बेर भारत का महत्त्वपूर्ण फल है। यह कड़े फलों में से एक है। अकसर इसे गरीबों का फल कहा जाता है। यह काँटेदार सदाबहार पेड़ है। खाने योग्य एसिड पल्प और कड़ी गुठली सहित यह अंडाकार होता है और इसके फल नारंगी या भूरे रंग के होते हैं। बेर की दो किस्में होती हैं। जंगली किस्म छोटी और गोल होती है, जिसे ‘झड़बेर’ कहते हैं और कृषि की गई किस्म का फल अंडाकार, गूदेदार, रोमिल और आकार में बड़ा होता है। यह छोटे किस्म की अपेक्षा स्वाद में अधिक मीठा होता है।

बेर चार हजार वर्षों से अधिक समय से चीन में पैदा होता रहा है। अब उष्णकटिबंधीय अफ्रीका और एशिया के शुष्क भागों में व्यापक पैमाने पर पैदा किया जाता है। भारत के सभी हिस्सों में काफी समय पहले से पैदा किया जाता है। इसमें शरद् ऋतू में फुल लगते हैं और शीत ऋत के अंत में फल आते हैं।

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बेर में पोषक तत्व :

बेर के विश्लेषण से ज्ञात होता है कि इसके प्रति 100 ग्राम भाग में
• आर्द्रता 81.6,
• प्रोटीन 0.8,
• वसा 0.3,
• खनिज 0.3
• कार्बोहाइड्रेट 17 प्रतिशत है,

इसमें प्रति 100 ग्राम पर खनिज और विटामिन पदार्थों में
• कैल्सियम 4,
• फॉस्फोरस 9,
• लौह 1.8,
• थायमिन 0.02,
• रिबोफ्लोविन 9.5,
• नायसिन 0.7,
• विटामिन ‘सी’ 76 ,
• कैरोटीन 21 माइक्रो ग्राम है,
इसका कैलोरिक मूल्य 74 है।

बेर के औषधीय गुण व लाभ :

बेर रक्त शुद्ध करता है और पाचन में सहायता देता है। यह छाती के रोगों और रक्तस्राव को रोकने में उपयोगी है। इसकी दोनों किस्मों में जिजफिक (Zizphic) एसिड व टैनिन रहते हैं। छाल कड़वी होती है, जो रक्तस्राव को रोकने में उपयोगी है।

1-मानसिक दुर्बलता :
बेर मानसिक दुर्बलता के उपचार में उपयोगी है। 500 मि.ली. पानी में मुट्ठी भर बेर तब तक उबालने चाहिए जब तक कि वह आधा न रह जाए। इसके बाद इसमें स्वाद के लिए शर्करा या शहद मिलाना चाहिए। इस मिश्रण को रात्रि में सोने से पहले प्रतिदिन एक बार लेना चाहिए। रक्त में अधिक ग्लुटेमिक एसिड पैदा करके यह मस्तिष्क के कार्य को बढ़ाता है।

2-सर्दी :
बेर बार-बार सर्दी और शीत ज्वर के प्रकोप से शरीर की रक्षा करता है। इसके लिए बेर के एक चम्मच ताजे रस को एक चुटकी काली मिर्च के चूर्ण के साथ प्रतिदिन लेना चाहिए।

3-बवासीर :
बवासीर के उपचार के लिए बेर की ताजा पत्तियों को सेंककर उपयोग में लाया जाता है। पत्तियों को सेंकने के लिए उन्हें उबलते पानी के बरतन के ऊपर कपड़ा ढककर उसपर पत्तियाँ रखते हैं। उन पत्तियों को एक दूसरे ढक्कन से ढक देते हैं, ताकि भाप बाहर न जाए। उबली पत्तियों को थोड़े अरंडी के तेल में मिलाकर बनाई गरम पल्टिस बवासीर पर लगाने से फायदा होता है। अधिक फायदे के लिए इसे एक सप्ताह तक दिन में दो बार लगाना चाहिए।

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4-मुँह की बीमारियाँ :
ताजा और कोमल पत्तियों को उबालकर, उसमें थोड़ा नमक मिलाकर कुल्ला करने से गले की खराबी, मुँह में सूजन, मसूड़ों में से खून आना, खट्टे फलों के अधिक उपयोग से जीभ में छाले इत्यादि विकारों में लाभप्रद है।

