अरुचि दूर कर भूख बढ़ाने के 32 अचूक उपाय | Bhukh badhane ke Upay

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अरुचि दूर कर भूख बढ़ाने के 32 अचूक उपाय | Bhukh badhane ke Upay

अरुचि के कारण लक्षण और उपचार :

★ स्वादिष्ट, चटपटे, उष्ण मिर्च-मसालों और अम्लीय रस से बने खाद्य पदार्थ सभी को बहुत स्वादिष्ट लगते हैं। चटपटे, स्वादिष्ट भोजन के लिए कुछ स्त्री-पुरुष होटल व रेस्तरां में अधिक खाना पसंद करते हैं। लेकिन अधिक समय तक ऐसे स्वादिष्ट भोजन का सेवन करने से पाचन क्रिया विकृत होती है और फिर स्वादिष्ट भोजन के प्रति अरुचि उत्पन्न हो जाती है। अरुचि के कारण स्वादिष्ट भोजन की ओर देखने की इच्छा भी नहीं होती।

★ अरुचि की विकृति पाचन क्रिया की विकृति से हो सकती है। ऐसे में भूख नहीं लगती तो कुछ खाने की इच्छा नहीं होती। जब भोजन खूब भरपेट किया हो, उसके बाद कोई स्वादिष्ट व्यंजन खाने को दिया जाए तो उसे खाने की इच्छा नहीं होती। लेकिन कुछ खाने की इच्छा न होना अरुचि नहीं होता। अरुचि विभिन्न रोग-विकारों के कारण होती है। अरुचि में स्वादिष्ट भोजन की सुगंध भी अच्छी नहीं लगती।

★ गहरी चिंता, शोक और भय की अधिकता भी कभी-कभी भोजन के प्रति अरुचि उत्पन्न कर देता है, लेकिन ऐसी अरुचि वातावरण के परिवर्तन के साथ नष्ट हो जाती है। काम, क्रोध, ईर्ष्या व मानसिक तनाव के कारण भी अरुचि की विकृति हो सकती है।

अरुचि ( भूख न लगना ) के कारण : bhukh na lagna ke karan

चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार वातादि दोष प्रकोप, शोक, भय, क्रोध व ग्लानि के कारण भोजन के प्रति अरुचि उत्पन्न हो जाती है। ऐसी स्थिति में भोजन की सुगंध भी अच्छी नहीं लगती। इस विकृति को अरुचि कहा जाता है। मुंह में डाले गए खाद्य जब स्वादिष्ट न लगें तो उस विकृति को अरुचि कहते हैं। महर्षि सुश्रुत के अनुसार अरुचि दोषजन्य विकृति होती है अर्थात् दूसरे विकारों के कारण होती है। अरुचि में मुंह में प्रेषित खाद्य गले के नीचे तो उतर जाते हैं लेकिन उसे खाने की इच्छा नहीं होती। महर्षि चक्रपाणि के अनुसार अरुचि में भोजन मुंह से आगे नहीं जाता। रोगी अरुचि के कारण उस भोजन को उगल देता है। अरुचि में भूख नहीं लगती और कुछ खाने की इच्छा भी नहीं होती।

1) अरुचि की उत्पत्ति के शारीरिक व मानसिक कारण हो सकते हैं। दूषित एवं कुपित दोष आमाशय में पहुंचकर विकृति उत्पन्न करते हैं। इससे आमाशय में शोथ, गैस्टिक, अम्लता की वृद्धि और रक्ताल्पता (एनीमिया) आदि विकार उत्पन्न होकर भोजन में अरुचि उत्पन्न कर देते हैं।
2) शारीरिक रूप से अरुचि की उत्पत्तिआमाशय में होती है। | गहरी चिंता, शोक, भय, क्रोध के कारण भी अरुचि की उत्पत्ति होती है। अरुचि के कारण जब रोगी भोजन नहीं करता, तो कुछ ही सप्ताह में शारीरिक रूप से बहुत निर्बल हो जाता है। भोजन की कमी से मांसादि धातुओं का क्षय होने से शारीरिक क्षीणता तेजी से बढ़ती है। शोक, भय, मानसिक तनाव की स्थिति में आमाशयिक ग्रंथि अल्प मात्रा में पाचक रस (एंजाइम) की उत्पत्ति करती है। ऐसी स्थिति में भूख भी नष्ट होती चली जाती है।
3) आयुर्वेद चिकित्सा के अनुसार वातज, पित्तज, कफज और त्रिदोषज्ञ अरुचि की उत्पत्ति स्थल हृदय व जीभ होता है। आगंतुक अरुचि का उत्पत्ति स्थल मन कहा गया है।
4) संक्रामक रोगों से पीड़ित होने, ज्वर के कारण और रक्ताल्पता (एनीमिया) में अरुचि हो जाती है। अरुचि स्वतंत्र रोग नहीं दूसरे रोगों के साथ उत्पन्न विकृति है।

