क्यों शिवजी को प्रिय हैं बेल पत्र ? Kyon Shivji Ko Priya hai Bela Patra

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क्यों शिवजी को प्रिय हैं बेल पत्र ? Kyon Shivji Ko Priya hai Bela Patra

क्या हैं बेल पत्र अथवा बिल्व-पत्र ? : bel patra kya hai

बिल्व-पत्र बेल के पेड़ की पत्तियां हैं, जिसके हर पत्ते लगभग तीन-तीन के समूह में मिलते हैं। कुछ पत्तियां चार या पांच के समूह की भी होती हैं। किन्तु चार या पांच के समूह वाली पत्तियां बड़ी दुर्लभ होती हैं। बेल के पेड को बिल्व भी कहते हैं।

बिल्व के पेड़ का विशेष धार्मिक महत्व हैं। शास्त्रोक्त मान्यता हैं कि बेल के पेड़ को पानी या गंगाजल से सींचने से समस्त तीर्थो का फल प्राप्त होता हैं एवं भक्त को शिवलोक की प्राप्ति होती हैं।

बेल कि पत्तियों में औषधि गुण भी होते हैं। जिसके उचित औषधीय प्रयोग से कई रोग दूर हो जाते हैं। भारतीय संस्कृति में बेल के वृक्ष का धार्मिक महत्व हैं, क्योकि बिल्व का वृक्ष भगवान शिव का ही रूप है। धार्मिक ऐसी मान्यता हैं कि बिल्व-वृक्ष के मूल अर्थात उसकी जड़ में शिवलिंग स्वरूपी भगवान शिव का वास होता हैं। इसी कारण से बिल्व के मूल में भगवान शिव का पूजन किया जाता हैं।

शिव जी ने बताया बिल्व वृक्ष और पत्र का महत्व : Shivji ne bataya bel patra ka mahatva

नारद जी ने एक बार भोलेनाथ की स्तुति कर पूछा – प्रभु आपको प्रसन्न करने के लिए सबसे उत्तम और सुलभ साधन क्या है. हे त्रिलोकीनाथ आप तो निर्विकार और निष्काम हैं, आप सहज ही प्रसन्न हो जाते हैं. फिर भी मेरी जानने की इच्छा है कि आपको क्या प्रिय है ?

शिवजी बोले- नारदजी वैसे तो मुझे भक्त के भाव सबसे प्रिय हैं, फिर भी आपने पूछा है तो बताता हूं. मुझे जल के साथ-साथ बिल्वपत्र बहुत प्रिय है. जो अखंड बिल्वपत्र मुझे श्रद्धा से अर्पित करते हैं मैं उन्हें अपने लोक में स्थान देता हूं.

नारद जी भगवान शंकर औऱ माता पार्वती की वंदना कर अपने लोक को चले गए. उनके जाने के पश्चात पार्वती जी ने शिव जी से पूछा- हे प्रभु मेरी यह जानने की बड़ी उत्कट इच्छा हो रही है कि आपको बेलपत्र इतने प्रिय क्यों है. कृपा करके मेरी जिज्ञासा शांत करें.

शिव जी बोले- हे शिवे ! बिल्व के पत्ते मेरी जटा के समान हैं. उसका त्रिपत्र यानी तीन पत्ते, ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद हैं. शाखाएं समस्त शास्त्र का स्वरूप हैं. विल्ववृक्ष को आप पृथ्वी का कल्पवृक्ष समझें जो ब्रह्मा-विष्णु-शिव स्वरूप है. स्वयं महालक्ष्मी ने शैल पर्वत पर विल्ववृक्ष रूप में जन्म लिया था.

यह सुनकर पार्वती जी कौतूहल में पड़ गईं. उन्होंने पूछा- देवी लक्ष्मी ने आखिर विल्ववृक्ष का रूप क्यों लिया ? आप यह कथा विस्तार से कहें. भोलेनाथ ने देवी पार्वती को कथा सुनानी शुरू की.

विल्ववृक्ष उत्पत्ति की रोचक पौराणिक कथा : bilv vriksh utpatti ki katha

पार्वती जी कौतूहल में पड़ गईं. उन्होंने पूछा- देवी लक्ष्मी ने आखिर विल्ववृक्ष का रूप क्यों लिया ? आप यह कथा विस्तार से कहें. भोलेनाथ ने देवी पार्वती को कथा सुनानी शुरू की.

