पूज्य बापू जी का संदेश

ऋषि प्रसाद सेवा करने वाले कर्मयोगियों के नाम पूज्य बापू जी का संदेशधन्या माता पिता धन्यो गोत्रं धन्यं कुलोद्भवः। धन्या च वसुधा देवि यत्र स्याद् गुरुभक्तता।।हे पार्वती ! जिसके अंदर गुरुभक्ति हो उसकी माता धन्य है, उसका पिता धन्य है, उसका वंश धन्य है, उसके वंश में जन्म लेने वाले धन्य हैं, समग्र धरती माता धन्य है।""ऋषि प्रसाद एवं ऋषि दर्शन की सेवा गुरुसेवा, समाजसेवा, राष्ट्रसेवा, संस्कृति सेवा, विश्वसेवा, अपनी और अपने कुल की भी सेवा है।"पूज्य बापू जी

यह अपने-आपमें बड़ी भारी सेवा है

जो गुरु की सेवा करता है वह वास्तव में अपनी ही सेवा करता है। ऋषि प्रसाद की सेवा ने भाग्य बदल दिया

पूज्य आसाराम बापू जी से आध्यात्मिक प्रश्नोत्तरी | Pujya Asaram Bapu Ji

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पूज्य आसाराम बापू जी से आध्यात्मिक प्रश्नोत्तरी | Pujya Asaram Bapu Ji

Spiritual Questions and Their Answers -Pujya Asaram Bapu Ji

प्र०- ईश्वर को कैसे पाया जाय ?

उ०-  हरेक साधक की अपनी-अपनी क्षमता होती है । सबकी अपनी-अपनी योग्यता होती है । उसके कुल का, संप्रदाय का जो भी मंत्र इत्यादि हो उसका जप-तप करता रहे, ठीक है । साथ ही साथ किसी ज्ञानवान महापुरुष का सत्संग सुनता रहे । बुद्ध पुरुष के सत्संग के द्वारा साधक का अधिकार बढता जायेगा । साधक की योग्यता देखकर यदि ज्ञानवान मार्ग बताएं तो उस मार्ग पर चलने से साधक जल्दी अपने लक्ष्य तक पहुँच जाता है ।
प्रथम भक्ति संतन कर संगा ।
दूसर रति मम कथा प्रसंगा ।।

प्र०- आत्मा और परमात्मा का मिलन कैसे होता है ?

उ०- सच पूछो तो आत्मा परमात्मा ये एक ही चीज के दो नाम हैं । जैसे घटाकाश और महाकाश । घडे में आया हुआ आकाश और महाकाश दोनों एक हैं । घडे का आकाश महाकाश से कैसे मिले ? घडे के आकाश को पता चल जाय कि मैं ही महाकाश हूँ तो वह महाकाश से मिल गया । तरंग को पता चल जाय कि मैं जल हूँ तो वह जल से मिल गया । आत्मा को पता चल जाय कि मैं आत्मा हूँ… परमात्मा से अभिन्न हूँ तो वह परमात्मा से मिला हुआ ही है ।

प्र०- स्वामीजी ! आत्मा को दुःख, शोक स्पर्श नहीं कर सकते । हम देह नहीं, आत्मा हैं । फिर भी हमको दुःख तो होता है ?

उ०- हाँ, यह कइयों की समस्या है । लोग मेरे पास आते हैं और बोलते हैं : ‘बापू ! फलाना आदमी ऐसा-ऐसा बोलता है… यह सुनकर मेरी आत्मा जलती है ।
आत्मा कभी जलती नहीं । यह तो मनुभाई (मन) को शोक होता है । हर्ष-शोक मन को होता है । राग-द्वेष मति के धर्म हैं । भूख-प्यास प्राणों को लगती है । प्राण चलते हैं इसलिए भूख-प्यास लगती है । काला-गोरा होना यह चमडी का धर्म है । मोटा और पतला होना यह देह का धर्म है । तुम अपने को देह मान लेते हो कि मैं मोटा हुआ, मैं गोरा हुआ ।