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अरुचि के प्रकार और लक्षण :

आयुर्वेद चिकित्सा ग्रंथों में वातादि दोषों के प्रकुपित होने से अरुचि को विभिन्न रूपों में विभक्त किया गया है। वात प्रधान, पित्त प्रधान, कफ प्रधान, त्रिदोष प्रधान और आगंतुक प्रधान।

1. वात प्रधान : वात प्रधान अरुचि के कारण रोगी के हृदय में शूल, मुंह में कसैलापन, दांतों में खट्टापन और कोष्ठबद्धता की विकृति के लक्षण दिखाईbhukh na lagna ke karan aur upay देते हैं।
2. पित्त प्रधान : पित्त प्रधान अरुचि में मुंह में कड़वाहट, कभी अम्लीय स्वाद, अधिक प्यास, दाह, मुंह में भाप निकलने, बचैनी के लक्षण दिखाई देते हैं।
3. कफ प्रधान : कफ प्रधान अरुचि होने पर मुंह में खारा स्वाद, कभी मीठा स्वाद, शरीर में भारीपन, आलस्य, खुजली व मुंह में कफ के लक्षण दिखाई देते हैं। रोगी प्रतिश्याय (जुकाम) से पीड़ित होता है।
4 .त्रिदोषजन्य अरुचि : त्रिदोषजन्य अरुचि में हृदय शूल, तृषा (प्यास), दाह, शरीर के विभिन्न अंगों में पीड़ा, कफ की विकृति, शरीर में भारीपन और मन में काफी व्याकुलता रहती है।
5 . आगंतुक अरुचि : में रोगी को भोजन की गंध अप्रिय लगती है। जी मिचलाने और शरीर में बेचैनी होती है। भय लगने से वायु में क्षोभ उत्पन्न होता है। रोगी बहुत ग्लानि अनुभव करता है। मुंह में शुष्कता होती है और भोजन में अरुचि होती है।
आइये जाने अरुचि दूर कर भूख को बढ़ाने वाले आयुर्वेदिक घरेलु उपायों के बारे में |

भूख बढ़ाने के आयुर्वेदिक उपाय व घरेलु नुस्खे : bhukh badhane ke upay in hindi

चिकित्सा विशेषज्ञ वातज अरुचि में बस्ति (एनीमा), पित्तज अरुचि में विरेचन और कफज अरुचि में वमन द्वारा चिकित्सा करने से बहुत लाभ होता है। रोगी को माउथ वाश से दिन में दो-तीन कुल्ले करके मुंह साफ करना चाहिए। अरुचि के कारण दुर्गंध नष्ट होती है। रोगी के मानसिक तनाव, चिंता, भय व शोक के कारण उत्पन्न अरुचि में बातें करके सांत्वना भी देते रहना चाहिए।

वातिक अरुचि में चिकित्सा :

1)  नीबू का पानक: नीबू के रस को शक्कर और जल के साथ मिलाकर पानक बनाएं। इसमें लौंग और काली मिर्च का चूर्ण मिलाकर सेवन कराने से वात प्रकोप से उत्पन्न अरुचि नष्ट होती है। नीबू की शिकंजी बनाकर पिला सकते हैं।  ( और पढ़ें –  नींबू खाने के 6 बड़े लाभ )
2)  इमली का पानक : इमली के बीज निकालकर गुड़ या शक्कर के साथ जल में मिलाकर रख दें। दो-तीन घण्टे बाद इमली को मसलकर व छानकर उस जल में दाल चीनी, छोटी इलायची और काली मिर्च चूर्ण मिलाकर सेवन करने से अरुचि नष्ट होती है।  ( और पढ़ें – इमली खाने के 78 जबरदस्त फायदे  )
3)  यवानी खाण्डव चूर्ण 2 से 4 ग्राम मात्रा में जल के साथ सुबह-शाम सेवन करने से वातिक अरुचि नष्ट होती है।
4)  धनंजय वटी 1 से 6 गोली रोगी के स्वास्थ्य को देखते हुए हल्के उष्ण जल से सेवन कराएं। वातिक अरुचि नष्ट होती है।
5)  शिवाक्षार पाचन चूर्ण 2 से 4 ग्राम मात्रा में, दिन में दो बार, भोजन के बाद हल्के उष्ण जल के साथ सेवन कराने से वातिक अरुचि नष्ट होती है।
6)  रोगी को कोष्ठबद्धता होने पर पंचसकार चूर्ण 3 से 5 ग्राम मात्रा में रात्रि के समय हल्के उष्ण दूध या जल के साथ सेवन कराने से कोष्ठबद्धता नष्ट होती है। विरेचन के लिए इस चूर्ण का उपयोग किया जाता है।
7)  एलादि चूर्ण 3 से 6 ग्राम मात्रा में मधु और मिश्री मिलाकर रोगी को सुबह-शाम चटाने से अरुचि नष्ट होती है।

