सेवा की महक – ईश्वरचंद्र विद्यासागर ( Ishwar Chandra Vidyasagar )

Home » Blog » Mahan Vibhutiyan » सेवा की महक – ईश्वरचंद्र विद्यासागर ( Ishwar Chandra Vidyasagar )

सेवा की महक – ईश्वरचंद्र विद्यासागर ( Ishwar Chandra Vidyasagar )

Motivational Stories in Hindi : प्रेरक हिंदी कहानी

★ सन् १८२० में कलकत्ता के पास एक गाँव में ईश्वरचंद्र विद्यासागर (Ishwar Chandra Vidyasagar)का जन्म हुआ था । विद्या में इतने कुशल, बुद्धिमान थे कि उनका नाम विद्यासागर पडा । वे जब बालक थे तो अपने पिता के साथ टाँगे में बैठकर कलकत्ता जा रहे थे । उनका गाँव कलकत्ता से १९ मील दूरी पर था । रास्ते में माइल स्टोन देखकर उन्होंने पिता से पूछा :
‘‘पिताजी ! यह पत्थर पर क्या लिखा है ?
पिता ने कहा : ‘‘यह अंग्रेजी में उन्नीस लिखा है ।

★ बालक ईश्वर ने पूछा : ‘‘अंग्रेजी में ऐसे उन्नीस लिखते हैं ?
‘‘हाँ ।
बस, फिर तो पक्का कर लिया । उन्नीस के बाद अठारह दिखे । आगे बढते-बढते सत्रह, सोलह… चार, तीन, दो, एक आदि दिखते गये । बुद्धिमान बालक ईश्वर ने टाँगे की सफर करते-करते ही उन्हें पक्का कर लिया । कलकत्ता पहुँचा तब तक वह अंग्रेजी की पूरी गिनती सीखकर पक्की कर चुका था । ऐसा बुद्धिमान लडका था वह ।

★ जैसे-जैसे वह बडा होता गया, सत्संग का लाभ मिला होगा या अगले जन्म की साधना होगी, उसे पता लगता गया कि यह संसार की सब चीजें छोडकर मर जाना है । इनका सदुपयोग करके अपनी आत्मा के समीप आना चाहिए । या तो सेवा के द्वारा इनका सदुपयोग करके अपने परमात्मा में आना है या फिर इनके लिए मजदूरी करके पच-पचकर मर जाना है । और फिर घोडा, गधा, बिल्ली और सूअर आदि बनकर जन्म-मृत्यु के चक्कर में पडना है ।

★ अभी हम मध्य में हैं, चेतन की अवस्था में हैं । इसका अति उपभोग करके अचेतन अवस्था में जायें अथवा सदुपयोग करके परम चेतन अवस्था में जायें यह हमारे हाथ की बात है ।

★ ईश्वरचन्द्र बहुत बुद्धिमान और तेजस्वी थे इसलिए पढाई पूरी कर लेने पर उन्हें विद्यासागर के नाम से अलंकृत किया गया । युनिवर्सिटी में उनकी नियुक्ति हुई । वे छात्रों को तर्कशास्त्र पढाते थे । परंतु वे इतने अक्लमंद, समझदार और साथ ही साथ निःस्पृह थे कि कुछ ही दिनों में उन्होंने युनिवर्सिटी के सत्ताधीशों से कहा :
‘‘मुझसे ज्यादा अच्छे ढंग से तर्कशास्त्र तो पंडित श्रीमान वाचस्पति पढा सकते हैं । मैं अपनी आय के स्वार्थ के कारण छात्रों की पढाई में कमी क्यों आने दूँ ? मुझमें तर्कशास्त्र पढाने की योग्यता है मगर मुझसे ज्यादा अच्छा पंडित वाचस्पति उन्हें पढा सकते हैं ।

★ सत्ताधीशों ने इनकी बात स्वीकार कर ली और ईश्वरचंद्र विद्यासागर खुद पंडित वाचस्पति के पास निमंत्रण लेकर गये । वाचस्पति इनके निमंत्रण को सुनकर चकित हो गये । वे बोले :
‘‘इस पद के लिए तो पंडित लोग खींचातानी करते हैं । आपको यह सामने से मिला है और आप मेरे लिए सुझाव दे रहे हैं ? वास्तव में विद्यासागर ! आप मानव नहीं, अपितु देव हैं ।

