हार्ट अटैक क्या है ,इसके कारण व बचने के उपाय

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हार्ट अटैक क्या है ,इसके कारण व बचने के उपाय

हृदयाघात (हार्ट अटैक) क्या होता है ? : heart attack in hindi

जब ब्लॉकेज का स्तर 70 प्रतिशत हो जाता है तब ‘एंजाइना’ का कहर शुरू होता है । यह ब्लॉकेज नलिका के आंतरिक दीवार में होता है जिसे इंटिमा (Intima) कहते हैं जो धीरे-धीरे ब्लॉकेज के बढ़ने के साथ-साथ सिकुड़ने लगता है।
अंतत: एक दिन यह दीवार टूट जाती है और वसा का जमाव ब्लॉकेज के स्तर को शत प्रतिशत तक पहुंचा देता है । रक्त संचार की प्रक्रिया में इस तरह की पूर्ण बाधा ‘हृदयाघात’ के मुकाम तक ले जाती है ।
शत प्रतिशत ब्लॉकेज की स्थिति से तीव्र दर्द पसीना आना तथा हृदय के कुछ मांसपेशियों का निष्क्रिय हो जाना अंतत: स्थायी रूप से क्षति का कारण बन जाती है । हार्ट अटैक (हृदयाघात) के बदौलत हृदय में रक्त का संचार बाधित हो जाता है । यह स्थिति हृदय में रक्त संचार करने वाली नलिकाओं के किसी भी शाखा में शत प्रतिशत ब्लॉकेज के कारण होती है । हृदय की मांसपेशियों में रक्त व ऑक्सीजन का संचार बंद हो जाता है और परिणामस्वरूप व्यक्ति की मौत हो जाती है ।
हार्ट अटैक की तीव्रता इस बात पर निर्भर करती है कि हृदय का कितना हिस्सा प्रभावित हो रहा है । 5-10 प्रतिशत हिस्सों के प्रभावित होने पर तीव्रता कम होती है।
और ऐसी परिस्थिति में मरीज प्रायः बच जाता है किन्तु जब यह 30 -40 प्रतिशत हिस्सों को प्रभावित करती है। तो आक्रमण तीव्र होता है और तत्काल व उचित देखभाल के अभाव में मौत सुनिश्चित हो जाती है।

हृदयाघात प्राय: वसायुक्त भोजन ( अधिक) करने अचानक क्रोध अत्यधिक दु:ख या तनाव के कारण होता है । हार्ट अटैक एंजियोग्रॉफी और एंजियोप्लास्टी प्रक्रिया के दौरान भी हो जाता है जब बैलून फुलकर कॉरोनरी आर्टरी (हृदय में रक्त संचालन की नलिका) को अवरुद्ध कर देता है या इंटिमा (आतरिक सतह) टूट जाती है।
हार्ट अटैक (हृदयाघात) को टालने के लिए साधारण संवाद है- ‘ब्लॉकेज को उत्पन्न नहीं होने दें ।’ यदि ब्लॉकेज को कम कर सकते हैं तो हार्ट अटैक कभी नहीं होगा । जीवनशैली में परिवर्तन लाकर हार्ट अटैक की संभावना को रोका जा सकता है।
हार्ट अटैक की संभावना को दूर करने के लिए निम्नलिखित बातों पर ध्यान दें –

1. कोलेस्ट्रॉल                         130 से 160
2. ट्राइग्लिसराइड                   60 से  120
3. एच डी एल कोलेस्ट्रॉल        40  से  60
4. रक्त शर्करा (उपवास)       70  से  100
5. रक्त शर्करा (पीपी)            140  से  निचे
6. रक्तचाप                           120 / 180
7. अत्यधिक व्यायाम
8. लम्बाई के अनुसार वजन
9. धूम्रपान नहीं
10. तनाव (स्ट्रेस) पर नियंत्रण
11. भोजन में तेल /घी बिलकुल नहीं।
12. फल व सलाद प्रचुर मात्रा में लें ।
13. दूध व दूध से निर्मित वस्तुओं से परहेज करें ।
14. मांस से परहेज ।
15. अल्कोहल नहीं ।

( और पढ़ेहार्ट ब्लॉकेज दूर करने के 10 सबसे असरकारक घरेलु उपचार )

