अर्जुन हमारे गौरवशाली पूर्वजों के सर्वाधिक उपयुक्त प्रतिनिधि हैं। जब तक ‘भारत’ है; गंगा, यमुना, हिमालय, कुरुक्षेत्र का मैदान है; कृष्ण का नाम है, गीता है-अर्जुन का नाम भी
भारतीय संस्कृति में अमर है। अर्जुन ‘नर’ अथवा जीवन के सफल-पुरुषार्थ के मूर्त स्वरूप हैं। भारतीय मनीषा का यह मत, संजय के शब्दों में है, कि-”जहाँ योगेश्वर कृष्ण हैं, गांडीवधारी अर्जुन हैं, वहाँ सदा श्री, विजय, विभूति और ध्रुव नीति है।”

जन्म पर आकाशवाणी :

महापराक्रमी वीर अर्जुन के इस धराधाम पर अवतीर्ण होते ही अपने गंभीर निर्घोष से गगन को निनादित करती हुई जो देववाणी प्रस्फुटित हुई, उस वाणी ने माता कुंती को संबोधित करते हुए इस प्रकार कहा, “हे कुंति ! तेरा यह पुत्र ब्राह्मणों का रक्षक, मित्रों का मनोरथ सिद्ध करनेवाला, शत्रुओं की शोक-वृद्धि करनेवाला तथा अपने संपूर्ण बंधु-बांधवों के आनंद को बढ़ानेवाला होगा।”
यह अलौकिक कर्म करनेवाला, यशस्वी, शत्रुओं का विनाश करनेवाला, नीतिमान, महात्मा सूर्य सदृश कांति से युक्त, अपूर्व पराक्रमी, कर्मठ तथा सौंदर्य में देवतुल्य होगा। कार्तवीर्य अर्जुन के समान तेजस्व, भगवान् शिव के तुल्य पराक्रम, इंद्र के समान अजेय तथा कीर्तिशाली होगा। जिस प्रकार भगवान् वामन के जन्म लेने पर माता अदिति गौरवान्वित हुई थीं, उसी प्रकार अर्जुन भी अपने जन्म से तुम्हारे हर्ष और गौरव को बढानेवाला होगा।

तुम्हारा यह पुत्र मद्र, कुरु, सोमक, चेदि, काशि, करुष आदि देशों को जीतकर कुरुवंश की लक्ष्मी को समृद्ध करेगा। यह वीर उत्तर दिशा में जाकर उत्तर कुरु आदि देशों को जीतकर (कुरुवंश की लक्ष्मी को समृद्ध करेगा) असंख्य धनराशि लावेगा, जिससे महाराज युधिष्ठिर का यज्ञ विधिपूर्वक निष्पन्न होगा। तुम्हारे पुत्र के बाहुबल से रक्षित हव्यवाहन भगवान् अग्निदेव खांडव वन में संपूर्ण प्राणियों की चरबी का आस्वादन कर तृप्त होंगे।

तुम्हारा यह महाबली पुत्र संसार के संपूर्ण राजाओं को वश में करके तीन अश्वमेध यज्ञों को संपन्न करेगा। यह वीर बालक भगवान् परशुराम के समान तेजस्वी, भगवान् विष्णु के समान पराक्रमी, बलवानों में श्रेष्ठ तथा महायशस्वी होगा। यह द्वंद्व युद्ध में भगवान् शंकर को संतुष्ट कर उनसे पाशुपत अस्त्र प्राप्त करेगा। कुंति ! तुम्हारा यह पुत्र इंद्र की आज्ञा से देवताओं के शत्रु निवातकवच नामक दैत्यों को परास्त कर संपूर्ण दिव्यास्त्रों का ज्ञान प्राप्त करेगा।

स्वयं भीष्म ने अपनी इच्छा मृत्यु से पूर्व कहा था, “जिस प्रकार प्राणियों में मनुष्य श्रेष्ठ है, पक्षियों में गरुड़ श्रेष्ठ है, जलाशयों में समुद्र श्रेष्ठ है, चौपायों में गौ, तेजस्वियों में सूर्य, पर्वतों में हिमालय, वर्गों में ब्राह्मण श्रेष्ठ है, उसी प्रकार धनुर्धारियों में तुम (अर्जुन) श्रेष्ठ हो ।’

