नारसिंह चूर्ण के बेमिसाल फायदे ,सेवन विधि और नुकसान | Narsingh Churn Benefits In Hindi

Home » Blog » Ayurveda » नारसिंह चूर्ण के बेमिसाल फायदे ,सेवन विधि और नुकसान | Narsingh Churn Benefits In Hindi

नारसिंह चूर्ण के बेमिसाल फायदे ,सेवन विधि और नुकसान | Narsingh Churn Benefits In Hindi

नारसिंह चूर्ण घटक द्रव्य व बनाने की विधि : Narsingh Churn in Hindi

✦शतावरी, गोखरू, छिलके निकाले हुए तिल और विदारीकन्द ६४-६४ तोले,
✦वाराहीकन्द १ सेर,
✦ गिलोय १ सेर,
✦शुद्ध भिलावे १२८ तोले,
✦चित्रकमूल की छाल आध सेर,
✦त्रिकटु ३२ तोले,
✦मिश्री ३॥ सेर,
✦शहद १।। सेर और
✦घृत ७० तोले लेवें।
✦इनमें से सूखी औषधियों को कूट छान महीन चूर्ण कर मिश्री मिलावें। पश्चात् घृत और फिर शहद मिलावें। बाद में अमृतबान में भरें।(चक्रदत्त)

वक्तव्य-हम घी और शहद नहीं मिलाते। सेवन के समय में ६ माशे घी और १ तोला शहद मिला लेना विशेष हितावह माना है।
रसायन और बाजीकरण गुण के लिये चूर्ण बनाना हो तो गिलोय के स्थान में गिलोयसत्व, भिलावें के स्थान में भिलावें का मगज (गोडम्बी) और त्रिकटु के स्थान में त्रिजात लेना विशेष लाभदायक है।

उपलब्धता : यह योग इसी नाम से बना बनाया आयुर्वेदिक औषधि विक्रेता के यहां मिलता है।

सेवन की मात्रा और अनुपान :

२-४ माशे चूर्ण या घी शहद मिला हो तो ६ माशे से १ तोला, दिन में २ बार दूध के साथ लेवें।

नारसिंह चूर्ण के गुण और उपयोग :

• इस चूर्ण को १ मास तक सेवन करने से क्षय, कास, वृद्धावस्था की निर्बलता, गंज, प्लीहा, अर्श, पाण्डु, हलीमक, श्वास, कास, पीनस, भगन्दर, मूत्रकृच्छ्, अश्मरी, कुष्ठ, उदर रोग, प्रमेह, वातरोग, पित्तरोग, कफरोग, द्वन्द्वज रोग, त्रिदोषज रोग, अर्श ये रोग दूर होकर पुरुष तेज वाला, पराक्रमी, वेग और गम्भीर स्वर वाला बन जाता है।