हार्ट अटैक किन कारणों से होता है इसके उत्तरदायी कारक :

कोरोनरी हार्ट डिजीज संपूर्ण विश्व में बढ़ती रुग्णता एवं मृत्यु दर का सर्वप्रमुख कारण है। भारत में भी इसका निरंतर विस्तार जारी है। इस रोग का मुख्य कारण हृदय में रक्त संवाहन करने वाली नलिकाओं के आंतरिक सतहों पर कोलेस्ट्रॉल व वसा का एकत्रित होना है जिसके परिणामस्वरूप रक्त संवाहक बाधा व ब्लॉकेज की उत्पत्ति होती है।
विशेष परिस्थितियों व जीवन शैली को इस रोग के कारणों के रूप में जिम्मेदार माना गया है। ये वैसे कारक हैं जो नलिकाओं में कोलेस्ट्रॉल व वसा के जमाव को बढ़ाते या उत्साहित करते हैं। कोरोनरी हार्ट डिजीज के लिए जिम्मेवार कारकों को दो भागों में विभाजित किया गया है।
1. परिवर्तनीय कारक (Modifiable risk- Factor) : इस समूह में वैसे कारकों को रखा जाता है जिनमें बदलाव लाकर हृदय रोगों के विकास को रोका जा सकता है।
2. अपरिवर्तनीय कारक (Non- Modifiable risk -Factor) : तीन ऐसे कारक होते हैं, जिनमें कोई बदलाव नहीं लाया जा सकता है-उम्र, लिंग व अनुवांशिकी।

परिवर्तनीय कारक :

1. स्ट्रेस (तनाव)
2. उच्च रक्त – कोलेस्ट्रॉल स्तर
3. उच्च रक्त-ट्राइग्लिसराइड स्तर
4. निम्न रक्त एच डी एल स्तर
5. आहार में एन्टिऑक्सीडेन्ट्स की कमी
6. उच्च रक्तचाप
7. वंशानुगत डायबिटीज (जिसका कारण ज्ञात नहीं)
8. मोटापा या अतिभार
9. निष्क्रिय जीवनशैली या शारीरिक गतिविधि का अभाव
10. धूम्रपान व तम्बाकू सेवन
11. अल्कोहल का सेवन

अपरिवर्तनीय कारक :

1. उम्र
2. लिंग
3. अनुवांशिकी

1.रक्त में कोलेस्ट्रॉल का स्तर :

कोरोनरी हार्ट डिजीज के लिए उत्तरदायी कारकों में सर्वप्रमुख है- रक्त में कोलेस्ट्रॉल । प्रारंभ में कोलेस्ट्रॉल को हृदय नलिकाओं में ब्लॉकेज का सर्वप्रमुख कारण माना जाता था किन्तु इस दिशा में हुए अनन्य अध्ययनों से यह ज्ञात होता है कि यह उन तीन महत्वपूर्ण कारकों में से एक है।

कोलेस्ट्रॉल रक्त में मौजूद वसा की छोटी मात्रा है । यह कोमल तत्त्व वसा अम्ल की एक श्रृंखला के साथ 27 कार्बन परमाणुओं के योग से बनता है । इसकी बनावट बहुत ही जटिल होती है जो चार चक्रों में घूमती है । इसे ‘साइकलो-पेन्टानो-परहाइड्रोफेनाथटीन चक्र’ कहा जाता है । चिकित्सा विज्ञान में इसे सबसे अलंकृत अणु माना जाता है । शरीर में कोलेस्ट्रॉल का कार्य अति महत्त्वपूर्ण होता है । यह कोशिकाओं तंत्रिका कवचों व मस्तिष्क के कोशिकाओं का निर्माण करता है । इस अणु के अभाव में जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती । शरीर में इसकी आवश्यकता इतनी होती है। कि इसकी पूर्ति के लिए यकृत (लीवर) स्वयं इसका निर्माण करता है ।

किन्तु इस अणु की वांछित मात्रा से अधिक उपस्थिति (शरीर व रक्त में) हृदय में रक्त संवाहक करने वाली नलिकाओं में ब्लॉकेज बना देता है । कोलेस्ट्रॉल की अधिक मात्रा सिर्फ हृदय ही नहीं अपितु मस्तिष्क के नलिकाओं पैर की नलिकाओं व आंखों के निचले त्वचा में भी एकत्रित होकर ब्लॉकेज बना सकता है ।