दुर्योधन के निवेदन करने पर जब पितामह भीष्म ने दोनों पक्षों के रथी, अतिरथी तथा अर्धरथी वीरों की गणना की, उस समय उन्होंने अर्जुन के जिस पराक्रम का उल्लेख किया है, वह अतुलनीय है। भीष्म का वचन उस समय प्रमाण माना जाता है, अतएव अर्जुन के विषय में उन्होंने जो विचार व्यक्त किया है वह वस्तुस्थिति का परिचायक है। उनका विचार था कि कौरव-पांडव दोनों सेनाओं में अर्जुन की समता करनेवाला वीर दूसरा कोई नहीं है। संपूर्ण देवताओं, दैत्यों, नागों, राक्षसों तथा यक्षों में भी अर्जुन की समानता करनेवाला कोई नहीं है, फिर मनुष्यों में तो हो ही कैसे सकता है? अर्जुन का गांडीव धनुष दिव्य है। उनके घोड़े वायु के समान वेगशाली तथा अवध्य हैं। उनका रथ दिव्य है। उनका कवच अभेद्य है। उनके बाण अक्षय हैं। महेंद्र, रुद्र, कुबेर, यम एवं वरुण संबंधी दिव्य अस्त्रों से वे सुसज्जित हैं। केवल एकमात्र अपने उस दिव्य रथ की सहायता से अर्जुन ने हिरण्यपुर वासी सहस्रों दानवों का संहार किया है। ऐसे अतुल पराक्रमी पांडुनंदन का सामना युद्ध में कौन वीर कर सकता है?

द्रुपद के पुरोहित द्वारा कौरव-सभा में अर्जुन के विषय में कहा गया यह कथन कितना सटीक है कि कौरवों की ग्यारह अक्षौहिणी सेना एक ओर हो और अकेले अर्जुन दूसरी ओर हों तो अकेले पांडुनंदन ही इन सबके लिए पर्याप्त हैं।

पुरोहित की इस सत्य बात का भीष्म ने भी समर्थन किया। भीष्म के मत में अर्जुन महारथी, बलवान् और अस्त्र विद्या में निपुण हैं। युद्ध में कोई भी वीर उनका सामना करने में समर्थ नहीं है। दूसरों की तो बात ही क्या, साक्षात् इंद्रदेव भी युद्ध में अर्जुन का सामना नहीं कर सकते। भीष्म पितामह का यह प्रबल विश्वास था कि अर्जुन युद्ध में तीनों लोकों का मुकाबला कर सकते हैं।

वीरवर अर्जुन के विषय में भगवान् कृष्ण की भी यहीं सम्मति थी कि इंद्रलोक तथा रुद्रलोक सहित संपूर्ण लोकों में भयंकर नेत्रोंवाले भगवान् रुद्र को छोड़कर दूसरा कोई नहीं है, जो कुंतीनंदन अर्जुन को परास्त कर सके।

संजय को संदेश देते हुए यही बात भगवान् कृष्ण ने कही थी। अर्जुन के पराक्रम का वर्णन करते हुए भगवान् ने कहा था कि जो अपनी दोनों भुजाओं से पृथ्वी को उठा ले, वही व्यक्ति युद्ध में अर्जुन का सामना कर सकता है। जो मनुष्य युद्ध में अर्जुन को जीत सकता है, वह संपूर्ण प्रजा को भस्म कर सकता है, और साथ ही संपूर्ण देवताओं को स्वर्ग से नीचे गिरा सकता है। श्रीकृष्ण के अनुसार देवताओं, असुरों, मनुष्यों, यक्षों, गंधर्वो तथा नागों में कोई भी ऐसा वीर नहीं है, जो युद्ध में अर्जुन का सामना कर सके। इसका स्पष्ट उदाहरण विराटनगर में अर्जुन और कौरवों का वह युद्ध है, जब कुंतीनंदन ने अकेले ही संपूर्ण कौरव महारथियों और उनके सहायकों को जीत लिया था। बल, पराक्रम, तेजस्विता, हस्तलाघव, विषाद का अभाव तथा धैर्य जैसा पांडुनंदन अर्जुन में देखा जाता है वह एक साथ अन्यत्र दुर्लभ है।

युद्ध में सुअवसर पाते ही पांडुनंदन शत्रुओं को मथ डालते थे। अस्त्र-शस्त्रों की उनकी शिक्षा अद्भुत थी। उनके हाथों की चपलता और दूर-दूर तक बाण मारने की शक्ति को देखकर आचार्य भी चकित थे। युद्ध में कुंतीनंदन के बाणों की वर्षा टिड्डी दल की तरह असंख्य जान पड़ती थी। अर्जुन के बाणों की बौछार इतनी सघन होती थी कि उनके भीतर वायु का प्रवेश भी कठिन था। अर्जुन का युद्धलाघव अपूर्व था। लाखों बाण एक साथ शत्रु के रथ के पास गिरते थे। युद्ध में अर्जुन का गांडीव वैसे ही चमकता था जैसे मेघों में बिजली चमकती है। शत्रु-दल को यह अनुमान लगाना कठिन होता था कि अर्जुन दाहिने हाथ से बाण चलाते हैं। अथवा बाएँ हाथ से। जैसे जंगलों में दावानल सैकड़ों मार्ग बनाकर आगे बढ़ता है। उसी प्रकार अर्जुन जिस ओर बढ़ते थे, उधर ही असंख्य मार्ग खुल जाते थे।