पित्तज अरुचि की चिकित्सा :

1) नीबू का शरबत बनाकर पीने से पित्तज अरुचि नष्ट होती है।
2) अदरक का शरबत बनाकर रोगी को पिलाने से पित्तज अरुचि नष्ट होती है।   ( और पढ़ें –  स्वास्थ्यवर्धक अच्युताय आमला अदरक पेय )
3) एलादि वटी की 1 से 4 गोली दूध के साथ सेवन करा सकते हैं। गोलियां चूसने से भी बहुत लाभ होता है। पित्त विकृति से उत्पन्न अरुचि नष्ट होती है।
4) लवंगादि चूर्ण 3 से 6 ग्राम मात्रा में मधु या गाय के दूध के साथ सुबह शाम सेवन कराने से पित्तज अरुचि नष्ट होती है। इस चूर्ण को शीतल जल के साथ भी सेवन करा सकते हैं। यह चूर्ण भोजन में रुचि पैदा करता है।
5) सितोपलादि चूर्ण 2 ग्राम मात्रा में मधु और घी के साथ सेवन कराने से पित्तज अरुचि नष्ट होती है। अग्निमांद्य की विकृति भी नष्ट होती है।
6) द्राक्षावलेह के सेवन से पित्तज अरुचि नष्ट होती है।

श्लैष्मिक (कफज) अरुचि की चिकित्सा :

1)  आर्द्रकावलेह 10 से 20 ग्राम मात्रा में सुबह-शाम सेवन करने से कफज अरुचि नष्ट होती है। वात और कफ प्रधान रोगों में बहुत लाभ करता है।
2)  अदरक और सेंधा नमक मिलाकर भोजन से पहले सेवन करने से अरुचि नष्ट होती है।   ( और पढ़ें –  सेंधा नमक के फायदे )
3)  अदरक का शरबत बनाकर सेवन करने से श्लैष्मिक अरुचि नष्ट होती है। स्वादिष्ट शरबत पाचन क्रिया को तीव्र करता है।
4)  धनंजय वटी की 1 से 6 गोली दिन में हल्के उष्ण जल के साथ सेवन करने से श्लैष्मिक अरुचि नष्ट होती है।
5)  आमवृद्धि के कारण उत्पन्न अरुचि में अग्निकुमार रस की 1 से 2 गोली जल के साथ सेवन कराएं। पाचन क्रिया के क्षीण होने से उत्पन्न अजीर्ण और कोष्ठबद्धता को नष्ट करके भूख बढ़ाता है।
6)  आंत्रपुच्छ शोथ (अपेंडिसाइटिस) रोग में अरुचि होने पर अग्नितुण्डी वटी की 1 या 2 गोली हल्के उष्ण जल के साथ सेवन कराएं।
7)  अधिक गरिष्ठ भोजन खाने पर उत्पन्न अरुचि में लघु कव्याद रस की 2 से 4 गोली तक्र में सेंधा नमक मिलाकर सेवन करने से बहुत लाभ होता है। भोजन शीघ्रता से पच जाता है और रोगी को भूख लगने लगती है।

त्रिदोषज अरुचि की चिकित्सा :