5-चर्म रोग :
फोड़ा, बालतोड़ आदि को पकाने के लिए पत्तियों और टहनी के पेस्ट को लगाने से अच्छे परिणाम मिलते हैं। बीजों का पेस्ट कष्टकारक फोड़ों और स्टाइज में भी लाभकारी है। बिच्छू के दंश स्थान पर इस पेस्ट को नींबू का एक चम्मच रस मिलाकर पुल्टिस के रूप में उपयोग में लाया जाता है। पत्तियों को उबालकर उस पानी से घाव व फोड़ों को धोने के लिए लोशन के रूप में उपयोग करने से फायदा होता है।

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6-सूजाक :
बेर की पत्तियाँ जहरीले सूजाक में उपयोगी होती हैं। इस बीमारी में इन्हें दूध में उबालकर देना चाहिए।

7-मोटापा :
बेर की पत्तियाँ मोटापा कम करने के लिए बेहतरीन ओषधि हैं। मुट्ठी भर पत्तियों को रात भर पानी में भिगोकर रखने के बाद उस पानी को सुबह खाली पेट पीना चाहिए। इस उपचार के बेहतर परिणामों के लिए इसे लगातार कम-से-कम एक माह तक करना चाहिए।

8-बालों के रोग :
बेर की पत्तियों का पेस्ट खोपड़ी व बालों पर लगाने से उन्हें साफ रखता है और खोपड़ी की त्वचा पर होनेवाले किसी रोग के होने से रोकता है। यह बालों को काला व लंबा भी बनाता है।

9-पेट की बीमारियाँ :
बेर के पेड़ की छाल का अतिसार, पेचिश व मरोड़ में घरेलू ओषधि के रूप में उपयोग होता है। इसे चूर्ण या काढ़े के रूप में उपयोग किया जा सकता है। छाल के अंदरूनी भाग को पानी में उबालकर लेने से कब्ज में जुलाब लेने के लिए उपयोगी है।

10-आँख आना :
आँख आने पर बेर की पत्तियाँ बहुत उपयोगी ओषधि हैं। पानी में पत्तियों को उबालकर उस पानी से आँख धोनी चाहिए।

सामान्य उपयोग :

इस फल को ताजा या सूखा खाया जाता है। इसका उपयोग डिजर्ट के रूप में भी किया जाता है। इस फल को शर्करा के साथ सिझाने से स्वादिष्ट डिश तैयार होती है। इससे स्फूर्तिदायक पेय भी तैयार किया जाता है।

बेर की कैंडी :

बेर के उत्पादों में कैंडी एक प्रमुख उत्पाद है। बेर की कैंडी बनाने के लिए फल को शीरे या चाशनी में पागकर सुखाते हैं। पहले फलों को कोंच लेते हैं। फिर कई दिनों तक उन्हें नमक के पानी में डुबोए रखते हैं।
इसके बाद फलों को धोकर नमक निकाल देते हैं। तब फलों को उबलते हुए पानी में डाल देते हैं। दो-तीन मिनट बाद पानी से निकालकर उन्हें फैला देते हैं।
पानी निकल जाने पर 25 प्रतिशत चीनी की चाशनी तैयार करते हैं। इसके बाद उबलती हुई चाशनी बेरों पर डालते हैं। लगभग चौबीस घंटे फलों को चाशनी में रखते हैं। फिर फलों को निकाल लेते हैं।
बची हुई चाशनी में थोड़ी चीनी और मिलाकर दोबारा चाशनी बना लेते हैं। इस चाशनी में भी फलों को चौबीस घंटे डुबाए रखते हैं। ऐसा कई बार करना पड़ता है। अंत में फलों को सुखा लेते हैं। यही बेर की कैंडी है। यह खाने में खूब अच्छी लगती है।

बेर का मुरब्बा :

बेर का मुरब्बा भी बनाया जाता है। इसके लिए बेरों को कोंचकर उनकी गुठलियाँ अलग कर देते हैं। गूदे को चाशनी में पागकर मुरब्बा बना लेते हैं। पके हुए फलों को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर सुखाया भी जा सकता है। इन्हें सुबह-शाम नाश्ते के रूप में खाते हैं।