पूज्य बापू जी का संदेश

ऋषि प्रसाद सेवा करने वाले कर्मयोगियों के नाम पूज्य बापू जी का संदेशधन्या माता पिता धन्यो गोत्रं धन्यं कुलोद्भवः। धन्या च वसुधा देवि यत्र स्याद् गुरुभक्तता।।हे पार्वती ! जिसके अंदर गुरुभक्ति हो उसकी माता धन्य है, उसका पिता धन्य है, उसका वंश धन्य है, उसके वंश में जन्म लेने वाले धन्य हैं, समग्र धरती माता धन्य है।""ऋषि प्रसाद एवं ऋषि दर्शन की सेवा गुरुसेवा, समाजसेवा, राष्ट्रसेवा, संस्कृति सेवा, विश्वसेवा, अपनी और अपने कुल की भी सेवा है।"पूज्य बापू जी

यह अपने-आपमें बड़ी भारी सेवा है

जो गुरु की सेवा करता है वह वास्तव में अपनी ही सेवा करता है। ऋषि प्रसाद की सेवा ने भाग्य बदल दिया

वास्तु के अनुसार पूजा घर कहाँ और कैसे होना चाहिये | Vastu Tips For Puja Ghar

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वास्तु के अनुसार पूजा घर कहाँ और कैसे होना चाहिये | Vastu Tips For Puja Ghar

घर में बनाना हो पूजा का स्थान(Puja Ghar), तो रखें इन बातों का ध्यान |vastu shastra for pooja room in hindi

प्रश्न: घर में पूजन कक्ष(Puja Ghar) किधर होना चाहिए?
उत्तर: पूजन कक्ष हमेशा पूर्व, या घर के ईशान्य में होना चाहिए।

प्रश्न: पूजा करते समय व्यक्ति पूर्व या ईशान्य दिशा में बैठे, अथवा उसका मुंह पूर्व या ईशान की तरफ होना चाहिए, इस बारे में बड़ी भ्रांति है।
उत्तर: सूर्य प्रकृति की अनंत शक्ति से परिपूर्ण प्रत्यक्ष देवता है। जिधर सूर्य हो, उधर हमारा मुंह पूजा करते समय होना चाहिए। आप देखते हैं कि हम सूर्य नमस्कार एवं सूर्य को अर्घ्य सूर्य के सामने खडे़े हो कर करते और देते हैं। अतः पूजा करते समय हमारा मुंह पूर्व या ईशान में ही हो, इसका विशेष ध्यान रखना चाहिए।

प्रश्न: कुछ लोग कहते हैं कि गुरु या भगवान की मूर्तियां पूर्व तथा ईशान में मुंह किये हुए होनी चाहिएं।
उत्तर: यदि गुरु या भगवान की मूर्ति का मुंह पूर्व की ओर होगा, तो उसकी स्थिति पश्चिम में होगी। साधक का मुंह स्वतः ही पश्चिम की ओर हो जाएगा। यदि भगवान की मूर्ति का मुंह ईशान में है, तो साधक का मुह नैर्ऋत्य में होगा। दोनों ही स्थितियां गलत होगी।

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प्रश्न: हम मूर्ति पूजा में विश्वास नहीं रखते तथा ईश्वर को सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान एवं सर्वत्र मानते हैं। ऐसी स्थिति में भी क्या प्रार्थना कक्ष पूर्व, या ईशान में होना चाहिए?
उत्तर: मूर्ति पूजा को आप माने, या न माने, यह आपके व्यक्तिगत विश्वास एवं श्रद्धा का विषय है। ईश्वरीय शक्तियां आपके मानने, या नहीं मानने से प्रभावित नहीं होतीं। सूर्य को आप माने, या न माने, वह हर प्राणी को स्वच्छंद प्रकाश और ऊर्जा देता है। पर उसकी रहस्य से भरी अनंत शक्तियों को जानना जरूरी है। इस जानकारी से आपकी योग्यता और ज्ञान बढ़ते हैं। सूर्य को कोई फर्क नहीं पड़ता है।
फिर सामान्य शिष्टाचार का नियम भी यही है कि हम किसी भी व्यक्ति का स्वागत, अभिवादन उसके सामने से करते हैं। सूर्य को हम सूर्य भगवान न भी माने, तो उसकी अनंत ऊर्जा और किरणों के दर्शन हमें पूर्व एवं अधिकतम ऊर्जा का दर्शन ईशान से ही होगा। अतः पूजा घर, या प्रार्थना कक्ष पूर्व अथवा ईशान में बनाना ही वैज्ञानिक पक्ष को स्वीकार करता है।

