मौजी भगत (बोध कथा) | Prerak Hindi Kahani

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मौजी भगत (बोध कथा) | Prerak Hindi Kahani

शिक्षाप्रद कहानी : Hindi Moral Story

  जिला गौहाटीके खगीपुर नामक एक गाँवमें एक अहीर रहता था। नाम था मनमौजी। था भी मौजी ! उसने गाँवके जानवरोंके चरानेका काम पसंद किया। यह कहानी उस समय की है जब कि भारत पर जहाँगीरी अमलदारी थी।

•  एक नदीके किनारे मौजी पाँच गायें चरा रहा था। वे गायें जमींदारोंकी थीं । रोटी-कपड़ा और दो रुपये माहवारी तनखाहपर मौजी काम करता था। न माँ, न बाप। परम स्वतन्त्र। न पढ़ा, न लिखा। परम मौजी। जिस बातको सच मानता, फिर चाहे वह एकदम गलत ही क्यों न हो, चींटा-सा चिपट जाता था। सत्यके साथ सारूप्य हो जानेकी आदत मौजीमें थी। पर सत्य और असत्यका विवेक करनेवाली निर्णय-शक्ति उसमें न थी, क्योंकि वह सत्संगहीन था। सत्संगहीन सदा मूर्ख रहता है, फिर चाहे वह डबल एम० ए० ही क्यों न हो। बात यह है कि संसारमें सत्य और असत्य दूध और पानीकी तरह मिला दिया गया है। असल और नकलको जाननेकी शक्ति सत्संगसे ही मिलती है।

•  आमके पेड़के नीचे बैठा मौजी एक भजन गुनगुना रहा था। तबतक वहाँ आ पहुँचे एक पण्डितजी। कंधेपर झोला और मस्तकपर लंबे तिलक। पण्डितजी वहाँ ठहर गये। दोपहर हो रहा था। पण्डितजीने झोलेमेंसे धोती निकाली और स्नान किया। इसके बाद पालथी मारकर बैठ गये और दोनों आँखें बंद कर लीं। फिर दाहिने हाथसे नाक दबा ली और बस, बड़ी देरतक बैठे रहे। इसके बाद उन्होंने मुँगके दो लड्डू निकाले और खा-पीकर चलनेको तैयार हुए। तब मौजी बोला-‘पा लागी पिंडीजी माराज !
पण्डित-आशीर्वचन ।
मौजी–आप कहाँ रहते हैं?
पण्डित–केसमपुर।
मौजी –आप इधर जा कहाँ रहे हैं?
पण्डित-दौलताबाद। वहाँ मेरे चेले लोग रहते हैं।
मौजी-रिस न हों तो एक बात पूछूँ ?
पण्डित–पूछो।
मौजी-अभी आप नाक बंद करके क्या कर रहे थे?
पण्डित-भगवान्का दर्शन कर रहा था।
मौजी –ठीक !
बस। पण्डितजी एक तरफ चले गये।

•  मौजीके पास दूसरी धोती न थी। वह नंगा होकर नदीमें कूद पड़ा और नहाकर बाहर निकला। उसने धोती पहनी और वह पालथी मारकर बैठ गया। तब उसने आँखें बंद कीं और फिर
नाक भी पकड़ ली; परंतु जब कुछ भी दिखायी न पड़ा, तब मौजीने कहा-‘पण्डितजीको भगवान् दीखते थे तो मुझे क्यों नहीं दिखायी देंगे?
इतना कहकर उसने नाक और जोरसे दबायी। शायद नाकको कम दबाया हो यह सोचकर। मगर कुछ नहीं। थोड़ी देर बाद मौजीकी साँस घुटने लगी। तब उसने कहा-‘प्राण ही चाहे क्यों न निकल जायँ, लेकिन जबतक भगवान्के दर्शन न होंगे तबतक नाक नहीं छोडूंगा।’

