दूध-ज्वर के कारण और लक्षण :

अक्सर नाजुक-बदन औरतों को, बालक जन्म के कुछ दिन बाद, सर्दी लग जाने, अपथ्य आहार-विहार करने, छाति में दूध रुक जाने अथवा घर में लड़ाई-झगड़ों के कारण चिन्ता-फ़िक्र और रज़ करने, अथवा कच्ची अवस्था में ही जच्चा के चलने-फिरने और परिश्रम करने वगैर: कारणों से यह ज्वर होता है, पर इसका असल कारण दूध का छातियों में रुकना है।

पहले-पहल बालक को जन्म देने वाली स्त्री के स्तनों में दूध देर से आता है। अगर बिना दूध आये ही बच्चा स्तनों से लगा दिया जाता है, तो दूध आने के सूराख बन्द हो जाते हैं। बहुत सी औरतों के इतना दूध आया करता है कि कभी-कभी अपने-आप धाराएँ छूट पड़ती हैं। बालक अगर इतना दूध नहीं पी सकता, तो स्तन भारी हो जाते हैं। स्तनों के भारी होने से औरतों को बड़ी तकलीफ़ होती है। अनेक औरतें तो अपने हाथों से बीठनी भींच-भींच कर दूध निकाल फेंकती हैं। जो ऐसा नहीं कर सकतीं, वे बड़ी पीड़ा भोगती हैं। बाजु-बाज़ स्त्रियों के स्तन बहुत ही कठोर और बीठनियाँ मोटी होती हैं। कमजोर बालक उन बीठनियों को मुख में दबा कर दूध नहीं पी सकता। उस हालत में दूध स्तनों में भर जाता है। दूध रुकने के कारणों से, अथवा और किसी वजह से, या सदी-गर्मी से खून का बहना बन्द हो जाने से स्तनों पर सूजन आ जाती है; उससे स्त्रियों को कंपकंपी लग कर जाड़े का बुखार आ जाता है। इस ज्वर को, बोलचाल में, दूध का ज्वर और अँग्रेजी में मिल्क फीवर (Milk Fever) कहते हैं।

इस ज्वर वाली स्त्री उदास हो जाती है; हाथ, पाँव, सिर और पीठ में वेदना होती है, स्तनों में भी पीड़ा होती है, वे पके फोड़े की तरह दुखते हैं और तन कर लाल हो जाते हैं। जाड़े के बुखारों की तरह इस ज्वर में पहले जाड़ा लगता है, पीछे गरमी आती है। प्यास की अधिकता होती है। शेष में पसीने आकर ज्वर उतर जाता है। इसमें औरतें प्रलाप भी करती हैं। बदहज़मी और जी मिचलाना आदि लक्षण भी देखे जाते हैं।

स्तनों (ब्रेस्ट) में दर्द और सूजन दूर करने के घरेलू उपाय :

(१) अगर गर्मी-सर्दी से खून की चाल बन्द हो जाने के कारण छातियों पर सूजन आ गई हो, उनमें मीठा-मीठा दर्द होता हो, तो गीदड़-दाख के पत्ते दो तोले और बाकला दो तोले—इनको खूब महीन पीस कर और सिकंजबीन में मिला कर, छातियों पर लेप करने से पीड़ा शान्त होगी। जब तक वरम–सूजन न उतर जाय, तीन-चार बार लेप करना चाहिये।

(२) अगर बालक के दूध पीते-पीते, माथे की चोट मारने से सूजन आ गई हो, तो स्त्री को चाहिये कि कंघी को ऊपर से नीचे, धीरे-धीरे स्तन पर फेरती जाय और ऊपर से दूसरी औरत सुहाता-सुहाता गरम जल स्तन पर डालती जाय। कंघी नीचे से ऊपर न लानी चाहिये, बार-बार ऊपर से नीचे को फेरनी चाहिये और ऊपर से गरम जल पड़ना चाहिये। तीन दिन में निश्चय ही आराम हो जायगा।

(३) अगर खुश्की और गरमी के कारण स्तनों में दूध जम गया हो, तो मूंग और साँठी चावल दोनों को पीस कर, कुछ गरम जल मिला कर लगाना चाहिये।

