तबसे बैठा देख रहा हूँ फिर आनेकी राह (प्रेरक कहानी) | Prerak Hindi Kahani

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तबसे बैठा देख रहा हूँ फिर आनेकी राह (प्रेरक कहानी) | Prerak Hindi Kahani

बोध कथा : Hindi Moral Story

उन दिनों हरद्वारमें अर्धकुम्भीका मेला था। मैं भी गया था। मैंने तीन दिनसे लक्ष्य किया कि एक सिपाही सरकारी वर्दी में एक करीलके नीचे बैठा माला जपा करता है। तीसरे दिन मैं उसके पास गया। उसने हाथ जोड़कर ‘जय सीताराम स्वामीजी!’ कहा। मैं पास ही बैठ गया।

मैं—तुम किस टाइपके सिपाही हो जी ?
वह–क्यों स्वामीजी !
मैं–सिपाही के हाथमें माला ! सिपाहीके हाथमें तो चाहिये भाला।
वह- क्या एक सिपाही भक्त नहीं बन सकता महाराज!
मैं—जो भक्त होगा, वह सिपाही नहीं बनेगा और जो सिपाही होगा, वह भक्त नहीं बनेगा। दोनों विपरीत अवस्थाएँ हैं।
वह–परंतु मुझमें दोनों बातें हैं।
मैं—देखो सिपाहियों का जीवन वे देखो, वे दो सिपाही गाँजेके दम लगा रहे हैं। वह देखो, एक सिपाही किसी गरीब यात्री से पैसे ऐंठ रहा हैं। उधर देखो, वे तीन सिपाही पुल पर आनेवाली युवतियोंको कैसे घूर रहे हैं, मानो विधाता-रचित सौन्दर्य-चन्द्रके राहु-केतु हैं।
वह –आप ठीक कह रहे हैं। आज हमारी सिपाही की कौम ही अधर्मी हो गयी है।
मैं –इधर तुमको देखो, सबसे अलग विरागीकी तरह माला जप रहे हो। किसका मन्त्र जप रहे हो?
वह- विष्णुभगवान का ।
मैं-मन्त्र किसने दिया?
वह -मेरे गुरुने!
मैं –तुम्हारा गुरु कौन है?
वह –मेरी स्त्री!
मैं-खूब विरोधाभास का जोड़ा?
वह–सो क्यों स्वामीजी !
मैं-एक तो सिपाही भक्त और दूसरे स्त्री गुरु !-ये दोनों ही विरोधाभास हैं। यानी सिपाही भक्त नहीं बन सकता; क्योंकि सिपाही की जाति आज जालिम हो गयी है और स्त्री गुरु नहीं बन सकती, क्योंकि औरत की जाति मायाविनी होती है; परंतु तुम्हारे पास दोनों विरुद्ध बातें उपस्थित हैं। यही आश्चर्य है।
वह –कभी-कभी सिपाही भी भक्त बन जाता है और कभी कभी स्त्री भी गुरु बन जाती है।
मैं—यह भी ठीक है। भगवान् असम्भवको भी सम्भव बनाया करते हैं। सम्भव-असम्भव और अन्यथासम्भव- ये तीनों हरकतें भगवान्में हैं।
वह-लक्ष्मणजीकी गुरु सुमित्रा देवी स्त्री जातिकी ही थीं। तुलसीदासजी की गुरु रत्नावली स्त्री ही थीं और गोपीचन्द की गुरु उनकी माता मैनावती जी भी स्त्री ही थीं। इसी प्रकार मेरा गुरु स्त्री ही है।
मैं –तुम्हारा नाम!
वह–मुझे लोग ठाकुर जीवनसिंह कहते हैं।
मैं –कहाँके रहनेवाले हो?
वह-जौनपुर। यहाँ कुम्भभरके लिये मेरी ड्यूटी हैं।
मैं—अच्छा, तो जीवनसिंहजी! आप अपनी कहानी सुना जाइये।
जीवन सिंह ने माला रख दी और कहने लगा–‘आप नहीं मानते तो सुन लीजिये मेरी विचित्र कहानी!’
