74 मन (प्रेरक हिंदी कहानी) Moral Stories in Hindi

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74 मन (प्रेरक हिंदी कहानी) Moral Stories in Hindi

बादशाह–महाराज बीरबल ! हम और आप सात महीने से चित्तौड़ में लड़ाई कर रहे हैं। अनगिनत बंदे बेकसूर मारे गये। क्यों मारे गये?
बीरबल-बादशाह सलामत ! अमीरों की मूर्खताएँ गरीबोंको भोगनी पड़ती हैं। खास रामायण में लिखा है
“और करड अपराध कोउ और पाव फल भोग। “
बादशाह-कितने आदमी मारे गये इस लड़ाई में?
बीरबल–आदमी और औरतको तो मैं जानता नहीं ! दिल्ली और चित्तौड़ की इस भयानक लड़ाई में इतने हिंदू मारे गये हैं कि उनके जनेऊ ७४ मन हुए हैं ! यह एक महाभारत आपने कराया क्यों ? मेरा भी रोकना न मानकर आपने बेकार इस नरसंहार को निमन्त्रण ही क्यों दिया?
बादशाह-७४ मन जनेऊ? अजी पंडीजी ! आप फरमाते क्या हैं ?
बीरबल-वह देखिये, आम की शाखा में तराजु झूल रहा है। नंबरी ‘मनका बाट भी वहाँ रखा है और सब जनेऊ भी वहाँ रखे हैं। चलिये और अपनी करतूत का मुलाजा कीजिये।
बादशाह-७४ मन जनेऊ? या अल्लाह ! या रामचन्दर ! मगर पंडीजी ! आपने जनेऊ क्यों इकट्टे कराये ?
बीरबल-ब्राह्मण और क्षत्रिय-पलटने जनेऊधारी हैं। अहीर और जाटों की पलटने जनेऊ हीन हैं। ७४ मन जनेऊ आधे मृतकों के समझने चाहिये। उनके दूने कर दीजिये-उतने आदमी आपने इसलिये मरवा डाले कि आज आप दिल्ली के सिंहासन पर विराजमान हैं। अत्याचार या जुल्म इसीको कहते हैं। मैं जानता था कि आप युद्ध में मरने और घायल होनेवालों की गिनती पूछा करते हैं। इसलिये यहाँ की सूक्ष्म मर्दुमशुमारी, सूत के तीन डोरों की शकल में देख लीजिये।

(२)

बादशाह-या अल्लाह! या राजा रामचन्दर! मुझे वहाँ मत ले चलो पंडीजी माराज ! मुझे बड़ा अफसोस होगा ! माफ करो खुदाके वास्ते !
बीरबल-खुदा माफ करेगा? अगर ऐसा करे तो खुद खुदा ही खुद जाय ! चित्तौड़के रेगिस्तान को आपने खून की झील बना दिया है। यह दृश्य खुदाको क्या इस वक्त दिखायी नहीं देता होगा ? माफ करने योग्य आपका यह कसूर है?
बादशाह–अरे, चित्तौड़ के किले में यकायक आग लग गयी है ! लोगों को भेजो, आग बुझा दें।
बीरबल–लोग कहाँ, लोग तो केवल दो शेष रहे हैं। एक आप, एक मैं। चलिये, हम दोनों आग बुझायें। मगर शत्रुके महल में आग है, आपके महल में तो है नहीं, फिर आपको खुशी मनाना चाहिये या रोना चाहिये?
बादशाह-दुश्मन कोई नहीं है, सभी दोस्त हैं। सभी कलेजे से लगा लेनेके काबिल हैं। माराज! किसी तरहसे भी इस आगमें पानी डलवा दीजिये।
बीरबल-यह आग वह नहीं है कि जिसको पानी खा सके। यह आग वह है कि जिसमें पानी मिट्टींके तेलकी तरह जलता है। आप फिकर न करें। जिसे आप आग समझते हैं, वह आग नहीं है।
बादशाह-आग नहीं है? आग-है-आग ! आग-ही-आग है !किले को खाने आयी है। उदयसिंह के इस किलेको बचाओ बीरबल !
बीरबल-बादशाह सलामत ! जरा होश में आइये। जिसको आप आग समझ रहे हैं, वह जौहरकी आग है !
बादशाह –हैं? जौहर हो रहा है! महारानी सती हो रही हैं।

(३)