•भिलावे मिलाने से चूर्ण अधिक उग्र बनता है। वातप्रधान और कफ प्रधान प्रकृति वालों के लिये यह हितकर है।
•पित्तप्रकृत वालों से सहन नहीं होता एवं इसमें कामोत्तेजक गुण होने से बालकों को भी न दें।
• यह चूर्ण वातरोगों में अच्छा लाभ पहुँचाता है।
• अनेक रोगों की उत्पत्ति पचनक्रिया की विकृति से, आहार में से योग्य रस न बनने पर होती है। रस शुद्ध और योग्य परिमाण में बने तो आगे होने वाली रक्तादि धातुएं शुद्ध और सबल बनती हैं। इन सबका आधार आमाशय और यकृतादि पचनयन्त्र अथवा जठराग्नि का विशेष स्थान रहता है। जब जठराग्नि निर्बल बनती है तब उसे प्रज्वलित करना चाहिये। यह कार्य इस चूर्ण के सेवन से सम्यक् प्रकार से होता है।
•इस चूर्ण की क्रिया मुख्यतः आमाशय, यकृत और वातनाड़ियों पर होती है। इस चूर्ण के सेवन से आमाशय और यकृत् उत्तेजित होते हैं। अर्थात् आमाशय रस (Gastric juice) में लवणाम्ल (Hydrochloric Acid) की उत्पत्ति अधिक होती है, यकृत् पित्त (Bile) के स्राव में वृद्धि होती है एवं वातनाड़ियाँ भी सबल बनती हैं परिणाम में आमाशय और लघु अन्त्र के भीतर होने वाली पचन-क्रिया सबल बनती है। इस हेतु से आहार में से आम और विष बनना बन्द हो जाता है, रस रक्तादि धातुओं का निर्माण सम्यक् होता है। फिर अकाल में आई हुई निर्बलता या वृद्धावस्था और विविध रोगसृष्टि ये सब दूर हो जाते हैं।
•इस चूर्ण में मुख्य औषधि भिलावा है, वह पाचन अग्नि और धात्वग्नि को प्रदीप्त करता है। जठराग्नि प्रदीप्त होने से पचन क्रिया सुधरती है तथा धात्वग्नि प्रदीप्त होने पर रस रक्तादि धातुओं में रहे हुये निर्बल से सबल अणुओं की उत्पत्ति होती है। इस तरह धातुओं के भीतर होने वाली चयापचय क्रिया (Metabolism) में सुधार होता है। जिससे आमविष या धातुमल का संचय होकर जो रोग उत्पन्न हुए हों, वे दूर
हो जाते हैं।

नारसिंह चूर्ण के फायदे / रोगों का उपचार :

1-माँसक्षय-
रक्त, मांसादि, धातुओं का ह्रास होकर देह शोष होना (Atrophy) की उत्पत्ति चयापचय क्रिया की विकृति से होती है। जब तक चय क्रिया अर्थात् नवनिर्माण और संग्रह क्रिया सबल हो तब तक देहशोष नहीं होता; किन्तु इस क्रिया की विकृति होने पर रस में से रक्त पूरा नहीं बन सकता। रक्तक्षय होने पर मुखमण्डल पर निस्तेजना, चक्कर आना, शारीरिक निर्बलता, हृत्स्पन्दनवर्द्धन (धड़कन), श्वास भर जाना, जिह्वा शुष्क रहना, मलावरोध और उदासीनता आदि लक्षण उपस्थित होते हैं। फिर माँसक्षय होने पर देह के वजन का ह्रास, अग्निमांद्य, स्फूर्ति का नाश, त्वचा में कालापन, सर्वांग में विवर्णता, निद्रावृद्धि, थोड़े के परिश्रम में थकावट आ जाना, सर्दी-गरमी सहन न होना, कफवृद्धि और यकृत्-प्लीहाविकृति आदि लक्षण बढ़ जाते हैं। इस क्षय पर नारसिंह चूर्ण का सेवन अति हितावह है। औषधि २-४ मास तक पथ्यपालनपूर्वक सेवन करनी चाहिये। रोग जितना पुराना हो और अशक्ति जितनी अधिक हो उतनी ही मात्रा कम होनी चाहिये।

2-कास-
पचनक्रिया मन्द होने पर देहबल का ह्रास होता है। फिर शीतल वायु का आधात, सूर्य के ताप में घूमकर शीतल जलपान या कफप्रकोपक आहार-विहार अथवा कीटाणुओं का आक्रमण होने पर कफधातु प्रकुपित होकर कास की संप्राप्ति कर देता है। यदि प्रथमावस्था में तीव्रता होने से शुष्क कास रहती हो तो उस अवस्था में भिलावा प्रधान, उष्णवीर्य औषधि नहीं दी जाती है। फिर जब कास का वेग कम हो जाता है और कफ सफेद और कुछ चिपचिपा बन जाता है; रोग चिरकारी या जीर्ण बन जाता है, दूषित कफ सरलता से बाहर न निकलता हो तो इस चूर्ण के अतिरिक्त कफघ्न औषधि कफकुठार, श्रृंगंभस्म या कफकर्तन अथवा इतर औषधि देनी चाहिये।

