पूज्य बापू जी का संदेश

ऋषि प्रसाद सेवा करने वाले कर्मयोगियों के नाम पूज्य बापू जी का संदेशधन्या माता पिता धन्यो गोत्रं धन्यं कुलोद्भवः। धन्या च वसुधा देवि यत्र स्याद् गुरुभक्तता।।हे पार्वती ! जिसके अंदर गुरुभक्ति हो उसकी माता धन्य है, उसका पिता धन्य है, उसका वंश धन्य है, उसके वंश में जन्म लेने वाले धन्य हैं, समग्र धरती माता धन्य है।""ऋषि प्रसाद एवं ऋषि दर्शन की सेवा गुरुसेवा, समाजसेवा, राष्ट्रसेवा, संस्कृति सेवा, विश्वसेवा, अपनी और अपने कुल की भी सेवा है।"पूज्य बापू जी

यह अपने-आपमें बड़ी भारी सेवा है

जो गुरु की सेवा करता है वह वास्तव में अपनी ही सेवा करता है। ऋषि प्रसाद की सेवा ने भाग्य बदल दिया

साधना की रक्षा करने वाला दिव्य ​रक्षा कवच : Raksha Kavach

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साधना की रक्षा करने वाला दिव्य ​रक्षा कवच : Raksha Kavach

रक्षा कवच : Raksha Kavach

★ मुझे शास्त्रों में से एक रक्षा-कवच(Raksha Kavach) मिल गया है जो मुझे अच्छा लगा | मैंने उसका प्रयोग किया | बड़ा सरल है |
आरंभ में आप यह प्रयोग थोड़े दिन लगातार करें | फिर तो आप याद करेंगे और रक्षा – कवच आपके इर्दगिर्द बन जायेगा | फिर वासना की तरंगे आपके अंदर नहीं घुसेंगी |

★ आँख ने कुछ देखा, मन उसके लिए लालायित हुआ, बुद्धि ने निर्णय लिया कि ऐसा करना है | इस प्रकार एक-एक इन्द्रिय मन को खींच लेती है | मन बुद्धि से सम्मत्ति ले लेता है और आप उसमें गरक हो जाते है |

★ वासना के इन आवेगों से स्वयं को बचने में यदि आप सहयोग नहीं देते तो भगवान और गुरु भी आपको बचने में सफल नहो हो सकते | यदि विद्यार्थी साथ नहीं देता है तो शिक्षक और प्राचार्य मिलकर भी उस विद्यार्थी को पदवीधारी नहीं बना सकते | अत: पुरुषार्थ तो आपको ही करना पड़ेगा |

★ भगवान की, शास्त्रों की, ऋषियों एवं सदगुरु की कृपा अनावृत हैं, जैसे सूर्य की किरणे, बरसात सामान्यत: मिलते ही है | किंतु किसान स्वयं मेहनत नहीं करे तो बरसात और सूर्य क्या करेंगे ?
आप अपनी रक्षा कीजिये |

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​रक्षा -कवच धारण करने एवं आत्मबल जगाने की विधि :

<★> पद्मासन या सिद्धासन में बैठे | मेरुदंड सीधा हो | आँखें आधी खुली -आधी बंद रखे | ‘
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​<★> ॐ ​’​ या अपने इष्टमंत्र अथवा गुरुमंत्र का जप करते हुए दृढ़ भावना करें कि ‘मेरे इष्ट की कृपा का शक्तिशाली प्रवाह मेरे अंदर प्रवेश कर रहा है और मेरे चारों और सुदर्शन चक्र – सा एक इन्द्रधनुषी घेरा बनाकर घूम रहा है |

<★> वह अपने दिव्य तेज से मेरी रक्षा कर रहा है | इन्द्रधनुषी प्रकाश घना होता जा रहा है | दुर्भावनारुपी अंधकार विलीन हो गया है | सात्त्विक प्रकाश -ही-प्रकाश छाया है | सूक्ष्म आसुरी शक्तियों से मेरी रक्षा करने के लिए वह रश्निल चक्र सक्रिय है | मैं पूर्णत: निश्चिंत हूँ |’