हमारे पूर्वज सत्यखोजी ऋषि बहुत बड़े वैज्ञानिक थे। ऋषि शब्द का अर्थ है ‘‘ऋषियो रिसर्च कर्तार’’। जो निरंतर सत्य एवं ज्ञान की खोज में शोध (रिसर्च) करते रहे, वे ही तो ऋषि कहलाये। ऋषि कभी गलत नहीं होते एवं शास्त्र कभी निष्फल नहीं होते। यह बात हमें वास्तु शास्त्र को पढ़ने के पहले खुले दिल और दिमाग से स्वीकार कर लेनी चाहिए। नास्तिकता मनुष्य का नकारात्मक गुण है; कृतघ्नता है। जो है उसको स्वीकार न करना नास्तिकता है। नास्तिकता से आज दिन तक किसी का भला नहीं हुआ। मनुष्य को गुरु ,ईश्वरीय शक्ति और देवत्व के प्रति सकारात्मक होना चाहिए एवं सदैव कृतज्ञता का भाव रखना चाहिए। तभी मानवीय सद्गुणों में वृद्धि होगी।

प्रश्न: अधिकतर पूजा घर रसोई में होते हैं। क्या यह सही है?
उत्तर: जिनके भी पूजा घर रसोई में हैं, वे सभी दुःखी एवं संतप्त हैं। उनके पूर्वज एवं भगवान दोनों ही उनसे नाराज रहते हैं, |

प्रश्न: घर के पूर्वजों की तस्वीरें कहां होनी चाहिएं?
उत्तर:

1. घर में मृतात्मा पूर्वजों के चित्र सदैव नैर्ऋत्य कोण, या पश्चिम दिशा में लगाने चाहिएं।
2. घर का भारी सामान, अनुपयोगी वस्तुएं नैर्ऋत्य कोण में रखनी चाहिएं।
3. मृतात्मा का चित्र पूजन कक्ष में देवता के साथ लगाने से बचें। पूर्वज हमारे आदर और श्रद्धा के प्रतीक हैं। वे हमारे इष्ट देवता का स्थान नहीं ले सकते।

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प्रश्न: कई लोग ईशान में बड़ा चबूतरा बना कर पूजा स्थल बनाते हैं। क्या यह सही है?
उत्तर: ईशान में बड़ा चबूतरा बना कर भार डालना गलत होगा। हां, पूजा स्थल सामान्य से ऊंचाई ;त्ंपेमक.चसंजमवितउद्ध पर होना चाहिए।

प्रश्न: क्या पूर्व या ईशान की दीवार में प्रकोष्ठ (आला) बना कर पूजा स्थल बनाया जा सकता है?
उत्तर: अवश्य। पर इस प्रकोष्ठ के ऊपर अन्य वस्तुएं, पछीत, या दूसरा आला (प्रकोष्ठ) नहीं होने चाहिएं।

प्रश्न: हमारी लोहे की अलमारी पूर्व दिशा में रखी है। क्या उसके ऊपरी खंड में पूजा स्थल स्थापित हो सकता है?
उत्तर: हां! पर यह चलायमान चंचल पूजा होगी। पूजन कक्ष स्थिर और स्थाई होना चाहिए तथा पूजा समय के अतिरिक्त, उसे हिलाना या छेड़ना गलत होगा।

प्रश्न: क्या घर का पूजन कक्ष स्वतंत्र होना चाहिए?
उत्तर: मनुष्य को यदि आध्यात्मिक शक्ति से परिपूर्ण एवं तेजस्वी होना है, तो उसका पूजन कक्ष स्वतंत्र होना चाहिए। जब हम बच्चों के लिए कमरा, बड़े-बड़े शौचालय एवं स्नानागार, मनोरंजन एवं खाने के लिए हॉल बनाते हैं, तो क्या ईश्वर के लिए, स्वयं की उन्नति हेतु एक छोटा सा प्रार्थना कक्ष, भगवान के निमित्त अलग से नहीं बना सकते? यह हमारी संकीर्ण मनोवृत्ति को ही दर्शाता है, पूजा कक्ष स्वतंत्र न बना सकें, तो पूर्व में मंडप जरूर बनाना चाहिए।

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2017-06-20T10:38:17+00:00 By |Vastu|0 Comments

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