महावातविध्वंसन रस के फायदे ,गुण और उपयोग | Mahavat Vidhwansan Ras in Hindi

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महावातविध्वंसन रस के फायदे ,गुण और उपयोग | Mahavat Vidhwansan Ras in Hindi

महावातविध्वंसन रस क्या है ? mahavat vidhwansan ras kya hai

महा वातविध्वंसन रस एक आयुर्वेदिक दवा है जिसका प्रयोग मुख्यतः रूमेटोइड गठिया, हड्डियों और जोड़ों का दर्द, मांसपेशियों के दर्द, अथवा सूजन ,पैरालिसिस और मिर्गी जैसे रोगों को दूर करने में किया जाता है। यह एक दर्द निवारक दवा है।

महावातविध्वंसन रस की सामाग्री : ingredients of mahavat vidhwansan ras

✦शुद्ध पारद
✦शुद्ध गन्धक
✦नाग भस्म
✦वंग भस्म
✦लौह भस्म
✦ताम्र भस्म
✦अभ्रक भस्म
✦पीपल
✦शुद्ध टंकण
✦सोंठ
✦काली मिर्च
✦वत्सनाभ

महावातविध्वंसन रस का रोगों में लाभ :

✢ अस्थिसंधिशोथ (osteoarthritis)
गठिया का दर्द
✢ जोड़ो का दर्द (joint pain)
✢ सूजन (swelling)
बवासीर(piles)
✢ रूमेटोइड गठिया(Rheumatoid arthritis)
✢ संधिशोथ (Arthritis)
✢ ऑस्टियो आर्थराइटिस
मिर्गी (epilepsy)
✢ जोड़ों की सूजन(Swelling of joints)
✢ हड्डियों का दर्द(Bone pain)
पक्षाघात(paralysis)
✢ मांसपेशियों का दर्द (Muscular pain)

सेवन की मात्रा और अनुपान : Dosage

१ से २ गोली दिन में दो-तीन बार दें। तीव्र वात रोगों में अदरक -रस और शहद के साथ या भांगरा-स्वरस और शहद के साथ, और आमवात में एरण्ड तैल या घृत अथवा सुखोष्ण जल के साथ दें।

महावातविध्वंसन रस के फायदे ,गुण और उपयोग : mahavat vidhwansan ras ke fayde, gun aur upyog

1- इस रसायन का प्रयोग करने से समस्त प्रकार के कठिन वात रोग नष्ट होते हैं और शूल, कफ प्रकोप जनित रोग, ग्रहणी, सन्निपात, अपस्मार, मन्दाग्नि शरीर का स्पर्श शीतल होना, पित्तोदर, प्लीहावृद्धि, कुष्ठ, अर्श, स्त्रियों के गर्भाशय विकृति जन्य रोग, सूतिका रोग-इन सबको शीघ्र नष्ट करता हैं।

2- यह रसायन वात-वृद्धि और वातवाहिनियों के क्षोभ का शमन करनेवाली उत्तम शामक औषध है। साथ ही इस औषधि में शूल नाशक गुण भी विशेषांश में विद्यमान रहते है।

3- यह वातवाहिनियों के क्षोभ में उपयोगी होने से अपतानक, अपतन्त्रक आक्षेपक और तीव्र, वेगवाले आशुकारी पक्षाघात में वात-वृद्धि के लक्षण अधिक होने पर इस रसायन के सेवन से वात प्रकोप का शमन होकर वात-साम्य स्थापित होना है।

4- किसी भी निमित्त से उत्पन्न किसी भी रोग में वातवाहिनियों में क्षोभ होने पर एवं रोग की तीव्रावस्था में महावातविध्वंसन रस का सेवन उपयोगी है। केवल वात प्रधान विकार होने पर इस रसायन से अच्छा उपकार होता है, परन्तु दोष-वातपित्तात्मक हों, तो सूतशेखर रस का सेवन उपयोगी है।

5- वातवाहिनियों के कार्य में किसी कारण से रूकावट होने पर वात क्षोभ उत्पन्न होता है, फिर किसी भी अवस्था में शूल उत्पन्न होने की दशा में इस रसायन का सेवन कराना लाभप्रद है। पद्यपि आमवात और सन्धिवात की जीर्णावस्था में योगराज गुग्गुल और गौक्षुरादि गुग्गुल का सेवन उपयोगी है, तथापि जब अंगों में बिच्छू के दंश के समान अत्यन्त तीव्र वेदना, विशेषतः शोथ स्थान में भयंकर वेदना, शूल, बैचैनी, प्रलाप आदि लक्षण हों, तब आमशोषक और वेदनाशामक ये दोनों कार्य इस रसायन के प्रयोग करने से सरलतापूर्वक उत्तम प्रकार से हो जाते हैं, और रोगी को थोड़े ही समय में बहुत लाभ हो जाता है। आमवात रोग की तीव्रावस्था की यह अप्रतिम औषध है।