सूचना-यदि कास के साथ ज्वर भी रहता हो, ज्वर ९९° से अधिक हो जाता हो, मूत्र में पीलापन रहता हो, शीत लगकर रोंगटे खड़े हो जाते हों तो यह चूर्ण नहीं देना चाहिये।

3-निर्बलता-
वृद्धावस्था आने पर वातनाड़ियाँ शिथिल हो जाती हैं। रोग निरोधक शक्ति निर्बल हो जाती है, पचनक्रिया मन्द हो जाती है; किसी-किसी को अच्छी निद्रा भी नहीं मिलती; आलस्य बना रहता है और शरीर थका हुआ भासता है। यदि तमाखू का व्यसन हो तो कफ धातु भी दूषित बन जाती है। ऐसी अवस्था में इस चूर्ण का सेवन शीतकाल में एकाध मास तक कराने से देह स्वस्थ और सबल बन जाती है।

4-कुष्ठ-
भिलावे में एक प्रकार का दाहक तैल रहता है, वह रक्त में जाकर फिर स्वेद द्वारा शनै:शनै बाहर निकलता रहता है। इस हेतु से त्वचा पर बाह्य कीटाणुओं की आबादी हुई तो वह इस चूर्ण के सेवन से नष्ट हो जाती है। इस हेतु से गंज, श्वेतकुष्ठ, व्रण, विद्रधि और दद् आदि उपकुष्ठ इन पर लाभ पहुँचाता है।

वक्तव्य-यदि मात्रा अधिक दी जायेगी, उष्ण ऋतु होगी अथवा पित्त प्रकृति वालों को सेवन कराया जायगा तो त्वचा शुष्क हो जायगी और कण्डु की प्राप्ति होगी। कदाच ऐसा हो जाय तो औषध सेवन बन्द करावें और नारियल की गिरी खिलाने तथा नारियल या तिली के तैल से मालिश कराने पर कण्डु शमन हो जाती है।

5-प्लीहावृद्धि-
पचन क्रिया मन्द होने या थक जाने पर आमोत्पत्ति होती है। फिर उसके विष का रक्त में शोषण होने पर ज्वर आ जाता है। ज्वरावस्था में पथ्य का योग्य पालन न होने या अन्य कारण से विषमज्वर के कीटाणुओं का प्रवेश प्लीहा में हो जाने पर प्लीहावृद्धि हो जाती है। यदि यह वृद्धि ज्वर निवृत्त हो जाने पर भी रह गई है, ज्वर न आता हो और पचनक्रिया निर्बल हो तो उस अवस्था में इस चूर्ण का सेवन कराया जाय तो रक्तद्वारा प्लीहा में भिलावें के तैल का प्रवेश होने पर कीटाणु नष्ट हो जाते हैं। फिर प्लीहा वृद्धि शमन हो जाती है।

6-अर्श-
पचनक्रिया मन्द हो जाने पर अनेकों को मलावरोध रहता है तथा उदर में वायु उत्पन्न होती है; इस अवस्था में योग्य उपचार न हो तो अफारा आता है और मलावरोध रहता है। तत्पश्चात् गुदनलिका में स्थित शिराओं पर मल और वायु का बोझा पड़कर अर्श की सम्प्राप्ति हो जाती है। अर्श के मस्से शुष्क और कठोर बन जाने पर चुभते हैं। देह कृश और निर्बल हो जाती है। इन अफारा मलावरोध और अर्श रोगों पर इस चूर्ण का सेवन तक्र के साथ कराया जाता है। मिर्चादि मसाले, द्विदल धान्य और बद्धकोष्ठ करने वाले पदार्थों का सेवन कम कर देने से रोग का सत्वर दमन होता है और देह सबल बन जाती है।