<★> श्वास जितनी देर भीतर रोक सकें, रोंके | मन-ही-मन उक्त भावना को दोहराये | मानसिक चित्र बना लें | अब धीरे-धीरे ‘
​​
​​<★> ॐ ….’ का दीर्घ उच्चारण करते हुए श्वास बाहर निकाले और भावना करें कि ‘मेरे सारे दोष, विकार भी बाहर निकल गए है | मन-बुद्धि शुद्ध हो गये हैं | श्वास के खाली होने के बाद तुरंत श्वास न लें | यथाशक्ति बिना श्वास रहें और भीतर-ही-भीतर ‘ ​​

<★> हरि ॐ … हरि ॐ ….’ का मानसिक जप करें | दस-पंद्रह मिनट ऐसे प्राणायामसहित उच्च स्वर से ‘ॐ …’ की ध्वनि करके शांत हो जायें | सब प्रयास छोड़ दें | वृत्तियों को आकाश की ओर फैलने दें |

<★> आकाश के अन्दर पृथ्वी है | पृथ्वी पर अनेक देश, अनेक समुद्र एवं अनेक लोग हैं | उनमें से एक आपका शरीर आसन पर बैठा हुआ हैं | इस पुरे दृश्य को आप मानसिक आँख से, भावना से देखते रहें | आप शरीर नहीं हो बल्कि अनेक शरीर, देश, सागर, पृथ्वी, ग्रह, नक्षत्र, सूर्य, चन्द्र एवं पुरे ब्रम्हांड के दृष्टा हो, साक्षी हो, इस साक्षीभाव में जाग जायें |

<★> थोड़ी देर के बाद फिर से प्राणायामसहित ‘
​​ॐ ….’ का जाप करें और शांत होकर अपने विचारों को देखते रहें |

<★> इस अवस्था में दृढ़ निश्चय करें कि ‘मैं जैसा बनना चाहता हूँ वैसा होकर ही रहूँगा |’ विषयसुख, सत्ता, धन-दौलत इत्यादि कि इच्छा न करें क्योंकि आत्मबलरूपी हाथी के पदचिन्ह में अन्य सभीके पदचिन्ह समाविष्ट हो ही जायेंगे | आत्मानंदरूपी सूर्य के उदय होने पर मिट्टी के तेल के दीये के प्रकाशरूपी क्षुद्र सुखाभास कि गुलामी कौन करें ?

<★> किसी भी भावना को साकार करने के लिए ह्रदय को कुरेद डाले ऐसी निश्चयात्मक बलिष्ठ वृत्ति होनी आवश्यक है | | अंत:करण के गहरे -से -गहरे प्रदेश में चोट करे ऐसा श्वास भरके निश्चयबल का आवाहन करें | सीना तानकर खड़े हो जाये अपने मन कि दीन-हीन, दु:खद मान्यतावों को कुचल डालने के लिए |

<★> सदा स्मरण रहे कि इधर-उधर भटकती वृत्तियों के साथ आपकी शक्ति भी बिखरती रहती है | अत: तमाम वृत्तियों को एकत्रित करके साधनाकाल में आत्मचिंतन में लगाये और व्यवहारकाल में जो कार्य करते हो उसमें लागायें | हरेक कार्य आवेशरहित व दत्तचित्त होकर करें | सदैव विचारशील एवं प्रसन्न रहें | जीवमात्र को अपना स्वरुप समझे | सबसे स्नेह करें | दिल को व्यापक रखें | खंडनात्मक वृत्ति का सर्वथा त्याग करें |

<★> आत्मनिष्ठा में जगे हुए महापुरुषों के सत्संग तथा सत्साहित्य से अपने जीवन को मुखरित हो जायेगी | दुष्प्रभावों के अदृश्य परमाणुओं के भजन के लिए ये अचूक साथी है | जैसे लोहे को लोहा काटता है, वैसे ही विचार को विचार काटता है | आपके इन दो साथियों – आत्मबल एवं रक्षा -कवच के सामर्थ्य पर विश्वास कीजिये | ये सतत आपकी रक्षा एवं पुष्टि करेंगे

श्रोत – ऋषि प्रसाद मासिक पत्रिका (Sant Shri Asaram Bapu ji Ashram)

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साधना की रक्षा करने वाला दिव्य ​रक्षा कवच : Raksha Kavach
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2017-08-10T17:10:26+00:00 By |Sadhana Tips|0 Comments

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