•  कुछ देर बाद व्याकुलताने असह्य रूप धारण | किया |मौजी बोला–‘प्राण प्यारे हैं, जरूर हैं; लेकिन भगवान्से ज्यादा प्यारे नहीं ।’ उसने नाक और भी कस ली। प्राणकी डोरी भगवान्के सिंहासनमें बँधी होती है। चूंकि प्राणका रूप साँप-जैसा है, इसलिये समस्त साँपोंके यानी समस्त प्राणीके समुह शेषनाग पर
भगवान् विष्णुजी सदा विराजमान रहते ही हैं। मौजीके प्राणका खटका सिंहासनपर पहुँचा। भगवान्ने देखा तो एक अहीरका लड़का नाक दबाये जंगलमें बैठा है। कारण जो पूछा तो मायाने पण्डितजी वाली कहानी समझा दी। लक्ष्मीके नामसे भगवान्के पास योगमाया सदा हाजिर ही रहती है। भगवान्ने सारा माजरा जानकर सोचा कि मौजीकी मौत अभी आयी नहीं, जो वह मर जायगा; इसलिये उसे दर्शन देना चाहिये। भगवान्ने मौजीके सामने प्रकट होकर कहा-‘आँखें, खोलो। मैं आ गया।’

•  आवाज सुनकर मौजीने आँखें खोलीं और नाक भी छोड़ दी। कुछ देर साँस लेकर वह बोला- आप कौन हैं?
भगवान्- भगवान् हूँ।
मौजी- इसका क्या सबूत कि आप ही भगवान् हैं?
भगवान्- तुम जैसा चाहो सबूत ले लो।Hindi Moral Story
मौजी- मैं उन पण्डितजीको बुलाये लाता हूँ, अभी वे बहुत दूर नहीं गये होंगे। अगर पण्डितजी कह देंगे कि तुम्हीं भगवान् हो तो मैं मान लूंगा; क्योंकि उन्होंने भगवान् देखे हैं, मैंने तो कभी देखा नहीं।
भगवान्–अच्छी बात है।
मौजी– लेकिन जबतक मैं पण्डितजीको लेने जाऊँ तबतक कहीं अगर आप खिसक गये तो?
भगवान्-नहीं, मैं यहीं खड़ा रहूँगा।
मौजी- अनजाने आदमीका क्या विश्वास ? मैं आपको रस्सीसे कसकर इस आमके वृक्षसे बाँध जाऊँगा।
भगवान्–अच्छा भाई, बाँध लो।

•  मौजी उठा। पाँचों गायोंकी रस्सियाँ खोलीं और उन सबको बाँधकर उसने तीस हाथ लंबा एक रस्सा तैयार किया। भगवान् बेचारे खुद ही आमके वृक्षसे सटकर जा खड़े हुए। मौजीने बेकलक तरीकेसे उनको कसकर बाँध दिया। फिर वह दौड़ा। दो फर्लाग दौड़नेके बाद पण्डितजी दिखलायी पड़े। उसने चिल्लाकर कहा-‘ओ पिंडीजी माराज!
चलो देख लो कि तुम्हारेवाले भगवान् यही हैं कि कोई दूसरे? मैंने उनको आमके वृक्षसे बाँध दिया है।’ पण्डितजीने आवाज सुनी मगर मतलब कुछ भी न समझे। मुड़कर देखा तो वही लड़का दौड़ता आ रहा है कि जो नदी-किनारे मिला था।

  पण्डितजीने सोचा कि यह युवक है और मैं | बूढ़ा हूँ। कहीं मेरा झोला छीनने न आता हो। पण्डितजी आगेको सरपटे। मगर मौजी था अपनी धुनका पक्का। उसने दौड़कर पण्डितजीका हाथ पकड़ लिया। लाचारीके कारण पण्डितजी वहाँ आये, जहाँ वह आमका वृक्ष था। मौजी-देखो पिंडीजी ! यही भगवान् हैं न?
पण्डितजीने बहुत इधर-उधर देखा। आमके वृक्षसे एक रस्सा लिपटा था और कहीं कुछ न था।