7-पाण्डु-
पचनक्रिया दूषित होने, उदर में कृमि होने और विषमज्वर की संप्राप्ति होने पर रस-रक्तादि धातुएं भी दूषित हो जाती हैं। फिर रक्त में वर्ण द्रव्य अथवा रक्त का परिमाण ही कम हो जाता है जिससे पाण्डु और हमीलक रोग की संप्राप्ति होती है। यदि ज्वर में हेतु कृमि हो तो पहिले कृमिघ्न औषधि लेकर उनको दूर कर देना चाहिये। ज्वर विष रहा हो तो पहिले ज्वरघ्न औषधि का सेवन कर उसका निवारण करना चाहिये। इस तरह उत्तान दोष को दूरकर फिर लीन विष को जलाने, रक्त बढ़ाने और शरीर को सबल बनाने के लिये नारसिंह चूर्ण का सेवन कराया जाता है।

8-श्वासरोग-
इसकी उत्पत्ति श्वसन में विकृति होने पर होती है, इसके कारणों में कफ, धातु की विकृति, शुक्रक्षय और पचनक्रिया दूषित होना ये मुख्य हैं। इन तीनों कारणों पर इस चूर्ण का अच्छा असर होता है। इस हेतु से कफप्रधान श्वासरोग दूर हो जाता है। यदि धूम्रपान का व्यसन हो और सेवन चालू रहे तो इस चूर्ण का सेवन करने पर पूरा लाभ नहीं मिलता, यदि कफ रहित शुष्क वात-पित्तप्रधान श्वासप्रकोप हो तो थोड़ा-सा परिश्रम भी सहन नहीं होता। परिश्रम से हृदय में धड़कन होती हो तो इस चूर्ण का कुछ विपरीत प्रभाव पड़ता है।

9-पीनस-
भिलावे का तैल जिस समय तैल ग्रन्थियों से निकलता है, उस समय श्वसन यन्त्र में या नासापथ में रहे हुये कीटाणु कफ और माँसकोथ का नाश होता है। इस हेतु से पीनस रोग में भी इस चूर्ण से लाभ पहुँच जाता है। नस्यादि बाह्मोपचार भी आवश्यकता अनुसार करते रहना चाहिये।

10-भगन्दर-
रोग नया हो और गुदद्वार की रक्तवाहिनी बहुत दूर तक दूषित न हुई हो तो बाह्मोपचार (मर्यादि बेल के कल्क की पुल्टिस) के साथ इस चूर्ण का सेवन कराया जाय तो पूयोत्पत्ति बन्द हो जाती है और माँसकोथ में भी लाभ पहुँचता है। कारण भिलावे का तैल पूय में रहे हुये कीटाणु और कोथ में उत्पन्न कृमियों को नष्ट कर देता है, यह क्रिया रक्त में से भिलावे का तैल बाहर निकलने पर होती है।

11-अश्मरी-
यकृत् पित्त की रचना में विकृति या यकृत् पित्त गाढ़ा बनने पर अश्मरी द्रव्य की उत्पत्ति होती है। फिर द्रव्य वृक्क या मूत्राशय में संचित होकर अश्मरी बन जाती है। इस अश्मरी के कारणरूप यकृत पित्त की रचना को यह चूर्ण सुधारता है। इस हेतु से अश्मरी की उत्पत्ति
को रोकने के लिए प्रथमावस्था में यह चूर्ण हितावह है।

12-उदररोग-
इसकी सम्प्राप्ति अग्निमांद्य होने के पश्चात् होती है। पचन विकृति के साथ अन्य सहायक अवयव या धातु-विकृति के भेद से उदररोग के ८ प्रकार पृथक् हो जाते हैं। इन ८ प्रकारों में से वातोदर, कफोदर, यकृद्दाल्युदर और प्लीहोदर की प्रथमावस्था में यह चूर्ण सहायक औषधि रूप से व्यपहृत हो सकता है। कारण भिलावा, चित्रक मूल और त्रिकटु का प्रभाव यकृत् और प्लीहा की क्रिया पर तथा वात और कफ विकृति पर होता है। इनके अतिरिक्त शतावरी, गोखरू और तिल भी वातनाड़ियों को पुष्ट करते हैं।