(४) अगर कुचों पर सूजन हो, तो मकोय, गुलखैरू, गोखरू, निर्विषी, अफ़ीम और गेरू—इन छहों को एक-एक माशे लेकर, जल में पीस लो और कुछ गरम करके सुहाता-सुहाता लेप कर दो।

(५) शीशम की पत्तियों को एक हाँड़ी में डाल कर, ऊपर से गरम जल भर कर औटाओ। जब पौन या आधा पानी रह जाय, उतार कर उस पानी से स्तनों की सूजन को धोओ।

(६) इन्द्रायण की जड़ का लेप करने से स्तन-रोग नष्ट हो जाता है।

(७) हल्दी और धतूरे के पत्ते का लेप करने से स्तन की पीड़ा शान्त हो जाती है। परीक्षित है।

(८) तपाये हुए लोहे को जल में बुझा कर, वह पानी पिलाने से स्तन-रोग नष्ट हो जाता है।

(९) बाँझ-ककोड़े की जड़ का लेप करने से भी स्तन-पीड़ा शान्त हो जाती है।

(१०) मुलेठी, नीम, हल्दी, सम्हालू और धाय के फूल–इन सबको महीन पीस-छान कर, स्तन के घावों पर बुरकने से घाव भर जाते हैं।

(११) प्रसूति अवस्था में अक्सर, पहले-पहल दूध आते समय दर्द होने लगता है अथवा सूजन आ जाती है। उस समय ८ माशे नौसादर को आधी छटाँक जल में घोल कर एकदिल कर लेना चाहिये और उसे स्तनों पर लगा देना चाहिये। इस लेप से स्तनों में पड़ी हुई गाँठ शीघ्र ही नर्म हो जाती है। गाँठ के पिघलने और सूजन नष्ट करने में यह लेप बड़ा ही उपकारी है। अगर पैर में मुरड़ आ जाय या बादी से सूजन आ जाय, तो यही लेप करने से अवश्य फायदा होता है। स्तनों की पीड़ा और सूजन मिटाने में यह उपाय सबसे उत्तम है।

नोट-अगर स्तन पक जायँ, तो नश्तर लगा कर या किसी दवा से पीप वगैरः निकाल कर, घाव भरने के लिए मरहम प्रभृति से काम लेना चाहिये।

(१२) अगर दूध स्तनों में बहुत ही आता हो और बालक उतना न पी सकता हो और इस वजह से स्त्री को कष्ट रहता हो, तो काहू के बीज, मसूर और जीरा इनको सिरके में पीस कर स्तनों पर लेप करो, दूध कम हो जायगा।

नोट-(१) अगर दूध सूख गया हो तो बच, मोथा, अतीस, देवदारु, सोंठ, शतावर और अनन्तमूल-इन सबका काढ़ा पिलाना चाहिये।

(२)–“भावप्रकाश” में लिखा है-स्तन-रोगों में पित्त-नाशक शीतल पदार्थों का प्रयोग करना चाहिये। जोंक लगवा कर खून निकलवा देना चाहिये। किन्तु स्तनों पर सेक वगैरः करके, पसीना कभी न निकालना चाहिये। स्तन की पीड़ा मिटते ही ज्वर नष्ट हो जाता है। अगर जरूरत हो, तो ज्वर-नाशक दवा देनी चाहिये। अगर प्रसूतावस्था हो, तो वैसा ही नुसखा देना चाहिये और सूतिका-रोग का ही पथ्यापथ्य प्रतिपालन करना चाहिये। अगर प्रसूतावस्था न हो, तो वैसा ज्वर-नाशक देना चाहिये। पर मुख्य उपाय कारण को मिटाना है, जिससे कि ज्वर हुआ हो।

दूध-ज्वर का इलाज / चिकित्सा : milk fever ka upchar

स्तन पीड़ा के शान्त होने से ही दूध-ज्वर या स्तन पीड़ा से हुआ ज्वर आराम हो जायगा। अगर जरूरत हो, तो ज्वर-नाशक औषध भी दी जा सकती है।