इंद्रकुमार के विषय में महाराज धृतराष्ट्र की भी यही सम्मति थी कि युद्धभूमि में यदि पृथानंदन अर्जुन शस्त्र उठा लें तो यमराज भी उनके हाथ से जीवित नहीं बच सकता। अर्जुन ने अकेले ही सुभद्रा का हरण किया। उन्होंने अकेले ही खांडव वन में अग्नि को तृप्त किया तथा अकेले ही इस संपूर्ण पृथ्वी को जीतकर राजाओं को अपना करदाता बना लिया। दिव्य गांडीव धनुष धारण करनेवाले पांडुपुत्र ने अकेले ही निवातकवच नामक दैत्यों का संहार किया और अकेले ही किरात वेशधारी भगवान् महादेव को अपने बाहुबल से संतुष्ट किया। घोषयात्रा के समय अर्जुन ने अकेले ही गंधर्वो से दुर्योधन आदि के प्राणों की रक्षा की तथा अकेले ही संपूर्ण राजाओं को जीतकर जयद्रथ का वध कर डाला। अतएव महाराज धृतराष्ट्र की दृष्टि में कुंतीकुमार की बराबरी करनेवाला कोई योद्धा नहीं था। वे अद्वितीय वीर थे।

कर्ण के सारथि महाराज शल्य ने भी यही भाव अर्जुन के विषय में प्रकट किया था-“कौन ऐसा पराक्रमी है, जो जल से वरुण को और ईंधन से अग्नि को नष्ट कर सके? कौन वायु को कैद कर सकता है अथवा समुद्र को पी सकता है ? युद्ध में पांडुनंदन अर्जुन का भी कुछ ऐसा ही स्वरूप होता है। युद्धभूमि में इंद्रकुमार बीभत्सु इंद्र सहित संपूर्ण देवताओं और असुरों द्वारा भी पराजित नहीं किए जा सकते । जो अर्जुन को युद्धभूमि में जीत सकता है वह अपनी दोनों भुजाओं से पृथ्वी को उठा सकता है, कुपित होकर संपूर्ण प्रजा को भस्म कर सकता है तथा देवताओं को स्वर्ग से नीचे गिरा सकता है।’

गुरुभक्ति :

जब पितामह भीष्म ने अपने पौत्रों कौरव-पांडवों को शिष्य रूप में आचार्य द्रोण को समर्पित किया, तब गुरु द्रोण ने गुरुदक्षिणा के रूप में उनके सामने एक शर्त रखी कि उनके मन में एक अभिलाषा है, जिसे अस्त्र-शिक्षा प्राप्त कर लेने के बाद उन्हें पूरा करना होगा। गुरु द्रोण के उस वचन को सुनकर सभी कौरव चुप रह गए; किंतु आचार्य की उस अभिलाषा को पूर्ण करने के लिए अर्जुन ने तुरंत प्रतिज्ञा की। अर्जुन के इस शौर्य को देखकर आचार्य ने उन्हें छाती से लगा लिया तथा बारबार उनका मस्तक चूमा। यहाँ तक कि हर्ष के आवेश में आचार्य रो पड़े।

जब राजा विराट की गायों को लौटाने के उद्देश्य से अर्जुन ने दुर्योधन की सेना पर आक्रमण किया, तब पहले उन्होंने गांडीव धनुष पर दो बाणों को चढ़ाकर फेंका, जो गुरु द्रोणाचार्य के पैरों के पास गिरे तथा दो बाण उनके दोनों कानों का स्पर्श करते हुए निकल गए। अर्जुन ने आज बहुत वर्षों बाद गुरु का दर्शन किया था, अतएव उन्होंने पहले दो बाणों द्वारा गुरु-चरणों में प्रणाम किया तथा दूसरे दो बाणों द्वारा गुरु से युद्ध की आज्ञा माँगी ।

रथ पर बैठे हुए अर्जुन ने बाण, सुंदर दस्ताने, तरकश, शंख, कवच, किरीट, खङ्ग और धनुष धारण कर रखे थे। उनके रथ पर पताका फहरा रही थी-ऐसा मालूम होता था मानो घी की आहुति पाकर अग्नि प्रज्वलित हो उठी हो।

