दशमूल क्वाथ के फायदे और उपयोग – Dashmool Kwath Benefits in Hindi

दशमूल क्वाथ क्या है ? Dashmool Kwath Kya Hai

दशमूल क्वाथ (दशमूल काढ़ा) एक आयुर्वेदिक दवा है। इसका उपयोग बुखार ,स्त्री रोग संबंधी समस्याएं, संधिशोथ ,कमजोरी ,अनिद्रा ,तनाव जैसे रोगों को दूर करने में किया जाता है ।

दशमूल क्वाथ के मुख्य घटक : Dashmool Kwath Ingredients

  • शालपर्णी,
  • पृश्नुिपर्णी,
  • छोटी कटेरी,
  • बड़ी कटेरी,
  • गोखरू,
  • बेलगिरी,
  • अरणी,
  • मूल,
  • सोनापाठा,
  • गंभारी छाल,
  • पाढ़ल,
  • धाय के फूल

दशमूल क्वाथ बनाने की विधि : Dashmool Kwat Bnane ki Vidhi

शालपर्णी, पृश्नुिपर्णी, छोटी कटेरी, बड़ी कटेरी, गोखरू, बेलगिरी, अरणी, मूल, सोनापाठा, गंभारी छाल, पाढ़ल – ये प्रत्येक द्रव्य 64-64 तोला लेकर जौकुट करके 1 मन 24 सेर जल में पकायें, चतुर्थांश (16 सेर) जल शेष रहने पर उतार क छान लें। पश्चात् इसमें गुड़ ६ सेर एवं धाय के फूल १० छटाँक डालकर आसवारिष्ट सन्धानविधि से 1 माह तक सन्धान करें। एक माह के बाद छानकर रखें। (शार्ङ्गधर संहिता या योग आसवारिष्ट विधि से निर्मित)

नोट- यह योग इसी नाम से बना बनाया आयुर्वेदिक औषधि विक्रेता के यहां मिलता है। इस दवा को ऑनलाइन या आयुर्वेदिक स्टोर से ख़रीदा जा सकता है।

मात्रा और अनुपान : Dosage & How to Take in Hindi

400 मिलीलीटर पानी के साथ एक चम्मच (5 ग्राम) चूर्ण को दाल कर उबालें। जब 100 मिलीलीटर तक पानी बच जाये तब इसे छानकर उपयोग में लायें | इसे ब्रेकफास्ट और डिनर से पहले लें।

दशमूल क्वाथ (दशमूल काढ़ा) के रोगों में लाभ :

  • इसका उपयोग पीठ के निचले हिस्से में दर्द, कटिस्नायुशूल, कंपकंपी, पार्किंसंस रोग में किया जाता है।
  • फेफड़ों : सूखी खांसी और श्वसन कमजोरी के लिए टॉनिक के रूप में इसका उपयोग किया जा सकता है।
  • सभी प्रकार के बुखार
  • तनाव
  • अनिद्रा
  • संधिशोथ
  • खांसी और अस्थमा
  • कमजोरी

दशमूल क्वाथ के फायदे और उपयोग : Dashmool Kwat ke Fayde in Hindi

1. खाँसी में : दशमूल क्वाथ (दशमूल काढ़ा) में “अरण्डी की जड़ “अथवा “पोहकरमूल का चूर्ण” डाल कर पीने से श्वास, खाँसी और पसली की पीड़ा शान्त हो जाती है।( और पढ़े – खांसी और कफ दूर करने के 11 रामबाण घरेलु उपचार)

2. सन्निपात ज्वर में : सन्निपात ज्वर, मोह और तन्द्रा होने पर-दशमूल के काढ़े में “पीपर का चूर्ण” मिला कर पीना बहुत ही अच्छा है।

3. धनुस्तम्भ रोग में : दशमूल का काढ़ा पिलाना और शरीर में कड़वा तेल मलना हितकारी है।

4. पक्षाघात रोग में : दशमूल का काढ़ा हींग और सेंधा नमक मिलाकर पिलाना हितकर है।( और पढ़े – लकवा के 37 घरेलु इलाज )

5. सूतिका रोग में : इस रोग में भी दशमूल के काढ़े में पीपर का चूर्ण मिलाकर पिलाना चाहिये ।

6. हृदयशूल में : हृदयशूल, पीठ के शूल और कमर के शूल में-देशमूल का काढ़ा सवेरे ही पीना चाहिये ।

7. बुखार में : इस क्वाथ का प्रयोग करने से समस्त प्रकार के वातश्लैष्मिक ज्वर शीघ्र नष्ट होते हैं ।( और पढ़े –बुखार के कारण ,लक्षण और इलाज )

8. पाश्र्वशूल में : सन्निपात ज्वर, समस्त प्रकार के सूतिका रोग, ग्रह, कण्ठ ग्रह, पाश्र्वशूल,तथा वातरोगों को शीघ्र नष्ट करता है। विशेषतया सूतिका रोग मेंअधिक लाभप्रद है।

9. तनाव दूर करने में : तनाव कई अतिरिक्त बीमारियों का मूल कारण है। दिव्य दशमूल क्वाथ एक उत्कृष्ट रचना है जो दिमाग पर से तनाव कम करती है। यह दवा तनाव और इसके संबंधित रोगों के लिए प्राकृतिक इलाज है।