जो कुछ होता है वह इन्द्रियों में, मन में, बुद्धि में, देह में होता है । आत्मा इन सबसे अलग है । मन में अच्छा भाव आया और गया, शरीर और अंतःकरण द्वारा अच्छा कार्य हुआ, बुरा कार्य हुआ । इन सबको जो देखनेवाला है वह आत्मा है । सूक्ष्म दृष्टि से इसका अनुभव किया जाता है । अनुभव करनेवाला फिर अलग नहीं रहता, वही हो जाता है ।
सो जाने जासू देहू जनाहीं ।
जानत तुम ही तुम ही हो जाई ।।

प्र०- भगवान श्रीकृष्ण स्वधाम-गमन के समय अपने प्यारे भक्त उद्धव को साथ क्यों न ले गये और बद्रिकाश्रम क्यों भेज दिया ?

उ०- उद्धव ने देखा कि अब सोने की द्वारिका के साथ पूरा यदुवंश याने भगवान का पूरा परिवार उनकी आँखों के सामने खत्म हो रहा है फिर भी श्रीकृष्ण को कोई शोक नहीं, कोई आसक्ति नहीं । क्योंकि वे आत्मा में निष्ठ हैं, तत्त्व में खडे हैं । वे प्रपंच को सत्य नहीं मानते । सब प्रपंच मिथ्या है ।
यह मिथ्या प्रपंच का विसर्जन हो रहा था । उद्धव ने देखा कि भगवान अपनी माया समेट रहे हैं । अब वे स्वधाम जाने की तैयारी में हैं । उन्होंने कहा : प्रभु ! दया करो । मुझे साथ में ले जाओ ।
श्रीकृष्ण ने कहा : उद्धव ! साथ में कोई आया नहीं और साथ में कोई जायेगा नहीं ।
यदिदं मनसा वाचा चक्षुभ्यां श्रवणादिभिः ।mybapuji-Pujya-Asaram-Bapu-Ji
नश्वरं गुह्यमाणं च विद्धि माया मनोमयम् ।।

मन से, वाणी से, आँख से, कान से जो कुछ अनुभव में आता है वह सब नश्वर है, मनोमय है, माया-मात्र है । हे उद्धव ! मैं तुझे तत्त्वज्ञान सुनाता हूँ । वह सुनकर तू बद्रिकाश्रम चला जा, एकान्त में बैठ जा । ‘मैं आत्मा हूँ तो कैसा हूँ यह खोज । ‘मैं कौन हूँ… ? मैं कौन हूँ ? यह अपने आपको गहराई से पूछ ।
बच्चा ‘यह क्या है…? वह क्या है…? यह कौन है…? ऐसा पूछता है लेकिन ‘मैं कौन हूँ…? ऐसा संसार के किसी बच्चे ने नहीं पूछा । वह आत्मज्ञान का खजाना बन्द का बन्द रह गया ।
अब तुम अपने आपसे पूछो : ‘मैं कौन हूँ ? खाओ, पियो, चलो, घूमो । फिर पूछो : ‘मैं कौन हूँ ?
‘मैं रमणलाल हूँ ।

यह तो तुम्हारे देह का नाम है । तुम कौन हो ? अपने को पूछा करो । जितना गहरा पूछोगे उतना दिव्य अनुभव होने लगेगा । एकान्त में, शान्त वातावरण में बैठकर ऐसा पूछो… ऐसा पूछो कि कि बस ! पूछना ही हो जाओ । एक दिन, दो दिन, दस दिन में यह काम नहीं होगा । खूब अभ्यास करोगे तब ‘मैं कौन हूँ ? यह प्रगट होने लगेगा और मन की चंचलता मिटने लगेगी । बुद्धि के विकार नष्ट होने लगेंगे । शरीर का तूफान शांत होने लगेगा । यदि ईमानदारी से साधना करने लगो न, तो छः महीने में वहाँ पहुँच जाओगे । जहाँ छः साल से चला हुआ व्यक्ति भी नहीं पहुँच पाता है । छः साल बैलगाडी चले और छः घण्टे हवाई जहाज उडे तो कौन आगे पहुँचेगा ?
तत्त्वज्ञान हवाई जहाज की यात्रा है ।