बीरबल–जी गरीबपरवर! केवल एक महारानी ही नहीं, एक हजार पतिव्रताओं की जमात भी जल रही है।
बादशाह-दौड़कर चलो ! सतियों को जलने से जल्दी बचाओ ! वरना मुगल खानदान आगे चलकर बरबाद हो जायगा।
बीरबल—उस भावी बरबादी की शिला आज आपने खुद ही रख दी। चित्तौड़ के आस-पास अगणित शव सड़ रहे हैं, रक्तने झीलका रूप धारण किया है और महल में सतियाँ जल रही हैं। तवारिख क्या कहेगी ! कलम वाले क्या लिखेंगे !
बादशाह-या अल्लाह ! या श्रीरामचन्दर! बिलकुल बेकसूर था महाराना ! चित्तौड़को एक स्वतन्त्र राज्य मान लेने में मेरी कोई हानि नहीं थी।
बीरबल-फिर क्यों अपना मुँह काला किया? साथ रहने के कारण मेरा भी मुँह काला हुआ या नहीं?
बादशाह –बैठ जाओ ! मेरे पैर काँपते हैं। इरादा होता है कि मैं भी इसी आगमें कूद पड़े। मगर बैठना कैसा? जल्दी चलो। अभी आग जलायी ही गयी है। हिंदू माता अभी जली नहीं होंगी।
बीरबल –हिंदू माताके पास हम और आप पहुँच ही नहीं सकते। जब उनके पति मारे गये तब सारा रनिवास सती हो जायगा। उनको इस कामसे रोकनेवाला न बीरबल है और न बादशाह ही। अगर ब्रह्माजी चाहें तो वे भी नहीं रोक सकते।
बादशाह–तो क्या हुआ! करीबसे चलकर दर्शन करेंगे।
बीरबल-इस वक्त आपकी मति मारी गयी है। आपके सिरपर ७४ मन के दूने का पाप आ बैठा है।  प्रथम तो किलेका ताला अंदर से बंद है, दूसरी बात यह कि शत्रुके किले में आपको जाना नहीं चाहिये।

(४)

बादशाह- मुझे मजबूरन चित्तौड़ से लड़ना पड़ा।
बीरबल-किसके कहनेसे यह लड़ाई हुई ?
बादशाह-एक फकीर के कहनेसे।
बीरबल–क्या कहा था उसने ? ।
बादशाह-तबकी बात है, जब आप वजीर नहीं थे। दिल्लीमें एक ऐसा फकीर आया कि जो सोना बनाता था। जब उससे मैंने सोना। बनाना पूछा तो वह मुकर गया। मैंने उसे आजीवन कारागारका दण्ड दिया। मगर खाना ले जानेके लिये मैं खुद खानसामाँ के स्वाँग करता था। अच्छा खाना ले जाता था। उस फकीर की सेवा जिस्मानी भी किया करता था। जो चीज माँगता था, चुपचाप दे आता था। अफीम खानेकी लत थी उसे। मैं अठन्नीभर अफीम शाम-की-शाम थमा आता था। छ: महीनेमें बाबाजी बड़े खुश ! एक दिन मैं रोना-सा होकर चुपचाप बैठ गया। पूछनेपर कह दिया कि लड़कीकी शादी आ गयी है और घर में चूहे डंड पेल रहे हैं। फकीरने कहा-रुपये के लिये अफसोस करना बेकार हैं। मैं तुझे सेरभर सोना बना दूंगा।
बीरबल-उस फकीर का नाम क्या था?
बादशाह–नाम तो मैं नहीं जानता, था बड़ा औलिया।
बीरबल–आपने एक इस्लामी अमर फकीर को बिना कारण कैद कर लिया था। एक औलियाको आपने जेल में ढूँसा था। यों कहिये कि आप जुल्म के आदी हैं। मुझपर लोग इसीलिये नाराज रहते हैं कि मैं कलमतोड़ जवाब देता हूँ। पीछे चाहे स्याह हो या सफेद हो।
बीरबल–हाँ, फिर सोना बना?
बादशाह-आप भिगोकर मारने में लासानी हैं माराज! इसलिये मैं आपके सब कसूर माफ किये बैठा हूँ।
बादशाह-फकीर ने कहा- तीन चीजें ले आ-(१) चमड़े की धौंकनी और कोयला, (२) ताँबा और (३) पारा ! आग पर ताँबा गलाया और पारे का दिल मिलाया, वही सोना बना। मगर इस्म आजम के बिना पारा अपना दिल नहीं देता हैं! वह आगपर उड़ जाता है। वह कुछ नहीं बनता हुआ सब कुछमें समा जाता है ! खैर साहब, खुदा आपका भला करे? मैं रातमें तीनों चीजें ले गया। उसने ताँबा गलाया और पारेका दिल मिलाया। सोना तो क्या चीज ! कुन्दन बन गया पंडीजी !
बीरबल–आपने सोना बनाना सीख लिया है ?
बादशाह-हाँ, जिसे आप ‘अकबरी’ मुहर समझते हैं, वह रसायन का सोना है। जौहरी लोग उसे कीमती सोना कहते हैं, यह सोना मैं खुद बनाता हूँ।
बीरबल-उस फकीर ने और क्या बात कही थी?
बादशाह –उसने कहा था कि देखो, मैंने मन्त्रसहित तरकीब तुमको बतला दी है। तुम किसी को यह इल्म मत बतलाना।
बादशाह ने मुझे इसलिये कैद किया है कि मैंने उसे तरकीब बतानेसे इन्कार कर दिया। अगर बादशाह खुशामद करता तो बतला देता। चार चीजें अगर बादशाह पा जाय तो वह दिल्लीके तख्तपर हमेशा कायम रह सकता है।
बीरबल-कौन चार चीजें ?
बादशाह–(१) संतकी मिहरबानी, (२) सतीकी मिहरबानी (३) रसाइन और (४) चित्तौड़ का किला।
बीरबल–पाया क्या-क्या?
बादशाह—कबीर साहब संतकी मिहरबानी पा ली है। रसाइन पा ली है। चित्तौड़का किला पा लिया है। सिर्फ सतीकी मिहरबानी बाकी रही।