6- कभी-कभी मानसिक रोगों से भी बात क्षोभ होकर वेदना होती है। अपस्मार, उन्माद, मनोव्याघात आदि विकारों में होने वाली वेदना में विशेषत: द्राक्षारिष्ट या अभ्रक भस्म प्रधान औषधि दी जाती है, किन्तु जो शूल शारीरिक दोषों से विशेषत: वात दुष्टि से उत्पन्न होता है, उस शूल पर इस रसायन का विशेष कार्य होता है। इससे वात-प्रकोप नष्ट होकर साम्य-भाव स्थापित होता है। इसी कारण से किसी भी प्रकार के शूल में इस रसायन के प्रयोग से उत्तम लाभ होता है। स्थान भेद और दोष-दूष्य भेद के अनुसार अनुपान की उचित कल्पना करके देना विशेष उपयोगी है।

7- केवल वातक्षोभजन्य शिर:शूल अति त्रासदायक होता है। उस समय अत्यन्त व्याकुलता और शरीर में कील गाड़ने सदृश भयंकर वेदना होती है। रोगी अपनी गर्दन (गला) इधर-उधर फिराता है और बेचैनी बढ़ती जाती है तथा निरर्थक विचार आना विशेषतः मस्तिष्क के दायें पार्श्व में अतिशय पीड़ा आदि लक्षण होते हैं, यहाँ तक कि पीड़ा के मारे रोगी सिर पीटता, रोता चिल्लाता है। इस प्रकार कुछ समय दर्द होकर बाद में स्वयमेव कम जो जाता है, अर्थात् वेदना का वेग सहन करने लायक होता जाता है। कुछ ही समय में फिर पहले के समान वेदना होने लगती है, इस प्रकार बार-बार आक्षेप सदृश तीव्र वेग के रूप में वेदना होती रहती है। इस प्रकार के शिरःशूल में इस रसायन का सेवन अत्यंत लाभकारी है।

8- शिरःशूल के समान कुक्षिशूल, उर:शूल, पाश्र्वशूल इनमें भी अकस्मात् तीव्र शुल होने लगता है, फिर कुछ समय के लिये वेदना कम होकर पुन:शिरःशूल सदृश तीव्र और असह्य शूल होने लगता है। यह असह्य शूल छूरा भोंकनें सदृश होता है। इस प्रकार के रोगों में वात विध्वंसन रस कफघ्न अनुपान के साथ सेवन करना उपयोगी है।

9- हृदय के शूल में उक्त प्रकार की आक्षेप सदृश वेदना होने पर इस रसायन के सेवन से अच्छा लाभ होता है, परन्तु जब तीव्र वेदना हृदय से निकल कर बायें हाथ की ओर फैलती हो, और साथ में घबराहट, प्रस्वेद आदि लक्षण प्रतित होते हों, उस दशा में इस रसायन का प्रयोग न करके (स्वल्प मात्रा में सूतराज रस या मुक्त अथवा प्रवाल प्रधान) शामक औषधि देनी चाहिए।

10- वातक्षोभजन्य छाती या पीठ के शूल में महावातविध्वंसन रस का सेवन विशेष गुणकारी है।

11-इसी प्रकार फुफ्फुस प्रदाह के प्रारम्भ में छाती में शूल चलता हो और वात क्षोभ से वेदना होती हो तथा वेदना के साथ मर्यादित ज्वर एवं शोथ होने की दशा में हो तो इस रस का सेवन उत्कृष्ट लाभकारी है।

12- वातक्षोभजन्य उदर शूल में भी यह रस उपयोगी है। उदर पीड़ा-विकार में विशेष लाभ करता है। इसमें उदर के भीतर विविध अवयव, उनकी क्रिया और उनमें विकार, तीनों का सम्बन्ध रहता है, अतः इस कारण से रोग निर्णय में कठिनाई होती है। उदर की परीक्षा करने पर पचनेन्द्रिय के विकार, मूत्रपिण्ड, मूत्रमार्ग या मूत्राशय के विकार, अन्य विकृति और उनमें शल्य तथा सर्व कोष्ठ में व्यापक वात नाड़ियों में विकृति, सगर्भा स्त्री रोगिणी होने पर गर्भाशय विकार इन सबका विचार करना पड़ता है। इनमें वातक्षोभजन्य शूल में इसका प्रयोग विशेष गुणकारी है। यह शूल भी आक्षेप, सदृश बड़े जोर से उत्पन्न होता है और उतने ही वेग से शमन भी होता है।

