परिचय :

सभी प्रकार के आहार-द्रव्यों में पृथक-पृथक गुण होते हैं जोकि पंच-तत्त्वों की न्यूनाधिकता के कारण उत्पन्न होते हैं। इनके रस भी अलगअलग होते हैं। विभिन्न प्रकार की निर्माण-विधियों के द्वारा जब इन आहार-द्रव्यों के संस्कार किये जाते हैं, तब विभिन्न आहार-द्रव्यों के संयोग के परिणामस्वरूप और ओषधि-द्रव्यों के मिश्रण के परिणामस्वरूप इनके गुणों में परिवर्तन आ जाता है जोकि कभी-कभी वास्तविक आहार-द्रव्य के गुण से भी बहुत-कुछ भिन्नता रखता है। अनेक व्यक्ति आहार-द्रव्यों के गुणों से ही परिचित नहीं होते, और परिचित भी हों तो संयोग, संस्कार एवं मिश्रण के परिणामस्वरूप उसके गुणों का ज्ञान न होने से उनका सेवन अनेक बार उनके लिए अस्वास्थ्यप्रद एवं अनेक रोगों की उत्पत्ति का कारण बन जाता है।
अतः संक्षेप में कुछ आहार-पदार्थों के गुण-दोषों की जानकारी आवश्यक हो जाती है।

किस रोग में क्या खाना चाहिये व खाद्य-पदार्थों के गुण-दोष : kis rog me kya khaye

1-जल-स्वच्छ जल क्लेद-नाशक, बलकारक, शीतल, हल्का, ग्लानिहारक, तृप्तिदायक, हृदय को प्रिय तथा जीवनदायक होता है। जल मूच्र्छा, प्यास, तन्द्रा, वमन, उल्टी विबन्ध (कब्ज), निद्रा एवं अजीर्ण को नष्ट करनेवाला होता है।

2-दूध –यह मधुर, स्निग्ध, वातनाशक, पित्तनाशक, दस्तावर, वीर्य को शीघ्र उत्पन्न करनेवाला, शीतल, पुष्टिकारक, बलदायक, बुद्धिदायक एवं तृप्तिकारक माना जाता है। ( और पढ़ेदूध पीने के 98 हैरान कर देने वाले जबरदस्त फायदे)

3- दही–जठराग्नि को दीप्त करनेवाला, स्निग्ध (चिकना), भारी, बल एवं वीर्यवर्धक होता है, मूत्रकृच्छ (पेशाब खिंचकर आना), अरुचि एवं दस्तों की बीमारी में विशेष हितकारी होता है।

4-घी–रसायन, मधुर, नेत्रों को हितकारी, अग्नि-प्रदीपक, शीतवीर्य,वातनाशक एवं पित्तनाशक है। यह बल, वर्ण, बुद्धि के लिए भी उत्तम है। आयुवर्धक और स्निग्ध होने के साथ कफकारक भी है। यह पेट के भारीपन, उन्माद, शूल अफारा, विसर्प तथा रक्तविकार को नष्ट करता है। ( और पढ़ेगाय के घी के अद्भुत लाभ )

4-भात–चावलों का भात अग्नि को प्रदीप्त करता है। तृप्तिकारक, रुचिकारक एवं पथ्य है, किन्तु बिना धुला हुआ एवं बिना मांड निकाला हुआ भात भारी, अरुचिकारक तथा कफवर्धक होता है। यह वातकारक है तथा मांस एवं चर्बी को बढ़ाता है।

5- दाल-उड़द, चना, मोठ की दालें पेट में भारीपन पैदा करनेवाली हैं। जबकि मसूर और मूंग सुपाच्य हैं।

6-खिचड़ी-मूंग की दाल तथा चावल के संयोग से बनी हुई खिचड़ी बलवर्धक, कफ तथा पित्त को उत्पन्न करनेवाली, लघु (हल्की), विष्टम्भ पैदा करनेवाली, मल एवं मूत्र की क्रिया को ठीक करनेवाली होती है।

7-पुलाव-आलू, मटर, बड़ियों तथा गरम मसालों से सिद्ध पुलाव तृप्तिदायक, रुचिकारक, बलदायक, वृष्य (वीर्यवर्धक), कफकारक एवं पित्तनाशक है।

