नीचे कुछ महत्वपूर्ण संस्थानों के नाम और उनके संस्कृत में ध्येय-वाक्य या मोट्टो दिये गये हैं साथ ही उनका हिंदी में अर्थ भी है :

– सर्वोच्च न्यायालय – “यतोधर्मस्ततो जय:”- धर्म की ही विजय होती है.

– सेना – “स्वधर्मे निधनं श्रेयः” – अपना धर्म का पालन करते हुए हुए मौत आ जाये तो श्रेष्ठ है।

– नौसेना – “शं नो वरुणः” – समुद्र के देवता की कृपा बनी रहे .

– वायुसेना – “नभःस्पृशं दीप्तम्” – आप का रूप आकाश तक दमक रहा है

– जीवन बीमा – “योगक्षेमं वहाम्यहम” – जो मुझमे ध्यान रखते है मै उनका ध्यान रखता हूँ.

– राजपुताना रायफल्स – “वीरम भोग्या वसुंधरा” – वीर ही इस धरती का सुख भोगेंगे .

– गढ़वाल रेजिमेंट – “युद्धाय कृत निश्चयः” – अर्जुन युद्ध करने के लिए तैयार हो जाए।

– दूरदर्शन -“सत्यम शिवम् सुन्दरम “- सत्य ही ईश्वर है. सत्य ही सुन्दर है.

– पर्यटन – “अतिथि देवो भव” – अतिथि ईश्वर है.

– दूरभाष – “अहर्निशं सेवामये”- हमेशा सेवारत

– पुलिस का है, “सद् रक्षणाय, खल निग्रहणाय।”

– संस्थान गुरुकुल काङ्गडी विश्वविद्यालय हरिद्वार उत्तराखण्ड- “ब्रह्मचर्येण तपसा देवा मृत्युमपाघ्नत” अर्थ – ब्रहमचर्य के तप से देव लोग मृत्यु को जीत लेते है

– अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान -“शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम् ” अर्थ -शरीर ही सभी धर्मों (कर्तव्यों) को पूरा करने का साधन है।

– विश्वविद्यालय अनुदान आयोग- “ज्ञान-विज्ञानं विमुक्तये ” अर्थ – ज्ञान-विज्ञान से विमुक्ति प्राप्त होती है।

– काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU) – “विद्ययाऽमृतमश्नुते” अर्थ- विद्या से अमृत की प्राप्ति होती है

– आन्ध्र विश्वविद्यालय – “तेजस्विनावधीतमस्तु” अर्थ -हमारा ज्ञान तेजवान बनें।

-वनस्थली विद्यापीठ -“सा विद्या या विमुक्तये” अर्थ-विद्या मुक्ति का द्वार है

– बंगाल अभियांत्रिकी एवं विज्ञान विश्वविद्यालय, शिवपुर- “उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान् निबोधत” अर्थ- उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक अपने लक्ष्य तक ना पहुँच जाओ

– भारतीय प्रशासनिक कर्मचारी महाविद्यालय, हैदराबाद- “संगच्छध्वं संवदध्वम्” अर्थ- साथ चलो, साथ बोलो

– बिड़ला प्रौद्योगिकी एवं विज्ञान संस्थान, पिलानी -“ज्ञानं परमं बलम्” अर्थ- ज्ञान सबसे बड़ा बल है

-केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड- “असतो मा सद्गमय ” अर्थ- हमें असत से सत की ओर ले चलें

– प्रौद्योगिकी महाविद्यालय, त्रिवेन्द्रम- “कर्म ज्यायो हि अकर्मण:” अर्थ- कर्म, अकर्म की तुलना में श्रेष्ठ है

– देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इन्दौर-“धियो यो नः प्रचोदयात्” अर्थ- दैवीय विद्वता हमारे कर्मो को प्रेरित करे

-गोविंद बल्लभ पंत अभियांत्रिकी महाविद्यालय (पौड़ी)-“तमसो मा ज्योतिर्गमय” अर्थ- हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलें

– गुजरात राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय- “आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः” अर्थ-हमारी तरफ़ सब ओर से शुभ विचार आएँ।

– भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान खड़गपुर -“योगः कर्मसु कौशलम्” अर्थ-परिश्रम, उत्कृष्टता का मार्ग है

– भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मुंबई -“ज्ञानं परमं ध्येयम्” अर्थ- ज्ञान परम ध्येय है।

-भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान कानपुर -“तमसो मा ज्योतिर्गमय” हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलें

-भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान चेन्नई- “सिद्धिर्भवति कर्मजा” अर्थ- सफ़लता का मूलमंत्र कठिन परिश्रम है

-भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान रुड़की-“श्रमं विना न किमपि साध्यम्” कोई उपलब्धि प्रयास के बिना असंभव है

-भारतीय प्रबंधन संस्थान अहमदाबाद – “विद्या विनियोगाद्विकास:” विद्या-विनियोग से विकास होता है।

-भारतीय प्रबंधन संस्थान बंगलौर- “तेजस्वि नावधीतमस्तु” हमारा ज्ञान तेजवान बनें।

-भारतीय सांख्यिकी संस्थान -“भिन्नेष्वेकस्य दर्शनम्” अनेकता में एकता का दर्शन।

-केन्द्रीय विद्यालय -“तत् त्वं पूषन् अपावृणु “- हे ईश्वर, आप उसे अनावृत्त कीजिए (=ज्ञान पर छाए आवरण को हटाइए)।

-मोतीलाल नेहरू राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान, इलाहाबाद- “सिद्धिर्भवति कर्मजा “- सफ़लता का मूलमंत्र कठिन परिश्रम है

-राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् (एन॰सी॰ई॰आर॰टी) “विद्ययाऽमृतमश्नुते “-विद्या से अमृत की प्राप्ति होती है

-राष्ट्रीय विधि विद्यालय – “धर्मो रक्षति रक्षितः”- जो धर्म की रक्षा करते हैं, वे धर्म द्वारा रक्षित होते हैं

-संपूणानंद संस्कृत विश्वविद्यालय श्रुतं मे गोपय मेरे श्रुत (सीखे हुए) की रक्षा करें।

-श्री सत्य सांई विश्वविद्यालय -“सत्यं वद् धर्मं चर “- सत्य बोलें, धर्म के मार्ग पर चलें

-कोलंबो विश्वविद्यालय -“बुद्धि: सर्वत्र भ्राजते:- बुद्धि सर्वत्र प्रकाशमान होती है।

-दिल्ली विश्वविद्यालय-“निष्ठा धृति: सत्यम् “- निष्ठा धृति और सत्य

-पेरादेनिया विश्वविद्यालय -” सर्वस्य लोचनं शास्त्रम् “ज्ञान सभी का नेत्र है

-पश्चिम बंगाल राष्ट्रीय न्यायिक विज्ञान विश्वविद्यालय – “युक्तिहीने विचारे तु धर्महानि: प्रजायते “- युक्तिहीन विचार से धर्म की हानि हो जाती है।

अगर हमारा देश धर्म से निरपेक्ष होता तो उसके महत्वपूर्ण संस्थानों के ध्येय वाक्य संस्कृत में ना होते ……