अर्जुन के हृदय में गुरु के लिए कितना प्यार और सम्मान था, यह तब मालूम होता है जब वे अपने परम पूजनीय गुरु द्रोणाचार्य की रथ द्वारा परिक्रमा करने के लिए उत्तर को आदेश देते हैं। जब तक द्रोणाचार्य अर्जुन के शरीर पर प्रहार नहीं करते तब तक वे कभी उनपर प्रहार नहीं करेंगे इस सनातन धर्म का पालन करने के लिए वे पूर्ण कटिबद्ध थे।

आचार्य द्रोण के पास पहुँचकर उन्होंने पुन: गुरु को प्रणाम किया और उन्होंने आचार्य से अपनी इच्छा प्रकट की कि तेरह वर्षों तक वनवास के अपार दु:खों को सहने के बाद अब वे शत्रुओं से बदला लेने के लिए प्रकट हुए हैं, अतएव आचार्य को अब पांडवों पर क्रोध नहीं करना चाहिए, बल्कि उन्हें युद्ध की आज्ञा प्रदान करनी चाहिए। इससे स्पष्ट है कि प्रबल मानसिक उत्तेजना के क्षणों में भी अर्जुन के हृदय से कभी शिष्ट व्यक्तियों के प्रति विनय का भाव दूर नहीं होता है। गुरु से भी युद्ध करना पड़ता है-इस क्षत्रिय धर्म की कठोरता को पांडुनंदन मन-ही-मन धिक्कारते हुए भी अपने कर्तव्य-पथ पर डटे रहे और आचार्य के साथ उन्होंने भयंकर युद्ध किया।

भीष्म का परिचय देते हुए अर्जुन का हृदय क्षण भर के लिए कचोट उठता है। कि जो ज्ञान-विज्ञान से संपन्न, महापराक्रमी, बाल ब्रह्मचारी शांतनुनंदन और गंगापुत्र हैं, पूर्ण राज्यलक्ष्मी से संपन्न होकर भी दुर्योधन जैसे कुटिल और कपटी के अधीन होकर पांडवों से युद्ध करना चाहते हैं ।

अर्जुन के हृदय में धनुर्वेद के प्रति अप्रतिम जिज्ञासा थी। शिक्षा प्राप्ति में अपूर्व लगन, श्रेष्ठ बाहुबल तथा निरंतर अभ्यास के कारण वे सभी शिष्यों से आगे निकल गए। अस्त्र विद्या में उनका विशेष अनुराग था, अतएव तुल्य अस्त्रों के प्रयोग में, फुरती तथा कौशल में भी वे अन्य राजकुमारों से आगे बढ़ गए। आचार्य के उपदेश को तुरंत पकड़ने में अर्जुन अपूर्व प्रतिभाशाली थे। अर्जुन सब प्रकार की कलाओं में श्रेष्ठ थे। क्रांतदर्शी बुद्धि, मन की एकाग्रता, बल तथा उत्साह के आधिक्य के कारण वे संपूर्ण अस्त्र-विद्याओं में सर्वश्रेष्ठ घोषित हुए। अस्त्रों के अभ्यास तथा गुरु के प्रति अनुराग में भी कोई उनका सानी नहीं था। अर्जुन अपनी विशिष्ट प्रतिभा के कारण संपूर्ण राजकुमारों में अतिरथी वीर सिद्ध हुए।

आचार्य द्रोण द्वारा ली गई अस्त्र-परीक्षा में भी अर्जुन पारंगत सिद्ध हुए। अपने हृदय की अपूर्व एकाग्रता के साथ उन्होंने गीध के मस्तक को धड़ से अलग कर दिया, जबकि अन्य कोई राजकुमार उस परीक्षा में सफल नहीं हो सका।

इसी प्रकार जब गंगा में स्नान करते समय आचार्य की पिंडली को ग्राह ने पकड़ लिया, द्रोण का संकेत पाते ही अर्जुन ने अपने बाणों से ग्राह के टुकड़े-टुकड़े कर दिए; जबकि अन्य राजकुमार हक्के-बक्के होकर देखते रह गए। अपने श्रेष्ठतम शिष्य अर्जुन पर प्रसन्न होकर आचार्य ने उन्हें प्रयोग तथा उपसंहार सहित ‘ब्रह्मशिर नामक अस्त्र प्रदान किया तथा आशीर्वाद दिया कि संसार में धनुर्विद्या में तुमसे बढ़कर दूसरा कोई नहीं होगा।

अद्वितीय धनुर्धर :

