पूज्य बापू जी का संदेश

ऋषि प्रसाद सेवा करने वाले कर्मयोगियों के नाम पूज्य बापू जी का संदेशधन्या माता पिता धन्यो गोत्रं धन्यं कुलोद्भवः। धन्या च वसुधा देवि यत्र स्याद् गुरुभक्तता।।हे पार्वती ! जिसके अंदर गुरुभक्ति हो उसकी माता धन्य है, उसका पिता धन्य है, उसका वंश धन्य है, उसके वंश में जन्म लेने वाले धन्य हैं, समग्र धरती माता धन्य है।""ऋषि प्रसाद एवं ऋषि दर्शन की सेवा गुरुसेवा, समाजसेवा, राष्ट्रसेवा, संस्कृति सेवा, विश्वसेवा, अपनी और अपने कुल की भी सेवा है।"पूज्य बापू जी

यह अपने-आपमें बड़ी भारी सेवा है

जो गुरु की सेवा करता है वह वास्तव में अपनी ही सेवा करता है। ऋषि प्रसाद की सेवा ने भाग्य बदल दिया
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१०८ दिनों की साधना

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१०८ दिनों की साधना

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सब तकलीफों का मूल है पाँच क्लेश है | अविद्या माना जो विद्यमान वस्तु नहीं है उसको विद्यमान दिखाये और जो विद्यमान है उसको ढक दे.. उसको अविद्या बोलते है, माया भी बोलते है | तो एक है अविद्या सब दु:खों का मूल | फिर अविद्या के बल से आती है अस्मिता – शरीर को ‘मैं’ मनाने की बेवकूफी | ये अस्मिता के दो बच्चे है – राग और द्वेष | राग – पक्षपात करायेगा और द्वेष – जलायेगा | और पाँचवा है अभीनिवेश – मृत्यु का भय | मृत्यु से भय से मृत्यु तो नहीं टलता लेकिन मृत्यु बिगडता है | तो रोज सुबह उठे, मेरे जठरा में जठराग्नि है | अविद्या – स्वाहा, अस्मिता – स्वाहा, राग – स्वाहा, द्वेष – स्वाहा और अभीनिवेश (मरने का डर) – स्वाहा |

ये तीन महीने १८० दिन करो हलका-फुल हो जायेगा मन, बुद्धि, शरीर, निरोगता में भी मदद मिलेगी | रोज सुबह जठरा नाभि के आगे देख के ये भावना करों ये जठराग्नि है | त्रिकोणाकार जैसे यज्ञ कुंड चौड़ा होता है अग्नि की लौ ऊपर पतली होती है | ऐसे अग्नि तो है ही है | उस अग्नि में ये पाँच – अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभीनिवेश स्वाहा करो | बहुत लाभ होगा | १०८ दिन का ये कोर्स करो |

-Pujya Bapuji Ahmedabad 22nd June’ 2013

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2017-01-03T13:13:59+00:00 By |Sadhana Tips|0 Comments

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