तालमखाना का सामान्य परिचय : Talmakhana in Hindi

यह एक क्षुप जाति की वनस्पति है जो जमीन पर फैलती है। इसके पत्ते लम्बे होते हैं, फूल नीले रङ्ग के होते हैं, डालियाँ कांटेदार होती हैं तथा इसका फल गोल और कटीला होता है । इसके बीजों को तालमखाना कहते हैं ।

विविध भाषाओं में नाम :

संस्कृत-कोकिलाक्ष, इक्षुरक, इक्षुगन्धा, कोकिलनयन, इक्षुबालिका, शुक्ल पुरुप, इत्यादि । हिन्दी-तालमखाना, कुलियाकंटा । बङ्गाल-कुलियाखाड़ा, कुलेकांटा, कंटकलिका । गुजराती–एखरो, तालमखानू । मराठी-बिखरा, कोलमुन्दा, तालमखाना । उर्दु-तालिम खाना । लेटिन-Asteracantha Longifolia [ एस्टेरेकेथालांगिफोलिया ], Hygrophila Spinosa [ हायग्रोफिला स्पिनोसा ] ।

तालमखाना के औषधीय गुण और प्रभाव : Talmakhana ke Gun in Hindi

आयुर्वेद मत-

✥ आयुर्वेद के मत से इसके पत्ते मीठे, कड़वे और स्वादिष्ट होते हैं।
✥ ये स्निग्ध, पौष्टिक, कामोद्दीपक, निद्रा लाने वाले तथा अतिसार, प्यास, पथरी, मूत्र सम्बन्धी रोग, प्रदाह, नेत्रविकार, शूल, जलोदर, उदर रोग, कब्जियत और मूत्रावरोध में लाभदायक हैं।
✥ इसके बीज शीतल, स्वादिष्ट, कसेले और कड़वे होते हैं ।
✥ ये वीर्यवर्धक, भारी, बलकारक, ग्राही, गर्भस्थापक, कफ वातकारक तथा मल स्तम्भक और रुधिर विकार, दाह तथा पित्त को हरने वाले होते हैं।
✥ इसकी जड़े उत्कृष्ट शीतल, वेदनानाशक, बलकारक और मूत्रल होती हैं।
✥ इसके बीज स्निग्ध, कुछ मूत्रल और कामेन्द्रिय को उत्तेजना देने वाले होते हैं ।
✥ इसके पंचाङ्ग की राख मूत्रल होती है ।
✥ इसकी जड़ का काढ़ा सुजाक और बस्तीशोथ रोग में दिया जाता है ।
✥ इसके देने से सुजाक की जलन कम होती है और पेशाब का प्रमाण बढ़कर के रोग धुल जाता है ।
✥ यकृतोदर में इसकी जड़ का काथ और पंचाङ्ग की राख दी जाती है ।

यूनानी मत –

• यूनानी मत से इसके पत्ते खाँसी, प्रमेह, कटिवात और जोड़ों के दर्द में उपयोगी होते हैं।
• इसके बीज स्वादहीन, चवर्द्धक, कामोद्दीपक और पौष्टिक होते हैं।
• ये खून को सुधारते हैं । सुजाक और अनैच्छिक वीर्यस्राव में भी ये लाभदायक हैं ।

रासायनिक विश्लेषण –

इसके बीजों के अन्दर चिकना पदार्थ २३ प्रतिशत और एक प्रकार का स्थायी पीला तेल तथा मांसल पदार्थ ३१ प्रतिशत रहते हैं।

सेवन की मात्रा :

इसकी राख की मात्रा १ माशे से ३ माशे तक और बीजों के चूर्ण की मात्रा ३० रत्ती से ६० रत्ती तक की होती है ।

तालमखाना के फायदे व औषधीय उपयोग :

१) तालमखाना और जलोदर-
अनुभवों से मालूम हुआ है कि इस औषधि में मूत्ररेचक गुण बहुत प्रभावशाली रूप में रहता है। इसलिये इसकी जड़ का काढ़ा बनाकर देने से जलोदर के रोग में आश्चर्यजनक लाभ होता है । “जङ्गलनी जड़ी बूटी” के लेखक लिखते हैं कि एक रोगी को ६ दिन तक प्रति दो-दो घण्टे के अन्तर से इसका क्वाथ बनाकर दिया गया। इसका परिणाम यह हुआ कि पहले जहाँ हर चौबीस घण्टे में उसको ४० से ८० तोले तक पेशाब उतरता था उसकी जगह इस औषधि को देने के पश्चात् हर चौबीस घण्टे में ४५० तोला पेशाब उतरने लगा
और इस प्रकार उसके पेट के अन्दरका संचित सब जल निकल कर रोगी रोगमुक्त हो गया । इस क्वाथ को इस प्रकार बनाया जाता है :-

तालमखाने की २ ½ तोला जड़ लेकर उसको कूटकर ५० तोले पानी के साथ औटाना चाहिये । जब ३६ तोला पानी रह जाय तब उसे उतार कर छान लेना चाहिये । फिर हर दो-दो घण्टे में इस क्वाथ को २ ½ से ४ तोले तक की मात्रा में पिलाना चाहिये ।

