पूज्य बापू जी का संदेश

ऋषि प्रसाद सेवा करने वाले कर्मयोगियों के नाम पूज्य बापू जी का संदेशधन्या माता पिता धन्यो गोत्रं धन्यं कुलोद्भवः। धन्या च वसुधा देवि यत्र स्याद् गुरुभक्तता।।हे पार्वती ! जिसके अंदर गुरुभक्ति हो उसकी माता धन्य है, उसका पिता धन्य है, उसका वंश धन्य है, उसके वंश में जन्म लेने वाले धन्य हैं, समग्र धरती माता धन्य है।""ऋषि प्रसाद एवं ऋषि दर्शन की सेवा गुरुसेवा, समाजसेवा, राष्ट्रसेवा, संस्कृति सेवा, विश्वसेवा, अपनी और अपने कुल की भी सेवा है।"पूज्य बापू जी

यह अपने-आपमें बड़ी भारी सेवा है

जो गुरु की सेवा करता है वह वास्तव में अपनी ही सेवा करता है। ऋषि प्रसाद की सेवा ने भाग्य बदल दिया

कबीर जी की अनोखी मंत्रदीक्षा( बोध कथा )| Hindi storie with moral

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कबीर जी की अनोखी मंत्रदीक्षा( बोध कथा )| Hindi storie with moral

Motivational stories in Hindi : प्रेरक हिंदी कहानियाँ

★ उस समय काशी में रामानन्द स्वामी बडे उच्च कोटि के महापुरुष माने जाते थे । कबीरजी ने उनके आश्रम के मुख्य द्वार पर आकर विनती की : ‘‘मुझे गुरुजी के दर्शन कराओ ।

★ उस समय जात-पात का बडा आग्रह रहता था । और फिर काशी ! पण्डितों और पण्डे लोगों का अधिक प्रभाव था । कबीरजी किसके घर में पैदा हुये थे, हिन्दू के या मुस्लिम के, कुछ पता नहीं था । एक जुलाहे को रास्ते में किसी पेड के नीचे से मिले थे । उसने पालन-पोषण करके कबीरजी को बडा किया था । जुलाहे के घर बडे हुये तो जुलाहे का धन्धा करने लगे । लोग मानते थे कि वे मुसलमान की संतान हैं ।

★ द्वारपालों ने कबीरजी को आश्रम में जाने नहीं दिया । कबीरजी ने सोचा कि पहुँचे हुये महात्मा से अगर गुरुमंत्र नहीं मिलता तो मनमानी साधना से ‘हरिदास, बन सकते हैं, ‘हरिमय, नहीं बन सकते । कैसे भी करके रामानन्दजी महाराज से मंत्रदीक्षा लेनी है ।

★ कबीरजी ने देखा कि हररोज सुबह तीन चार बजे स्वामी रामानन्दजी खडाउँ पहनकर ‘टप… टप… आवाज करते हुये गंगा में स्नान करने जाते हैं । कबीरजी ने गंगा के घाट पर उनके जाने के रास्ते में सब जगह बाड कर दी और एक ही मार्ग रखा । उस मार्ग में सुबह के अन्धेरे में कबीर सो गये । गुरु महाराज आये तो अन्धेरे के कारण कबीरजी पर पैर पड गया । उनके मुख से उद्गार निकल पडे : ‘राम… राम…!

★ कबीरजी का तो काम बन गया । गुरुजी के दर्शन भी हो गये, उनकी पादुकाओं का स्पर्श एवं मुख से राम मंत्र भी मिल गया । अब दीक्षा में बाकी ही क्या रहा ? कबीरजी नाचते, गुनगुनाते घर वापस आये । रामनाम की और गुरुदेव के नाम की रट लगा दी । अत्यंत स्नेहपूर्ण हृदय से गुरुमंत्र का जप करते, गुरुनाम का कीर्तन करते साधना करने लगे । दिनोदिन उनकी मस्ती बढने लगी ।

★ जो महापुरुष जहाँ पहुँचे हैं वहाँ की अनुभूति उनका भावपूर्ण हृदय से चिन्तन करनेवाले को भी होने लगती है ।sant kabir ji motivational story in hindi
काशी के पण्डितों ने देखा कि यवन का पुत्र कबीर रामनाम जपता है, रामानन्द के नाम का कीर्तन करता है उस यवन को रामनाम की दीक्षा किसने दी ? क्यों दी ? मंत्र को भ्रष्ट कर दिया ।

★ पण्डितों ने कबीर से पूछा : ‘‘रामनाम की दीक्षा तेरे को किसने दी ?
‘‘स्वामी रामानन्दजी महाराज के श्रीमुख से मिली ।
‘‘कहाँ दी ?
‘‘सुबह गंगा के घाट पर ।
पण्डित पहुँचे रामानन्दजी के पास : ‘‘आपने यवन को राममंत्र की दीक्षा देकर मंत्र को भ्रष्ट कर दिया, सम्प्रदाय को भ्रष्ट कर दिया । गुरु महाराज ! यह आपने क्या किया ?

