ऑटिज्म के लक्षण, कारण और उपचार

ऑटिज्म क्या है ? (What is Autism in Hindi)

इंसान अपनी संवेदनाओं के माध्यम से ही आसपास की दुनिया की खोजबीन करता है, उसके बारे में सीखता है। इन संवेदनाओं में स्पर्श, गति, शरीर के प्रति सचेतता, दृष्टि, ध्वनि और गुरुत्वाकर्षण का खिंचाव शामिल है। दिमाग में इन संवेदनाओं को व्यवस्थित करके ही सम्पूर्ण व्यक्तित्व का विकास होता है। ये विभिन्न संवेदी तन्त्र हमारे दिमाग को सूचनाएँ भेजते हैं। दिमाग में इन सूचनाओं पर प्रक्रिया होती है और दिमाग शरीर के विभिन्न अंगों को क्रिया करने के आदेश देता है। मगर ऑटिज्म से पीड़ित बच्चे में संवेदी तन्त्र अल्प सक्रिय या अधिक सक्रिय प्रतिक्रिया दे सकता है। अर्थात् ऐसे बच्चों में संवेदनाओं का यह तन्त्र ठीक से काम नहीं करता।

ऑटिज्म के लक्षण (Autism ke Lakshan in Hindi)

बच्‍चों में ऑटिज्म के क्या लक्षण होते हैं ?

ऑटिज्म से पीड़ित बच्चे में निम्लीखित लक्षण पाए जा सकते है –

  1. ऑटिज्म से पीड़ित बच्चे अकेला रहना चाहता है, उसे खिलौनों से भी लगाव नहीं होता।
  2. अन्य लोगों की उपस्थिति का उसे भान नहीं होता, अपने आस-पास की चहल-पहल में उसे कोई दिलचस्पी नहीं होती।
  3. बोलना देर से सीखता है या बोलना ही नहीं चाहता। अपने आप से ही बात करना उसे अच्छा लगता है अर्थात् आत्मोन्मुखी होता है।
  4. बातचीत की पहल करने में घबड़ाता है।
  5. अपना नाम पुकारने पर भी उत्तर नहीं देता या बहरों की तरह व्यवहार करता है।
  6. बिना किसी ठोस कारण के दुश्चिन्ता का शिकार हो जाता है।
  7. शारीरिक सम्पर्क, यहाँ तक कि माता-पिता का सम्पर्क भी उसे अच्छा नहीं लगता। प्यार किए जाने पर या गोद में लिए जाने पर जोरों से रोने लगता है। अतिसक्रिय प्रतिक्रिया वाले बच्चों को थोड़ा-सा छु लेने से भी दर्द का एहसास होता है।
  8. अल्पसक्रिय प्रतिक्रिया वाले बच्चों को जोर से चोट लगने पर भी दर्द का एहसास नहीं होता।
  9. माता-पिता को भी ऐसे बच्चे नहीं पहचानते।
  10. आँख से आँख मिलाकर बात करना उसे अच्छा नहीं लगता।
  11. ऑटिज्म वस्तुतः स्नायु तन्त्र विकास का जटिल विकार है जो दिमाग के सामान्य कार्यों को भी प्रभावित करता है। यह बच्चों की संवाद की क्षमता, अपने आस-पास के वातावरण के प्रति प्रतिक्रिया की क्षमता और सामाजिक सम्बन्धों को प्रभावित करता है। ऐसा बच्चा वही व्यवहार बार-बार दुहराता है, अतः अभ्यास कराए जाने पर वह कम्प्यूटर गेम खेलेगा, जिगसॉ पजिल का समाधान ढूँढ लेगा, पर स्वयं को अभिव्यक्त नहीं कर पाएगा। अगर प्यास है, तो पानी के जग की तरफ इशारा करेगा, भूखा है तो खाना नहीं माँगेगा।

ऑटिज्म से पीड़ित बच्चा अचानक अतिसक्रिय हो जाता है। यदि वह आक्रामक प्रकृति का है तो उसे बाहर नहीं ले जा सकते और माता-पिता को समाज से कटकर रहना होता है। हर एक बच्चे की अलग प्रतिक्रिया होती है। अतः हर एक ऑटिज्म बच्चे के साथ अलग तरीके से व्यवहार करना पड़ता है।

ऑटिज्म के कारण (Autism ke Karan in Hindi)

ऑटिज्म क्यों होता है ?