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं :
‘‘हे उद्धव ! तू बद्रिका आश्रम चला जा । कोई किसीका नहीं है, कोई किसी के साथ आया नहीं, कोई किसी के साथ जायेगा नहीं । तू बोलता है कि मैं तुम्हारे साथ चलूँ लेकिन तुम मेरे साथ आये नहीं, न मैं तुम्हारे साथ आया हूँ । सब अकेले-अकेले जायेंगे । मुझसे तू तत्त्वज्ञान सुन ले । फिर मुझसे तू ऐसा मिलेगा कि बिछडने का दुर्भाग्य ही नहीं आयेगा ।

ऐसे तो श्रीकृष्ण उद्धव के सिर पर हाथ रख देते । फुर्र्…! ‘तू मुक्त हो गया !‘ नहीं । श्रीकृष्ण ने तत्त्वज्ञान का उपदेश दिया है उसका बराबर अनुभव कर । पशु होते हैं न ? वे पहले घास ऐसे ही खाते हैं । फिर बैठे-बैठे जुगाली करते हैं । ऐसे ही तुम भी कथा-सत्संग सुन लो; फिर एकान्त में जाकर उसका चिन्तन-मनन करो ।
जितनी देर सुनते हो उससे दस गुना मनन करना चाहिए । मनन से दस गुना निदिध्यासन करना चाहिए । हम भी डीसा में अपने आपमें डूबे रहते थे । पूज्यपाद गुरुदेव के आशीर्वाद के बाद तुरन्त निकल पडते समाज में हुश… हो… हुश… हो…! तो काम नहीं बनता । सुनो और एकान्त में बैठकर जमाओ ।

प्र०- कलयिुग में परमात्म-प्राप्ति शीघ्र कैसे होती है ।
कहते हैं कि सत्युग में वर्षों के पुण्यों से परमात्मप्राप्ति होती थी । द्वापर में यज्ञ से होती थी, ध्यान से होती थी । ‘दानंकेवलं कलियुगे ।अथवा ‘कलियुग केवल नाम अधारा । जपत नर उतरे सिन्धु पारा ।

उ०- शास्त्र का कोई एक हिस्सा लेकर निर्णय नहीं लेना चाहिये । शास्त्र के तत्मत से वाकिफ होना चाहिये । यह भी शास्त्र ही कहता है कि :
राम भगत जग चारि प्रकारा सुकृतिनो चारउ अनघ उदारा ।
चहुँ चतुरन कर नाम आधारा ज्ञानी प्रभुह विशेष पियारा ।।
राम के, परमात्मा के भक्त चार प्रकार के हैं । चारों भगवन्नाम का आधार लेते हैं, श्रेष्ठ हैं; लेकिन ज्ञानी तो प्रभु को सब से विशेष प्यारा है ।
गीता कहती है :

न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते ।
दूसरे युगों में जप से, यज्ञ से होता था तो श्रीकृष्ण ने अर्जुन को तत्त्वज्ञान का उपदेश क्यों दिया ? उद्धव को तत्त्वज्ञान क्यों दिया ?
जन-साधारण के लिये जप अपनी जगह पर ठीक है, हवन अपनी जगह पर ठीक है । लेकिन जिनके पास समझ है, बुद्धि है वे अपनी-अपनी योग्यता के अनुसार साधन करके पार हो जाते हैं । जनक अष्टावक्र के तत्त्वज्ञान सुनकर पार हो गये ।
वह भी जमाना था कि लोग १२-१२ वर्ष, १५-१५ वर्ष, २५-२५ वर्ष जप तप करते थे तब कहीं उनकी सिद्धि होती थी । लेकिन कलियुग में सिद्धि जल्दी हो जाती है ।

