रस माणिक्य के फायदे और नुकसान | Ras Manikya Benefits and Side Effects in Hindi

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रस माणिक्य के फायदे और नुकसान | Ras Manikya Benefits and Side Effects in Hindi

रस माणिक्य क्या है ? ras manikya in hindi

आयुर्वेदिक चिकित्सा में रसमाणिक्य एक शास्त्रोक्त बहुउपयोगी तथा उत्तम लाभकारी औषधि का स्थान रखता है इसलिए अधिकांश वैद्यगण इसका बुद्धिपूर्वक और युक्तिसंगत प्रयोग कर इसके चमत्कारिक प्रभाव से रोगियों को लाभान्वित करते हैं।
इस औषधि का उपयोग वात और कफ प्रधान रोगों की चिकित्सा में किया जाता है इसीलिए वात और कफ दोष के प्रकुपित होने से उत्पन्न होने वाले चर्म रोगों में इसका प्रयोग चमत्कारिक परिणाम देता है। आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति में औषधि का चुनाव उतना आसान नहीं होता जितना दिखाई देता है। रोग उत्पत्ति में किस दोष की प्रधानता है, रोग का प्रकार क्या है तथा रोगी की प्रकृति आदि बातों के साथ-साथ औषधि के गुण प्रभाव को ध्यान में रखते हुए न केवल किसी औषधि का चुनाव ही किया जाता है बल्कि उसकी मात्रा का भी निर्धारण किया जाता है।
एक सामान्य नियम यह है कि किसी भी औषधि का प्रयोग करते समय उसकी मात्रा उतनी ही देनी चाहिए जितनी की निर्दिष्ट की गई हो। रसमाणिक्य के मामले में यह नियम बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि उपयुक्त मात्रा से अधिक देने पर यह पित्त प्रकोप जन्य रोग के लक्षण उत्पन्न कर सकता है। कारण यह है कि इस औषधि का गुण उष्णप्रधान है अतः यह वात और कफ का शमन तो करती है किन्तु उष्ण होने से पित्तवर्द्धक होती है। इसी कारण पित्तप्रधान रोगों में इसका प्रयोग नहीं किया जाता है। रोग के लक्षणों के आधार पर मोटे तौर पर दोष प्रधानता का अन्दाजा लगाया जा सकता है।
जैसे- जब रोगी कभी भी दर्द, शीतलता और जकड़ाहट का अनुभव करे तो ये वात प्रधान रोग के लक्षण हैं। जब रोगी किसी भी स्थान पर जलन, दाह, उष्णता या गर्माहट का अनुभव करे तो ये पित्तप्रधान रोग के प्रमुख लक्षण हैं और जब रोगी को शोथ, सूजन, भारीपन, शीतलता व खुजली हो तब रोग को कफ प्रधान समझना चाहिए। इसी प्रकार किसी रोग में जब दो दोषों की प्रधानता हो तो मुख्य लक्षण इस प्रकार होते हैं- जैसे दर्द, भारीपन और खुजली हो तो वह रोग वातकफ प्रधान है, यदि जलन, दाह और दर्द हो तो वह रोग वात-पित्त प्रधान है और जब रोगी में जलन, भारीपन और सूजन हो तो वह रोग पित्त-कफ प्रधान है, ऐसा जाना जाता है। कहने का तात्पर्य यह है कि आयुर्वेदिक औषधि देने वाले या औषधि लेने वाले को वात पित्त और कफ की स्थिति को समझ कर ही औषधि का चयन करना चाहिए ।
रसमाणिक्य उष्णप्रधान और पित्तवर्धक है तथा वात कफ का शमन करने वाली औषधि है। अतः प्रयोग के समय सावधानी अनिवार्य है,
उदाहरण के लिए यदि कफ के साथ खून आ रहा हो, कहीं भी रक्तस्राव हो तथा जलन के लक्षण दिखाई दें तो रसमाणिक्य का उपयोग नहीं किया जाना चाहिए। रसमाणिक्य को आधार बनाकर आयुर्वेदिक औषधियों के चयन की प्रक्रिया पर इस संक्षिप्त चर्चा के बाद हम अपने मूल विषय पर लौटते हैं और रसमाणिक्य के घटक द्रव्य, निर्माण विधि, सेवन विधि एवं मात्रा तथा विभिन्न रोगों में इस उत्तम योग की महत्ता और उपयोगिता पर आपसे चर्चा शुरू करते हैं।

रस माणिक्य के घटक द्रव्य : ras maniky ingredients in hindi

✦हरताल,
✦भूरे कोले का पेठा(कुष्माण्ड),
✦कांजी,
✦तिल्ली का तैल,
✦त्रिफला काढ़ा,
✦चूने का पानी,
✦अभ्रक के पत्ते।