रक्त के साथ कोलेस्ट्रॉल स्वतंत्र रूप में संवाहित होता है जो बहुत ही खतरनाक होता है और वह प्रोटीन के साथ भी प्रवाहित हो सकता है । कोलेस्ट्राल शून्य रक्त व हृदय नलिकाओं में जिस दर से ब्लॉकेज का एकत्रीकरण होता है – के बीच मजबूत संबंध होता है ।

पहले यह माना जाता था कि रक्त में कोलेस्ट्रॉल की मात्रा 250 मि.ली. प्रति 100 मि.ली. तक सामान्य व सुरक्षित होता है । किन्तु यह 20 वर्ष पहले की बात है । इस दिशा में हुए अनन्य अध्ययनों से अगले 10 वर्षों में यह बताया गया कि यह दर 200 एम. जी. 100 मि.ली. तक होना चाहिए । किन्तु नवीन अध्ययनों में यह बताया गया है कि किसी भी तरह यह दर 200 एम. जी.100 मि.ली. से अधिक अच्छा नहीं होता । अब इसकी मात्रा 180-200 एम. जी. 100 मि.ली. सामान्य माना जाता है । साओल हृदय कार्यक्रम का सुझाव है कि यह दर 160 एम. जी. 100 मि.ली. से नीचे होना चाहिए।

वैसे लोगों के रक्त में कोलेस्ट्रॉल की मात्रा अधिक पाई जाती है जिनके आहार में कोलेस्ट्रॉल अधिक शामिल होता है । जिन आहारों में कोलेस्ट्रॉल की मात्रा अधिक होती है उसमें अंडे का पीला वाला भाग मांस-मछली, दूध घी क्रीम मक्खन आइसक्रीम चॉकलेट पनीर एवं दही इत्यादि । इसके अतिरिक्त अन्य कोई भी वसा विशेषकर तरल अम्लीय वसा का उपयोग लीवर द्वारा कोलेस्ट्रॉल के निर्माण हेतु किया जाता है । जब रक्त में इस कोलेस्ट्रॉल का प्रवाह प्रोटीन के साथ होता है तो यह हृदय में रक्त संवाहन करने वाली नलिकाओं में एकत्रित हो जाता है । साओल का सुझाव है कि प्रत्येक व्यक्ति के प्रतिदिन आहार में कोलेस्ट्रॉल की मात्रा 10 एम.जी. प्रतिदिन तक या कम होनी चाहिए।

2. रक्त में ट्राइग्लिसराइड्स का स्तर :

कोलेस्ट्रॉल के अतिरिक्त एक अन्य वसा जिसे शोध व अध्ययन के तत्काल श्रृंखला में महत्त्व दिया गया है-ट्राइग्लिसराइड्स है। जिसे हृदय रोग के प्रमुख कारणों में गिना जाता है। लगभग सभी वसा जिसे हम भोजन के माध्यम से लेते हैं- ट्राइग्लिसराइड्स ही होती है। यह मुख्यतः तेल (ऑयल्स) का दूसरा नाम है। ट्राइग्लिसराइड्स ही ब्लॉकेज के निर्माण में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसका निर्माण ग्लिसरॉल के एक अणु व वसा के तीन अणुओं के योग से होता है। लगभग सभी तेलों में शत प्रतिशत वसा होता है। ट्राइग्लिसराइड्स का सामान्य स्तर 60-160 मि.ली. ग्राम होता है। साओल का सुझाव है कि इस स्तर को 130 मि.ली. ग्राम से कम किया जाए।

3. एचडीएल कोलेस्ट्रॉल की निम्न स्तर :