★ गुरु महाराज ने कहा : ‘‘मैंने तो किसी को दीक्षा नहीं दी ।
‘‘वह यवन जुलाहा तो ‘रामानन्द.. रामानन्द… मेरे गुरुदेव रामान्द.. की रट लगाकर नाचता है, आपका नाम बदनाम करता है ।
‘‘भाई ! मैंने तो उसको कुछ नहीं कहा । उसको बुलाकर पूछा जाय । पता चल जायगा ।

★ काशी के पण्डित इकट्ठे हो गये । जुलाहा सच्चा कि रामानन्दजी सच्चे यह देखने के लिए भीड हो गयी । कबीरजी को बुलाया गया । गुरु महाराज मंच पर विराजमान हैं सामने विद्वाान पण्डितों की सभा मिली है । रामानन्दजी ने कबीरजी से पूछा : ‘‘मैंने तुझे कब दीक्षा दी ? मैं कब तेरा गुरु बना ? कबीर बोले : ‘‘महाराज ! उस दिन प्रभात को आपने मुझे पादुका स्पर्श कराया और राममंत्र भी दिया, वहाँ गंगा के घाट पर ।

★ रामानन्द ने कबीर के सिर पर मृदु खडाऊँ मारते हुये कहा : ‘‘राम… राम.. राम… मुझे झूठा बनाता है ? गंगा के घाट पर कब मैंने तुझे दीक्षा दी थी ?
कबीरजी बोले उठे : ‘‘गुरु महाराज ! तब की दीक्षा झूठी तो अब की तो सच्ची…! मुख से रामनाम का मंत्र भी मिल गया और सिर में आपकी पावन पादुका का स्पर्श भी हो गया ।

★ स्वामी रामानन्दजी उच्च कोटि के संत-महात्मा थे । पण्डितों से कहा : ‘‘चलो, यवन हो या कुछ भी हो, मेरा पहले नम्बर का शिष्य यही है ।
ब्रह्मनिष्ठ सत्पुरुषों की विद्या या दीक्षा प्रसाद खाकर मिले तो भी बेडा पार करती है और मार खाकर मिले तो भी बेडा पार कर देती है ।

★ इस प्रकार कबीरजी ने गुरुनाम कीर्तन से अपनी सुषुप्त शक्तियाँ जगायीं और शीघ्र आत्मकल्याण किया । धनभागी हैं ऐसे गुरुभक्त जो दृढता और तत्परता से कीर्तन-ध्यान-भजन करके अपना जीवन धन्य करते हैं, कीर्तन से समाज में सात्त्विकता फैलाते हैं, वातावरण में शुद्धि और अपने तन-मन की शुद्धि करनेवाला हरिनाम का कीर्तन सडकों पर खुले आम नाचते गाते हुये करते हैं ।

★ दुनिया का सब कुछ धन, यश कमा लिया जाय या प्रतिष्ठा के सुमेरु पर स्थित हुआ जाय, उन सब श्रेष्ठ उपलब्धियों से भी गुरुशरणागति एवं गुरु-चरणों की भक्ति श्रेष्ठ है ।
इसके विषय में आद्य शंकराचार्य कहते हैं कि :
मन्स्चेन न लग्नं गुरोरंध्रिपद्मे ।
ततः किं ततः किं ततः किम् ततः किं ।।
अगर गुरु के श्रीचरणों में मन न लगा तो फिर क्या ? इस सबसे क्या ? कौन-सा परमार्थ सिद्ध हुआ ?

★ कलियुग में केवल नाम अधारा क्यों न इस कलिकालqचतामणि हरि-गुरुनाम कीर्तन कल्पतरु का विशेष फायदा उठाया जाय ?

श्रोत – ऋषि प्रसाद मासिक पत्रिका (Sant Shri Asaram Bapu ji Ashram)

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