यज्ञ चिकित्सा से रोग निवारण | Vedic Yagya Chikitsa

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यज्ञ चिकित्सा से रोग निवारण | Vedic Yagya Chikitsa

यज्ञ चिकित्सा : Yagya Chikitsa se Rog Nivaran

★ आदियुग से अब तक चिकित्सा प्रणाली खोजों के आधार पर कहीं से कहीं जा चुकी है। चिकित्सा प्रणालियों के क्रमिक विकास में वेद के अन्तर्गत ही कई प्रकार कि पद्धतियों का उल्लेख मिलता है। जब सब प्रकार के उपचार और वैद्य, रोगी को स्वस्थ करने में असमर्थ हो जाते हैं तब वह, पूजा अर्चाना, स्तुति, प्रार्थना, यज्ञ, याग, दान, पुण्य आदि की शरण लेता है। इस प्रकार के अनेको मन्त्र ऋग्वेद, अर्थवेद और यजुर्वेद में पाए जाते हैं। यहां हम यज्ञ चिकित्सा की ही चर्चा कर रहे हैं, जिसे वेदों में सर्वोपरि माना गया है।

★ यों तो वेद मन्त्रों द्वारा ही जीवन की सभी इच्छाएं पल्लवित हुई हैं और उसके लिए बड़े-बड़े राजसूय यज्ञ, पुत्रेष्टि यज्ञ, रोग निवारणार्थ यज्ञों के मन्त्र और उनकी समिधा, औषधियां और विधि कहीं एक सूत्र में न होकर अनेकानेक ग्रन्थों फैली पड़ी हैं। यदि इन सब विधियों को संकलित कर लिया जाये तो मानव के स्वास्थय लाभ के लिए सबसे सरल, सफल, हानि रहित चिकित्सा पद्धति का स्थापन हो सकता है।

★ एलोपैथी की सभी किटाणु नाशक औषधियों के सम्बन्ध में सभी डाक्टरों का एक ही मत है कि वे शरीर को हानि पहुँचाए बिना किटाणु का नाश कर ही नहीं सकती। जबकि यज्ञ पद्धति से ऐसे सूक्ष्माति सूक्ष्म कणों को उत्सर्जन होता है जो शरीर को हानि पहुंचाए बगैर किटाणुओं को समाप्त कर देते हैं।

★ यज्ञ-चिकित्सा का सर्व श्रेष्ठ गुण तो यह है कि इसमें रोगी को औषधी खाने की आवश्यकता नहीं होती तथा इसके द्वारा शरीर में औषधि इन्जेक्शन के तीव्र प्रभाव से अधिक शीघ्र शरीर पर अपना प्रभाव डाल देती है। अग्नि के इस महान गुणकारी परिणाम स्वरूप ही हमारे पूर्वजों ने अग्नि को देव माना है।

★ यज्ञ में प्रयुक्त विशेष वृक्ष की समिधा और औषधि मिलकर वाष्प रूप में सांस के द्वारा शरीर की रक्त प्रणाली में पहुंचते ही अपना प्रभाव तत्काल दिखाती है इसीलिए यज्ञ में प्रयुक्त की जाने वाली समिधा(लकड़ी) पीपल, आम, गूलर, जामुन आदि वृक्षों से ग्रहण करने का विधान है।

★ वैदिक यज्ञ और यज्ञ चिकित्सा का अपना शास्त्रीय विधान है। विधानानुसार किए गए यज्ञ का परिणाम भी फलदायी होता है।

★ बात केवल 45 वर्ष पुरानी है, नरवर वेद महाविद्यालय, भगीरथी के पावन तट पर, बुलन्दशहर मण्डल, उत्तर प्रदेश में स्थित है। एक बार विद्यालय के कुछ छात्रों ने हास्य में वेदज्ञ पुज्य श्री रमेशचन्द्र जी को यह चुनौती दी कि वेदपाठी जी यदि वर्षा कराओं तो आपको वेदाज्ञ मान लिया जाएगा।

★ वेदपाठी जी ने उन छात्रों से कहा कि तुम लोग तन मन से यज्ञ की सेवा करों तो यज्ञ द्वारा वर्षा अवश्य कराई जा सकती है ,

★ विद्यार्थियों की स्वीकृति के बाद वेदपाठी जी ने पौने किलोमीटर दूर श्री गंगा जल लाने वाले छात्रों को नियुक्त करके, अभिषेक मन्त्रोचारण करने वाले वेदपाठी नियुक्त किए, श्री मान्यवर रमेश चन्द जी ने विधिवत देवपूजन कर अविच्छेद जल धाराभिषेक आरम्भ किया।Yagya Chikitsa se Rog Nivaran