रस माणिक्य बनाने की विधि : preparation method of ras maniky

पहली विधि :-
सबसे पहले 100 ग्राम हरताल को लेकर उसे एक कपड़े की पोटली में बांध लें। इसके बाद एक बर्तन में लगभग 3 लिटर पेठे का रस लेकर आंच पर रख दें। अब इसमें एक लकड़ी की सहायता से हरताल की पोटली को पेठे के रस में डुबो दें लेकिन यह ख्याल रखें कि हरताल की पोटली बर्तन के नीचे के तले से ऊपर रहे । इसे लगभग 3 घण्टे तक उबालें। इसके बाद इसी पोटली को, इसी विधि से कांजी, तिल्ली का तैल और त्रिफला के काढ़े में अलग-अलग 3-3 घण्टे तक उबालें। फिर एक पात्र में चूने का पानी लेकर उबालें। इस पोटली को डंडे की सहायता से चूने के पानी के ऊपर लटका कर लगभग 3 घण्टे तक, धीमी आंच से, चूने के पानी की भाप से स्वेदन करे। इस प्रकिया से हरताल का शोधन हो जाता है,
यह शुद्ध हरताल है। अब एक मिट्टी के बर्तन में नीचे के तले पर अभ्रक पत्र बिछाकर उस पर शुद्ध हरताल के चावल के दाने के बराबर टुकड़े फैला कर बिछा दें। फिर इसके ऊपर एक और अभ्रक पत्र रख कर इसे ढंग दें। मिट्टी के पात्र को मिट्टी के कटोरे से ढंक कर उसके मुंह के जोड़ पर बेर के पत्तों की लुगदी लगा कर बन्द कर दें। इसके बाद इस मिट्टी के पात्र को गोबरी के कण्डों की आंच पर इतना गरम करें कि पात्र के नीचे का भाग एकदम लाल हो जाए। इसके बाद इसे उतारकर स्वतः ठण्डा होने के लिए छोड़ दें। ठण्डा होने के बाद मिट्टी के बर्तन का ऊपरी ढक्कन हटाकर अभ्रक पत्तों के बीच में लाल रंग का दानेदार रसमाणिक्य प्राप्त कर लें।
यह भैषज्य रत्नावली में वर्णित विधि से बनाया गया रस माणिक्य है।

दूसरी विधि :-
रसतन्त्रसार के अनुसार बिना शुद्ध किये हरताल को मोटा मोटा चावल के दाने के बराबर चूर्ण कर लें और फिर समान आकार वाले
अभ्रक के दो पतरों में से एक पर इस चूर्ण को | फैला कर रख दें तथा दूसरे अभ्रक के पतरे से
ढंक दें तथा इन दोनों पतरों को बैर की लुगदी से बन्द कर दें। इन अभ्रक के पतरों के मध्य में दबे हरताल को गोबरी के कंडों की बिना धूएं | वाली आंच (निर्धूम आंच) पर रखे तथा हर 3-3 मिनिट पर पलटते रहें। 3-4 बार पलटने पर हरताल का रंग माणिक्य के समान लाल रंग का हो जाता है। अब अग्नि पर से उतार लें व ठण्डा होने पर यह रसमाणिक्य है।

उपलब्धता : यह योग इसी नाम से बना बनाया आयुर्वेदिक औषधि विक्रेता के यहां मिलता है।

मात्रा और अनुपान : ras maniky dosage

सामान्यतः रसमाणिक्य की 125 मि.ग्रा. ( 1 रत्ती) मात्रा सुबह और शाम शहद और अदरक के रस के साथ, शहद और घी की विषम मात्रा के साथ, पान के रस के साथ या पीपल के चूर्ण के साथ अथवा रोग की अवस्था के अनुसार दी जाती है।

रस माणिक्य के उपयोग : ras manikya uses in hindi

✷ वात और कफ दोष के कुपित होन से उत्पन्न होने वाले विभिन्न प्रकार के रोगों में इस योग का प्रयोग किया जाता है।
✷ यह बालक, युवा, वृद्ध, स्त्रियां तथा सुकुमार कोमल प्रकृति वालों को दिया जा सकता है।
✷ प्रसुता स्त्रियों में जब किसी किटाणु का संक्रमण हो जाये तथा वात कफज व आमविषजन्य व्याधियों में यह योग बहुत ही उपयोगी होता है।
✷ इस रसायन में गन्धक और शंखिया का इस प्रकार का संयोजन है कि यह शीघ्र ही रक्त में मिलकर अपना प्रभाव तत्काल दिखाता है।
✷ इस रस के सेवन से वात कफज ज्वर, विषम ज्वर, सन्निपात, श्वास, कास, हृदयावरोध, चर्मरोग, कुष्ठरोग, वातरक्त, भगन्दर, नाड़ी व्रण, दुष्टव्रण या पुराना घाव, चर्मदल कुष्ठ
आदि रोगों में लाभ होता है। कुछ मुख्य रोगों में इसके उपयोग का विवरण इस प्रकार है
आइये जाने ras manikya benefits in hindi,ras manikya ke labh in hindi