मैं—क्योंकि तुम्हारी कहानी में अवश्य कोई अघट-घटना होगी।
जीवन०–अघट-घटना जरूर है! उसी घटनाने मुझे पागल बना दिया है।
मैं-कहो, क्या बात है? शायद मैं कोई सलाह दे सकूँ।
जीवन०–इसलिये सुनाता हूँ कि शायद आप कोई रास्ता दिखलायें। बात यह है कि मैं पक्का सुधारक था। सबका खण्डन करता था और मेरी स्त्री थी परम श्रद्धालु, घोर सनातनधर्मी।
मैं-घोर सनातनधर्मी!
जीवन०–घोर नहीं, बल्कि घनघोर सनातनधर्मी।
मैं –इसके क्या मानी?
जीवन०-उसने आँगनमें तुलसीका वृक्ष लगा रखा था और एक मूर्ति शालग्रामजी की रख दी थी कि जो उसके गुरु उसे दे गये थे। तुलसी के घरौंदे में भगवान् विष्णुजी की तस्वीर टंगी थी। रोज सबेरे उठकर वह स्नान करती और ठाकुरजीकी पूजा करती थी। रामायण पढ़ती और विष्णुसहस्रनामका पाठ करती। तब जाकर किसी से बात करती थी।
मैं –उसका नाम क्या था?
जीवन०-वह मर नहीं गयी है। उसका नाम गोमती देवी है। तीन | पुत्र तथा एक कन्या की माता है।
मैं-अच्छा, आगे कहो।
जीवन०–एक दिन रातको मैंने उससे कहा कि कप्तान साहब मुझपर नाराज हैं। एक दिन सलाम नहीं किया, इसीसे नाराज हो गया है, मेरा तबादला उस पापीने अल्मोड़ा कर दिया है।
गोमती-अल्मोड़ा कहाँ है?
जीवन०–जहाँके हमारे मुख्य मन्त्री और प्रसिद्ध कवि दोनों पंतजी हैं। वह एक पहाड़ी जिला है। वहाँके लोग बड़े रूखे माने जाते हैं। यहाँ से बहुत दूर है। धरती के छोरपर समझो।
गोमती-तो क्या करोगे?
जीवन०–इस्तीफा दूंगा !
गोमती-गुजर कैसे होगी?
जीवन०–खेती करूंगा। उत्तम खेती ही है। नौकरी तो निकृष्ट है।
गोमती-मत घबराओ ! मैं अपने विष्णुभगवानु से प्रार्थना करूंगी। तुम्हारा तबादला मंसूख हो जायगा।
जीवन०–मैं कप्तानके पास जाकर तबादला रोकनेकी प्रार्थना कदापि नहीं करूंगा।
गोमती-मत करना।
जीवन०–फिर भी तबादला रुक जायगा?
गोमती-हाँ, रुक जायगा।
जीवन–कैसे ?
गोमती-विष्णुभगवान् रोक देंगे।
जीवन०–अरी भोली ! विष्णुभगवान् कोई चीज नहीं।
गोमती-वाह, वाह। यह खूब कही।
जीवन०–ब्रह्मा, विष्णु और शंकरकी कल्पना पोंगापंथी सनातनियों के सड़े दिमागकी की हुई है। हमलोग कल्पना के पीछे नहीं दौड़ते, सचाईको अपनाते हैं, जो सदा हमारे सामने होती है। विष्णु को किसने देखा है? असलमें विष्णु नामक कोई चीज इस संसार में नहीं है। कोई परमात्मा है भी तो वह निराकार परमात्मा ही है!
गोमती-वही निराकार हैं, वही साकार हैं! वही ब्रह्मा नामसे साकार-द्वारा जगतकी रचना करते हैं, वही विष्णुभगवान्के रूपसे संसारका पालन करते हैं और वही परमेश्वर रुद्र-शंकरके साकार द्वारा संहार करते हैं।
जीवन०-(हँसकर) मैं यह तो मान ही नहीं सकता कि । विष्णुभगवान् कोई चीज हैं। पर यदि विष्णु कोई थे तो अब बुढे हो गये होंगे या मर गये होंगे !