13-प्रमेह-
प्रमेह के २० प्रकार शास्त्र में कहे हैं। इन सब पर चूर्ण का उपयोग हो, ऐसा नहीं कह सकेंगे। हस्तिमेह, जिसमें मूत्र का परिमाण अत्यधिक होता है और अधिक बार होता है, रात्रि को निद्रा में भी बार-बार उठना पड़ता है। उसमें मूत्र की अधिक उत्पत्ति इस चूर्ण के सेवन से रुक जाती है। यदि ज्वरादि की उष्णता के हेतु से मूत्र में, आम, कफ, लसीका आते हों, तो उन्हें दूर करने में यह चूर्ण सहायक होता है। उसी तरह शुक्राशय को उष्णता पहुँचने से शुक्र पतला होकर शुक्रमेह हो गया हो (मूत्र के साथ बाहर निकलता हो) तो इस चूर्ण के सेवन से विष नष्ट हो जाने से वह भी दूर हो जाता है।
जिन प्रमेहों में वृक्क और मूत्राशय अपना कार्य योग्य रूप से न कर सकते हों, उन प्रमेहों में या मूत्रकच्छू में इसका सेवन कराना हितकर नहीं हो सकेगा।

14-इक्षुमेह-
इसमें अग्न्याशय का अंकुश यकृत् पर से हट जाने से यकृत निरंकुश होकर अत्यधिक शक्कर उत्पन्न करता है। इसमें विकृति अन्य प्रकार की होती है। अतः इस विकार पर इस चूर्ण का उपयोग नहीं हो सकता।
भिलावा सामान्यतः वातज और कफज विकृति पर अति लाभदायक है। यह इस चूर्ण में मुख्य औषधि है। साथ-साथ चित्रकमूल, त्रिकटु आदि सहायक औषधियों में भी वातकफघ्न गुण रहा है। इस हेतु से वात और कफ धातु की विकृति से उत्पन्न रोगों के पूर्वरोग और प्रथमावस्था में यह चूर्ण व्यवहृत होता है।
पित्तप्रकोप में सामान्यत: भिलावा, त्रिकटु, चित्रकमूलादि ये औषधियाँ हानि पहुँचाती हैं, किन्तु इन औषधियों की उग्रता को दमन करने
और पित्त को शमन करने के लिये गिलोय, शतावरी, विदारीकन्द, मिश्री और घृत मिलाया है। इस हेतु से वातकफ की प्रधानतासह गौण पित्तप्रकोप हो तो इस चूर्ण का उपयोग हो सकता है। पित्तप्रकोप होने पर गिलोय के स्थान में गिलोयघन या गिलोय सत्व तथा भिलावे के स्थान पर गोडम्बी (भिलावे की गिरी) का उपयोग करना विशेष हितावह माना जायेगा।
इस चूर्ण में शतावरी, बड़े गोखरू, छिलके रहित तिल, विदारीकन्द और वाराहीकन्द ये सब औषधियां मिलाने से यह चूर्ण रसायन, शुक्रवर्द्धक | और कामोत्तेजक गुण दर्शाता है। कामोत्तेजना के लिये यथार्थ में इस चूर्ण का सेवन कम कराया जाय तो अच्छा। कारण, जितनी कामोत्तेजना
होती है, उतना ही वीर्य का अपव्यय होता है। फिर परिणाम में हानि होती है।

15-कष्टार्तव-
जिन स्त्रियों को मासिक धर्म असमय पर होता हो, उस समय वेदना होती हो और रज:स्राव कम होता हो, फिर उसी हेतु से शारीरिक निर्बलता, पाण्डुता, मस्तिष्क में दर्द रहना, दृष्टिमांद्य, अरुचि, मलावरोध, आलस्य बना रहना और प्रदरादि लक्षण प्रतीत होते हों, उन रुग्णाओं को नारसिंह चूर्ण का सेवन कराने पर लाभ पहुँचता है।

