आत्मसंतुष्ट का सामर्थ (बोध कथा) | Hindi Moral Story

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आत्मसंतुष्ट का सामर्थ (बोध कथा) | Hindi Moral Story

शिक्षाप्रद कहानी : Prerak Hindi Kahani

★ राजा चक्ववेण गुरु के ज्ञान में संतुष्ट रहते थे, बुराईरहित संसार की सेवा में रत और संयम से रहते थे । वे ऐश-आराम नहीं करते थे, प्रजा का पैसा प्रजा के हित में लगाते, यथायोग्य प्रजा की भलाई, प्रजा की सेवा करते और अपने लिए कुछ नहीं चाहते थे । तो इससे अपनी सेवा हो गयी । ईश्वर को प्रीति करते थे तो ईश्वर की सेवा हो गयी । थोडी अपनी जमीन थी, उसमें खेती कर उसीसे गुजारा करते थे । उनकी रानी भी सादे कपडे पहनती थी । चक्ववेण राजा होते हुए भी सतत संतुष्ट योगी हो गये । संतुष्टः सततं योगी…

★ एक दिन नगर में कोई उत्सव हुआ । कुछ बडे घर की महिलाएँ चक्ववेण की पत्नी से मिलने गयीं । उन महिलाओं ने कीमती रेशमी वस्त्र एवं रत्नजिडत सोने के आभूषण पहने थे । उन्होंने देखा कि चक्ववेण की पत्नी खद्दर (हाथ से काता हुआ कपडा) की सादी साडी में है । घर भी सादा-सूदा, खटिया भी सादी-सूदी, चाँदी का पलंग भी नहीं !

★ चक्ववेण की पत्नी व घर देखकर वे बोलीं : ‘‘तुम राजा चक्ववेण की रानी और तुम्हारे पास कोई गहना-गाँठा नहीं, हीरे-जवाहरात नहीं… ! कैसी तुम्हारी जिन्दगी है ! चक्ववेण की पत्नी बोली : ‘‘हम राजकोश से पैसा नहीं लेते । हमारा खेत है । मेरे पति खेत जोतते हैं, हक का खाते हैं और राज्य भी करते हैं । समाज से कुछ लेते नहीं, जो कुछ हमारे पास है, उससे सेवा करते हैं । हमें तो शांति है, संतोष है, आनंद है ।

★ ‘‘अरे ! काहे का आनंद-आनंद ? तुम तो महारानी हो और चक्ववेण राजा का इतना यश है ! तुम्हारे से अच्छे कपडे तो हमारी नौकरानियाँ पहनती हैं । – ऐसा करके चक्ववेण की रानी के अंदर विपरीत संस्कार डालकर वे चली गयीं।

★ अब चक्ववेण की पत्नी रूठ के बैठ गयी ।
राजा चक्ववेण शाम को आये तो बोले : ‘‘रानी ! आज तुम खुश नहीं हो । क्यों उदास हो ? वैसे तो रोज फूल खिला हुआ होता है तुम्हारे दिल का, आज मुरझाया कैसे ? रानी : ‘‘आप तो हैं साधु बाबा जैसे । मैं रानी होकर भी ऐसे कपडे पहनती हूँ और मेरे पास कोई गहना भी नहीं है । मैं कैसी रानी ? इससे तो नौकरानी अधिक सुखी होती है ।

★ राजा : ‘‘तो क्या चाहिए तुमको ? Raja Chakven ki prerak hindi kahani
‘‘जैसी दूसरी महिलाएँ थीं…
‘‘अरे ! दूसरी महिलाओं को तो सुविधाएँ थीं, सुख था, संतोष नहीं था । तुमको अंतरात्मा का संतोष है, मेरे को भी है । हम अपने कर्म को कर्मयोग बनाते हैं ।
‘‘आप क्या अंतरात्मा का संतोष-संतोष कहते रहते हो ? बाहर का भी कुछ चाहिए न ? यह तो मैंने आज सेठानियों को देखा तो मेरे मन में हुआ कि मेरे को गहने-गाँठे, हीरे-जवाहरात हों तो मैं भी सुखी रहूँ ।
‘‘अरे ! भोली है तू । बाहर की चीजों से सुखी होना यह अहंकार का सुख है । अंतरात्मा का सुख होना यह कर्मयोग का, भक्तियोग का सुख है ।

★ ‘‘यह सब ठीक है । आपका उपदेश तो मेरे को बहुत मिल गया पर अब मेरे को भी थोडा ऐसे रहना है ।
चक्ववेण ने देखा, ‘हलके संग से इसकी बुद्धि हलकी हो गयी है । अब क्या करें ? राजकोश से प्रजा का पैसा लेकर, प्रजा का कर लेकर अपनी रानी के गहने-गाँठों में लगाना – यह तो प्रजा के कर की चोरी होगी, यह सेवा नहीं होगी । ‘ कितने श्रेष्ठ राजा थे !