गोमती-नहीं, देवता न तो बूढे होते हैं और न मरते हैं। फिर वे तो देवोंके भी देव हैं। साक्षात् ईश्वर ही हैं।
जीवन०–मैं तो तब जानूं कि विष्णुभगवान् ही जगत्के पालक हैं कि जब मेरा तबादला रुक जाय और मुझे कप्तानके सामने गिड़गिड़ाना न पड़े।
गोमती-ऐसा ही होगा।
जीवन०–यदि ऐसा हुआ तो मैं अपनी सुधारकी को भाड़में झोंक दूंगा और तुम्हारे सनातनधर्ममें आ जाऊँगा। इतना ही नहीं, तुमको गुरु मानूंगा।
गोमती-आज मैं प्रार्थना करूंगी ।।
जीवन०–कल प्रात: मैं इस्तीफा दे दूंगा, लिखा रखा है। इसलिये आज ही जो कुछ करना हो, कर डालना, क्योंकि परसों अल्मोड़ा जानेका हुक्म मिलेगा। पेशकार साहबने पक्की खबर दी है। हुक्म तबादला लिखा जा चुका है। साहबके दस्तखत भी हो चुके हैं। परसों मुझे दे दिया जायगा।
गोमती-आप निश्चिन्त होकर अपने पहरेपर जाइये।

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मैं–क्यों जीवनसिंह ! कप्तान साहब किस जातिका था?
जीवन०–अंग्रेज-बच्चा था मि० यार्क साहब! बड़े कड़े मिजाजका अफसर था। सुपरिटेंडेंट पुलिसको भी ‘कप्तान’ कहते हैं हमलोग!
मैंने कहा-अच्छा, फिर क्या हुआ?
जीवन०-मैं कलक्टरी पर पहरा देने जा रहा था। आधी रातको समय था। आधी रातसे प्रात:तक मेरी ड्यूटी थी। जब कचहरीके पास पहुँचा तो मुझे एक पण्डितजी मिले। मेरे कुलपुरोहित पण्डित दुलीचन्दको पहचानकर मैं खड़ा हो गया। सनातनधर्मी न होनेके कारण मैं तो उनको अपना पुरोहित नहीं मानता था, परंतु गोमती मानती थी और वह उनको बहुधा बुलाकर व्रतोंकी व्यवस्था किया करती थी। मुझसे उन्होंने कहा
‘मुझे तुम्हारे तबादलेका हाल मालूम है। कल सुबह इस्तीफा मत पेश करना। कल दोपहर को मंसूखी तबादलाका हुक्म मिल जायगा।’
इतना कहकर वे चले गये। मैंने उनकी बातपर कोई ध्यान नहीं दिया , क्योंकि ज्योतिषपर मुझे विश्वास नहीं था और वे एक ज्योतिषी थे।
मैंने पूछा फिर सुबह इस्तीफा पेश किया?
जीवन०–मैंने इतनी बातें निश्चय कर लीं कि इस्तीफा सुबह नहीं, कल शामको दाखिल करूंगा। अपनी स्त्री तथा पण्डितजीकी बातकी जाँच भी तो करनी थी।
मैं—आगे कहो। ।
जीवन-जब पहरा देकर मैं सुबह घर गया, तब अपनी स्त्रीसे ज्योतिषीवाली बात कही। वह बोली कि उसने भी प्रार्थना की थी। इसके बाद बड़े लड़के को भेजकर पण्डित दुलीचन्दजी ज्योतिषीको मेरी स्त्रीने घरपर बुलाया और वे आये। गोमतीने उनको सादर बैठाया और पूछा-‘कल आधी रातको आपने ठाकुर साहबसे क्या कहा था?’
पं० जी—कुछ नहीं।
जीवन०–आप कल आधी रातको कचहरीके पास मुझे मिले थे या नहीं?
पं० जी-नहीं।
जीवन०—तब वह कौन था?
पं० जी-मुझे नहीं मालूम।
जीवन०–कल आधी रात आप कहीं गये थे?
पं० जी–कल रातको मैंने घरसे बाहर कहीं डग भी नहीं मारी!
जीवन०-मैं यह मान नहीं सकता, सिपाही हूँ, मुझे कोई चकमा नहीं दे सकता।
पं० जी –मेरे पास सबूत भी है।
जीवन०–कैसा सबूत?