16-मासिक धर्म की अप्राप्ति-
कतिपय नवयुवतियों को आयु बढ़ने पर भी बीजाशय या समग्र प्रजनन संस्थान का योग्य विकास न होने से मासिक धर्म का आरम्भ नहीं होता। उनका देखाव छोटी कुमारियों के सदृश भासता है। देह कृश और निस्तेज होती है एवं स्तनों में मांस वृद्धि नहीं होती। उनको यह चूर्ण, त्रिवंग भस्म और मधुमालिनी के साथ दिया जाता है।

नारसिंह चूर्ण के नुकसान / सेवन मे सावधानियाँ : Narsingh Churn Side Effect

(१) यदि उबाक, वमन, मुखपाक, छाती में दाह, मुँह में कड़वावन, स्वेदाधिक्य, अधिक उत्ताप, व्याकुलता, निद्रानाश, और क्रोधाधिक्य पैत्तिक लक्षण प्रबल हों तो इस चूर्ण का सेवन नहीं कराना चाहिये।
(२) अधिक प्रवास, अधिक सूर्य के ताप या अग्नि का सेवन करने वालों को यह चूर्ण नहीं देना चाहिये एवं ग्रीष्म ऋतु और शरद् ऋतु में भी इस चूर्ण का प्रयोग नहीं करना चाहिये।

(३) इस चूर्ण के उपयोग काल में अधिक मिर्चादि, गरम पदार्थ, गरम-गरम चायादि पेय, धूम्रपान, मांसाहार, स्त्री समागम, चिन्ता और क्रोधादि से हो सके उतना बचना चाहिये।

(४) शुष्ककास, प्रतमक श्वास (कफरहित श्वास प्रकोप), अम्लपित्त, नूतनपित्त, नूतनज्वर, अतिसार, ग्रहणी, पेचिस, निद्रानाश, विदग्धाजीर्ण, मूत्रकृच्छ, शुक्र का अति पतलापन और अति उष्णता इन रोगों से पीड़ितों को नारसिंह चूर्ण नहीं देना चाहिये।

(५) इस चूर्ण का सेवन १६ वर्ष से कम आयु वालों को नहीं कराना चाहिये एवं सगर्भा स्त्री और अति वयोवृद्धों को भी नहीं देना चाहिये।

(६) इस चूर्ण के सेवन काल में बारम्बार मूत्र के परिमाण और वर्ण पर लक्ष्य देते रहना चाहिये। यदि मूत्र परिमाण अति कम और वर्ण पीला हो जाता है, अति स्वेद आने लगता है और दाह होता है, तो इसे तुरन्त बन्द कर देना चाहिये और विकार शमनार्थ नारियल का जल पिलाना चाहिये।

(७) वात नाड़ियों या सुषुम्णाकाण्ड (पीठ की हड्डी) से सम्बन्ध वाले रतिकेन्द्र में चेतनााधिक्य (Hyperesthesia) है तो नारसिंह चूर्ण या भिलावे मिश्रित अन्य औषधि का सेवन नहीं कराना चाहिये। अन्यथा स्वप्नदोष बार-बार होता रहेगा।

(८) इस चूर्ण के सेवन करने पर तुरन्त गरम-गरम चाय, दूध, काफी सेवन नहीं करना चाहिये। अन्यथा भल्लातक से मुँह में शोथ आ जायेगा।

नोट :- किसी भी औषधि या जानकारी को व्यावहारिक रूप में आजमाने से पहले अपने चिकित्सक या सम्बंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ से राय अवश्य ले यह नितांत जरूरी है ।

2019-04-07T19:55:30+00:00By |Ayurveda|1 Comment

One Comment

  1. Raja April 12, 2019 at 3:11 pm - Reply

    You really make it seem so easy together with your presentation however I find this topic to be actually one thing
    that I think I’d never understand. It seems too complex and very broad
    for me. I’m looking forward for your next publish, I’ll try to get the hold of it!

Leave A Comment

1 + seventeen =