श्री नारायण स्वामी (संत चरित्र)- मधुर जीवन प्रसंग

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श्री नारायण स्वामी (संत चरित्र)- मधुर जीवन प्रसंग

परमात्मा की खोज : Motivational storie in Hindi (प्रेरक हिंदी कहानी)

★ सन् १९५६ के आसपास की घटना है । मियाँगाँव स्टेशन के आगे नर्मदा किनारे-कर्नाली गाँव है । वहाँ एक संत हो गये श्री नारायण स्वामी । पूर्व जीवन में वे न्यायाधीश के पद पर सेवारत थे । जैसे लोगों के साथ न्याय करते थे वैसे अपने साथ भी पूरा न्याय करते थे । शरीर को जीवित रखने के लिए नौकरी तो करते थे लेकिन आत्मा का रस पाने के लिए प्रतिदिन ध्यान भी करते थे ।

★ अंग्रेजों के शासन के वक्त की बात है । एक आदमी को फाँसी की सजा देनी थी । जुरी में पाँच जज बैठे थे । इनको भी उसमें बैठने का अवसर मिला । मुजरिम को जब जुरी के समक्ष पेश किया गया तो उसका निर्दोष चेहरा देखकर उनका हृदय पुकार उठा कि :
‘यह व्यक्ति दोषी नहीं हो सकता ।

★ परंतु हाईकोर्ड का आर्डर था और इस दिन उसे फाँसी देनी थी । बंगाली न्यायाधीश ने बडी दृढतापूर्वक कहा कि :
‘‘इसे फाँसी की सजा देना उचित नहीं है । उन्होंने उसे बचाने के लिए भरसक प्रयास किये । शेष चार न्यायाधीशों ने उन्हें समझाने का प्रयत्न किया । आपस में ‘तू-तू मैं-मैं ” हो गयी और फाँसी का जो नियत समय ५ बजे का था उसकी जगह ५-३० बज गये । तब ब्रिटिश-शासन की बडी कचहरी से तार आया कि उस मुझरिम को रिहा कर दिया जाय, वह निर्दोष है ।

★ बंगाली न्यायाधीश ने जुरी के सदस्यों को बडे ही कठोर शब्दों में कहा :
‘‘यदि नियत समय पर उस आरोपी को फाँसी लग जाती फिर पूरा ब्रिटिश शासन उल्टा होकर टंग जाता तो भी उस बेचारे के प्राण वापिस लाने में असमर्थ ही रहता । धन्य है उस अंतर्यामी परमात्मा को जिसने मुझे स्पष्ट प्रेरणा देकर एक निर्दोष का जीवन बचाने में निमित्त बनाया । अब तो मैं उसी परमात्मा की खोज में अपनी शेष जीवन लगा दूँगा ।

★ उन्होंने तुरन्त इस्तीफा लिखकर भेज दिया । लोगों ने काफी समझाया-बुझाया, परंतु वे उन नासमझों की बातों में आये नहीं । अपना पवित्र इरादा बदला नहीं और चल पडे पूर्ण पुरुष की खोज में, सद्गुरु की खोज में । वे बंगाली न्यायाधीश बुद्धिशाली थे । नित्य ध्यान-अर्चन करनेवाले थे इसलिए जैसी-जैसी जगह पर उनका सिर झुका भी नहीं । १०८, १००८, मंडलेश्वर, पीठाधीश्वर आदि कई पदवियोंवाले साधुओं से मुलाकात की ।

★ ऋषिकेश, हरिद्वार और हिमालय के कई स्थानों में भी काफी भटके । गिरि-गुफाओं में खोजबीन की पर कोई संतोषकारक मार्गदर्शक न मिला । उन्हें बारंबार यही विचार आने लगा कि :
‘निगुरा रहकर जिंदगी बर्बाद करने से तो बेहतर है कि इस जीवन को समाप्त कर दिया जाय । उनमें तडप जगी । छटपटाहट ऐसी हुई कि कई दिन, कई रातें रोते रहे । भगवान से प्रार्थना करते रहे कि : ‘हे भगवान ! मुझे गुरु से मिला दे ।