पण्डितजी–कहाँ हैं?
मौजी–दिनमें नहीं सूझता? वे कैसे बँधे हैं?
पण्डितजीने अपना पिण्ड छुड़ानेकी गरजसे झूठ ही कह दिया कि ‘हाँ, यही हैं। इसके बाद मौजी फिर बोला-‘नजदीक जाकर देख लो, फिर कभी यह मत कहना कि ये वे नहीं हैं।’
पण्डितजी को भगवान् दिखायी नहीं दे रहे थे। परंतु उन्होंने कहा-‘बस-बस, यही हैं यहीं।’
अब पण्डितजीकी छुट्टी थी। वे चल दिये। मौजीने रस्सा खोला। भगवान्के चरण छुए।
भगवान्—वह पण्डित मेरा भक्त नहीं है, वह तो पाखंडी है।
मौजी- तो आप पाखंडीको क्यों दर्शन देते हैं?
भगवान्–मैंने उसे कभी दर्शन नहीं दिया।
मौजी-वाह, वह कहता था कि मैं रोज दर्शन किया करता हूँ। और अभी मेरे सामने वह आपको देख गया है। | भगवान्—उसने न तो आज देखा और न पहले कभी देखा था। वह झूठा है।
मौजी–लेकिन उनके झूठने मुझे सचसे मिला दिया। वे पाखंडी ही सही, परंतु मेरे गुरु हैं।
भगवान्—तुम क्या चाहते हो ? मेरा दर्शन व्यर्थ नहीं होता।
मौजी–मैं यह चाहता हूँ कि जब मैं नहाकर नाक बंद किया करूं, तब आपका दर्शन हुआ करे।
भगवान्–ऐसा ही होगा।
मौजी–एक बात आपने अपनी खुशीसे दी। एक बात मेरे माँगनेसे दीजिये।
भगवान्-माँगो !
मौजी-जब पण्डितजी नाक बंद किया करें तब उनको भी दर्शन दिया करें।
भगवान्—तब तो वह भी सुधर जायगा; क्योंकि मेरा दर्शन पानेवाले मिथ्याचारी नहीं रह सकते।
मौजी ! तुम धन्य हो । तुमने अपने गुरुका उद्धार किया और अपना उद्धार किया। गुरु ही चेलेका उद्धार किया करते हैं, पर आज चैलेने गुरुका उद्धार किया।

एक साल बाद वही पण्डितजी फिर उसी मार्गसे निकले। मौजी पूर्ववत् गायें चरा रहा था। जब दोनोंने दोनोंको देखा, तब मौजी बोला-गुरुजी ! प्रणाम।
पण्डित-गुरुजी ! प्रणाम।
मौजी-आप मेरे गुरु हैं, क्योंकि आपने मुझे भगवान्से मिलाया।
पण्डित–आप मेरे गुरु हैं, क्योंकि आपने मुझे भगवान्से मिलाया।
मौजी–मैं अहीर हूँ और आप ब्राह्मण हैं।
पण्डित-आप ही ब्राह्मण हैं और मैं अहीर हूँ।
मौजी–मैं मूढ़ था, आपने पण्डित बनाया !
पण्डित–मैं पाखंडी था, आपने भक्त बनाया।
मौजी–जो हुआ सो हुआ। हम दोनों दोनोंके गुरु हुए और दोनों दोनोंके चेला हुए।
पण्डित-मैंने यजमानीका पेशा छोड़ दिया। तुम भी गाय चरानेका पेशा छोड़ दो।
मौजी–फिर क्या करोगे।
पण्डित-द्वार-द्वारपर रामनामको प्रचार करेंगे। तुम बजाया करना बँजड़ी और मैं बजाया करूँगा मजीरा।। मौजी–दोनों मिलकर भक्तिके भजन गाया करेंगे।
पण्डित–हाँ! रामनामके पवित्र जलमें खुद भी नहाया करेंगे। और संसारको भी नहलाया करेंगे।
मौजी-नाम क्या रखोगे ?
पण्डित–तुम्हारा नाम रहेगा-पण्डितदास और मेरा नाम रहेगाअहीरदास।
मौजी–क्योंकि मेरा गुरु एक पण्डित है और आपका एक अहीर है।
पण्डित–हाँ! |
गौहाटी जिलेमें दो साधु घूम-घूमकर भजन गाते हुए देखे जाने लगे। जब वे भजन गाते तो स्वयं मस्त हो जाते और सुननेवाले भी मगन हो जाते । भगवान की लीला विचित्र है।
भगवान को धन्य है और उनके भक्तोंको भी धन्य है।

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