानी हो जाए। विस्तार से चर्चा करना इसलिए सम्भव नहीं है कि गुर्दो की जैसी स्थिति हो, उसकी जांच करा कर, स्थिति की सही-सही जानकारी प्राप्त कर, उसके अनुसार ही आहार-द्रव्यों का चुनाव किया जाता है और यह चुनाव, रोगी की जांच करा कर प्राप्त रिपोर्ट के आधार पर, चिकित्सक या आहार विशेषज्ञ ही कर सकता है और तभी ऐसा सन्तुलित आहार लेने की सही सलाह दी जा सकती है।

किडनी रोग में खान पान और परहेज | Kidney Disease Diet in Hindi

गुर्दे के पुराने रोगी के लिए सामान्य निर्देश :

1-जो लोग डिब्बा बन्द पदार्थों का सेवन करते हैं उन्हें पेकिंग पर लगे लेबल को पढ़ने की आदत रखना चाहिए और लेबल पर दिये गये घटक द्रव्यों (Ingredients) के नाम ज़रूर पढ़ना चाहिए। यदि इन नामों में सोडियम (नमक) या मोनो सोडियम नाम हो तो इस पदार्थ का सेवन नहीं करना चाहिए। ( और पढ़ेकिडनी के दर्द का घरेलू उपचार)

2- इसी तरह संसाधित पनीर डिब्बा बन्द अचार, डिब्बा बन्द खाद्य पदार्थ आदि का भी सेवन नहीं करना चाहिए क्योंकि इनमें नमक की मात्रा ज्यादा हो सकती है।

3- अपने भोजन में ऊपर से नमक डालने की आदत छोड़ देना चाहिए इसके बजाय स्वाद के लिए नींबू और अन्य मसालों का उपयोग करना चाहिए। ( और पढ़ेकिडनी रोग के कारण लक्षण और उपचार )

4- प्रोटीन-प्रोटीन की मात्रा कितनी हो या प्रोटीन का सेवन बिल्कुल ही न किया जाए इसका निर्णय रोगी की स्थिति को देखकर अच्छा आहार विशेषज्ञ ही उचित सलाह दे सकता है और वह यह भी बता सकता है। कि शरीर को स्वस्थ रखने के लिए कम से कम मात्रा में प्रोटीन किन पदार्थों से और कैसे प्राप्त किया जा सकता है ज्यादातर लोगों की जानकारी और धारणा यह होती है कि मांस, मछली, दूध से बने पदार्थों में प्रोटीन होता है पर शायद यह जानकारी उन्हें नहीं होगी कि अनाज और फलीदार सब्ज़ियों में भी प्रोटीन होता है। ( और पढ़ेप्रोटीन के श्रोत इसके फायदे और नुकसान )

5- तरल पदार्थ- गुर्दो के रोगी को तरल पदार्थों का सेवन भी सीमित मात्रा में करना चाहिए। पानी के अलावा अंगूर, सन्तरे, सेव, गन्ना, मौसम्बी, सलाद भी तरल पदार्थ में आते हैं क्योंकि इनमें जल की मात्रा बहुत होती है। जो खाद्य पदार्थ कमरे के तापमान पर तरल अवस्था में रहते हैं जैसे सूप, आइस क्रीम आदि भी तरल पदार्थ ही माने जाते हैं। इन सबका सेवन चिकित्सक के परामर्श के अनुसार ही करना चाहिए।

6- फास्फोरस- फास्फोरस युक्त पदार्थों का सेवन भी सीमित मात्रा में ही करना चाहिए। सामान्यतः इसकी सीमित मात्रा 800 से 1000 मि. लि. प्रतिदिन होती है, इससे ज्यादा नहीं।

7-दूध से बने पदार्थ जैसे दूध, दही, आइसक्रीम का सेवन कम मात्रा में करना चाहिए।  ( और पढ़े – )

8- गिरीवाले फल, मटर, मूंगफली, फलियां, मसूर और पेय पदार्थों में बियर, कोको और कोला का सेवन नहीं करना चाहिए।

9-पोटेशियम- सादे नमक के स्थान पर किसी दूसरे नमक के उपयोग के बारे में अपने चिकित्सक से परामर्श लेना चाहिए। कुछ रोगियों के मामले में पोटेशियम को भी बहुत कम मात्रा में लेना ज़रूरी होता है। बाज़ार में मिलने वाले नमकीन पदार्थों में पोटेशियम की मात्रा बहुत ज्यादा रहती है।

10- परहेज़ का ध्यान रखने के साथ ही यह भी ध्यान में रखना होगा कि शरीर दुबला व कमज़ोर न हो तो अपने आहार में सादा सुपाच्य और ताज़ा भोजन लेना चाहिए जिसमें गेहूं, मक्का से बनी रोटी और हरी सब्ज़ियां हों, कोई दाल न हो और नाश्ते में नमकीन बिस्किट, चिप्स और कोई तला पदार्थ न हो।

11-भोजन और नाश्ता हमेशा निश्चित समय पर करना चाहिए और खूब अच्छी तरह चबा चबा कर यानी प्रत्येक कौर को 32 बार चबा कर खाना चाहिए।

12-यदि रोगी के शरीर का वज़न ज्यादा हो तो आहार में कैलोरीज़ की मात्रा कम कर देना चाहिए और शारीरिक परिश्रम एवं व्यायाम अवश्य करना चाहिए।

13- यदि रोगी मधुमेह से पीड़ित न हो तो वह आहार में कैलोरी वैल्यू बढ़ाने के लिए शहद और शक्कर का सेवन कर सकता है।

14- खाद्य तेलों में जैतून, करडी और सूरजमुखी तेल का उपयोग करना उचित रहता है।

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