13- श्लैष्मिक और श्वसनक सन्निपात की प्रथमावस्था में यदि कफ विकृति सामान्य और वात प्रकोप अधिक हो तो महावात विध्वंसन रस का सेवन उपयोगी है, परन्तु जब गले में कफ की घर-घर आवाज होती हो, तो उस दशा में इस रस के सेवन से विशेष अधिक लाभ नहीं होता।

14- आन्त्रिक सन्निपात (मधुरा), ग्रान्थिक सन्निपात (प्लेग) और सान्धिक सन्निपात में बेहोशी, कण्ठ चलते रहना, प्रलाप, चित्त विभ्रम, नेत्र भरे-से ज्ञात होना, जिव्हा शुष्क, (कभी जिव्हा काली
भी हो जाती है), जिव्हा पर कार्ट, इस प्रकार की वात-क्षोभयुक्त दशा में इस महावातविध्वंसन रस का सेवन सर्वप्रसिद्ध अपूर्व लाभकारी निर्भय औषधि है।

15- प्रसूता स्त्रियों को ज्वर न होने पर भी मक्क्ल शूल होता है, जिसमें भयंकर शिरःशूल, बस्ति कोष्ठ और गर्भाशय में अति तीव्र शूल या आक्षेप के समान वेदना-गर्भाशय से निकलकर बस्ति और उदर में फैल जाना आदि लक्षणों में महावातविध्वंसन रस का सेवन अत्यन्त लाभकारी है।

16- गृध्रसी रोग को पाश्चात्य चिकित्सा शास्त्र में वातनाड़ी शूल के अन्तर्गत माना जाता है। इस रोग के प्रारम्भ में बेचैनी, पैरों में झनझनाहट, नाड़ियों का खिंचाव आदि लक्षण होते हैं। फिर नितम्बप्रदेश, जंघा के सामने या पीछे या बाहर शूल उत्पन्न होता है। इस रोग में असह्य पीड़ा होती है। निद्रा नहीं आती, इस दशा में कितने ही सप्ताह या मास व्यतीत हो जाते हैं। किसी-किसी को इस रोग में ज्वर भी हो जाता है। ज्वर का तापमान १०२, १०३ या १०५ तक बढ़ जाता है, फिर वमन, घबराहट, भयंकर शीर्ष शूल, छाती में वेदना, बेहोशी आदि लक्षण उत्पन्न होते हैं। ऐसी दशा में महावात-विध्वंसन रस आधी रत्ती, आम का मुरब्बा ३ माशे, भाँगरे का रस १ तोला मिलाकर उसमें से थोड़ा-थोड़ा करके तीन-चार बार दें। इस प्रकार दिन में २ बार तैयार करके देते रहें, तथा विषगर्भ तैल में तारपीन तैल और कपूर मिलाकर मालिश करते रहने से वेदना का तत्काल शमन हो जाता है।
– औ. गु. ध. शा. के आधार पर

 महावात विध्वंसन रस कैसे काम करता है : Mahawat Vidhwansan Ras works in hindi

इस रसायन का कार्य वातवाहिनियों, वातवह मण्डलों और वातसंस्थानों पर क्षोभ नाशक होता है। यह रस वात दोष तथा मांस और अस्थि इन दूष्यों पर लाभ पहुँचाता है। इस रस में कजली कीटाणुनाशक और योगवाही है। नाग, वंग, लौह, शक्तिवर्द्धक और बल्यत्व के कारण वातशामक है। ताम्र आक्षेपनाशक और वातशामक है। अभ्रक भस्म वातवाहिनियों पर बल्य और शामक प्रभाव करती है। सुहागा कीटाणुनाशक और शामक है तथा वत्सनाभ अवसादक, क्षोभनाशक और शूलघ्न है।
आइये जाने Vidhwansan Ras Side effects in hindi

महावातविध्वंसन रस के नुकसान : mahavat vidhwansan ras ke nuksan

1- इस आयुर्वेदिक औषधि को स्वय से लेना खतरनाक साबित हो सकता है।
2- महावातविध्वंसन रस को डॉक्टर की सलाह के अनुसार सटीक खुराक समय की सीमित अवधि के लिए लें।

विशेष : संधिशूलहर योग चूर्ण(Achyutaya Hariom Sandhishulhar Churna) गठिया,जोड़ो व कमर के दर्द में शीघ्र राहत देने वाली लाभदायक आयुर्वेदिक औषधि है|

प्राप्ति-स्थान : सभी संत श्री आशारामजी आश्रमों( Sant Shri Asaram Bapu Ji Ashram ) व श्री योग वेदांत सेवा समितियों के सेवाकेंद्र से इसे प्राप्त किया जा सकता है |

(वैद्यकीय सलाहनुसार सेवन करें)

2018-09-08T13:48:52+00:00 By |भस्म(Bhasma)|0 Comments