ध्यान योग की महिमा : Inspirational Storie in Hindi

★ एक संत हो गये । उनका नाम था योगानंद सरस्वती । ग्वालियर के पास कहीं उनका स्थान अभी है । उनको योग में ज्यादा रुचि थी और चेतन समाधि सीखना चाहते थे । वे इस आशा में भ्रमण करते रहते थे कि कोई सिद्ध योगी गुरु मिल जाय और मुझे योग सिखाये ।

★ घूमते-घामते उन्हें सीतापुर के अरण्य में कोई योगी मिल गये । उनके पैर पकडे, प्रार्थना की : ‘‘महाराज ! मुुझे योगी बनना है । चेतन समाधि सीखनी है ।
योगी ने बताया कि : ‘‘जितना मैं जानता हूँ उतना तो तुम जानते ही हो । अब बात रही सिद्ध योगी बनने की, चेतन समाधि सीखने की । सिद्ध योगी गुरुओं को समाज पहचानता नहीं । ऐसे सिद्ध योगी समाज में आते नहीं । इधर तो कोई ऐसे योगी हैं नहीं । परंतु मेरे ध्यान में एक जगह है, जहाँ सिद्धयोगी रहते हैं । वह जगह ऐसी है जहाँ साधारण लोग जा भी नहीं सकते ।

★ योगानंद ने कहा : ‘‘महाराज ! कृपा करके उसका पता दीजिये । योगी का दर्शन भी पापनाशक होता है । अगर वे कृपा कर देंगे और मुझे योग सिखा देंगे तो फिर मैं देशवासियों की सेवा करुँगा, उन्हें उन्नत करूँगा ।
उस योगी ने कहा : ‘‘ऐसा करो । ऋषिकेश से बद्रीनाथ के रास्ते जाओगे तो विष्णु-प्रयाग आयेगा । विष्णुप्रयाग से १८ मील, लगभग २८ कि.मी. पूर्व दिशा में जाना । वहाँ मृत्युस्रय पहाड है । उस पहाड की गहराई में तुम जाना । वहाँ आगे बढते जाना । दुर्गम मार्ग पार करने के बाद तुम्हें सिद्ध योगी के दर्शन होंगे । इस प्रकारका पता उन योगी ने योगानंद सरस्वती को समझा दिया ।

★ अब योगानंद की ही भाषा में… ‘‘मैं विष्णुप्रयाग तक पहुँचा फिर पूर्व की ओर चलते चलते पहाडी लोगों से पता लगाकर उस पहाड तक पहुँचा । फिर उस पहाड की गहराई में गया । मुझे बताये गये थे वे चिन्ह मिलते गये । मेरा हौसला भी बढता गया और आश्चर्य भी हुआ कि यहाँ ऐसी जगह में कोई योगी, कोई मनुष्य कैसे रहते होंगे ? बिल्कुल सन्नाटा था, वहाँ कोई नहीं था । फिर सोचा कि समर्थ योगी तो ऐसी जगह रहते हैं जहाँ कोई न हो । वे वायु पीकर भी जी सकते हैं, संकल्पबल से कुछ भी बना सकते हैं । ऐसे योगी भी होते हैं । यह सब मैंने सुना था ।

★ मैं चलता गया, चलता गया । आगे दो तीन मार्ग मिले । अब किस ओर जाना ? किससे पूछें ? बडी उलझन थी । मैंने स्वरज्ञान का उपयोग किया । जो स्वर चल रहा था उसी तरफ के रास्ते चला । आगे एक लंबी-सी गुफा आयी । पचास-साठ फीट लंबी होगी । पंद्रह-बीस फीट चौडी होगी । मैं उसमें घुसकर लाँघते हुये आगे बढा । उसके दूसरे छौर पर दो पहािडयों के बीच एक छोटा रास्ता आया । उसे लांघा तो चारों तरफ अंधेरा था । थोडे आगे सूर्य की किरणों जैसा भास हुआ । पानी के चश्मे की कलकल आवाज आ रही थी । भय भी लगा । फिर उत्साह भी बना कि मैं ऐसे योगियों से मिलने जा रहा हूँ जो दुर्लभ होते हैं ।