रंगभूमि जब सभी राजकुमारों के अस्त्र-शस्त्र कौशल का प्रदर्शन हुआ, अर्जुन ने भी अपना पराक्रम प्रकट किया। अर्जुन ने पहले आग्नेयास्त्र द्वारा अग्नि उत्पन्न | की, फिर उसे बुझा दिया वारुणास्त्र के प्रयोग से। उन्होंने वायव्यास्त्र द्वारा आँधी उत्पन्न की, फिर पर्जन्यास्त्र द्वारा बादल प्रकट कर दिए। भौमास्त्र से उन्होंने पृथ्वी में प्रवेश किया तथा पर्वतास्त्र से पर्वतों की सृष्टि कर दी। अंतर्धानास्त्र द्वारा वे स्वयं अदृश्य हो गए। क्षण भर में वे लंबे हो जाते थे तथा क्षण भर में बौने बन जाते थे। क्षण भर में रथ के बीच दिखाई देते और पलक मारते-मारते पृथ्वी पर उतरकर अस्त्र कौशल दिखाने लगते थे। अर्जुन ने बड़ी फुरती के साथ सूक्ष्म और भारी दोनों प्रकार के लक्ष्यों को अपने बाणों से बांध डाला। रंगभूमि में रखे हुए तथा घूमते हुए लोहे के शूकर के मुख में एक साथ पाँच बाणों को एक बाण की तरह प्रवेश करा दिया। रस्सी से लटकते हुए तथा हिलते हुए गाय के सींग के छेद में अर्जुन ने लगातार इक्कीस बाण गड़ा दिए। इस प्रकार अर्जुन ने रंगभूमि में अपने अद्भुत कौशल का प्रदर्शन किया।

महाराज द्रुपद के साथ भीषण युद्ध करते हुए अर्जुन ने उनके धनुष को काटकर गिरा दिया और तलवार खींचकर उनके रथ के दंड पर कूद पड़े। द्रुपद के रथ पर चढ़कर निर्भीक अर्जुन ने उसी प्रकार द्रुपद को अपने काबू में कर लिया

जैसे गरुड़ सहसा समुद्र को क्षुब्ध करके साँप को पकड़ लेता है । द्रुपद अर्जुन की वीरता से अत्यधिक प्रभावित हुए। इसीलिए जब उन्होंने किसी ब्राह्मण के मुख से सुना कि पांडव लाक्षागृह में जलकर मर गए तो वे मानो शोक-सागर में डूब गए।

धनुष को पकड़ने में अर्जुन की मुट्ठी बड़ी दृढ़ थी। हाथ की फुरती और लक्ष्य बेधने में भी वे बड़े कुशल थे। क्षुर, नाराच, भल्ल और विपाठ आदि ऋजु, वक्र तथा विशाल अस्त्रों के संचालन के गूढ़ तत्त्व के ज्ञाता तथा उन अस्त्रों के सफल प्रयोक्ता थे। इसीलिए आचार्य द्रोण को यह पूर्ण विश्वास हो गया था कि फुरती एवं निपुणता में इस संसार में अर्जुन के समान दूसरा कोई योद्धा नहीं है। अर्जुन को पूर्णरूप से सुयोग्य पात्र समझकर ही आचार्य ने उन्हें ‘ब्रह्मशिर’ नामक अस्त्र प्रदान किया था, जो वज्र के समान प्रकाशमान था तथा जिसमें समूची पृथ्वी को भस्म कर डालने की शक्ति थी। इसीलिए आचार्य ने उसे मनुष्यों तथा अल्पवीर्य प्राणियों पर छोड़ने का निषेध किया था। उस समय समुद्रपर्यंत संपूर्ण पृथ्वी पर यह बात फैल चुकी थी कि अर्जुन के समान धनुर्धर संसार में दूसरा कोई नहीं है।

