सूतशेखर रस के 14 लाजवाब फायदे गुण और उपयोग | Sutshekhar Ras Health Benefits in Hindi

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सूतशेखर रस के 14 लाजवाब फायदे गुण और उपयोग | Sutshekhar Ras Health Benefits in Hindi

सूतशेखर रस क्या है : sutshekhar ras kya hai

सुतशेखर रस एक आयुर्वेदिक औषधि है जो अम्लपित्त(Acidity), वमन, संग्रहणी, खाँसी, गुल्म, मन्दाग्नि, पेट फूलना, हिचकी जैसे बहुत से रोगो के इलाज में काम आती है।
इसके दो प्रकार प्रकार है –
1) सूतशेखर रस (स्वर्ण-युक्त) / sutshekhar ras gold
2) सूतशेखर रस (सादा)

सूतशेखर रस की सामाग्री : ingredients of sutshekhar ras

शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, सुवर्ण भस्म, रौप्य भस्म, शुद्ध सुहागा, सोंठ, मिर्च, पीपल, शुद्ध धतूरे के बीज, ताम्र भस्म, दालचीनी, तेजपात, छोटी इलायची, नागकेशर, शंख भस्म, बेलगिरी और कचूर

सेवन की मात्रा और अनुपान :

१-१ गोली सुबह-शाम शहद, गाय का घी ३ माशा, मीठे बेदाने या दाड़िम का रस, दाड़िमावलेह या शर्बत अनार अथवा लाजमण्ड के साथ दें।

सूतशेखर रस के फायदे , गुण और उपयोग : sutshekhar ras ke fayde , gun aur upyog

इस रसायन के उपयोग से अम्लपित्त, वमन, संग्रहणी, खाँसी, गुल्म, मन्दाग्नि, पेट फूलना, हिचकी आदि रोग नष्ट होते हैं।

✻ श्वास  : श्वास तथा राजयक्ष्मा में भी इसका प्रयोग किया जाता है। ( और पढ़ेअस्थमा–दमा-श्वास के 170 आयुर्वेदिक घरेलु उपचार )

✻ वात रोग  : यह रसायन पित्त और वातजन्य विकारों को शान्त करता है। विशेषतया– पित्त की विकृति जैसे अम्लता या तीक्ष्णता या आमाशय अथवा पित्ताशय में पित्त कमजोर हो अपना कार्य करने में असमर्थ हो गया हो, तो उसे सुधारता है। अतएव इसका प्रयोग अम्लपित्त में खट्टा वमन, कोष्ठ में दर्द होना, उदावर्त आदि पित्त-विकृति रोगों में प्राय: अधिक किया जाता है।

✻ दस्त : यह पित्तदोषनाशक होते हुए हृदय को बल देनेवाला तथा संग्राही (दस्त को बाँधने वाला) भी है। इसलिए राजयक्ष्मा की प्रथम और द्वितीयावस्था में तथा संग्रहणी और अतिसार आदि वात प्रधान रोगों में दस्त कम करने तथा हृदय को बल पहुँचाने के लिए इसे देते हैं। ( और पढ़े दस्त रोकने के 33 घरेलु उपाय )

✻ सूखी खाँसी : जिसमें कफ नहीं निकलता हो और रात में खाँसी का प्रकोप ज्यादा होता हो, तो सूतशेखर रस को सितोपलादि या तालीसादि चूर्ण के साथ उपयोग करने से खाँसी दूर हो जाती है।

✻ पेट दर्द  : यह पाचक पित्त की विकृति को दूर कर जठराग्नि को प्रदीप्त करता है और कोष्ठ में होनेवाले दर्द को दूर करता है, क्योंकि यह वेदनाशामक भी है, परन्तु यह अफीम की तरह शीघ्र ही वेदना (दर्द) का शमन नहीं करता, क्योंकि यह अफीम जैसा तीक्ष्ण -वीर्य प्रधान नहीं है। यद्यापि इसका प्रभाव दर्द में धीरे -धीरे होता है, परन्तु स्थायी होता है। यह उपद्रव को शान्त करते हुए मूल रोग को नष्ट करता है।
जैसे – अम्लपित्त में वात-प्रकोप से दर्द होता है और पित्त-प्रकोप के कारण खुट्टा वमन होता है, ये लक्षण प्रधानतया देखने में आते हैं। सूतशेखर रस वात-पित्तशामक गुण के कारण उपरोक्त दोनों विकारों को नष्ट करते हुए अम्लपित्त रोग को भी नष्ट कर देता है। इसलिए इसका प्रभाव धीरे-धीरे किन्तु स्थायी होता है। ( और पढ़ेपेट दर्द या मरोड़ दूर करने के 10 रामबाण घरेलु उपचार )

✻ हृदय : सूतशेखर रस का प्रभाव वातवाहिनी और रक्तवाहिनी शिराओं पर भी होता है। रक्तपित्त की गति में वृद्धि हो जाने के कारण हृदय और नाड़ी की गति में वृद्धि हो जाती है। इसको सूतशेखर रस कम कर देता है। इस रसायन से रक्तवाहिनी नाड़ी कुछ संकुचित हो जाती है, जिससे बढ़ी हुई रक्त की गति अपने-आप रुक जाती है। रक्त की गति कम होने पर हृदय की गति भी ठीक रूप से चलने लगती है, जिससे हृदय को कुछ शान्ति मिल जाती है, अतएव यह हृद्य है।