★ मानव अगर भोगों का उपयोग करता है तो मानव होता है । उसमें आसक्ति करता है तो दानव होता है और उसका त्याग करता है तो देव होता है ।
वाचस्पति ने पूछा :
‘‘आपने यह पदवी कैसे त्याग दी ?
‘‘इसमें क्या बडी बात है ? जिसमें बहुजन का हित होता हो, उसीमें मेरा हित है । क्योंकि हम व्यापक समाज से जुडे हैं । विद्यासागर ने उत्तर दिया ।

★ आप समाज से अलग नहीं रह सकते । समाज के हित में आपका हित है । कुटुंब के हित में आपका हित है । पडोस के हित में आपका हित है । देश के हित में आपका हित है । कुटुंब के हित में आपका हित है । विश्व के हित में आपका हित है । विश्व के विनाश में आपका भी अहित है, विनाश है । आप विश्व से जुडे हैं ।

++⚫++⚫++⚫++⚫++⚫++⚫++⚫++⚫++⚫++⚫++⚫++

★ ईश्वरचंद्र विद्यासागर के पास एक लडका आया और कहने लगा :
‘‘बाबुजी ! अकाल का समय है । भीख माँगना मेरा स्वभाव नहीं फिर भी मैं माँग रहा हूँ । हो सके तो एक पैसा दे दो ।

★ विद्यासागर तो सत्पुरुष थे । वे बोले : ‘‘बेटा ! एक पैसा चाहिए ? अगर मैं तुझे दो पैसा दूँ तो तू क्या करेगा ?
गरीब सच्चे लडके ने कहा : ‘‘एक पैसे के उबले हुये चने लेकर खाऊँगा और एक पैसा माँ को दूँगा ।

★ विद्यासागर ने पूछा : ‘‘अगर चार पैसे तुझे दूँ तो ?
लडका : ‘‘दो पैसे के चने घर ले जाऊँगा और दो पैसे माँ को दूँगा ।

★ विद्यासागर ने फिर पूछा : ‘‘अगर मैं तुझे दो आने दे दूँ तो ?
लडके ने सिर नीचे कर दिया और चलता बना विद्यासागर ने कलाई से पकडा और बोले :
‘‘क्यों जाता है ?
‘‘आप एक पैसा तो देते नहीं, दो आने इस जमाने में कौन दे सकता है ? आप मेरी मजाक उडाते हैं ।

★ विद्यासागर : ‘‘नहीं, समझ ले मैं तुझे दो आने दूँ तो तू क्या करेगा ?
लडका : ‘‘एक पैसे के चने अभी खाऊँगा, तीन पैसे के चने घर ले जाऊँगा और एक ही आना पूरा माँ को दूँगा । विद्यासागर फिर उस सच्चे लडके को आजमाते हैं : ‘‘अगर तुझे चार आने दूँगा तो क्या करेगा ?
उस हिम्मतवान लडके ने कहा : ‘‘दो आने को जैसे आगे कहा वैसे ही उपयोग में लाऊँगा और बाकी के दो आने से आम आदि फल खरीदकर बेचूँगा और उससे अपना गुजारा चलाऊँगा ।

★ विद्यासागर ने उसकी सच्चाई, समझदारी और स्वाश्रय को मन ही मन सराहते हुये उसे एक रूपया हाथों में थमा दिया । लडका तो हैरान हो गया कि वास्तव में यह आदमी अद्भुत है ! क्या कोई फरिश्ता है जो स्वर्ग से मेरा भाग्य खोलने के लिए नीचे उतरा है ! लडका नीचे उतरा है ! लडका रूपया लेकर उनका अभिवादन करता हुआ चलता भया ।

★ दो साल के बाद विद्यासागर कलकत्ते की बाजार से गुजर रहे थे तब एक युवक ने उन्हें रोका । हाथ जोडकर, आजीनिजारी करते हुये कहने लगा : ‘‘कृपा करके मेरी दुकान पर पधारिये ।
‘‘भाई ! मैं तो तुझे पहचानता भी नहीं और जिस दुकान की ओर तू इशारा कर रहा है, वह इतनी बडी दुकान किसकी है ?
‘‘आप चलो तो सही ! आप ही की है । लडके की आवाज में नम्रता और कृतज्ञता थी । विद्यासागर दुकान पर गये ।

