सिव चतुरानन जाहि डेराहीं (प्रेरक हिंदी कहानी) Moral Stories in Hindi

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सिव चतुरानन जाहि डेराहीं (प्रेरक हिंदी कहानी) Moral Stories in Hindi

बोध कथा : Hindi Storie With Moral

हनुमानगढ़ीके नागा बालाजी मेरे परिचित थे। अब तो वे समाधि ले लिये; परंतु उनकी एक आप-बीती कहानी मुझे बार बार याद आया करती है। उन्होंने एक दिन मेरी कुटीपर पधारकर यह विचित्र कथा सुनायी थी।
बालाजी अनाथ थे। पाँच सालकी आयुमें एक बाबाजीके साथ लग गये। जब बारह सालके हुए, तब बाबाजीने उनको हनुमानगढ़ी के किले में एक सिपाही बनाकर ढील दिया। चौबीस सालतक अखण्ड ब्रह्मचर्य साधकर और तत्कालीन महन्तकी गुरुदक्षिणा प्राप्तकर नागाजी देशाटनको निकले; क्योंकि देशाटनके बिना ज्ञान अनुभवके पदपर नहीं पहुँचता, वह पुस्तकीय ज्ञान रह जाता है।
घूमते-घामते वे नर्मदा-किनारे जा पहुँचे। वहाँ मिला एक योगी। उससे मित्रता हो गयी। दोनोंने एक साथ रहकर देशपर्यटन करनेकी ठानी।
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जिला छत्तीसगढ़के एक गाँवमें वे दोनों जा पहुँचे। गाँवके बाहर शिवजीके मन्दिरपर डेरा डाला। ग्रामवासी नर-नारी, बालक आदि आकर दर्शन और सत्संग करने लगे। आजकल कोई योगी द्वारपर ठहर जाता है तो मूर्ख गृहस्थ उससे बहस करने पर आमादा हो जाता है। ज्ञान सीखना नहीं चाहता, वह अपना ज्ञान सिखाना चाहता है कि जो कुछ भी नहीं है।
रातको जब एकान्त हुआ तब दोनों मित्रों में बातचीत छिड़ी।
योगी-आप मायासे अभीतक बचे हुए हैं?
नागा-माया ससुरी है क्या चीज जो बचना पड़ेगा? स्वरूपरूपी हिमालयके सामने एक चींटी!
योगी-आपने स्वरूपको साक्षात्कार कर लिया? आप अपना सहजरूप पा गये? क्या आपने सनातन पुरुषको प्राप्त कर लिया?
नागा –निश्चय।
योगी–आपको माया कभी परास्त नहीं कर सकती ?
नागा-सपनेमें भी नहीं। रातमें भी मैं रामपंचायतनकी पंचायतमें सोता हूँ, जहाँ बजरंगीका अटल पहरा है।
योगी-माया कहते किसे हैं?
नागा-कामिनी, कांचन और कीर्ति–इन तीन नदियोंकी त्रिवेणीको माया कहते हैं।
योगी–आप पक्के गुरुके चेले मालूम पड़ते हैं।
नागा-पक्के गुरुके होंगे आप, हम तो सच्चे गुरुके चेले हैं, जिन्होंने प्रत्येक तत्त्वके सारे बखिये खोलकर रख दिये।
योगी-आप कौन हैं?
नागा-जीव था, अब ईश्वर हो गया हूँ।
योगी-कैसे?
नागा-ईश्वरने अपने महलकी एक खिड़की मुझमें खोल दी है। अब वही वह है, मैं जो था सो खिड़की खुलते ही न मालूम कहाँ चला गया। ठीक अब समझा, वाह गुरुदेव! कैसी मार्केकी बात बतलायी। बतलायी नहीं, दिखलायी!
योगी–क्या बतलायी?
नागा-गुरुजीने बेतारके-तारसे इसी समय यह कहा था कि खिड़की खुलनेसे मन चला गया मायामें। मायाके मनभरका एक माशा मन तेरा मन बना घूमता था सो वह मायामें खिंच गया। डोरी लगी थी, खिंच गया पतंग-सा!
योगी–वाह, वाह-वाह! आज पक्के योगीके दर्शन हुए। धन्य भाग ! आप छार-छार ईश्वर हो गये और मायाकी अब आपको कोई परवा नहीं।
नागा-अजी, माया है कहाँ जो परवा होती! मुर्दा है माया ! इधर से मत देखो, जरा उधर से तो देखो। बेचारी चींटी चींटी चढ़ी पहाड़पर नौ मन तेल लगाय। हाथी पकड़ बगलमें दाबे लिये ऊँट लटकाय॥ कबीर साहेबके इस रहस्यवादी दोहेका अर्थ अब खुला !
योगी-परंतु नागाजी महाराज! जरा ध्यान दीजिये कि रामायण क्या कहती है इस विषयमें।
नागा-किस विषयमें?
योगी-मायाके विषयमें।
नागा-क्या कहती है?