✻ आन्त्रिक सन्निपात में – पित्ताधिक्य होने पर सिर में दर्द, अण्ट-सण्ट बोलना, नींद न आना, प्यास, पीलापन लिये जलन के साथ दस्त होना, रक्त की गति में वृद्धि होना, सूखी खाँसी, पेशाब में पीलापन आदि लक्षण होते हैं। ऐसी अवस्था में सूतशेखर रस, प्रवाल चन्द्रपूटी और गिलोय सत्व में मिलाकर देने से पित्त की शान्ति हो जाती तथा बढ़ी हुई रक्त की गति कम हो जाती है। फिर धीरे-धीरे रोगी अच्छा होने लगता है।

✻वात और पित्त की वृद्धि  :  शरीर में वात और पित्त की वृद्धि से रक्त दूषित हो जाने पर रक्त का संचार सीधा न होकर कुछ टेढ़ा -मेढ़ा होने लगता है। यह संचार माथे की तरफ ज्यादा होता है। जिससे सिर में चक्कर आने लगता है, रोगी को मालूम होता है कि समस्त संचार घूम रहा है। रोगी बैठा हुआ रहे तो भी उसे मालूम होता है कि वह चल रहा है या ऊपर, नीचे आ-जा रहा है। इसमें आँखें बन्द हो जाती हैं, माथा शून्य होता है और कानों में सनसनाहट होने लगती है, हृदय की गति शिथिल हो जाती हैं, रोगी कभी-कभी घबराने भी लगता है। ऐसी अवस्था में सूतशेखर रस शंखपुष्पी चूर्ण १ माशा और यवासा चूर्ण १ माशा के साथ मिश्री मिला, गो-दुग्ध या ठण्डे जल के साथ देने से बहुत शीघ्र लाभ होता है।

✻ आक्षेप जन्य वायु रोग में – जैसे धनुष्टंकार, अपतन्त्रक (हिस्टीरिया), अपतानक, धनुर्वात आदि रोगों में भी इसका उपयोग होता है, परन्तु ये रोग वात-पित्तात्मक होने चाहिए।

✻ मासिक धर्म : कभी-कभी स्त्रियों को बच्चा पैदा होने के बाद अथवा मासिक धर्म खुल कर न होने से या दर्द के साथ होने पर चक्कर आने लगता है। यह चक्कर रह-रह कर आता है। इससे गर्भाशय में दर्द होना, कोष्ठ में दर्द होना, घबराहट और कमजोरी बढ़ते जाना, थोड़ा-थोड़ा वमन होना, बेचैनी, वमन होने के बाद पेट में दर्द होना आदि लक्षण होते हैं। ऐसी हालत में सूतशेखर रस के उपयोग से वातजन्य आक्षेप तथा पित्तज दोष शान्त हो जाते हैं। ( और पढ़ेमासिक धर्म में होने वाले दर्द को दूर करते है यह 12 घरेलू उपचार  )

✻ वातज सिर-दर्द में – सिर में कील ठोंकने के समान पीड़ा होने से रोगी का व्याकुल हो जाना, सम्पूर्ण माथे में दर्द होना, दर्द के मारे रोगी का पागल-सा हो जाना, रोना चिल्लाना आदि लक्षण होते हैं और पित्तज सिर दर्द में – सिर में जलन के साथ दर्द होना, कफ और मुँह सूखना, वमन होना आदि लक्षण होते हैं। इसमें सूतशेखर रस बहुत फायदा करता है।

✻ आमाशय के व्रण : आमाशय की श्लैष्मिक कला में सूजन के साथ छोटे-छोटे पतले व्रण हो जाते हैं, फिर इसमें कड़े अन्न का संयोग होने से दर्द होने लगता है और वह अन्न वहाँ पर रहकर सड़ने लगता है और जब वमन के साथ वह अन्न निकल जाता है तब कुछ शान्ति मिलती है। ऐसी अवस्था में सूतशेखर रस देने से आमाशय के व्रण का रोपण हो जाता तथा पित्त का स्त्राव भी नियमित रुप से होने लगता और अपचन आदि विकारों के नष्ट होने से दर्द भी नहीं होती है। औ.गु.ध.शा.

✻ अम्लपित्त : सूतशेखर रस 1 रत्ती (121.50 मि.ग्रा.) तथा कामदुधा रस 2 रत्ती (243 मि.ग्रा.) शहद के साथ प्रातः तथा सायं लें। भोजन व नाश्ते के बाद इसके ठीक पहलेवाला ऊपर लिखा नुस्खा सेवन करें। रात में सोते समय 3 ग्राम ईसबगोल की भूसी तथा 3 ग्राम मधुयष्ट्यादि चूर्ण मिलाकर पानी के साथ लें। यह उपाय सभी प्रकार के अम्लपित्त में लाभप्रद हैं |

सूतशेखर रस के नुकसान : sutshekhar ras ke nuksan (side effects)

1-इस आयुर्वेदिक औषधि को स्वय से लेना खतरनाक साबित हो सकता है।
2-सूतशेखर रस को डॉक्टर की सलाह के अनुसार सटीक खुराक समय की सीमित अवधि के लिए लें।

2018-08-23T10:18:28+00:00 By |भस्म(Bhasma)|0 Comments