★ ऐसा करते करते आगे बढते हुये पानी की जगह तक पहुँचा । आगे कोई रास्ता नहीं था । बीच में पानी का चश्मा, छोटा-सा तालाब जैसा बना हुआ था । मैंन qहमत की । अंदर उतरा । घुटने भर पानी था । उसे लांघकर पार उतरा । सामने जो पत्थर था, उसमें एक छोटा-सा सुरंग जैसा छिद्र था जिसमें चलकर या बैठकर भी नहीं जा सकते । यह सब उन सीतापुर वाले योगी के बताये हुये चिन्ह ही प्रगट रूप में पाये गये इसलिए हौसला बना हुआ था ।

★ जैसे साँप रेंगते हुये जाते हैं ऐसे ही मैं लंबा होकर सोते हुये अपने शरीर को आगे गया होऊंगा । बिल्कुल अंधेरा था । आगे रास्ता सूझता नहीं था । भय लगा । मौत जैसे बगल से गुजर रही है । वापस आने को सोचा मगर यह सब संभव नहीं था । वापस कैसे लौटूँगा ? और वापस लौटने का कोई मतलब भी नहीं था । अब पैर भर ही लिया तो इस पार या उस पार । रेंगते हुये और थोडा-सा आगे बढ पाया कि सुरंग जैसा छिद्र पूरा हो गया । आगे जैसे कि खड्डा है । मगर वह कितना गहरा है क्या पता ? निरा अंधेरा थाा । आगे शरीर को झुकाकर हाथ पहुँचाने की कोशिश की मगर हाथ को जमीन का स्पर्श न हुआ ।

★ आगे क्या है ? यह देखने को थोडा और बढा तो धडाम से सिर के बल गिर पडा । मगर दैवयोग से वह चार-पाँच फीट की गहराई थी । रेता जैसा बिछा था । इसलिए चोट नहीं आयी । मैं संभलकर और धीरे-से आगे बढने लगा । आगे क्या देखता हूँ कि कोई मनोहर ध्वनि आ रही है । कभी नुपूर की झनकार, तो कभी ताली पीटने का स्वर, कभी ॐकार का गुंजन । अबीज अनुभव था उस ध्वनि का । थोडा हल्का-सा प्रकाश भी प्रतीत हुआ । इधर-उधर देखकर जहाँ से आवाज आ रही थी, उसकी ओर आगे बढा । उधर जाने पर पाया कि छोटी-सी खुली जगह थी । कुछ मनोरम्य फूल आदि लगे थे । गुफा जैसा कुछ दिख रहा था । वहाँ दो योगी बैठे थे । एक की लंबी सफेद दाढी और दूसरे योगी की काली दाढी और नाटा शरीर । सफेद दाढी वाले पुराने योगी मालूम होते थे और उनकी काया लंबी थी । काली दाढीवाले छोटे कद के थे । दोनों समाधिस्थ थे ।

★ मैं वहाँ जाकर बैठा रहा… अदब से बैठा ही रहा । तीन घंटे बीते तब युवान योगी ने आँखें खोलीः ‘‘अच्छा ! तुम आये हो ? इधर कैसे पहुँच गये ? मैंने उन्हें परिचय दिया और जिज्ञासा व्यक्त की । उन्होंने कहाः ‘‘तुम्हें भूख लगी होगी । पहले भोजन पा लो । मैं सोच रहा था कि यहाँ भोजन कहाँ होगा कि खाऊँगा । इतने में वे योगी बोले : ‘‘उधर की ओर बटलोई में ढँका पडा है । जितना जरूर हो उतना ही लेना । जूठा मत करना, जूठन मत छोडना । प्रसाद का बिगाड मत करना । मैं आज्ञा पाकर खाने को उठा । मेरे मन में हुआ कि बटलोई में कुछ कंदमूल होगा ।