रस माणिक्य के फायदे : ras manikya ke fayde in hindi

1-वर्षाऋतु जन्य सर्दी (प्रतिश्याय) में रस माणिक्य के फायदे :
जब कोई व्यक्ति बारिश में भीग जाने से, शीत प्रकोप के प्रभाव से गले में कफ, श्वासनलिका और फेफड़ों में तकलीफ़, हल्का बुखार, सर्दी जुकाम से पीड़ित हो जाता है, उसे बार-बार छींकें आती हों, नाक पानी की तरह बहने लगे व आवाज और गला बैठ जाए तो 125 मिग्रा (1 रत्त) रसमाणिक्य और 500 मि.ग्रा. से 1 ग्राम
तक सितोपलादि चूर्ण शहद के साथ सुबह-शाम देने से तत्काल लाभ होता है। ( और पढ़ेखाँसी के घरेलू इलाज)

2-शीत प्रकोपजन्य जुकाम में रस माणिक्य के फायदे :
जब मौसम अत्यधिक ठण्डा हो जिसके प्रकोप से रोगी को छाती में जकड़ाहट हो तथा उस पर ध्यान न देने से फेफड़ों में कफ की घरघराहट बढ़ जावे, घबराहट, सिरदर्द, मलावरोध आदि लक्षण उत्पन्न हो जाएं तथा जुकाम के कारण श्वास लेने में परेशानी आने लगे तो ऐसी अवस्था में रसमाणिक्य 2 ग्राम, त्रिभुवन कीर्ति रस 2 ग्राम, पीपल का चूर्ण 5 ग्राम- इन तीनों को अच्छे से मिलाकर 10 पुड़िया बना लें।  1-1 पुड़िया सुबह-शाम शहद में मिलाकर देने से 2-3 दिन में ही लाभ हो जाता है। ऐसे समय में रोगी को मलावरोध न होने दें अतः मलावरोध होने पर तत्काल इसका निवारण करें।( और पढ़ेसर्दी जुकाम दूर करने के 15 सरल घरेलू उपचार )

3-इनफ्लूएंजा में रस माणिक्य के फायदे :
अनेक बार जुकाम के बाद वातश्लेष्मिक ज्वर (Influenza) की शुरूआत हो जाती है। इसकी प्रारम्भिक अवस्था में दूषित कफ फेफड़ों में जमा होकर रक्त में प्रवाहित होने लगता है। थोड़े से परिश्रम में ही रोगी की श्वास फूलने लगती है और घबराहट होने लगती है। गले में आये हुए कफ को बाहर निकालने में रोगी को कठिनाई व तकलीफ महसूस होती है। ऐसी अवस्था में रसमाणिक्य 1 ग्राम, कफ कुठार रस ढाई ग्राम, गिलोय सत्व 5 ग्राम- सबको मिलाकर पीस कर आठ मात्रा बना लें। एक-एक मात्रा सुबह- शाम अडूसे के पत्ते के रस या हर्बल वसाका के साथ देने से तुरन्त लाभ होता है।

4-जीर्ण ज्वर में रस माणिक्य के फायदे :
जब किसी रोगी को, दूषित अन्न का सेवन करने से, बार-बार थोड़ेथोड़े समय अन्तराल से बुखार आने की समस्या होजाती है तब ऐसे रोगी को शुद्ध सात्विक भोजन देते हुए ये औषधियां देने से लाभ होता है- रसमाणिक्य 5 ग्राम, पिप्पली चूर्ण 10 ग्राम, गिलोय सत्व 10 ग्राम- सबको अच्छे से मिलाकर बराबर मात्रा की 30 पुड़ियां बना लें तथा 1-1 पुड़िया सुबह-शाम शहद के साथ दें।( और पढ़ेजीर्ण ज्वर का सरल घरेलू उपाय)

5-कफप्रधान ज्वर में रस माणिक्य के फायदे :
कंठ से कफ की घरघराहट आती हो, 100 से 102°f बुखार, मुंह का स्वाद मीठा या चिकनापन लिये हुए हो, शरीर में आलस्य, जुकाम, हाथ-पैर में खिंचाव, बार-बार पेशाब होना, पेशाब का रंग सफ़ेद होना, आंखों में भारीपन, भूख की कमी आदि कफ प्रधान लक्षणों से युक्त रोगी को रसमाणिक्य 5 ग्राम और संजीवनी वटी 5 ग्राम मिलाकर खरल में बारीक पीसकर तथा बराबर मात्रा की 30 पुड़िया बना, 1 पुड़िया आधा चम्मच अदरक के रस और एक चम्मच शहद में मिलाकर देने से शीघ्र लाभ होता है।