  • इस मानसिक बीमारी का स्पष्ट कारण तो नहीं पता है, पर शोधकर्ताओं का मानना है कि वांशिक पुनरावृत्ति (वंश से चला आता हुआ), कठिन प्रसव या सामाजिक-आर्थिक दबाव के कारण यह बीमारी हो सकती है।
  • कभी-कभी वांशिक पुनरावृत्ति से अलग असामान्य वांशिक दुर्घटना के परिणामस्वरूप भी ऑटिज्म के मामले सामने आए हैं। इस प्रकार की पारिवारिक पृष्ठभूमि न होते हुए भी माता-पिता या बच्चे के डीएनए में अचानक उत्परिवर्तन (म्यूटेशन) के कारण भी यह बीमारी हो सकती है।
  • डॉ. रिबेलो के अनुसार, एन्टीबायोटिक के दुष्प्रभाव, भारी धातु के विष, पारे से युक्त दवाइयाँ, अस्वाभाविक खाद्य पदार्थ जैसे बच्चों का डिब्बाबन्द खाना और दूध पाउडर, जिसमें आर्सेनिक और कैडमियम की अधिकता होती है, का सेवन इसका मूल कारण हो सकता है।
  • डॉ. बरुआ का मानना है कि अनेक प्रक्रियाओं द्वारा तैयार किया हुआ खाना, रसायन युक्त फल और सब्जी के सेवन से भी यह बीमारी हो सकती है।

ऑटिज्म से पीड़ित बच्चों के दिमाग का परिमापन (स्कैनिंग) करने पर कुछ क्षेत्रों में असामान्यता पाई जाती है।

ऑटिज्म की पहचान :

ऑटिज्म से पीड़ित बच्चों की पहचान कैसे करें ?

शोधकर्ताओं के अनुसार, यदि एक साल का बच्चा अपने नाम को सुनकर प्रतिक्रिया नहीं करता तो वह ऑटिज्म से पीड़ित हो सकता है।

जसलोक अस्पताल, मुंबई की स्नायु तन्त्र विशेषज्ञ डॉक्टर अनाहिता हेगडे का कहना है कि प्रायः ऑटिज्म को बच्चों का अवसाद, देर से बोलना और व्यवहारजन्य समस्या मान लिया जाता है। इससे बच्चे का गलत उपचार हो सकता है या ठीक उपचार में देरी हो सकती है। बच्चे की बीमारी की जल्दी पहचान होने पर उसे आस-पास की दुनिया से जोड़ा जा सकता है। दवाइयों और व्यवहारजन्य उपचार द्वारा उसको अपनी कठिनाइयों पर विजय पाने में मदद की जा सकती है।

पांच साल का होने से पहले यदि उसका उपचार शुरू कर दिया जाए तो उसके विकास में महत्त्वपूर्ण प्रगति होती है। उसका आत्मविश्वास बढ़ता है, वह अधिक आत्मनिर्भर और सुरक्षित महसूस करता है और एक बड़ी सीमा तक समाज का हिस्सा बन जाता है।

मिसेज पारामिता (ऑटिज्म से पीड़ित बच्चे की माँ) का कहना है कि ऑटिस्टिक बच्चे अपनी ही दुनिया में रहते हैं और हमारा लक्ष्य उनको अपने आस-पास की दुनिया के प्रति जागरूक बनाना है।

सनशाइन स्कूल वाशी, मुंबई की स्पीच और भाषा थेरेपिस्ट शुभांगी औलख का कहना है कि इन बच्चों को उनकी मूल आवश्यकताओं के बारे में संवाद करने योग्य बनाना है, जिससे वे अपनी मूल आवश्यकताओं को अभिव्यक्त कर सकें।

ऑटिज्म का उपचार (Autism ka Upchar in Hindi)

ऑटिज्म का इलाज कैसे किया जाता है ?