महाबली पांडु भी जिसे वश में न कर सके थे, उस यवनाधिपति को अर्जुन ने अनायास ही पराजित कर दिया। महापराक्रमी, अहंकारी तथा उदंड सौवीर-नरेश विपुल तथा दत्तामित्र का भी उन्होंने दमन कर दिया। एकमात्र रथ की सहायता से उन्होंने दक्षिण तथा पूर्व के सभी राजाओं को युद्ध में पराजित किया।
जब अर्जुन ने संसार के प्रमुख वीरों से भरी हुई महाराज द्रुपद की सभा में लक्ष्यवेध करके द्रौपदी को जीत लिया और वे उसे कुम्हार के घर ले गए (जहाँ पांडव ब्राह्मण के वेश में छिपकर रहते थे) तब महाराज युधिष्ठिर ने स्पष्ट शब्दों में अर्जुन से कहा कि उन्होंने द्रौपदी को जीता है, अतएव द्रौपदी का विवाह अर्जुन के साथ ही होना चाहिए। अर्जुन के साथ ही द्रौपदी की शोभा होगी । द्रौपदी अनिंद्य सुंदरी थी। उसका रूप कमनीय तथा अपूर्व लावण्य–युक्त था। वह एक ही दृष्टि में संपूर्ण प्राणियों के मन को मोह लेने वाली थी। ऐसी विकट परिस्थिति में भी अर्जुन ने जो धैर्यपूर्ण उत्तर दिया, वह उनके ही अनुकूल है- ‘महाराज, आप मुझे अधर्म का भागी न बनावें । बड़े भाई के अविवाहित रहते छोटे भाई का विवाह हो जाए, यह धर्म नहीं है। ऐसा कार्य तो अनार्यों के बीच देखा जाता है। पहले आपका विवाह होना चाहिए, फिर महारथी भीम का और फिर मेरा। तत्पश्चात् नकुल का और सहदेव का। भीम सहित हम चारों भाई और यह द्रौपदी सब आपकी आज्ञा के अधीन हैं।”

आकर्षक व्यक्तित्व :

इंद्रपुत्र अर्जुन की देह-यष्टि तथा सौंदर्य सभी व्यक्तियों के नेत्रों और हृदय को आनंद प्रदान करते थे। वे अपनी मीठी वाणी से सभी के हृदय को वशीभूत कर लेते थे। अर्जुन हमेशा वही प्रयत्न करते थे, जिससे प्रजा सुखी हो। मधुर वचन बोलनेवाले अर्जुन के मुख से कभी आयुक्त, पक्षपातपूर्ण असत्य तथा कटु वचन नहीं निकलते थे।

अर्जुन ने ब्रह्मचर्य का अपूर्व बल था। इस बात को स्वयं गंधर्वाधिपति चित्ररथ ने भी स्वीकार किया था। जब गंगा में जल-विहार करते समय चित्ररथ गंधर्व को अर्जुन ने पराजित किया तब अपनी पराजय का कारण बतलाते हुए गंधर्वपति ने कहा था कि ‘ब्रह्मचर्य श्रेष्ठ धर्म है और वह निश्चित रूप से तुममें वर्तमान है इसीलिए तुमने मुझे युद्ध में जीत लिया है।’

गंधर्व चित्रसेन ने उर्वशी के सम्मुख अर्जुन के जिन गुणों की अभ्यर्थना की है, वे उनमें पूर्णरूप से विद्यमान थे। उन्होंने मानो अर्जुन का सजीव चित्र ही प्रस्तुत कर दिया है।

सकामा उर्वशी को अर्जुन ने जो उत्तर दिया है वह उनकी अतुल धैर्य-शक्ति तथा विवेक-शक्ति का परिचायक है। ‘कल्याणि ! मेरी दृष्टि में जो स्थान कुंती, माद्री तथा शची का है वही तुम्हारा भी है। तुम पुरुवंश की जननी होने के कारण मेरे लिए परम पूजनीया हो। मैं तुम्हारी शरण हूँ। तुम्हारे चरणों में प्रणाम करता हूँ। तुम लौट जाओ, तुम मेरे लिए माता की तरह आदरणीया हो। तुम्हें पुत्र की तरह मेरी रक्षा करनी चाहिए।’

भाइयों को प्रिय :

हिमालय-गमन के पश्चात् युधिष्ठिर (अन्य भाइयों सहित) उदास होकर उन्हें याद करते हैं। सिंह की तरह मस्तानी जिनकी चाल है, जिनके शरीर का रंग श्यामल है, जो गुडाकेश (निद्रा-विजयी) हैं, अस्त्र-शस्त्रों में पूर्ण पारंगत हैं, युद्धकुशल तथा धनुर्धारियों के उपमान हैं, जो युद्ध में शत्रुओं के बीच क्रोधित यमराज की भाँति विचरण करते हैं, जिनके कंधे सिंह के समान हैं, मदजल बहानेवाले गजराज की शोभा को जो धारण करते हैं, संपत्ति तथा पराक्रम में जो इंद्र से कम नहीं हैं। जो अमित पराक्रमी, अजेय एवं उग्र धनुर्धर हैं, जो क्षुद्र बुद्धि व्यक्तियों के आक्षेप पर ध्यान नहीं देते, क्षमाशील तथा शरणागत को अभय प्रदान करनेवाले हैं; किंतु छल-कपट का आश्रय लेनेवाले कुटिल व्यक्तियों के लिए जो काल-सर्प की तरह भयानक हैं; जो दयालु, महाबली और प्रतापी हैं, शत्रुओं को भी अभय देनेवाले हैं; जो पराक्रम में भगवान् कृष्ण और कार्तवीर्य अर्जुन के तुल्य हैं, बाहुबल में इंद्र की समानता करनेवाले हैं, जिनके वेग में वायु का, मुख में चंद्रमा का तथा क्रोध में मृत्यु का निवास है, जिनके चरित्र में सूक्ष्म निंदा के लिए भी स्थान नहीं है, ऐसे महामना भाई के वियोग में कौन भाई दुःखी नहीं होगा ?