एक आदमी को पेट में कुछ दर्द हुआ । वह सेठ था बडा । वह वैद्य के पास दवा लेने गया । वैद्य ने देखा कि यह अमीर आदमी है । इसको सस्ती दवा काम में आयेगी नहीं । बोले :
‘‘ठहरो जरा ! दवा घोटनी है, सुवर्णभस्म डालनी है, बंगभस्म डालनी है, थोडा समय लगेगा । बिढया दवा बना देता हूँ ।
काफी समय उसको रोका बाद में दवा दी । उसने खायी और वह ठीक हो गया । वैद्य ने पूछा :
‘‘अब कैसा है ?
‘‘अच्छा है… आराम हो गया । कितने पैसे ?
‘‘केवल ११०० रुपये ।
सेठ ने दे दिये । वैसे का वैसा रोग एक गरीब को हुआ और उसी वैद्य के पास आया । बोला : ‘‘पेट दुखता है ।
वैद्य ने देखकर कहा : ‘‘कोई चिन्ता की बात नहीं । यह ले लो पुिडया । एक दोपहर को खाना, एक शाम को खाना । ठीक हो जायेगा ।
‘‘कितने पैसे ?
‘‘पाँच पैसे दे दो ।
उसने दे दिये । दो पुिडया खाकर वह ठीक हो गया ।

मर्ज वही का वही । वैद्य भी वही का वही । लेकिन एक से ११०० रुपये लिये और समय भी ज्यादा लगाया, दूसरे से पाँच पैसे लिये और तुरन्त दवा दे दी । ऐसे ही वैद्यों का वैद्य परमात्मा वही का वही है । हमारे अज्ञान का मर्ज भी वही का वही है । पहले के जमाने में लोगों के पास इतना समय था, इतने शुद्ध घी-दूध थे, इतनी शक्तियाँ थी तो लम्बा-लम्बा उपचार करने के बाद हमारा दर्द मिटता था । अभी ? वह दयालु भगवान है कि आ जाओ भाई । ले जाओ जल्दी-जल्दी ।

अष्टावक्र बोलते हैं कि ‘श्रवण मात्रेण । सुनते-सुनते भी आत्मज्ञान हो सकता है । पहले कितना तप करने के बाद बुद्धि शुद्ध, स्थिर होती थी वह अब सुनते-सुनते हो सकती है । ऐसा नहीं है कि केवल उस समय सतयुग था, अभी नहीं है । सत्त्वगुण में तुम्हारी वृत्ति है तो सतयुग है । रजो मिश्रित सत्त्वगुण में वृत्ति है तो द्वापर है । तमो मिश्रित रजोगुण में वृत्ति है तो त्रेतायुग है और तमोगुण में वृत्ति है तो कलियुग है ।

सतयुग में भी कलियुग के आदमी थे । राम थे तब भी रावण था । कृष्ण थे तब भी कंस था । अच्छे युगों में सब अच्छे आदमी ही थे ऐसी बात नहीं है । बूरे युग में सब बुरे आदमी हैं ऐसी बात भी नहीं । अतः दैवी संपदा के जो सद्गुण हैं- निर्भयता, सत्त्वसंशुद्धि, ज्ञान में स्थिति, स्वाध्याय, शौच, आर्जव, क्षमा आदि छब्बीस लक्षण अपने जीवन में लायें और आत्मवेत्ता महापुरुषों का संग करें तो कलियुग में शीघ्र परमात्म-प्राप्ति हो जायेगी । दैवी संपदा के सद्गुण अपने जीवन में लानेवाला आदमी धन-ऐश्वर्य में आगे बढना चाहे तो बढ सकता है, यश-समाथ्र्य में चमकना चाहे तो भी चमक सकता है और भगवत्प्राप्ति करना चाहे तो भी कर सकता है ।

श्रोत – ऋषि प्रसाद मासिक पत्रिका (Sant Shri Asaram Bapu ji Ashram)

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2017-08-04T14:53:41+00:00 By |Adhyatma Vigyan|0 Comments

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