पं० जी-मेरे घरके पास पण्डित शिवशंकरदयालुजी वैद्य रहते हैं।
जीवन०-मैं उनको जानता हूँ! कई बार दवा भी लाया हूँ।
पं० जी–उनको बुलवा लीजिये। वही मेरे गवाह हैं।
लड़के को भेजकर मैंने वैद्यजीको बुलवाया और वे आये। वैद्यजी से मैंने कहा-‘क्यों वैद्यजी! मेरी एक बातका जवाब आप सच-सच देंगे?
वैद्य-भय या लोभसे लोग झूठ बोलते हैं। मुझे आपसे न तो भय है और न लोभ।
जीवन०–आपको अपने पुत्रकी शपथ है, सच जवाब देना।
वैद्य-शपथ न देते तो भी सच बोलता, कहो क्या बात है?
जीवन०–कल रातको ज्योतिषीजी कहीं बाहर गये थे?
वैद्य–कल शामको मैंने भाँग बनायी थी। इनको जरा ज्यादा पिला दी थी। ये रातभर बेहोश पड़े रहे। इनकी स्त्री घबरा गयी थी। आधी रातको मूझे नाडी देखनेको बलाया गया था। मैंने एक दवा देकर इन्हें कै करायी थी। मैं शपथसे कहता हूँ कि ये सुबहतक कहीं नहीं गये।
जीवन०–बस, अब आप दोनों साहब जा सकते हैं। वे दोनों चले गये।
दोपहरी को पेशकार साहबने मुझसे कहा कि तुम्हारे तबादलेका हुक्म मंसूख कर दिया गया। तुम जौनपुरमें ही रहोगे।’ जब मैंने कारण पूछा तो उन्होंने जवाब दिया-‘साहबोंके मनकी बात मैं क्या जानूं।’
जीवन०–अब बताइये स्वामीजी ! ज्योतिषीके रूपमें वह कौन था? मैंने कहा-विष्णुभगवान् ही थे। जीवन-वे क्यों आये थे?
मैं –तुमने कहा था कि विष्णुजी मर गये, सो वे हाजिरी देने आये थे कि मैं अभी नहीं मरा हूँ।
जीवन०–लेकिन मैं तो मर गया। उसी समय से मैं पागल हो गया हूँ। यदि मैं जानता कि विष्णुभगवान् ही ब्राह्मणके रूप में खड़े हैं तो मैं उनके चरण पकड़ लेता। भक्तिका वरदान माँगता। । मैं—तुमको दर्शन हो गया। तुम धन्य हो! बड़े-बड़े भक्तोंको उनका दर्शन नहीं होता, फिर इस कलियुगमें तो और भी कठिन बात है।
जीवन०–मेरी स्त्रीने ‘हरिशरणम्’ वाला मन्त्र मुझे दिया। उसी मन्त्रको माला पर जपा करता हूँ और ‘तबसे बैठा देख रहा हूँ फिर आनेकी राह !’
मैं—इस प्रकार तुमको सुधारकीका भूत छोड़ गया।’
जीवन-मैंने समझ लिया कि इस सुधारकीमें कुछ तथ्य नहीं है, केवल हठधर्मी ही है। ज्ञान तो इसमें नहींके समान है। यथार्थ ज्ञान से इसका कोई सम्बन्ध नहीं है।
मैं-ठीक है।
जीवन०–क्यों स्वामीजी ! अब क्या फिर दर्शन नहीं होंगे?
मैं-मैं क्या जानूं? साहबोंके मनकी बात। यदि वे प्रसन्न हो जायँ तो प्रतिदिन दर्शन दे सकते हैं। प्रसन्न न हों तो सात जनम न मिलें। ‘विष्णुभगवान् समान न आन!’
जीवन०–मैं प्रयत्न तो यही कर रहा हूँ कि एक बार फिर मिलें।
मैं-किये जाओ प्रयत्न मेरे प्यारे ! यह प्रयत्न ही मनुष्य-जीवनका सबसे बड़ा फल है।
जीवन०–यही मेरे जीवनकी एक अघटन-घटना है।
मैं—खूब है भैया! तुम सचमुच अजीब सिपाही हो।