भक्त रानी मैनावती (बोध कथा) | Hindi Moral Story

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भक्त रानी मैनावती (बोध कथा) | Hindi Moral Story

शिक्षाप्रद कहानी : Prerak Hindi Kahani

आजसे दो हजार वर्ष पूर्व भारतकी राजधानी उज्जैनमें थी। भारतसम्राट् भरथरी (भर्तृहरि) महाराज जब योगी हो गये, तब विक्रमादित्यजी सिंहासनपर विराजमान हुए। उस समय बंगालके राजा गोपीचन्दजी थे, जो कि भरथरी के मामा थे।
गोपीचन्द ने जब सुना कि भरथरीने गुरु गोरखनाथजीसे अमरविद्या पढ़ी है और भोग त्यागकर योग से अनुराग किया है, तब वे भी गोरखनाथ जी के शिष्य हो गये। गुरु ने गोपीचन्द से भी कहा कि यदि तुम अमरविद्याके प्रेमी हो तो राज्य त्याग दो और भरथरीके साथ रहो।

गोपीचन्द जी ने वही किया। राज्य त्याग दिया। अपने छोटे भाईको गद्दीपर बैठाकर आपने योगी रूप धारण किया। गोरखगुरु के आज्ञानुसार रानी और मातासे भिक्षा माँगनेके लिये गोपीचन्द जी रंगमहल में गये।

रानी-   मैं आपको क्या भिक्षा हूँ? मेरे आँसुओंका हार लेते जाओ। जनक राजाकी तरह क्या आप भोग के अंदर योग को नहीं निभा सकते? |
राजा–  रानी साहबा ! योग से भी कठिन भोग है। बिना योग के भोग भी तो नहीं हो सकता।
रानी— क्या अमरविद्याके लिये राज्यका त्याग आवश्यक है?
राजा– आवश्यक है। अमरविद्याके नियमोंको पालनेके लिये राज-काज छोड़ना अनिवार्य है।
रानी– यदि मुझे त्यागने से आप अमर हो सकते हैं तो मुझे त्याग दीजिये।मैं अपने कलेजेपर पत्थर रख लँगी, परंतु आपकी हानि न करूंगी। सच्ची पत्नी पति के सुखके लिये सब सुख त्याग सकती है।
राजा-  मेरे अनुरागके लिये आप जो त्याग कर रही हैं, उसके लिये मैं आपका कृतज्ञ हूँ। मैं आपसे यही भिक्षा माँगने आया हूँ कि आप सहर्ष मुझे वनवास की आज्ञा प्रदान करें।
रानी-  सहर्ष कहती हैं कि आप अमरविद्या के विद्यार्थी बनें। समोद चाहती हूँ कि जनता भरथरी के साथ आपका भी नाम लिया करे। एक भिक्षा आप भी मुझे देंगे क्या?
राजा-  क्या?
रानी—जिस दिन मेरी मौत हो, उस दिन आपके दर्शन प्राप्त करूं।
राजा– तथास्तु !