8-खीर–दूध, चावल तथा शक्कर (चीनी) के संयोग से सिद्ध यह भारी बलवर्धक एवं विष्टम्भकारक है। खीर पित्त, दाह, अग्नि और वायु को नष्ट करती है एवं पुष्टिकारक होती है।

9-रोटी-गेहूं के आटे से बनी रोटी बलकारक, रुचिकारक, पुष्टिकारक, वातनाशक, धातुवर्धक, कफनाशक एवं भारी होती है।

10-कचौड़ी-गेहूं के आटे में उड़द के दाल की पीठी डालकर बनी हुई कचौड़ी बलदायक, वृष्य (वीर्यवर्धक), रुचिकारक, वातनाशक, गरम, पुष्टिकारक, भारी, तृप्तिदायक, मलभेदक, मेदवर्धक, पित्त एवं कफकारक है। बवासीर में विशेष हितकारी है।

11-पापड़-मूंग के आटे से बना हुआ पापड़ रुचिकारक, अग्नि-प्रदीपक, पाचक तथा रूक्ष होता है। उड़द की दाल का पापड़ भारी होता है।

12-शाक–प्रायः सभी शाक शक्तिवर्धक और भारी होते हैं। ये अग्नि-प्रदीपक और हितकारी होते हैं तथा अपान वायु एवं मल को निकालनेवाले होते हैं। इनमें पालक शक्तिवर्धक है। मेथी हाजमा ठीक करनेवाली, रुचिकारक तथा भूख बढ़ानेवाली है।

पूर्वोक्त सभी प्रकार के आहार-द्रव्यों पर जो सूक्ष्म प्रकाश डाला गया है, उसमें देश, काल, जाति आदि भेद से आहार के नाना रूप हैं। सभी पर प्रकाश डालना सम्भव न होने के कारण, ऐसे सभी आहार-पदार्थों के द्रव्य-संयोग तथा संस्कार के प्रभावानुसार गुणों की कल्पना करके उपयोग करना चाहिए।

भोजन करने जरूरी नियम : bhojan ke jaruri niyam

✦ प्रात:काल और सायंकाल दो समय का भोजन श्रेष्ठ बताया गया है। इनके बीच में भोजन करना आमाशय, आंत एवं पाचक अग्नि सभी क्रिया को मन्द । करता है। हम वर्तमान में भी इसी प्राचीन कथन को प्रत्यक्ष देखते हैं कि जो व्यक्ति नियमित रूप से दोनों समय भोजन करते हैं, वे स्वस्थ रहकर जीवन में अन्य कार्यों को सुचारू रूप से कर पाते हैं।

✦ हमें यह ध्यान में रखना चाहिए कि दिन में केवल दो बार, सुबह और शाम भोजन करें। अल्पाहार के बीच कम-से-कम एक पहर अर्थात् तीन घंटे का अवकाश जरूर रहना चाहिए। अर्धपक्व (अधपची) अवस्था में यदि भोजन किया जाय तो आमाशय में पाचनक्रिया ठीक प्रकार से नहीं होती। यदि 6 घंटे बाद बहुत समय तक भोजन न किया जाय तो अशक्ति (कमजोरी) आती है। किन्तु इसका यह अर्थ नहीं है कि सुबह भोजन करने के पश्चात् सायंकाल भूख न भी लगे तो भी भोजन करना आवश्यक है। वास्तव में भूख लगने पर ही भोजन करना चाहिए। पूर्व-भोजन के पच जाने पर ही खाइये। साधारणतः सुबह-शाम के भोजन में आठ घंटे का अन्तर रहना चाहिए।

✦ दिन में भोजन करना श्रेष्ठ होता है क्योंकि दिन में समस्त ज्ञानेन्द्रियों व कर्मेन्दियों की क्रियाएं होती रहने से पेट में गया आहार दूषित नहीं होता।

✦ जिन व्यक्तियों को रात में भोजन करना ही पड़े, उन्हें रात के पहले तीन घंटों में भोजन कर लेना चाहिए, ताकि पाचन की क्रिया ठीक रहे।

✦ रात को दस बजे के बाद भोजन करना सदा हानिकारक होता है। इससे अपच, कब्ज, मधुमेह (शुगर) आदि रोग हो जाते हैं। ऋतुओं के अनुसार दिन छोटे व बड़े होने के कारण भोजन के समय में कुछ परिवर्तन किया जा सकता