★ जल धारा आरम्भ हुई, अभिषेक कलश के रिक्त होने से पूर्व गंगाजल कलशों का चक्र चलने लगा। प्रणाली बन्द करने से मन्दिर गंगाजल से भरने लगा, मान्य वेद पाठी जी साम वेदी सूक्तों का गायन करने लगे, विद्यालय में एक कौतुक पूर्ण वातावरण बनने लगा, जल धारा अविच्छेद चलती रही, मन्त्राचार सस्वर होता रहा।

★ देवाधिदेव प्रातः स्मरणीय आशुतोष भगवान सदाशिव को लिंग स्वरूप मूर्ति का केवल अर्ध दर्शन होने लगा। रमेशचन्द्र जी भावमय होकर सामऋचाओं द्वारा भगवान आशुतोश को प्रसन्न करने में तन्मय हो रहे थे। लगभग 3 घण्टे श्रम करके गंगा जलधारा ने जो कि एक कलश से भगवान शंकर पर गिर रही थी। सारे मन्दिर को गंगाजल से भरते हुए शिवलिंग को भी गंगाजल में निमग्न कर दिया।

★ तभी पूर्व दिशा से काली घटाएं घिर आयी और वर्षा की झड़ी लग गयी, वर्षा में भीगते हुए गंगाजल आता रहा, समन्त्र जलधारा चलती रही। कुछ समय बाद आचार्य रमेशचन्द्र जी के अनुष्ठान समाप्त किया | चारों और से कर्म की प्रशंसा हुई।

★ अभिषेकात्मक यज्ञ का यह चमत्कार प्रत्यक्ष देखा गया था। होमात्मक, जपात्मक तथा अभिषेमात्मक यज्ञों का प्रयोग चिकित्सा क्षेत्र में भी होता आ रहा है।

★ डॉक्टर जिस मरीज के मर्ज को लाईलाज घोषित कर चुके हों, ऐसे रोगियों ने भी स्वास्थ्य लाभ पाया है। किस रोग के लिये किस मन्त्र का जप या अभिषेक अथवा होम करना है, इस विषय के जानकार तथा संयम से रहने वाले जन ही यज्ञ द्वारा चिकित्सा कर सकते हैं।

★ यज्ञ चिकित्सा के विषय में चिकित्सा चूडामणि महामहोपाध्याय श्रीकृष्णचन्द्र द्विवेदी के पास मार्च मास सन् 75 के दिन एक युवक आया। उसने प्रार्थना करते हुए कहा कि मुझे अपने पिता को दिखाना है। कृपा करके आप कष्ट कीजिए, उस युवक का आग्रह स्वीकार करके उसी की कार से उसके घर जा पहुंचे। – रोगी का निरीक्षण करके यह ज्ञात हुआ कि यकृत में पितव्रण था, जिसका आपरेशन कराए दो मास हो चुके हैं। किन्तु तभी से वे और अधिक कष्ट अनुभव कर रहे थे।

★ गोधृत मिलाकर हवन में गिलोय, काले तिल, ढाक के सूखे फूल की सामग्री बनाकर, ढाक की समिधाओं (लकडी) से। हवन कराया गया। प्रथम गणेशाम्बिका पूजन करके निम्नलिखित मन्त्र से आहुतियां दी गयी। –

रोगान शेषानपहसिंतुष्टा रूष्टातु कामान् सकलान् भिष्टान्।।
त्वमाश्रितानां न विपन्नराणां त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयान्ति।।

★ 500 आहुतियां प्रतिदिन पांच दिन तक हवन किया गया, औषधियों के सेवन व हवन से मुख ठीक हो गया। इस प्रकार उच्च कोटि के डाक्टरों से निराश रोगी एक मास में पूर्ण स्वस्थ हो गये।

★ चरक संहिता आयुर्वेद का श्रेष्ठतम ग्रन्थ है। चिकित्सा खण्ड में यज्ञ – चिकित्सा पर विस्तृत प्रकाश डाला है। तपेदिक रोग से मुक्ति की इच्छा रखने बालों का यक्ष्मा नाशक वेद विहित यज्ञ का आश्रय लेना चाहिए। अथर्वेद में कहा गया है।