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• कोमान के मतानुसार यह एक उत्तम पदार्थ है । इसकी जड़ का काढ़ा एक शौस की मात्रा में जलोदर और पुरानी ब्राइट्सडीसिज में मूत्रल वस्तु की बतौर दिया गया और उसका प्रभाव सन्तोषजनक रहा ।
• मद्रास के डाक्टर फिटस पैट्रिक और डाक्टर गिब्सन का कथन है कि अशक्त, रक्तहीन और कष्टसाध्य जलोदर के रोगियों के ऊपर इस वनस्पति के क्वाथ का प्रयोग करके उत्तम सफलता प्राप्त की गई है। दूसरी मूत्रल औषधियों के साथ में इसकी जड़ को मिलाकर देने से एक सप्ताह के अन्दर ही पेशाब की मात्रा तीन-चार गुनी बढ़ जाती है जिससे जलोदर और चमड़ी की सूजन दूर होकर रोगी को आराम हो जाता है ।
• एन्सली के मतानुसार इसके पंचाङ्ग की राख करके उस राख को कपड़े में छानकर बोतल में भरकर रखना चाहिये और जलोदर वगैरा रोगों में जब इसकी ताजी जड़े न मिल सकें तब राख को एक चम्मच भर लेकर १० तोले पानी में डालकर अच्छी तरह हिला देना चाहिये । इस पानी को ढाई २ तोले की मात्रा में दो-दो घण्टे के अन्तर से देने पर जलोदर में बहुत लाभ होता है ।
• डाक्टर नाडकरनी का कथन है कि इसकी जड़ शीतल, कट, पौष्टिक और स्निग्ध होती है । इसकी जड़ को एक औंस की मात्रा में ५० तोले पानी के साथ १० मिनट औंटाकर नीचे उतार कर छान लेना चाहिये । यह क्वाथ जलोदर, मत्र मार्ग और जननेन्द्रिय के रोगों में लाभदायक है । इसके पत्ते और बीज भी स्निग्ध और मूत्रल होते हैं। और वे भी सूजन के साथ वाले जलोदर में लाभदायक होते हैं।

२) गठिया –
कर्नल चोपरा के मतानुसार औषधि प्रयोग में इसकी जड़े और इसके पत्ते ज्यादा काम में आते हैं। इसकी जड़ का काढ़ा यकृत सम्बन्धी विकारों में लाभदायक है । जननेन्द्रिय और मूत्राशय के विकारों में भी यह लाभदायक है। इसकी जड़ का काढ़ा अपने मूत्रल गुण की वजह से जलोदर, गठिया और मूत्र सम्बन्धी विकारों में लाभ बतलाता है ।

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३) कुष्ठ रोग –
वाग्भट के मतानुसार तालमखाने के पौधे का रस निकाल कर पीने से और पत्तों का शाग खाते रहने से वातरक्त नामक कुष्ठ रोग दूर होता है ।

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४) प्रसव कष्ट –
बङ्गसेन का मत है कि इसकी जड़ और शक्कर को समान भाग लेकर मुँह में चबाने से जो रस पैदा होता है उस रस को प्रसव कष्ट से पीड़ित हुई स्त्री के कान में डालने से उसको तत्काल प्रसव हो जाता है ।

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५) अनिद्रा –
हारीत का कथन है कि इसकी जड़ों को उबाल कर पीने से बहुत दिनों की उचटी हुई निद्रा फिर गहरे रूप में आने लगती है ।

६) पथरी –
चरक का मत है कि गोखरू, तालमखाना और एरण्डी की जड़ को दूध में घिसकर पीने से मूत्रकृच्छु, मूत्राघात और पथरी रोग दूर होते हैं ।

७) बल वीर्य वर्धक चूर्ण –
ताल मखाने के बीज, कोंच के बीज, गोखरू, बलवीज, कालीमुसली. शतावरी, सालमपंजा, चोबचीनी, बादाम, चिरोंजी, पिस्ता, खसखस, इलायची, केशर, लौंग, जायफल, जावित्री, तज, गिलोय का सत्व । इन सब औषधियों को समान भाग लेकर चूर्ण कर लेना चाहिये । इस चूर्ण को आधे तोले की मात्रा में दिन में दो बार घी और शक्कर के साथ चाटकर ऊपर से गाय का धारोष्ण दूध पी लेना चाहिये । यह चूर्ण अत्यन्त बल वीर्य शक्तिवर्धक, बाजीकरण और नपुंसकता को दूर करने वाला है।

इसके अतिरिक्त और भी सब प्रकार के कामशक्तिवर्धक चूर्णों , अवलेहों और पाकों में भी तालमखाना एक प्रधान द्रव्य की तरह डाला जाता है । जिसका वर्णन चिकित्सा ग्रन्थों में देखना चाहिये ।

तालमखाना के नुकसान : Talmakhana ke Nuksan

अत्यधिक मात्रा में इसका सेवन मंदाग्नि जैसी समस्या उत्पन्न कर सकता है |