पीड़ितों की रक्षा :

पाँचों पांडव एक विशेष नियम के अंतर्गत द्रौपदी के साथ सुखपूर्वक निवास करते थे। एक दिन अचानक पास के गाँव से कुछ चोर किसी ब्राह्मण की गायें चुराकर ले जाने लगे। वह ब्राह्मण इंद्रप्रस्थ पहुँचा और उच्च स्वर में आर्तनाद करता हुआ पांडवों का गोरक्षा के लिए पुकारने लगा। अर्जुन न ब्राह्मण का विलाप सुनकर उसे धीरज बँधाया और गोरक्षा के लिए कटिबद्ध हो गए। किंतु समस्या यह थी कि जिस कमरे में पांडवों के अस्त्र-शस्त्र रखे हुए थे, उस कमरे में धर्मराज युधिष्ठिर द्रौपदी के साथ एकांत में बैठे हुए थे। नियमानुसार अर्जुन उस कमरे में प्रवेश करने में असमर्थ थे, साथ ही बिना अस्त्रों के चोरों का पीछा कैसे किया जाए ? किंतु उस आर्त ब्राह्मण की करुण पुकार से प्रेरित होकर अंत में अर्जुन ने यही निश्चय किया कि ब्राह्मण के आँसू पोंछने आवश्यक हैं। यदि आज राजद्वार पर विलाप करनेवाले इस ब्राह्मण की रक्षा नहीं की गई तो जहाँ हमें एक ओर ब्राह्मण उपेक्षा रूप अधर्म का भागी होना पड़ेगा, वहीं दूसरी ओर लोगों में यह बात भी फैल जाएगी कि पांडव पीड़ितों की रक्षा का दायित्व वहन करना नहीं चाहते। अतएव भले ही मुझे महाराज के तिरस्कार का पात्र बनना पड़े अथवा नियम-भंग का महान् दोष ही मुझे क्यों न प्राप्त हो अथवा वनवास में ही मेरी मृत्यु क्यों न हो जाए, तथापि गौ-ब्राह्मण की रक्षा रूप धर्म का पालन करना ही मेरे लिए श्रेयस्कर होगा। यह निश्चय कर तथा महाराज से पूछकर, कमरे में प्रवेश कर अर्जुन के धनुष-बाण लिये तथा शीघ्र ही चोरों का पीछा किया। उनका दमन कर ब्राह्मण के गोधन को लौटा लिया और नियमानुसार तुरंत ही बारह वर्षों के लिए वन को प्रस्थान किया।

अर्जुन के निश्चय को सुनकर महाराज युधिष्ठिर बड़े दु:खी हुए और उन्होंने अर्जुन को वन जाने से रोकने का भरसक प्रयत्न किया, किंतु अर्जुन अपने निश्चय पर अडिग रहे । उनका कहना था कि धर्म के विषय में बहानेबाजी ठीक नहीं होती। उन्होंने सत्य की सौगंध खाकर तथा शस्त्र छूकर प्रतिज्ञा की कि वे भविष्य में भी कभी धर्म की मर्यादा से विचलित नहीं होंगे। महाराज की आज्ञा लेकर वे वन को चले गए।

इंद्रलोक में अस्त्र-शस्त्रों का अभ्यास करते हुए अर्जुन पूर्ण पारंगत हो गए। इंद्रदेव के कथनानुसार अब वे देवताओं के लिए भी अजेय थे। सांसारिक असंयमी मनुष्यों की तो बात ही क्या थी। अर्जुन युद्ध में अप्रमेय, अजेय और अनुपम थे। संपूर्ण देवता और असुर मिलकर भी उन्हें पराजित नहीं कर सकते थे। अस्त्र-युद्ध में उनका सामना करनेवाला कोई योद्धा नहीं था। वे सदा सावधान रहनेवाले, स्वकार्य में दक्ष, सत्यवादी, जितेंद्रिय, ब्राह्मणभक्त और शूर थे। वीर अर्जुन ने इंद्रदेव से प्रयोग, उपसंहार, आवृत्ति, प्रायश्चित्त और प्रतिघात-अस्त्रों की इन पाँच विधियों सहित पंद्रह अस्त्रों का पूर्ण ज्ञान प्राप्त किया था।