विकासात्मक बाल रोग विशेषज्ञ डॉक्टर विभा कृष्ण मूर्ति, जो स्नायु तन्त्र विकास विकार की विशेषज्ञ भी हैं, का कहना है कि यदि जल्दी ही अर्थात् तीन वर्ष की आयु से ही ऐसे बच्चों का उपचार शुरू हो जाता है, तो जल्दी असर होता है। अतिसक्रियता के लिए ध्यान लगाना (मेडीटेशन), संवाद बढ़ाने के लिए वाक्य शक्ति उपचार (स्पीच थेरेपी), व्यवहारजन्य और रचनात्मक क्रिया-कलापों द्वारा उपचार करके दैनिक कामों को करना सिखाया जाता है। इस प्रकार के बच्चों के लिए अलग स्कूल होते हैं जहाँ विशेषज्ञों के द्वारा उपचार करके समाज से जोड़ने का प्रयास किया जाता है। उपचार के बाद बच्चे अन्य बच्चों के साथ मिलना-जुलना भी पसन्द करने लगते हैं, पर विशेष स्कूलों में प्रशिक्षण के बाद भी माता-पिता का निरन्तर प्रयास बहुत आवश्यक है।

डॉक्टर अंजली जोशी ने ऑटिस्टिक बच्चों के कुछ विशेष लक्षण और उनके लिए माता-पिता द्वारा किए जानेवाले प्रयासों का बहुत ही सरल और सहज शब्दों में विवेचन किया है।

संवेदी तन्त्र –

अल्प सक्रिय संवेदी तन्त्रवाला बच्चा ऊपर से गिरने पर भी दर्द को महसूस नहीं करता और अतिसक्रिय संवेदना वाला बच्चा बाल या नाखून कटवाने अथवा माता-पिता के स्पर्श में भी परेशानी अनुभव करता है। ऐसे बच्चों के साथ माता-पिता छुपा-छुपी का खेल खेलें, जिसमें अनाज या दालों में कोई ऐसी चीज छिपाकर रख दें जिसे बच्चा पहचानता हो और छूकर उसे पहचाने। अलग-अलग खुरदुरी चीजों से खेलते हुए बच्चों को उनके बीच अन्तर करने में मदद करें। बच्चे को अलग-अलग कण गठनवाली चीजों, जैसे – रेत, साबुन का झाग, गीला आटा, सूखा आटा या टैलकम पाउडर में उँगली से चित्र बनाने दें।

सन्तुलन व गति तन्त्र –

सन्तुलन तन्त्र सिर को सही रखने, चलने-फिरने व अन्य गतियों में मदद करता है। ऑटिस्टिक बच्चे की गतिविधियों में तालमेल में कमी होती है। वह ज्यादातर पड़ा रहना चाहता है, अनियंत्रित ढंग से हँसता या रोता है, भाषा समझने या बोलने में दिक्कत होती है। ऐसे बच्चे को झूला-झूलने, फिसलपट्टी पर फिसलने और सी-सॉ करने के लिए प्रेरित करें। कार, बस वगैरह में ले जाते समय कहानी आदि सुनाते रहें ताकि बच्चा सहज, शान्त रहे और संवेदी सूचनाओं को ग्रहण कर सके।