एचडीएल कोलेस्ट्रॉल को ‘अच्छा कोलेस्ट्रॉल माना जाता है। इसकी जांच बासी पेट में रक्त नमूना के द्वारा की जाती है। इस कोलेस्ट्रॉल में अन्य कोलेस्ट्रॉल के साथ घुल-मिल जाने की क्षमता होती है तथा यह कोलेस्ट्रॉल हृदय नलिकाओं में एकत्रित ब्लॉकेज में उपस्थित कोलेस्ट्रॉल को भी विस्थापित कर सकता है। रक्त में इस कोलेस्ट्रॉल का स्तर 40 मि.ली. ग्राम 100 मि.ली. ग्राम होना चाहिए ताकि हृदय रोगों को टाला जा सके। भारतवासियों में इसका स्तर निम्न होता है (40 मि.ली. ग्राम./ 100 मि.ली. से कम) ।

4. उच्चा रक्तचाप :

वयस्कों में सामान्य रक्तचाप 100/ 60-140/90 एम एम/ एच जी होता है। यदि रक्तचाप 140/90 निरंतर हो (या अलग-अलग अवसरों पर) बना रहता है तो, इस स्थिति को उच्च रक्तचाप (हाइपरटेंशन) कहा जाता है। यह एक आम बीमारी है और लगभग 20-30 प्रतिशत वयस्क इससे ग्रस्त हैं किन्तु अधिकांश लोगों को इसका अनुमान नहीं होता कि वे हाइपरटेंशन के शिकार हैं क्योंकि अधिकांश लोगों में इसके लक्षण नहीं दिखते। इसलिए इस बीमारी को सायलेंट किलर’ (Silent Killer) भी कहते हैं। उच्च रक्तचाप हृदय एवं इसमें रक्त संचार करने वाली नलिकाओं में अतिरिक्त तनाव बढ़ाता है। उच्च रक्तचाप कई बीमारियों का कारण होता है, जैसे हृदयाघात, हृदय निष्क्रियता, किडनी निष्क्रियता, मस्तिष्क पक्षाघात एवं आंखों की बर्बादी । उच्च रक्तचाप को तीन वर्गों में विभाजित किया जा सकता है-मध्यम, तीव्र एवं तीव्रतम । हृदय में रक्त का संचार करने वाली नलिकाओं में कोलेस्ट्रॉल एवं वसा के जमाव के लिए एक महत्त्वपूर्ण कारण उच्च रक्तचाप होता है। अत्यधिक नमक के सेवन से उच्च रक्त चाप की स्थिति उत्पन्न होती ही है साथ ही मनोवैज्ञानिक स्ट्रेस भी इसके लिए जिम्मेवार होता है ।

5. रक्त में शर्करा :

उपवास की स्थिति में रक्त में शर्करा की सामान्य मात्रा 80-120 एम.जी. होता है । यदि उपवास की स्थिति में इसकी मात्रा 110 एम.जी. या भोजन के बाद 160 एम.जी. से अधिक होता है तो यह स्थिति डायबिटीज या उच्च रक्त शर्करा (High Blood Sugar ) कहलाती है। डायबिटीज के मरीजों में मूत्र में भी शर्करा पायी जाती है । डायबिटीज के मरीजों में कोरोनरी ब्लॉकेज की अधिकतम संभावनाएं रहती हैं। ऐसे मरीजों में किडनी तंत्रिका एवं आंखों की संभावनाएं भी रहती हैं । डायबिटीज के मरीजों में मोटापा उच्च रक्तचाप एवं रक्त में कोलेस्ट्रॉल का स्तर ऊंचा होता है जो सामूहिक रूप से ब्लॉकेज के लिए उत्तरदायी होता है । प्रारंभिक जीवनकाल में डायबिटीज हार्ट अटैक को निमंत्रण देता है । डायबिटीज के प्रमुख लक्षणों में-प्यास लगना, अत्यधिक मूत्र आना (बार-बार) एवं वजन घटना आदि शामिल है। जबकि कुछ मरीजों में ऐसे लक्षण नहीं भी दिखते हैं । हृदय रोगियों के लिए डायबिटीज पर नियंत्रण पाना अति आवश्यक होता है। भारत में डायबिटीज के मरीजों की संख्या काफी है ।

6. मोटापा या अतिभार :