हे देवी, सत्ययुग में ज्योतिरूप में मेरे अंश का रामेश्वर लिंग था. ब्रह्मा आदि देवों ने उसका विधिवत पूजन-अर्चन किया था. फलतः मेरे अनुग्रह से वाग्देवी सबकी प्रिया हो गईं. वह भगवान विष्णु को सतत प्रिय हो गईं.

मेरे प्रभाव से भगवान केशव के मन में वाग्देवी के लिए जितनी प्रीति हुई वह स्वयं लक्ष्मी को नहीं भाई. अतः लक्ष्मी देवी चिंतित और रूष्ट होकर परम उत्तम bel patra todne ka mantrश्री शैल पर्वत पर चली गईं.

वहां उन्होंने मेरे लिंग विग्रह की उग्र तपस्या प्रारम्भ कर दी. हे परमेश्वरी कुछ समय बाद महालक्ष्मी जी ने मेरे लिंग विग्रह से थोड़ा उर्ध्व में एक वृक्ष का रूप धारण कर लिया और अपने पत्र पुष्प द्वारा निरंतर मेरा पूजन करने लगी.

इस तरह उन्होंने कोटि वर्ष ( एक करोड़ वर्ष) तक आराधना की. अंततः उन्हें मेरा अनुग्रह प्राप्त हुआ. महालक्ष्मी ने मांगा कि श्री हरि के हृदय में मेरे प्रभाव से वाग्देवी के लिए जो स्नेह हुआ है वह समाप्त हो जाए.

शिवजी बोले- मैंने महालक्ष्मी को समझाया कि श्री हरि के हृदय में आपके अतिरिक्त किसी और के लिए कोई प्रेम नहीं है. वाग्देवी के प्रति तो उनकी श्रद्धा है. यह सुनकर लक्ष्मी जी प्रसन्न हो गईं और पुनः श्री विष्णु के ह्रदय में स्थित होकर निरंतर उनके साथ विहार करने लगी.

हे पार्वती ! महालक्ष्मी के हृदय का एक बड़ा विकार इस प्रकार दूर हुआ था. इस कारन हरिप्रिया उसी वृक्षरूपं में सर्वदा अतिशय भक्ति से भरकर यत्न पूर्वक मेरी पूजा करने लगी. बिल्व इस कारण मुझे बहुत प्रिय है और मैं विल्ववृक्ष का आश्रय लेकर रहता हूं.

विल्ववृक्ष को सदा सर्व तीर्थमय एवं सर्व देवमय मानना चाहिए. इसमें तनिक भी संदेह नहीं है. विल्वपत्र, विल्वफूल, विल्ववृक्ष अथवा विल्व काष्ठ के चन्दन से जो मेरा पूजन करता है वह भक्त मेरा प्रिय है. विल्ववृक्ष को शिव के समान ही समझो. वह मेरा शरीर है.

जो विल्व पर चंदन से मेरा नाम अंकित करके मुझे अर्पण करता है मैं उसे सभी पापों से मुक्त करके अपने लोक में स्थान देता हूं. उस व्यक्ति को स्वयं लक्ष्मी जी भी नमस्कार करती हैं. जो विल्वमूल में प्राण छोड़ता है। उसको रूद्र देह प्राप्त होता है.
(योगिनीतंत्रम् ग्रंथ से)

अन्नदान सहस्रेषु सहस्रोप नयनं तधा
अनेक जन्मपापानि एकबिल्वं शिवार्पणं

बिल्वस्तोत्रमिदं पुण्यं यः पठेश्शिव सन्निधौ
शिवलोकमवाप्नोति एकबिल्वं शिवार्पणम्।।

बेल के पेड़ को सींचने का मंत्र : bel ke ped par pani dalne ka mantra

मूल सींचने का मंत्र –

बिल्वमूले महादेवं लिंगरूपिणमव्ययम् ।
य: पूजयति पुण्यात्मा स शिवं प्राप्नुयाद् ॥
बिल्वमूले जलैर्यस्तु मूर्धानमभिषिञ्चति ।
स सर्वतीर्थस्नात: स्यात्स एव भुवि पावन:॥