1)  यवानी खाण्डव चूर्ण 2 से 4 ग्राम मात्रा में मधु या जल के साथ सुबह शाम सेवन करने से त्रिदोषज अरुचि नष्ट होती है।
2)  क्षुदबोधक रस की 1-1 गोली सुबह-शाम जल के साथ सेवन करने से त्रिदोषज अरुचि नष्ट होती है।
3)  कारंयादि गुटिका (गोली) : काला जीरा, भुना सफेद जीरा, काली मिर्च, मुनक्का, अनारदाना, काला नमक, अमचूर और गुड़, सभी चीजें बराबर मात्रा में मिलाकर कूट-पीसकर मधु के साथ छोटी-छोटी गोलियां बनाकर छाया में सुखाकर रखें। सुबह-शाम 1-1 गोली सेवन करने से त्रिदोषज अरुचि नष्ट होती है। आगंतुक अरुचि की चिकित्सा
4)  अनार का शरबत पीने से आगंतुक अरुचि नष्ट होती है।   ( और पढ़ें – अनार के 118 चमत्कारिक फायदे )
5)  नीबू का शरबत भी आगंतुक अरुचि में बहुत लाभ पहुंचाता है।
6)  कण्ठ सुधारक वटी (गोली) मुंह में रखकर धीरे-धीरे चूसने से अरुचि नष्ट होती है।
7)  द्राक्षासव भोजन के बाद 15 से 20 मि.ली. मात्रा में इतना ही जल मिलाकर पीने से अरुचि नष्ट होती है। पाचन क्रिया तीव्र होने से अधिक भूख लगती है।
8)  जीर्ण ज्वर के बाद अरुचि होने पर अमृतारिष्ट 15 से 20 मि.ली. मात्रा में जल मिलाकर भोजन के बाद सेवन करने से बहुत लाभ होता है।
9)  सुदर्शन चूर्ण 3 से 6 ग्राम मात्रा में सुबह-शाम हल्के उष्ण जल के साथ सेवन कराने से जीर्ण ज्वर के बाद उत्पन्न अरुचि नष्ट होती है। पाचन क्रिया तीव्र होने से अधिक भूख लगती है।
10) कामला अर्थात् पीलिया रोग में अरुचि होने पर ताप्यादि लौह 3-3 रत्ती मात्रा में सुबह-शाम मूली के रस के साथ सेवन कराने से बहुत लाभ होता है।
11) भोजन से पहले नीबू के रस में अदरक के छोटे-छोटे टुकड़े व सेंधा नमक मिलाकर खाने से सभी तरह की अरुचि नष्ट होती है।
12) अदरक काला जीरा, काला नमक, अनारदाना, हरा धनिया, पुदीना की चटनी बनाकर, नीबू का रस मिलाकर खाने से अरुचि नष्ट होती है।

आहार-विहार :

1)  अरुचि में आहार पर नियंत्रण रखना बहुत आवश्यक होता है। अरुचि में किसी भी खाद्य पदार्थ के खाने की इच्छा नहीं होती। कुछ व्यक्ति अरुचि में कोष्ठबद्धता से पीड़ित होते हैं। अरुचि की उत्पत्ति आंतों में शुष्क मल के एकत्र होने से अधिक हो सकती है। ऐसी स्थिति में त्रिफला चूर्ण का सेवन करके कोष्ठबद्धता को नष्ट करके अरुचि का निवारण कर सकते हैं।
2)  अरुचि के रोगी को नीबू, अनार, इमली आदि से बने शरबत देने से पाचन क्रिया तीव्र होने से भूख लगती है तो भोजन की इच्छा होने लगती है।
3)  अरुचि के रोगी को करंज की दातन करने से भी लाभ होता है। दातन के साथ रोगी को जीभ साफ करनी चाहिए। जीभ पर जमी मैल हट जाने से स्वाद बढ़ता है।
4)  प्याज के छोटे-छोटे टुकड़े सिरके में डालकर, सेंधा नमक मिलाकर सेवन करने से अरुचि नष्ट होती है।  ( और पढ़ें – प्याज खाने के 141 फायदे  )
5)  अरुचि के रोगी को घी, तेल से बने खाद्य पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए। गरिष्ठ खाद्य पदार्थ भी अरुचि को विकसित करते हैं।
6)  लहसुन, धनिया, पुदीने की चटनी व शरबत पीने से अरुचि कम होती है।
7)  रोगी को अदरक, सोंठ, काली मिर्च, काला नमक, अंगूर, कमरख, अनार, जामुन, फालसे, संतरा, चकोतरा, नारियल का जल, आंवले का मुरब्बा, गुलकंद, मिश्री, हरड़, अजवायन आदि का इस्तेमाल करना चाहिए।

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