वैसे लोग जो भोजन में अत्यधिक वसा का सेवन करते हैं तथा व्यायाम नहीं करते उनका वजन बढ़ता है । अब कुछ प्रामाणिक तालिकाएं उपलब्ध हैं जिनके सहारे यह पता लगाया जा सकता है कि कोई मोटापा या अतिभार से ग्रस्त है । मोटे लोगों में हृदय रोगों की संभावनाएं अधिक रहती हैं। इनमें उच्च रक्तचाप
डायबिटीज और अंततः ब्लॉकेज की संभावनाएं काफी बढ़ जाती हैं । निम्न कैलोरी,वसायुक्त भोजन से परहेज शर्करा का कम सेवन व व्यायाम के माध्यम से मोटापा दूर किया जा सकता है । जो लोग शारीरिक रूप से निष्क्रियता अपनाते हैं उनमें उच्च रक्तचाप एवं हार्ट अटैक की स्थिति का विकास होता है। दुबले-पतले लोगों की तुलना में हार्ट अटैक की संभावना मोटे लोगों में 15 गुणा अधिक होती है।

7. एंटिऑक्सिडेंट्स एवं फाइबर (रेशेदार पदार्थ) :

एन्टिऑक्सिडेंट्स की मौजूदगी उपचयन की प्रक्रिया को नियंत्रित करता है। शरीर में प्रवाहित होने वाले रक्त में कोलेस्ट्रॉल व ऑक्सिज दोनों मौजूद होते हैं। कोलेस्ट्रॉल के उपचयन के परिणामस्वरूप ब्लॉकेज बनता है। एन्टिऑक्सिडेंट्स की उपस्थिति ‘ क्षय’ को रोकता है। विटामिन-ए, सी, ई एवं सिलेनियम, कैल्शियम तथा जिंक इसके उदाहरण हैं।
लगभग समस्त सब्जियों, उनके छिलकों एवं फलों में फाइबर होता है। यह हमारे भोजन को एकत्रित कर शौच के माध्यम से बाहर निकालने में सहयोग देता है। साथ ही भोजन में उपस्थित वसा को भी उत्सर्जित करता है।

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हार्ट अटैक (हृदयाघात) से बचने के उपाय :

✦सादा, संतुलित और पौष्टिक खानपान अपनाएं।
✦ ज्यादा घी-तेल और मसालों के सेवन से बचें।
✦एल्कोहॉल और सिगरेट से दूर रहें। एल्कोहॉल का सेवन करने के बाद हार्ट के पंपिंग की गति अनियंत्रित हो जाती है। इससे शरीर के विभिन्न हिस्सों तक सही ढंग से रक्त प्रवाह नहीं हो पाता। इसी तरह सिगरेट में मौजूद निकोटीन हार्ट की रक्तवाहिका नलियों के भीतरी हिस्से को नुकसान पहुंचाता है। सिगरेट पीने के बाद दिल की धड़कन तेज़ हो जाती है और इससे ब्लडप्रेशर भी बढ़ जाता है, जो हार्ट अटैक का बहुत बड़ा कारण है।
✦क्रीमयुक्त दूध के बजाय स्किम्ड मिल्क का सेवन करें।
✦प्रतिदिन हरी सब्ज़ियों और फलों की पांच मिलीजुली सर्विंग ज़रूर लें। अगर आप नॉन-वेजटेरियन हैं तो रेड मीट से दूर रहें ।
✦ब्लडप्रेशर नियंत्रित रखने के लिए नमक का सेवन सीमित मात्रा में करें।
✦अगर डायबिटीज़ की समस्या है तो शुगर के स्तर को नियंत्रित रखने के लिए चीनी, चावल, आलू और मीठे फलों का सेवन बेहद सीमित मात्रा में करें क्योंकि इससे भी हार्ट अटैक का ख़तरा बढ़ जाता है।
✦नियमित रूप से व्यायाम और सुबह-शाम की सैर करें। इससे शरीर के मेटाबॉलिज्म का स्तर नियंत्रित रहता है और हृदय की धमनियों में अतिरिक्त कोलेस्ट्रॉल का जमाव नहीं होता।
✦यह समस्या आनुवंशिक कारणों से भी होती है। अगर परिवार में इस बीमारी की हिस्ट्री रही है तो एहतियात के तौर पर साल एक बार हार्ट का रूटीन चेकअप ज़रूर करवाना चाहिए।

2019-02-09T18:24:13+00:00By |Disease diagnostics|0 Comments

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