योगी-सिव चतुरानन जाहि डेराहीं। अपर जीव केहि लेखे माहीं॥
नागा—यह तुलसीकी विमूढ़ता है। हम परमहंस लोग विधिहरि-हर- तीनों देवोंसे ऊपरके लोकमें विचरण करते हैं। हमारे सामने माया बदमाशी करे तो तुरंत हम उसकी नाक काट डालें।
योगी–वाह गुरु! मैं माया देवी से करबद्ध अनुरोध कर रहा हूँ कि वह अपनी शक्तिका कुछ नमूना हमारे इन परमहंसजी को अवश्य दिखलानेकी कृपा करें।
प्रातः एक बूढ़ा आदमी, जो चन्दन लगाये था, दो लड़कोंके साथ वहाँ आया और दण्डवत् कर नम्रताके साथ दोपहरीका निमन्त्रण दे गया। योगियोंका धर्म है कि वे निमन्त्रण स्वीकार कर गृहस्थोंके गृह पवित्र किया करें। | दोपहरीमें दो लड़के आये, दोनों योगियोंको घर लिवा ले गये। पक्का सामान बनाया गया था। खूब आनन्दसे भोजन कराया गया। फिर ऊपरके हवादार कमरेमें दोनों महात्माओंको विश्राम करनेके लिये कहा गया। थोड़ी देर बाद एक लड़का आया और योगीजीको नीचे मकान-मालिकके कमरेमें लिवा ले गया। थोड़ी देरमें बालाजी सो गये।
मालिक–आइये महाराज ! बैठिये, आपसे एक प्रार्थना है।
योगी–कहिये भगतजी !
मालिक–आपके साथ जो दूसरे योगी हैं, उनका और आपका साथ कबसे है?
योगी–कोई एक माससे। मालिक-उससे पहले वे कहाँ थे?
योगी–हनुमानगढ़ी में रहते थे।
मालिक–अच्छा, तो वे अपने सम्बन्धमें और कुछ कहते थे? विवाहका हाल बतलाते थे?
योगी–विवाह! अरे राम-राम! उनका विवाह ?
मालिक-विवाह क्यों नहीं ?
योगी–वे अखण्ड योगी हैं। आप कहते हैं-विवाह!
मालिक-ऐसी-तैसी उनकी और तुम्हारी। ‘तुम चुपके-से चले जाओ।’ नहीं तो मारे जूतोंके सारी श्रृंखला बिगाड़ दूंगा।
योगी-आखिर मामला क्या है?
मालिक –तुम्हारे साथ जो है, वह मेरा दामाद है। बारह सालका था, उसे कोई बाबा बहका ले गया था। गाँवके मदरसे में पढ़ता था। नाम था बालाजी। तुम्हारे साथीका क्या नाम है?
योगी-(मन-ही-मन मायाको प्रणामकर) ठीक है, नाम तो बालाजी ही बतलाता था।
बूढे का एक दामाद था जरूर नाम भी उसका बालाजी ही था। एक नामके सैकड़ों होते हैं। उसे कोई बाबा ले भी गया था।
मालिक-तुम अच्छे लड़के दिखलायी देते हो। फिर तुम्हारा अपराध भी कुछ नहीं बल्कि तुमने यह अहसान किया कि उसे इधर ले आये। कल जो गाँवकी स्त्रियाँ मन्दिर पर गयीं तो सखियोंके साथ मेरी लड़की विमला भी चली गयी थी। लड़की जो लौटकर आयी तो बेतरह रोने लगी। जब उसकी माताने बहुत दम-दिलासा दिया तब उसकी हिचकी रुकी। उसने कहा कि मेरे पति ही योगीरूपमें मन्दिरपर एक संन्यासीके साथ ठहरे हैं। बारह साल हो गये तो क्या हुआ, कोई स्त्री अपने पतिको भूल थोड़े ही सकती है।
योगी–नहीं भूल सकती। भूलका क्या काम?
मालिक-बेटा रमेश!
रमेश–जी!
मालिक-इधर आओ। देखो बेटा रमेश ! इन संन्यासीजीके चरण-स्पर्श करो। यही तुम्हारे जीजाजीको लाये।
रमेशने योगीको प्रणाम किया, योगीने माया को प्रणाम किया।
मालिक-जीजाजी क्या करते हैं?

रमेश–सोते हैं।
मालिक-तुम देख आये हो!
रमेश–जी हाँ।
मालिक-गुदगुदे गद्देपर मसहरी काहेको देखी होगी! अच्छा जाओ, धीरेसे किवाड़ बंद करना और ताला लगा देना और हाँ विमलाको जरा यहाँ भेजते जाना।।
रमेश गया। विमला आयी।
मालिक-बेटी विमला! तुम्हारी समझसे तुमने ठीक-ठीक पहचाना है न कि ऊपर जो योगी सो रहा है वही तुम्हारा पति है? विमला चुपचाप रोने लगी।
मालिक–कहिये महात्मन् ! वह रोती क्यों, यदि वही न होता !
योगी–वही है।
मालिक–आपकी आत्मा आईना हो गयी है। आप भी समझते हैं कि वही है।
योगी– वही है! वही है! मातेश्वरी माया वही है!