गोपीचन्द-  अलख ! माताजी ! भिक्षा दीजिये।
मैनावती–  आज मैं धन्य हुई । मेरे पेटसे एक भक्त पुत्र उत्पन्न हुआ। इसलिये मैं धन्य हूँ।
गोपीचन्द– मुझे भिक्षा दो माताजी !
मैनावती– मैं तुझे तीन शिक्षाओंकी भिक्षा देती हूँ। एक शिक्षाका मूल्य एक हीरे से कम नहीं है।
गोपीचन्द– शिक्षाके लिये ही मैंने हीरों की खान यानी राजपाट का त्याग किया है। आप शिक्षाकी भिक्षा दीजिये।
मैनावती– मेरी पहली शिक्षा यह है कि सर्वदा किले के अंदर रहना, जिससे शत्रु लोग हमला न कर सकें।
गोपीचन्द- मैं आपकी शिक्षा को समझ नहीं सका हूँ। आपने रहस्यवादकी वाणीमें शिक्षा दी है।
मैनावती– मनुष्यके लिये ब्रह्मचर्य से बढ़कर कोई किला नहीं है। रोग, शोक, भय, बाधा, व्याधि, चिन्ता और अशान्ति-कोई भी शत्रु इस किले पर हमला नहीं कर सकता। जो ब्रह्मचारी नहीं, वह न तो भक्त बन सकता है और न योगी। ब्रह्मचर्यके किलेमें जब भक्त-मन निवास करने लगता है, तब उसे किसी शत्रुका भय नहीं रहता है। यही मेरी प्रथम शिक्षाका रहस्य है।
गोपीचन्द— कृतज्ञ हूँ मैं माताजी! आपका ऋण कभी नहीं चुका सकता। आपकी योग्यताको प्रणाम करता हूँ। आपकी दूसरी शिक्षा क्या है?
मैनावती– मेरी दूसरी शिक्षा यह है कि सर्वदा मोहनभोग का भोजन करना।
गोपीचन्द- यह रहस्यवादी वाणी मालूम पड़ती है, क्योंकि परिस्थितिके विरुद्ध है। योगीको कभी-कभी एक मुट्ठी चना भी नसीब नहीं होता-मोहनभोग कैसा ?
मैनावती-  दिन-रातके चौबीस घंटेमें केवल एक बार ही किलकिलाकर भूख लगा करती है। उस समय चना-चबैना भी मोहनभोग के समान मालूम होता है। बिना भूखके मोहनभोग का भोजन भी चना-चबैनी है। एक हालत में चना भी मोहनभोग बन जाता हैं। | और एक हालतमें मोहनभोग भी चना रह जाता है। मेरी इस दूसरी शिक्षा का रहस्य यह है कि दिन-रातमें केवल एक बार भोजन करना, सो भी तब-जब भूख लगे।
गोपीचन्द– साधुवाद ! आपको अनुभव लाजवाब है। आपकी तीसरी शिक्षा क्या है?
मैनावती –  तीसरी शिक्षा यह है कि जब नींद लगे तब मसहरीमें सोना।।
गोपीचन्द-  यह भी रहस्यवादका वचन है। इस शिक्षाका मर्म भी मेरी पहुँचसे बाहरकी बात है।
मैनावती– जो लोग निमन्त्रण देकर नींदको बुलाते हैं, उनको पलँगपर भी अच्छी नींद नसीब नहीं होती। सोनेका समय हो गया, इसलिये सोना चाहिये, इस समझमें जो मसहरी पर भी सोते हैं, वे करवटें बदला करते हैं। परंतु जब लकालक नींद आती है,
तब खेत के ढेलों में भी पड़कर गहरी नींद ली जा सकती है। मेरी तीसरी शिक्षाका यही रहस्य है कि जब खूब नींद आये तभी सोना, हर समय आलसी बने पड़े मत रहा करना।
गोपीचन्द– साधु ! साधु! आपकी तीनों अमूल्य शिक्षाएँ मैंने अच्छी तरह गाँठ बाँध ली हैं। ये तीनों रत्न सर्वदा और सर्वथा मेरे पास रहेंगे। |
मैनावती– पिंगला रानी ने अपने खराब आचरण से अपने पति भरथरीको योगी बना दिया है। मैनावतीने अच्छे आचरणसे अपने पुत्र गोपीचन्दको योगी बना दिया है। फलतः इस संसारमें बुरी-से-बुरी और अच्छी-से-अच्छी स्त्री भी मौजूद हैं।

गोरखनाथ– वत्स गोपीचन्द !
गोपीचन्द-  महाराज !
गोरख–  तुमने अपनी रानीसे क्या भिक्षा प्राप्त की?
गोपीचन्द- दूसरेके उपकारके लिये अपना स्वार्थ त्याग करना चाहिये। रानीने मुझे इसी शिक्षाकी भिक्षा दी है।
गोरख–  तुमने अपनी मातासे क्या भिक्षा पायी ?
गोपीचन्द- माताने तीन शिक्षाओंकी भिक्षा दी है-(१) ब्रह्मचर्यसे रहना, (२) खूब भूख लगे तब भोजन करना और (३) खूब नींद लगे तब सोना।
गोरख–  ठीक है। तुमको सिद्धि प्राप्त होगी। प्रत्येक स्त्री प्रवृत्तिका जाल बिछाये बैठी है। प्रत्येक स्त्रीका सर्वस्व प्रवृत्तिमार्ग है। परंतु रानी मैनावतीने निवृत्तिका पक्ष ग्रहण किया है। मैंने यह पहली स्त्री देखी है, जिसने निवृत्ति से प्रेम दर्शाया है। मैनावती रानी ने सुमित्रा रानीकी तरह ब्रह्मको प्यार किया है। वास्तवमें तुम्हारी माता-माता कहलाने योग्य है। मैं उसको श्रद्धापूर्वक प्रणाम करता हूँ। | गोपीचन्द–ईश्वर करे, मेरी माता-जैसी सब माताएँ हो जायें।