आततायियों से हमेशा पीड़ित रहनेवाली द्रौपदी ने अर्जुन के विषय में जयद्रथ के सम्मुख जो उद्गार प्रकट किया वह भावात्मक न होकर तथ्यात्मक था’महावीर अर्जुन समस्त धनुर्धरों में श्रेष्ठ, धैर्यवान्, यशस्वी, जितेंद्रिय, ब्राह्मणभक्त
और अपने अग्रज महाराज युधिष्ठिर के सेवक हैं। अग्नि के समान तेजस्वी पांडुनंदन अर्जुन कभी भी काम, भय अथवा लोभवश अपना धर्म नहीं छोड़ सकते हैं।’

आततायी का वध करने के लिए जब भीम जयद्रथ की ओर लपके, तब अर्जुन की प्रत्युत्पन्न मति तुरंत जाग उठी और उन्होंने भीम को सतर्क किया कि जयद्रथ का वध न करना। आखिर दुःशला उनकी भी बहन थी, भले ही उसके भाई दुर्योधन और पति जयद्रथ ने उनका घोर अपमान किया था। भीम ने दौड़कर जयद्रथ के बाल पकड़ लिये और उसे उठाकर धरती पर पटक दिया। उसके शरीर पर दोनों घुटने रखकर भीम उसे घुटनों से मारने लगे। मार की पीड़ा से जयद्रथ मूर्छित हो गया। जब अर्जुन ने देखा कि भीम का क्रोध शांत नहीं हो रहा है तो उन्होंने दुःशला के वैधव्य का स्मरण दिलाकर भीम को जयद्रथ-वध से विरत किया।

विवेक और संतुलन :

जब भरी सभा में द्रौपदी का घोर अपमान हो रहा था, तो कुछ न कर सकने के कारण महारथी भीम का हृदय अत्यधिक क्षुब्ध हो रहा था। उनके हृदय का संपूर्ण क्रोध युधिष्ठिर पर उमड़ रहा था। वे क्रोध में इतने अभिभूत हो जाते हैं कि धर्मराज की दोनों बाँहें जलाने के लिए उद्यत हो जाते हैं। ऐसी विषम स्थिति में
अर्जुन ही उन्हें समझाकर शांत करते हैं। अर्जुन की बातों से उनका क्रोध शांत हो जाता है और वे अपना कुत्सित विचार त्याग देते हैं।
वह विशेष प्रसंग जब राजा विराट ने अपनी कन्या का विवाह अर्जुन से करने का प्रस्ताव रखा, उस समय उन्होंने जो उत्तर दिया वह उनके गौरव और धैर्य के अनुकूल है। जब मत्स्यराज ने यह प्रस्ताव रखा तब युधिष्ठिर ने अर्जुन की ओर देखा। अर्जुन ने अग्रज की आँखों में मानो कुछ पढ़ लिया और उन्होंने राजा विराट को उत्तर दिया, ‘राजन् ! मैं आपकी कन्या को अपनी पुत्रवधू के रूप में स्वीकार करता हूँ। मत्स्य और भरतवंश का यह संबंध सर्वथा उचित है। मैं आपके अंत:पुर में काफी दिन रहा हूँ तथा आपकी पुत्री को एकांत में और सबके सामने देखता आया हूँ। उसने भी सदा मुझे पितृतुल्य आदर दिया है। मैं नर्तक तो था ही, साथ ही गान-विद्या में भी अत्यंत कुशल हूँ। अतएव आपकी कन्या का मेरे प्रति बहुत अधिक प्रेम रहा है। वह मुझे सदा गुरु का आदर देती रही है। आपकी वयस्क कन्या के साथ एक वर्ष रहकर अब यदि मैं उसके साथ विवाह करता हूँ तो आपको अथवा अन्य लोगों को अवश्य ही मेरे चरित्र के विषय में संदेह हो सकता है और वह उचित भी है। अतएव मैं आपकी कन्या को पुत्रवधू के रूप में स्वीकार करूंगा। इससे मेरी पवित्रता और संयम सिद्ध होगा और आपकी कन्या पर भी लोगों का कोई संदेह नहीं रह जाएगा। पुत्री तथा पुत्रवधू में और पुत्र तथा आत्मा में कोई भेद नहीं होता। अत: आपकी कन्या को पुत्रवधू के रूप में स्वीकार करने पर हम दोनों की पवित्रता सिद्ध हो जाएगी। राजन्, मैं मिथ्यापवाद और अभिशाप से डरता हूँ।