मालिक-नाम भी वही, रूप भी वही।
योगी–नाम भी वही, रूप भी वही। वही तो बेटा जुआ-चोर। कहता था कि मैं ईश्वर हूँ और माया कुछ नहीं। अब नथ गये बच्चे नथकी नकबेसर में।
मालिक-आप ही बतायें कि मेरा क्या कर्तव्य है ?
योगी–मैंने तो प्रार्थना ही की थी इस कर्तव्यके लिये।
मालिक—तो आप इसी समय यहाँसे चले जायँ। उससे हम निबट लेंगे। अपना और उसका खून एक कर दूंगा, नहीं तो मेरा नाम विश्वनाथ महाराज नहीं। मेरी एकमात्र कन्याको कलंकित करता है बेईमान।
योगी–अच्छा चलता हूँ। जय सीताराम।
मालिक–जय श्रीराम। अब आप कहाँ जायँगे?
योगी-अपने आश्रमपर लौट जाऊँगा। दुनिया देख ली है।
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बालाजीकी जो आँख खुली तो शाम हो गयी। किवाड़ खोले तो बाहर था ताला। इधर-उधर देखा तो कोई नहीं! आवाज दी, कुछ नहीं। योगीको देखा, कहीं पता नहीं। बालाजीको बड़ा क्रोध हुआ। क्या मैं नजरबंद कर दिया गया ! ईश्वरको भी नजरबंद!
ताबड़तोड़ जो दस-पन्द्रह लाते किवाड़ोंपर जमायीं तो एक आला-बालाने आकर ताला खोल दिया और कहा–’कहिये स्वामीजी ! क्या आज्ञा है?’
बाला—बाहरसे साँकल क्यों लगायी थी? ताला भी था, इसका पता नहीं था?
युवती–जिससे कोई लड़का या बिल्ली आपकी निद्रा भंग न करे।
बालाजीकी गरमी शान्त हो गयी। अपने ईश्वरत्वमें जो शंका पैदा हो गयी थी, वह दूर हो गयी।
बाला–दूसरा योगी कहाँ गया?
विमला-अपनी कुटीपर चले गये।
बाला–मेरे लिये क्या कह गये?
विमला-कह गये कि आप तबतक यहीं रहें जबतक मैं पुन: न लौट आऊँ!
बाला-कब आयेगा?
विमला-सात दिनके अंदर।
बाला–चला क्यों गया? बिना कहे चला गया!
विमला—कोई चीज लाने गये हैं।
बाला-मैं सात दिन एक जगह नहीं रह सकता।
विमला-क्यों?
बाला—बहता पानी, रमता जोगी, इनको कौन सके बिलमाय?
विमला-आप योगी थे तो मुझसे विवाह क्यों किये थे?
बाला-किसने विवाह किया?
विमला-आपने।
बाला—किसके साथ?
विमला–मेरे साथ।
बाला—तुम भूलती हो।
विमला—वही नाम, वही रूप।
बाला-फिर भी मैं वह नहीं।
विमला—वही! वही! निश्चित वही!!
बाला –कैसे जाना?
विमला—वही नाम, वही रूप और वही मसा।
बाला-मसा क्या चीज?
विमला—नाकके नीचे जो छोटा-सा मसा है, वह भी था।
बाला-फिर भी मैं वह नहीं।
विमला-वाणी वही, रंग वही।
बाला–फिर भी नहीं। तुम भ्रममें हो।
हाथमें भरे बंदूक लिये मालिक ऊपर आ गये।
मालिक–देखो बालाजी ! तुम दोनोंकी सारी बातें मुझे जीनेमें
खड़े होकर सुननी पड़ीं। वैसे पिताको लड़की-दामादकी बात नहीं सुननी चाहिये; परंतु लाचारी थी। यदि अब तुम अपना जोगपन छाँटोगे तो अच्छा न होगा।
बाला—क्या होगा?
मालिक–इस बंदूकमें पाँच गोलियाँ हैं। दोसे तुम दोनोंको मारूंगा, दोसे हम दोनों मरेंगे, एक फिर भी बच रहेगी। मेरे दोनों लडके घरमें राज करेंगे। क्या समझे ?
बालाजीने देखा कि मामला बेढब है। दब गये! अवसर पाकर किसी दिन निकल भागेंगे यह मनमें स्थिर किया।
मालिक-क्या कहते हो?
बाला-आपकी आज्ञा स्वीकार है।
मालिक—यह मत समझना कि भाग जाओगे। तुम्हारे ऊपर छः सालतक कड़ा पहरा रहेगा। । दोनों पति-पत्नीकी तरह रहने लगे। तीन साल डटे रहे। जब एक लड़का पैदा हो गया, पहरा कुछ ढीला पड़ गया। एक रात निकल भागे। आखिर योगी थे, योगी नहीं चाहता राज्य भी। तब आकर उन्होंने अपना यह लंकाकाण्ड सुनाया।
मैंने पूछा–बालाजी ! अब मायाके प्रति क्या विचार है?
बालाने कहा-‘वह जगदम्बा है। माताकी इज्जत और परवा करना अपना धर्म है। वहाँ रहकर ईश्वर नहीं बना जा सकता। रामायणमें ठीक ही लिखा है।’