★ फिर राजा चक्ववेण ने सोचकर अपने ईमानदार मंत्री से कहा : ‘‘जाओ, रावण को बोलो कि राजा चक्ववेण का हुक्म है – एक मन सोना उधारी नहीं, दया-धर्म में नहीं, कर के रूप में दो । हमारा कर लगता है क्योंकि तुम हमारे राज्य पर से उड के जाते हो ।

★ चक्ववेण का राज्य छोटा था और लंकेश का बडा था । मंत्री रावण के पास गया और बोला : ‘‘तुम्हारे पर एक मन सोने का कर डाला है राजा चक्ववेण ने । तो रावण बहुत हँसा कि ‘‘चक्ववेण राजा इतना छोटा और मेरे पर कर डालता है ! ऐसे पागल राजा हैं धरती पर ! हा हा हा हा हा… ! वह राजा तो ऐसा ही है लेकिन मंत्री तुम्हारे को भी अक्ल नहीं है कि मैं कौन हूँ ?

★ ‘‘मुझे पता है तुम लंकेश हो, रावण हो । नौ ग्रह बाँधे हैं तुमने किंतु हमारे जो राजा चक्ववेण हैं न, वे आत्मसंतोष को पाये परम सिद्ध पुरुष हैं ।
‘‘मंत्री ! वह राजा तो पागल है, तुम भी पागल हो । चले जाओ बाहर । मंत्री चला गया तथा समुद्र के किनारे थोडी मिट्टी लेकर लंका की प्रतिकृति बनायी एवं पीला-पीला सुवर्णमय घास रगडकर उस पर छिडक दिया । दूसरे दिन सुबह मंत्री ने जाकर रावण से कहा : ‘‘देखो, तुमको अपनी लंका तबाह करनी है या रखनी है ?
‘‘हैं ! क्या बोलता है ?
‘‘मैंने लंका की प्रतिकृति बनायी है समुद्र के किनारे । चक्ववेण की दुहाई देकर उधर लंका की प्रतिकृति को गिराऊँगा तो यह गिर जायेगी ।
‘‘ऐसा कैसे हो सकता है ?
‘‘तुम चलकर देखो ।

★ रावण गया । मंत्री ने कहा : ‘‘देखो, यह है लंका की प्रतिकृति । यह लंका का मुख्य द्वार है, यह लंका का दूसरा द्वार है, यह आपका राजमहल है, यह परकोटा है । यह सब मैंने रात भर में बनाया है ।
अब देखो, जो अपने-आपमें संतुष्ट रहते हैं एवं समाज की सेवा करते हैं तथा बदले में ईश्वर से, समाज से कुछ नहीं चाहते हैं, आहा ! बुराईरहित चक्ववेण ! यथायोग्य भलाई करते हैं और भलाई का फायदा चाहते नहीं – ऐसे राजा के नाम की दुहाई से यह लंका का द्वार मैं यहाँ ढहाता हूँ तो वह भी ढह जायेगा । और वह द्वार ढह गया । ‘‘अभी यहाँ एक-एक करके मैं गिराता हूँ तो पूरी लंका तहस-नहस हो जायेगी ।

★ लंकेश घबराया कि राजा चक्ववेण के नाम की दुहाई में इतनी ताकत है ! यह मंत्री पूरी प्रतिकृति को गिरा देगा तो हमारी लंका गिर जायेगी । रावण बोला : ‘‘जितना सोना चाहिए कर में ले जा । किसीको बोलना नहीं कि रावण घबरा गया है । मेरी लंका को नहीं ढहाना । मंत्री एक मन सोना लेकर आया तथा पत्नीसहित चक्ववेण जहाँ बैठे थे, वहाँ सोना दिया ।

★ चक्ववेण बोले : ‘‘लंकेश ने कैसे दिया ?
‘ऐसे-ऐसे…’ सब बात मंत्री ने बतायी तो चक्ववेण की पत्नी की आँख खुली कि ‘जो आत्मज्ञान में रहते हैं, चिन्मयस्वरूप में रहते हैं, निष्पाप रहते हैं – ऐसे मेरे पति के नाम की दुहाई से मंत्री लंका ढहा सकता है । ऐसा आत्मा का बल है । ऐसे पति का सान्निध्य और सच्चा ज्ञान छोडकर मेरे को बाहर से आयी हुई ऐश-आराम और गहने-गाँठों की गुलाम विलासिनी स्त्रियों का कुसंग लग गया । हाय ! मैं तो गंगा-स्नान करूँगी । ‘
कुसंग लगा कि ‘ऐसा शृंगार होना, ऐसी लाली होना, ऐसा टिपटॉप होना…’ ऐसों के पेट में तो भूख है और पीठ पर हलुआ बँधा है । हृदय में तो अशांति है और बाहर बडा मकान है, बडा फर्नीचर है… कैसा जीवन है !

(बापूजी के सत्संग प्रवचन से)

श्रोत – ऋषि प्रसाद मासिक पत्रिका (Sant Shri Asaram Bapu ji Ashram)
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