किन तं यक्ष्मा अरुन्धते नैर्नशयथोऽश्नुते।।

★ अर्थात गूगल औषधि की उत्तम गन्ध जिस रोगी को प्राप्त होती है उसे। यक्ष्मा आदि छूत की बिमारियां नहीं सताती है। ऋग्वेद में औषिधियों का जन्म यज्ञाग्नि से बताया गया है।

★ औषधियाँ को सम्बोधित करते हुए कहा गया है। कि हे औषधियों! तुम। सैकड़ों गुणों से सम्पन्न हो और प्राणियों को अरोग्यता प्रदान करने वाली हो। बिना श्रद्धा के किया हुआ यज्ञ सफल नहीं होता है। श्रद्धा के साथ विधि भी आवश्यक है।

★ यज्ञ वेदी से उठने वाले धुए से जहां नाना भांति के अस्वास्थ्यकार आकाशीय कीट पतंगों का विनाश होता है वहीं संस्कृत की सूक्तियों के उच्चारण से हृदय में पवित्रता, निर्मलता का संचार होता है।

किस रोग में कौनसी औषधि से करें यज्ञ :

यदि किसी रोग विशेष की चिकित्सा के लिए हवन करना हो तो उसमें उस रोग को दूर करने वाली ऐसी औषधियाँ सामग्री में और मिला लेनी चाहिए जो हवन करने पर खाँसी न उत्पन्न करती हों। यह मिश्रण इस प्रकार हो सकता है—

(1) साधारण बखारो में तुलसी की लकड़ी, तुलसी के बीज, चिरायता, करंजे की गिरी
(2) विषम ज्वरों में—पाढ़ की जड़, नागरमोथा, लाल चन्दन, नीम की गुठली, अपामार्ग,
(3) जीर्ण ज्वरों में-केशर, काक सिंगी, नेत्रवाला, त्रायमाण, खिरेंटी, कूट, पोहकर मूल
(4) चेचक में—वंशलोचन, धमासा, धनिया, श्योनाक, चौलाई की जड़
(5) खाँसी में —मुलहठी, अड़ूसा, काकड़ा सिंगी, इलायची, बहेड़ा, उन्नाव, कुलंजन
(6) जुकाम में—अनार के बीज, दूब की जड़, गुलाब के फूल, पोस्त, गुलबनफसा
(7) श्वाँस में—धाय के फूल, पोन्त के डौड़े, बबूल का वक्कल, मालकाँगनी, बड़ी इलायची,
(8) प्रमेह में—ताल मखाना, मूसली, गोखरु बड़ा, शतावरि, सालममिश्री, लजवंती के बीज
(9) प्रदर में—अशोक की छाल, कमल केशर मोचरस, सुपाड़ी, माजूफल
(10) बात व्याधियों में—सहजन की छाल, रास्ना, पुनर्नवा, धमासा, असगंध, बिदारीकंद, मैंथी,
(11) रक्त विकार में—मजीठ, हरड़, बावची, सरफोंका, जबासा, उसवा
(12) हैजा में—धनियाँ, कासनी, सोंफ, कपूर, चित्रक
(13) अनिद्रा में—काकजघा पीपला-मूल, भारंगी
(14) उदर रोगों में—चव्य, चित्रक तालीस पत्र, दालचीनी, जीरा, आलू बुखारा, पीपरिं,
(15) दस्तों में—अतीस, बेलगिरी, ईसबगोल, मोचरस, मौलश्री की छाल, ताल मखाना, छुहारा।
(16) पेचिश में—मरोड़फली, अनारदाना, पोदीना, आम की गुठली, कतीरा
(17) मस्तिष्क संबंधी रोगों में-गोरख मुँडी, शंखपुष्पी, ब्राह्मी, बच शतावरी
(18) दाँत के रोगों में—शीतल चीनी, अकरकरा, बबूल की छाल, इलायची, चमेली की जड़
(19) नेत्र रोगों में-कपूर, लौंग, लाल चन्दन, रसोत, हल्दी, लोध
(20) घावों में—पद्माख, दूब की जड़, बड़ की जटाएं, तुलसी की जड़, तिल, नीम की गुठली, आँवा हल्दी।
(21) बंध्यत्व में-शिवलिंग के बीज, जटामासी, कूट, शिलाजीत, नागरमोथा, पीपल वृक्ष के पके फल, गूलर के पके फल, बड़ वृक्ष के पके फल, भट कटाई।
इसी प्रकार अन्य रोगों के लिए उन रोगों की निवारक औषधियाँ मिलाकर हवन सामग्री तैयार कर लेनी चाहिये।

2018-04-23T13:55:45+00:00 By |Adhyatma Vigyan, Articles|0 Comments

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