★ ‘‘आप बैठो, यह आप की ही दुकान है ।
युवक की आँखें कृतज्ञता प्रदर्शित करते हुये छलछला रही थी ।
विद्यासागर : ‘‘भाई ! मैं तो तुझे जानता ही नहीं ।

★ ‘‘मैं वह लडका हूँ, जिसको आपने एक पैसा, दो पैसा, एक आना, दो आना, चार आना कहते हुये एक रूपया दिया था । यह आपके एक रूपये का रूपांतर है, आपकी कृपा का प्रसाद है ।
लडका अब विद्यासागर के चरणों पर गिर पडा । विद्यासागर के चित्त में उस समय तो अनहद आनंद आया, शांति मिली और अब उनकी प्रसिद्धि यहाँ सत्संग में आप लोगों तक पहुँची । अगर वे उस रूपये को अपने मोह और स्वार्थ में उडा देते तो क्या मिलता ?
तप करे पाताल में, प्रकट होय आकाश ।

★ रूपयों में, वस्तुओं में एवं भोग में जहाँ भी आपका स्वत्व है, आपकी मालिकी है वह अगर आप परहित के लिए खर्च कर देते हैं तो आपकी कीर्ति स्थायी हो जाती है । धोखा-धडी, फरेब से किसी की कीर्ति होती दिखती हो तो वह अस्थायी है । कोई अगर अपने सही पसीने की कमाई से भोग न भोगकर सदुपयोग में खर्चता है तो उसका वंश स्थायी हो जायेगा ।

++⚫++⚫++⚫++⚫++⚫++⚫++⚫++⚫++⚫++⚫++⚫++

★ विद्यासागर सीधे-सादे कपडे पहनते थे । अपने शरीर के लिए ज्यादा खर्च नहीं करते थे । कुलपति के पद तक पहुँचे थे मगर इसके कारण खान-पान, पहेरवेश में आडंबर, दिखावा नहीं आया था । वे सादा और पवित्र जीवन जीते थे ।

★ एक बार वे रास्ते से गुजर रहे थे । सामने से एक ब्राह्मण आँसू बहाता हुआ मिला । परदुःख कातरता तो उनके स्वभाव में कूट-कूटकर भरी थी । रास्ते में गुजरते हुये भी खोजा करते थे, कोई सेवा का मौका मिल जाय । कोई रोडा, पत्थर बीच रास्ते में पडा हो तो उसे किनारे लगा देते थे । कोई रोता, बिलखता हुआ दिखता तो उससे सहानुभूति से बात करते । किसी का मार्गदर्शन करते समय उसे जो आनंद मिलता है, दुःखनिवृत्ति होती है उससे ज्यादा मार्गदर्शक को और सहानुभूति करनेवाले को अपने ही दिल में आनंद का अनुभव होने लगता है । सामनेवाला तो आपके बताये हुये रास्ते पर चले तब उसे फायदा होता है मगर आपने सहानुभूति से रास्ता बताया तो आपके हृदय में उसी समय फायदा महसूस होने लगता है । भव, राग और क्रोध कम होने लगते हैं ।

★ ईश्वर को पाने के लिए कोई मजदूरी नहीं करनी पडती, सिर्फ कला समझनी पडती है । मुक्ति के लिए कोई ज्यादा मेहनत नहीं है । नश्वर का सदुपयोग और शाश्वत में प्रीति, ये दो ही छोटे-से काम हैं ।

★ मिनिस्टर होना, प्राइम मिनिस्टर होना आप सब के बस की बात नहीं और फिर ये बडे-बडे काम का नतीजा बिल्कुल छोटा है । जबकि उपयुक्र्त छोटे काम का नतीजा एकदम बडा है । विद्यासागर ने उस ब्राह्मण को थाम लिया : क्या बात है ? तुम्हारी आँखों से आँसू गिरते हैं ? बताओ ।

★ दुःखी ब्राह्मण : ‘‘अरे मजदूर ! तू कया मेरा दुःख दूर करेगा ? विद्यासागर विनती करने लगे : ‘‘फिर भी भैया ! बताओ न ! मेरी जिज्ञासा है ।
‘‘मैंने लडकी की शादी में देखा-देखी ज्यादा खर्च कर दिया क्योंकि जाति में ऐसा रिवाज है । खर्च के लिए कर्जा लिया । जिससे कर्जा लिया उस महाजन ने मेरे पर दावा कर दिया । हमारी सात पीिढयों में, पूरे खानदान में हम कभी कोर्ट-कचहरी नहीं गये । अब मैं ऐसा बेटा पैदा हुआ कि मेरे बाप, दादा, नाना आदि का नाक कट जायेगा । मैं कोर्ट में जाकर खडा रहूँगा वह कैसा लगेगा ? कितनी शर्मनाक घटना होगी वह ?