शरीर की स्थिति –

मांसपेशियों और हड्डियों के जोड़ शरीर की स्थिति की जानकारी दिमाग को भेजते रहते हैं। संवेदी तन्त्र की मदद से हम चाय का प्याला पकडने, लिखने के लिए सही दबाव डालने या लोगों से एक सही दूरी बनाकर खड़े होने जैसे बारीक क्रिया-कलाप कर पाते हैं। हम सभी अपने मुँह का उपयोग अलग-अलग तरीके से करते हैं। ऑटिस्टिक बच्चों में इस तन्त्र का तालमेल मुश्किल होता है। इसके लिए माता-पिता उन्हें उछलने-कूदने, रस्साकशी करने, छोटे-मोटे वजन उठाने आदि के लिए प्रेरित करें। ऐसी गतिविधियों को करने के लिए प्रेरित करें, जिनमें फूंकना होता है, जैसे फुग्गा फुलाना, साबुन के बुलबुले बनाना, सीटी बजाना आदि। इन गतिविधियों से साँस पर काबू पाने में मदद मिलती है और साँस पर काबू पाना बोलने के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है। बच्चों को चूसने या चाटनेवाली चीजें खाने को दें। दूध या पानी पीने के लिए स्ट्रॉ का प्रयोग करना सिखाएँ और स्टिकर बुक में अपनी जीभ निकालकर थूक से स्टिकर चिपकाने के लिए प्रेरित करें।

दिन की शुरुआत –

ऑटिज्म से पीड़ित बच्चे आलस में शान्त चुपचाप पड़े रहना चाहते हैं। उन्हें सुबह टहलने या कसरत करने के लिए, दरवाजे की चौखट पर लटकने या झूलने आदि के लिए प्रेरित करें। गेंद फेंककर दीवार पर मारने के लिए बोलें, बड़े-बड़े तकिए, गददे उठाने और फर्नीचर सरकवाने का कार्य करवाएँ।

अति सक्रियता –

अतिसक्रिय बच्चों को हलका संगीत सुनाएँ, गोद में लेकर थपथपाएँ, टायर ट्यूब पर कूदना सिखाएँ और सिर की मालिश करें।

खुद को नुकसान –

अकसर तनाव में आकर ऐसा बच्चा खुद को ही नुकसान पहुँचाना चाहता है। ऐसे समय बच्चे को जोर से पकड़कर जमीन पर बैठाएँ, फिर नीचे झुक कर उसकी आँखों में आँखें डाल कर साफ-साफ निर्देश दें। यदि बच्चा सिर पटक रहा है तो उसके सिर पर मालिश करें और अच्छे से सिर को दबाकर पट्टी बाँध दें।

शैक्षिक हुनर का विकास –

जो कुछ हम देखते हैं उससे दिमाग जो अर्थ निकालता है उसे दृष्टि एहसास कहते हैं। शैक्षिक हुनर के विकास के लिए दृष्टि एहसास जरूरी है। इसके लिए ऑटिस्टिक बच्चों को जिग-सॉ पहेलियाँ दें, लकड़ी / प्लास्टिक के गुटके, जिन पर चित्र बने हों, ज्यामिती आकार की डिजाइनें खेलने को दें, मोती की मालाएँ बनाने को दें जिनमें कोई नमूना हो।

जैसा कि हम पहले भी कह चुके हैं कि यदि बचपन से ही इन बच्चों का उपचार शुरू हो जाता है, तो एक बहुत बड़ी सीमा तक आत्मनिर्भर हो सकते हैं अन्यथा किशोरावस्था या जीवन भर इन्हें दूसरों पर निर्भर रहना पड़ सकता है। डॉक्टर विभा कृष्ण मूर्ति, जो उम्मीद नाम की संस्था, मुंबई में चलाती हैं, ऑटिस्टिक बच्चों की सलाहकार हैं, का कहना है कि हम माता-पिता की मदद करने के लिए प्रायोगिक व्यवहारजन्य विश्लेषण नाम से एक कार्यक्रम करते हैं, जिसमें माँ और बच्चा दोनों साथ-साथ भाग लेते हैं। इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य माता-पिता को शिक्षित करना है कि वे कैसे ऑटिस्टिक बच्चों को सँभालें। उम्मीद संस्था से सम्पर्क किया जा सकता है।

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