6-न्यूमोनिया (फुफ्फुसीय सन्नीपात) में रस माणिक्य के फायदे :
न्यूमोकॉक्स बेक्टेरिया से होने वाले इस रोग में रोगी बहुत अशक्त हो जाता है, श्वास लेने में परेशानी के साथ-साथ श्वासगति तीव्र होकर फेफड़े धोंकनी की तरह तेज़ चलने लगते हैं। फेफड़ों से कफ सरलता से बाहर नहीं निकलता। ऐसे में सितोपलादि चूर्ण 10 ग्राम, गोदन्ती भस्म 5 ग्राम, अभ्रक भस्म 5 ग्राम, श्रृंगभस्म 5 ग्राम, रसमाणिक्य 5 ग्राम तथा पीपल चूर्ण 5 ग्राम- सबको मिला कर महीन पीस कर समान मात्रा की 30 पुड़ियां बना लें। 1-1 पुड़िया सुबह-शाम शहद व अदरक के रस के साथ देने से लाभ होता है। बच्चों में उम्र के आधार पर यह मात्रा आधी या एक चौथाई की जाती है। अडूसे का रस भी साथ में देना चाहिए।

7-वातरक्त में रस माणिक्य के फायदे :
आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में इसे गाउट (Gout) कहा जाता है। यह रोग पैर के अंगूठों में वेदना से शुरू होता है और धीरे -धीरे बड़ी सन्धियों में शोथ और वेदना उत्पन्न कर देता है। कुछ रोगियों में सूखी खुजली, फोड़े फुन्सियां आदि त्वचा विकार भी उत्पन्न हो जाते हैं। ऐसे में वातरक्त की चिकित्सा में दी जाने वाली औषधियों के साथ रसमाणिक्य मिलाकर देने से शीघ्र लाभ होता है।

8-सफ़ेद दाग में रस माणिक्य के फायदे :
श्वित्र रोग या सफ़ेद दाग़ की प्रारम्भिक अवस्था में रसमाणिक्य का चूर्ण व बाकुची चूर्ण को मिलाकर गोमूत्र में मिलाकर मोटी धूपबत्ती की तरह लम्बी गोलवर्ती बना कर सुखा ली जाती है। इस वर्ती दंडिका को जब भी उपयोग में लेना हो तो उसे पुनः गोमूत्र में चन्दन की लकड़ी की तरह पत्थर पर घिस कर सफ़ेद दाग के स्थान पर लेप करने से वहां 2-3 दिन में लाल दाने होकर गोल उभरे हुए छाले नुमा फफोले हो जाने पर लेप को तत्काल बन्द कर दिया जाता है तथा मक्खन लगाता जाता है। छालेनुमा फफोले मिट जाने पर 2 से 3 दिन बाद पुनः लेप किया जाता है। इस तरह 3-4 बार लेप करने से सफ़ेद दाग़ में लाभ होता है। ( और पढ़ेसफेद दाग का आयुर्वेदिक इलाज)

सावधानी – यहां यह सावधानी रखना ज़रूरी है कि यह प्रयोग रोग की प्रारम्भिक अवस्था में तथा जब सफ़ेद दाग 2 से 3 इंच व्यास तक के हों तभी किया जाता है। सम्पूर्ण शरीर में या चारों और फैली हुई अवस्था में इस प्रयोग को नहीं किया जाता है।

9-भगन्दर में रस माणिक्य के फायदे :
भगन्दर, नाड़ीव्रण तथा पुराने घाव की अवस्था में या जब किसी संक्रमण के कारण गुदामार्ग में भगन्दर, नाड़ी व्रण या किसी तरह की विद्रधि (Abscess), पुराना घाव, जीर्ण घाव होने की स्थिति में दी जाने वाली औषधियों के साथ रसमाणिक्य की 250मि. ग्रा. मात्रा कैशोर गुग्गुलु या त्रिफला गुग्गुलु की 2-2 गोली के साथ, महामंजिष्ठादि क्वाथ 10ml व अभयारिष्ट 10ml के अनुपान से देने से लाभ होता है।

रस माणिक्य के नुकसान : ras manikya ke nuksan in hindi

1-यह उष्ण प्रधान औषधि है अतः जहां भी पित्त दोष की अधिकता के साथ रक्तस्राव की स्थिति हो वहां इसका प्रयोग नहीं करना चाहिए।
2-कफ विकारों में लाभकारी रसमाणिक्य कफरोग में तब नहीं दिया जाता जब कफ के साथ रक्त भी आ रहा हो।
3-रस माणिक्य को डॉक्टर की सलाह के अनुसार सटीक खुराक समय की सीमित अवधि के लिए लें।

2018-10-16T14:12:04+00:00 By |Ayurveda|0 Comments