★ एक रात को ठीक १२ बजे वे गंगा किनारे काली कमलीवाले बाबाजी के आश्रम का जहाँ से प्रवेशद्वार है, वहाँ पहुँचकर परमात्मा को कातरभाव में प्रार्थना करने लगे :
‘हे भगवान ! हे नारायण ! मैं अयोग्य हूँ, निगुरा हूँ । गुरु को पाने की भी योग्यता नहीं है मुझमें । अब, कृपा कीजिये, मार्गदर्शन दीजिए ।
आखिर गुरु न मिले तो आत्महत्या करने को तैयार हो गये । ज्यों ही गंगाजी में कूदने के लिए पंजों के बल पैर ऊँचे किये… बस !
‘गंगे हर” करना ही था कि यहीं भगवान का प्रागट्य हुआ । उनका हाथ पकड लिया और बोले : ‘‘हे मूर्ख ! देह त्याग करता है लेकिन अहं त्याग नहीं करता ? न्यायाधीश होकर गुरु को खोजेगा तो गुरु कैसे मिलेंगे ? शिष्य होकर गुरु को खोज, साधक होकर संत को खोज, भक्त होकर भगवान को खोज, जा, आज से मैं तेरा गुरु हूँ । ‘नारायण-नारायण” जपा कर ।

★ परमात्मा का नैमित्तिक अवतार उस निमित्त हेतु प्रकट हुआ और आवश्यक आदेश देकर भगवान अंतर्धान हो गये ।
वे बंगाली बाबा नर्मदा किनारे तप करने के भाव से चाणोद-कर्नाली में आये । दिन में एक बार गाँव से भिक्षा ले आते । उसे नर्मदा के जल में डुबोकर खारा-खट्टा अर्पण करके सादा भोजन करते और ‘नारायण-नारायण” का जप करते रहते । लोगों ने देखा कि वे शांत, गंभीर और आत्म-मस्त संत हैं ।

★ साधारण आदमी भोजन करता है तो काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार में उसका रस खर्च होता है । भक्त भोजन करता है तो उसका रस भक्तिरस में खर्च होता है और भगवान को पाये हुये महापुरुष अगर कुछ खा लेते हैं तो उस पदार्थ का रस ब्रह्मज्योति में रूपान्तरित होता है ।
तो महाराज ! सब लोग होड लगाने लगे कि उनके घर बाबाजी ही भिक्षा लेने आयें । अब किस-किसको राजी करना ? अतः बाबाजी ने एक नियम बना दिया कि जिस कुटुम्ब के सभी सदस्य ‘नारायण” नाम का कीर्तन करते आयेंगे उनके घर की भिक्षा लेंगे । परिवारों ने भी आपस में भिक्षा के दिन बाँट लिये । फिर भी भीड बढती ही गयी । आखिर वे बाबा बद्रीनाथ चले गये । लोग भी बद्रीनाथ जा पहुँचे ।

★ एक समय की बात है ।
वे भक्तों से बोले : ‘‘आप लोगों ने मुझे तो कई बार खिलाया, आज मेरे नारायण को खिलाओ ।
भक्तों ने स्नानादि से शुद्ध, पवित्र हो बडे ही भाव और प्रेम से भोजन बनाया और बद्रीविशाल को भोग लगाया गया । वैसे तो पुजारी लोग रोजाना भोग धरते और ले आते थे । किंतु इनका तो स्पष्ट ध्येय था कि जब तक नारायण नहीं खायेंगे तब तक वे भी अन्न जल ग्रहण नहीं करेंगे । कुछ समय के पश्चात् जैसे कोई बडा आदमी थाल में से कुछ सामग्री उठाता है और बाकी का छोड देता है, भोजन के थाल में ऐसे चिन्ह मिले । नारायण स्वामी को संतोष हुआ । भगवान ने अर्चना अवतार के रूप में प्रकट होकर प्रसाद ग्रहण किया ।

★ जिनकी अर्चना-पूजा करते हैं उनमें अगर तुम्हारी दृढ श्रद्धा और संकल्प है तो भगवान वहाँ भी अपनी लीला दिखाने में समर्थ हैं । अरे ! स्पष्ट ध्येय और दृढ निश्चयवालों ने तो पत्थर में भी भगवान प्रकट करके दिखा दिया था । जिनका ध्येय स्पष्ट नहीं है वे तो माता-पिता में भी भगवान को नहीं देखते । जिनमें भगवान प्रकट हुये हैं ऐसे संत में भी भगवान नहीं देख पाते । जितना ध्येय स्पष्ट है, जितनी वृत्ति दृढ है, जितना चित्त तत्पर है उतना ही तुम्हारा संकल्प जड-चेतन में व्यापक चैतन्य को प्रकट करने में सक्षम हो जाता है ।
हरि व्यापक सर्वत्र समाना ।
प्रेम ते प्रकट होई मैं जाना ।।

श्रोत – ऋषि प्रसाद मासिक पत्रिका (Sant Shri Asaram Bapu ji Ashram)
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