★ ऐसा कहकर वह सिसक-सिसककर रोने लगा ।
‘‘अच्छा, महाजन का नाम क्या है ? विद्यासागर ने पूछा ।
‘‘आप नाम जानकर क्या करोगे ? मेरा दुःख, मेरा भाग्य, मैं फोडूँगा, आप अपने काम में लगो ।
ब्राह्मण मुलाकात निपटाना चाह रहा था । ‘‘कृपा करके बताओ तो सही ।
विद्यासागर ऐसा नहीं कह रहे हैं कि, ‘मैं कर्जा चुकाऊँगा, मैं ठीक कर दूँगा, मैं विद्यासागर हूँ ।

★ विद्यासागर ने आजीजी करके महाजन का नाम और कोर्ट के मुकदमे की तारीख पूछ ली । जिस दिन ब्राह्मण कोर्ट जाने को था उससे पहले ही उसे घर बैठे ही पता लग गया कि उसका केस खारिज हो गया है । क्यों ? क्योंकि महाजन को रूपये मिल गये । किसने दिये ? कोई पता नहीं । आखिर उसने पता लगाया कि परदुःखकातर, परदुःखभंजन विद्यासागर मुझे सडक पर मिले थे । उन्होंने पैसे भर दिये और मुझे दुःख से मुक्त किया । उस ब्राह्मण को चित्त में अगाध शांति और सुख मिला मगर उस वक्त मिला जब उसे कर्जमुक्ति का पता चला । जबकि विद्यासागर को उससे कई गुनी शांति और आनंद उसी वक्त मिला जब उन्होंने उस ब्राह्मण का हित किया ।

++⚫++⚫++⚫++⚫++⚫++⚫++⚫++⚫++⚫++⚫++⚫++

★ एक दिन विद्यासागर किसी स्टेशन पर उतरे । उन्हें शहर में जाना था । इतने में वहाँ का एक डॉक्टर ‘ऐ मजदूर… ऐ मजदूर… करते हुये मजदूर के लिए चिल्ला रहा था । अब छोटे-से स्टेशन पर मजदूर कहाँ ? विद्यासागर धीरे से, गंभीर चाल से आ रहे थे । उनके कपडे सीधे-सादे थे ।
डॉक्टर ने उन्हें बडे जोरों से डाँटा : ‘‘क्या तुम मजदूर लोग बडे आलसी हो गये हो ? इधर आओ, उठाओ… यह बेग उठाओ ।
विद्यासागर सिर पर बैग उठाकर पैदल चलकर उसके घर पहुँचे ।

★ वह अकडू डॉक्टर घर में जाकर पैसे ले आया और इन्हें देने लगा :
‘‘कितनी मजदूरी हुई ? डॉक्टर ने पूछा । इतने में डॉक्टर के बडे भाई ने खिडकी से देखा कि विद्यासागर आज हमारे प्रांगण में खडे हैं ! वह तो झटपट बाहर आकर आदरपूर्वक पैर छूने लगा ।
तब डॉक्टर को पता चला कि जिनका नाम सुना था… विद्यासागरजी, वे ही हैं ये । अरे !

★ इतने में करुणापूर्ण हृदय से विद्यासागर बोले : ‘‘मैं मजदूरी यही चाहता हूँ कि मेरे भारतवासी अहंकाररहित हों, स्वावलंबी हों । अपना काम आप ही करें और कत्तृत्व का अभिमान न रखें । यह मजदूरी मुझे दे दो ।
डॉक्टर तो फूट-फूटकर रोने लगा : ‘‘मैंने आप जैसे को नहीं पहचाना और अपमान किया ।
डॉक्टर ने उनके इस कृत के लिए विद्यासागरजी से माफी मांगी भविष्य में अहंकाररहित व स्वावलंबी होने का प्रण लिया|

श्रोत – ऋषि प्रसाद मासिक पत्रिका (Sant Shri Asaram Bapu ji Ashram)
मुफ्त हिंदी PDF डाउनलोड करें – Free Hindi PDF Download