भावार्थ: बिल्व के मूल में लिंगरूपी अविनाशी महादेव का पूजन जो पुण्यात्मा व्यक्ति करता है, उसका कल्याण होता है। जो व्यक्ति शिवजी के ऊपर बिल्वमूल में जल चढ़ाता है उसे सब तीर्थो में स्नान का फल मिल जाता है।

बिल्व पत्र तोड़ने का मंत्र : bel patra todne ka mantra

बिल्व-पत्र को सोच-समझ कर ही तोड़ना चाहिए।
बेल के पत्ते तोड़ने से पहले निम्न मंत्र का उच्चरण करना चाहिए-

अमृतोद्भव श्रीवृक्ष महादेवप्रियःसदा।
गृह्यामि तव पत्राणि शिवपूजार्थमादरात्॥

भावार्थ: अमृत से उत्पन्न सौंदर्य व ऐश्वर्यपूर्ण वृक्ष महादेव को हमेशा प्रिय है।
भगवान शिव की पूजा के लिए हे वृक्ष में तुम्हारे पत्र तोड़ता हूं।

कब न तोड़ें बिल्व कि पत्तियां ? : bel patra kis din nahi todna chahiye

•  विशेष दिन या विशेष पर्वो के अवसर पर बिल्व के पेड़ से पत्तियां तोड़ना निषेध हैं।
•  शास्त्रों के अनुसार बेल कि पत्तियां इन दिनों में नहीं तोड़ना चाहिए-
• बेल कि पत्तियां सोमवार के दिन नहीं तोड़ना चाहिए।
•  बेल कि पत्तियां चतुर्थी, अष्टमी, नवमी, चतुर्दशी और अमावस्या की तिथियों को नहीं तोड़ना चाहिए।
•  बेल कि पत्तियां संक्रांति के दिन नहीं तोड़ना चाहिए।

अमारिक्तासु संक्रान्त्यामष्टम्यामिन्दुवासरे ।
बिल्वपत्रं न च छिन्द्याच्छिन्द्याच्चेन्नरकं व्रजेत ॥

भावार्थ: अमावस्या, संक्रान्ति के समय, चतुर्थी, अष्टमी, नवमी और चतुर्दशी तिथियों तथा सोमवार के दिन बिल्व-पत्र तोड़ना वर्जित है।

चढ़ाया गया पत्र भी पुनः चढ़ा सकते हैं ?

शास्त्रों में विशेष दिनों पर बिल्व-पत्र तोडकर चढ़ाने से मना किया गया हैं तो यह भी कहा गया है कि इन दिनों में चढ़ाया गया बिल्व-पत्र धोकर पुन: चढ़ा सकते हैं।

अर्पितान्यपि बिल्वानि प्रक्षाल्यापि पुन: पुन:।
शंकरायार्पणीयानि न नवानि यदि चित्॥
भावार्थ: अगर भगवान शिव को अर्पित करने के लिए नूतन बिल्व-पत्र न हो तो चढ़ाए गए पत्तों को बार-बार धोकर चढ़ा सकते हैं।

बेल पत्र चढाने का मंत्र : bel patra chadane ka mantra

भगवान शंकर को विल्वपत्र अर्पित करने से मनुष्य कि सर्वकार्य व मनोकामना सिद्ध होती हैं।
श्रावण में विल्व पत्र अर्पित करने का विशेष महत्व शास्त्रो में बताया गया हैं।

विल्व पत्र अर्पित करते समय इस मंत्र का उच्चारण करना चाहिए-

त्रिदलं त्रिगुणाकारं त्रिनेत्रं च त्रिधायुतम् |
त्रिजन्मपापसंहार, विल्वपत्रं शिवार्पणम् ||

भावार्थ: तीन गुण, तीन नेत्र, त्रिशूल धारण करने वाले और तीन जन्मों के पाप को संहार करने वाले हे शिवजी आपको त्रिदल बिल्व पत्र अर्पित करता हूं।

2018-06-20T15:04:09+00:00 By |Adhyatma Vigyan|0 Comments