नस्य कर्म क्या होता है ?

नस्य कर्म (Nasya Karma) पंचकर्म (panchkarma) के अंतर्गत की जानेवाली एक चिकित्सा पद्धति है। नस्य थेरेपी में नाक के द्वारा औषधि या औषधि सिद्ध स्नेह जैसे की घी ,तेल या क्वाथ शरीर में पहुचाया जाता है। सभी पंचकर्म पद्दतियों में से नस्य यह सबसे सरल परन्तु बेहद असरदार उपचार हैं।

आयुर्वेद में कहा गया है ” नासा ही शिरसो द्वारम। ” अर्थात नाक यह हमारे मस्तिष्क का प्रवेश मार्ग (gate) है। इसलियें शिरोव्याधि अर्थात मस्तिष्क से जुड़ी बीमारियों में नाक द्वारा औषधि द्रव्य की बूंद डाली जाती है। नस्य का दूसरा अर्थ नासिका के लिए जो हितकर है, यह भी होता है। यह निश्चित लाभदायक चिकित्सा पद्धति है।

नाना प्रकार के रोगों पर नस्य लेने के फायदे :

1- वातविकार वाले को गुड़ और सोंठ मिला कर नास दो।
2- पित्त विकार में मिश्री, घी और मुलेठी को मिला कर नास दो।
3- कफ के विकार में तुलसी के और अडूसे के रस को मिला कर नास दो।
4- अगर सिर में कीड़ा हो तो बायबिडङ्ग, हींग और पीपल को मिला कर नास दो।
5- अगर खून भर जाने से सिर भारी हो, तो खाँड़ और केशर को घी में भून कर नास दो।
6- षड़बिन्दु तेल की नास देने से सिर के सभी रोग आराम होते हैं।परीक्षित है।
7- दूब के रस और अनार के फूल के रस की नास देने से नाक से खून गिरना बन्द हो जाता है।
8- स्त्री के दूध या महावर का रस की नास देने से हिचकी दूर हो जाती है।
9- दूब के रस में आम की गुठली पीस कर मिलाने और नास देने से बहती हुई नकसीर आराम हो जाती है।

ये सभी नुसखे परीक्षित हैं, कभी फेल होने वाले नहीं। विचार-पूर्वक, जहाँ जिसकी ज़रूरत हो, काम में लाने से सिद्धि होगी।

नस्य लेने की विधि :

जिसे नस्य देनी हो, उसे सीधा सुलाओ। माथा ऊँचा रखो, सिर लम्बा कर दो और हाथ-पैर फैला दो। रोगी की आँखों पर कपड़ा ढक दो। पीछे नाक, ऊँची करके नस्य दो। नस्य लेने वाला, नस्य लेने के समय, सिर को न हिलावे, न क्रोध करे, न हँसे और न किसी से बोले। पीछे उठ कर छींक ले। नाक और मुँह से पानी गिरेगा। नस्य लेने वाले को चाहिये कि दाहिने-बायें थूके, सामने न थूके।

नस्य का समय :

कफ का नाश करने को सवेरे के समय नस्य दो। पित्त का नाश करने को दोपहर के समय नस्य दो। वायु नष्ट करने को साँझ के समय नस्य दो। अगर रोग का जोर हो तो रात को नस्य दो।

नस्य के प्रकार :

इसके दो भेद हैं :- (१) रेचन, (२) स्नेहन।

रेचन नस्य वातादि दोषों को निकाल देता है और स्नेहन धातु बढ़ाता है। रेचन नस्य भी दो तरह की होती है (१) अवपीड़न, (२) प्रधमन।

अवपीड़न नस्य-

सोंठ, मिर्च, बच, प्रभृति तीक्ष्ण दवाओं को पानी के साथ पीस कर, लुगदी-सी बना कर, उसको कपड़े में रख और निचोड़ कर रस निकाल लेते हैं। उसकी ४-६ या ८ बूंद नाक के दोनों छेदों में टपकाते हैं। इसे “अवपीड़न नस्य” कहते हैं।
अवपीड़न नस्य गले के रोग, सन्निपात, अत्यन्त नींद, विषमज्वर, मन के विकार और कृमिरोग में देनी चाहिये।

प्रधमन नस्य –

“प्रधमन नस्य” का यह कायदा है कि एक ६ अंगुल लम्बी नली ऐसी बनानी चाहिये, जिसके दो मुँह हों। उस नली में सोंठ, मिर्च, आदि जिस दवा की नस्य देनी हो, भर लो और उसका एक सिरा रोगी की नाक में लगा कर, दूसरा अपनी ओर रख कर फूक मारो। आजकल कागज की नली सी बना लेते हैं और उससे काम निकल जाता है। बहुत ही उत्कट दोषों में यह प्रधमन नस्य देनी चाहिये। बेहोशी, मूर्च्छा, संज्ञा-नाश तथा मृगी वगैरह में ऐसी नस्य देते हैं।

सन्निपात-ज्वरों में इन्हीं नस्यों से काम पड़ता है। धातु बढ़ाने वाली नस्य ,मस्तक रोग, नाक के रोग, नेत्र रोग, आधासीसी, मुखशोष, कर्णनाद, पलित रोग (असमय में बाल पकना) प्रभृति रोगों में देते हैं। इनमें घी वगैरह चिकने और खाँड़ वगैर मीठे पदार्थों से नस्य देते हैं जैसे :-
घी में केशर मिला कर नस्य देने से अथवा दूध में खाँड़ डाल कर नस्य देने से वातरक्त की पीड़ा शान्त होती है। नारायण तेल या माषादि तेल वगैरः की नस्य देने से भी, कनपटी, मस्तक और आँख प्रभृति के रोग नष्ट होते हैं।

नोट :- ऊपर बताये गए उपाय और नुस्खे आपकी जानकारी के लिए है। कोई भी उपाय और दवा प्रयोग करने से पहले आयुर्वेदिक चिकित्सक की सलाह जरुर ले और उपचार का तरीका विस्तार में जाने।