(५ )

बीरबल–यही बाकी, बाकी तीनों की बाकी निकाल देगी।
बादशाह-क्या फरमाया पंडीजी ?
बीरबल—जिस दिल्ली के सिंहासन पर युधिष्ठिर और पृथ्वीराज अमर राजा न बन सके, उस पर आप कैसे बनेंगे?
बादशाह-एक सतीकी मिहरबानी बाकी है ! अगर मेरे चारों काम पूरे हो जायें तो फिर मैं देखता हूँ कि मुझे कौन मारता है।
बीरबल—वह देखिये, संग्राम भूमि के बीचोबीच एक सती दाह होने जा रहा है। चिता जल उठी हैं, सती परिक्रमा कर रही है। आपको चाहिये कि सतीकी मिहरबानी प्राप्त करें। चलिये, वहाँ चलिये।
दोनों सतीके सामने जा पहुँचे। दोनों ने सतीको प्रणाम किया। बादशाह ने हाथ जोड़कर सती से बातचीत की
बादशाह–आपका मकान कहाँ है?
सती- डोंगरपुर।
बादशाह–डोंगरपुरकी जागीर चित्तौड़से काफी दूर है। आप यहाँ क्यों आयीं?
सती–मेरे पति लड़ाई में मारे गये हैं।
बादशाह–आपके पतिका नाम?
सती–राजकुमार श्रीमानसिंह।
बादशाह-आपका नाम?
सती–लाजवन्ती।
बादशाह–मगर डोंगरपुर के राजा मेरे दोस्त हैं।
लाजवन्ती–परंतु उनके राजकुमार आपके दुश्मन थे।
बादशाह–आपने मुझे पहचान लिया?
सती-अपने शत्रु और मित्र को पशु-पक्षीतक पहचानते हैं।
बादशाह–आपका विवाह कब हुआ था?
सती-अभी नहीं। मॅगनी हुई थी!
बादशाह -जिसके साथ विवाह नहीं हुआ था, उसके साथ जल जाना नादानी है। आप मेरे साथ दिल्ली चलें ! मैं आपकी पूजा करूंगा। आप जिसके साथ चाहेंगी, अपना विवाह कर सकेंगी! डोंगरपुर की मालगुजारी माफ कर दी।

(६)

सती–पागल है, तू हिंदू सती का महत्त्व नहीं समझता, तू इसे नादानी बता रहा है, यहीं तेरी बड़ी नादानी है। हिंदू स्त्री एक बार जिसे मनमें पति मान लेती है, वही उसका पति है। यह भारतीय पातिव्रत की शान है कि मँगनी वाली लड़की अपने भावी पति के साथ सती हो रही है। मगर याद रख, ‘अब आपस में लड़ने वाले ये हिंदू और मुसलमान दिल्ली के सिंहासनपर नहीं हो सकेंगे।’
बादशाह-गजब हो गया !
बीरबल-सती ने भयानक शाप दे दिया !
सती–दिल्ली पर कोई तीसरी जाति राज्य करेगी। वे लोग हिंदू और मुसलमान दोनों के कान पकड़ेंगे। बादशाह-मैं आया था महर माँगने ! बीरबल मिला कहर!
बादशाह–मेरी तकदीर में ‘अमर बादशाह’ होना नहीं लिखा है। बीरबल !
बीरबल—नहीं लिखा है बादशाह सलामत ! हमलोग झोपड़ी में रहकर महलका सपना देखा करते हैं!
बादशाह-चित्तौड़ की लड़ाई ने मेरा सारा मनसूबा मिट्टी में मिला दिया। सतियों के शाप ने मेरी राज्य श्री हरण कर ली है। मेरा खानदान ‘तैमूरी ताज’ बहुत दिनों तक नहीं चलेगा। एक हजार साल भी नहीं चलेगा।
पति के शवको अपनी गोदमें रखकर लाजवन्ती सती हो गयी। बादशाह ने वहीं प्रतिज्ञा की कि अब मैं किसी के साथ युद्ध नहीं करूंगा। सती के चरणों की भस्म अपने मस्तक में लगाते हुए दोनों लौट आये।

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