★ यहाँ और तो क्या आ सकता है ? मगर ज्यों ही बटलोई का ऊपर का डक्कन उठाया तो देखा कि वही बूँदी के लड्डू और नमकीन जो मुझे बहुत प्यारा था एवं रास्ते मै खाने के लिए साथ लेकर चला था और जिसे रास्ते में ही खत्म किया था, वही कावही मैं यहाँ देख रहा था । मैं सोचनने लगा कि ये यहाँ-कहाँ से आ गये? मनभावनस्वादिष्ट भोजन देखकर मैंने लपककर उठाना शुरु किया । याद आया कि जितना जरूर हो उतनाही लेने की आज्ञा है । एक लड्डू और थोडा नमकीन लिया । मगर भूख जोरों की थी । लगा कि इतने से पेट भरेगा नहीं । जूठे हाथ फिर लेना कैसे ? सोचा एक लड्डू और ले लूँ । नमकीन भी थोडा लिया ।

★ फिर से कमबख्त मन सोचता है कि अगर और लड्डू चाहिए तो बाद में कैसे लूँगा ? एक लड्डू और ले लिया। और वैसे प्रतिदिनके भोजन की अपेक्षा दुगुना परोस दिया, भूख के कारण । मगर आश्चर्य तो यह हुआ कि मैंने थोडा नमकीन और एक लड्डू भी पूरा न खाया और पेट भर गया । अब हुआ कि यह तो जूठा रह गया इसे क्या करूँ ? वहाँ मुझे योगी देख नहीं पा रहे थे मैं उन्हें देख सकता था । बचा हुआ भोजन धीरे-से पानी के कुंड में डाल दिया और मुँह पोंछकर, कुल्ला करके खानदान आदमी होकर योगी के पास जाकर बैठ गया ।

★ योगी ने पूछा : ‘‘कैसे ! भोजन-प्रसाद पा लिया ?
‘‘हाँ ।
‘‘कुछ बचाया तो नहीं ? जूठा तो नहीं छोडा ? मेरा तो दिमाग चकराने लगा । पैरों के नीचे से जमीन खिसकी जा रही थी । मैंने वहाँ अकल लडाना शुरू किया, बात बनाना शुरू किया :
‘‘महाराज ! भोजन बडा स्वादिष्ट था । मेरा प्यारा भोजन मुझे मिल गया । मैंने बात टाल दी । योगी ने सोचा कि अच्छा ! योग सीखने आया है और कपट साथ में लेकर ?

★ ‘‘अच्छा ! बैठो । योग सीखना है न ? बैठो इधर । पद्यासन लगाओ । पेट भरा है और पद्मासन नहीं लगता तो कोई बात नहीं सिद्धासन लगाओ । आँख बंद करो । ध्यान धरो ।
मैंने आँख बंद करके ज्यों ध्यान करने की कोशिश की त्यों जोर से शोर-गुल सुनाई पडा : ‘‘गंगे मात की जय ! काली कमलीवाले बाबा की जय !! हर हर महादेव !!!
मैं सोचा : यह क्या ? कुुतहलवश आँख खोली । अरे ! आँख बंद की तो विष्णुप्रयाग से २८ कि.मी. दूर पर्वत की गुफा में और खोली तो ऋषिकेश के घाट पर बैठा हूँ । फिर तीन बार उस पर्वत की ओर ढूँढा मगर आज (सन् १३५४) तक वह गुफा नहीं मिली । यह खटका मुझे अभी भी है ।
ऐसे योगी भी हैं जो संकल्प बल से कहीं का कहीं पहुँचा दें ।

★ ‘योग समान बल नहीं ।
रामायण में भी आता है कि स्वयंप्रभा ने हनुमान अंगद, जांबवान आदि सबको अपने योगबल से अपने आश्रम से समुद्र किनारे पहुँचा दिया था । ठाँडे सकल qसधु के तीरा ।
मुझे खेद है कि ऐसे समर्थ योगी पुरुष मिले फिर भी जीव की गन्दी आदतों ने उसकी उन्नति नहीं होने दी । संत के साथ कपट, स्वादेन्द्रिय की लोलुपता चारित्र्यबल एवं संयमबल से रहित जीवन जीव को तुच्छ तिनके की नांई ईधर से उधर फेंकता रहता है ।

श्रोत – ऋषि प्रसाद मासिक पत्रिका (Sant Shri Asaram Bapu ji Ashram)
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