10. मासिक धर्म विकारों में : मासिक धर्म विकारों और गर्भावस्था को प्राप्त करने से संबंधित स्त्री रोग संबंधी विकारों में उपयोगी।

11. अवसाद में : यह प्राकृतिक जड़ी बूटी तनाव और अवसाद को कम करती है और आपके दिमाग को आराम देती है।

12. रक्तचाप के नियंत्रण में : यह नींद विकार से रोकने में मदद करता है और आपके रक्तचाप को नियंत्रण में रखता है।

13. गठिया रोग में : दशमूल क्वाथ का नियमित उपयोग गठिया जैसी पुरानी बीमारियों से रोकता है।

14. थकान दूर करने में : यह दवा आपकी प्रतिरक्षा प्रणाली को बढ़ावा देने और सिरदर्द और थकान से बचने में मदद करती है।

15. शोथ (सूजन) का ज्वर:

  • दशमूल और सोंठ का काढ़ा बनाकर पीने से सूजन के बुखार में लाभ होता है।
  • शहद मिलाकर रोजाना सुबह-सुबह रोगी को पिलाने से सूजन के बुखार, प्रसूति बुखार, सन्निपात ज्वर और अनेक प्रकार के वात रोगों में लाभ होता है।

16. सन्निपात ज्वर:

  • दशमूल (बेल, श्योनाक, खंभारी, पाढ़ल, अरलू, सरिवन, पिठवन, बड़ी कटेरी, छोटी कटेरी और गिलोय) के काढ़े में छोटी पीपल का चूर्ण मिलाकर रोगी को पिलाने से नींद (तन्द्रा यानी अनिद्रा), खाँसी, श्वास (दमा), कण्ठ अवरोध (गले की खराबी), हृदयावरोध (दिल का रोग), पसलियों का दर्द तथा वात, पित्त और कफ दूर होता है। साथ ही साथ सन्निपात बुखार नष्ट हो जाता है।
  • दशमूल (बेल, श्योनाक, खंभारी, पाढ़ल, अरलू, सरिवन, पिठवन, बड़ी कटेरी, छोटी कटेरी और गिलोय) के काढ़े में उतना ही अदरक का रस, कायफल, पोहकरमूल, सोंठ, कालीमिर्च, काकड़ासिंगी, पीपल, जवासा तथा अजवायन आदि को मिलाकर पिलाने से सन्निपात बुखार से पीडि़त मरीज को छुटकारा मिलता है।
  • दशमूल (बेल, श्योनाक, खंभारी, पाढ़ल, अरलू, सरियवन, पिठवन, बड़ी कटेरी, छोटी कटेरी और गिलोय) और कचूर, काकड़ासिंगी, पोहकरमूल, धमासा, भांरगी, कुड़े के बीज़, पटोल के पत्ते और कुटकी आदि को मिलाकर पकाकर काढ़ा बना लें। इस बने काढ़े को पीने से त्रिदोष बुखार, खाँसी, नींद व आना, प्रलाप, दाह (जलन) और अरुचि (भूख न लगना) के रोग समाप्त हो जाते हैं।
  • दशमूल (बेल, श्योनाक, खंभारी, पाढ़ल, अरलू, सरिवन, पिठवन, बड़ी कटेरी, छोटी कटेरी और गिलोय), त्रिकुटा, सोंठ, भारंगी और गिलोय को मिलाकर काढ़ा बना लें, इस बने काढ़े को सेवन करने से सन्निपात बुखार में लाभ होता है।

17. वात-पित्त का बुखार: बेल, श्योनाक, खंभारी, पाढ़ल, अरलू, सरिवन, पिठवन, बड़ी कटेरी, छोटी कटेरी और गिलोय) और अडू़से के काढ़े में शहद मिलाकर रोगी को पिलाने से कफ के बुखार में लाभ मिलता है।

18. अंडकोष की सूजन: 14 से 28 मिलीलीटर दशमूल के काढ़े को 7 से 14 मिलीलीटर एरंड के तेल में मिलाकर रोजाना सुबह सेवन करने से अंडकोष की सूजन कम हो जाती है।

19. दांत मजबूत करना: सरसों के तेल में दशमूल काढ़ा डालकर आग पर पकायें। गाढ़ा हो जाने पर इससे दाँत एवं मसूढ़ों पर मलने से मसूढ़े मजबूत होते हैं।

20. गर्भवती स्त्री का बुखार: दशमूल के गर्म काढ़े में शुद्ध घी को मिलाकर सेवन करने से गर्भवती स्त्री का प्रसूत ज्वर मिट जाता है।

21. बहरापन: दशमूल काढ़े को तेल में पकाकर ठंडा कर लें। फिर इस तेल को चम्मच में लेकर गुनगुना करके 2-2 बूंद करके दोनो कानों में डालने से बहरापन दूर होता है।

22. कमरदर्द: 14 से 28 मिलीलीटर दशमूल काढे़ को 7-14 मिलीलीटर एरण्ड के तेल के साथ मिलाकर दिन में 3 बार सेवन करने से कमर दर्द से आराम मिलता है।

23. कनफेड: फिटकरी, माजूफल, पलाश, पापड़ी और मुर्दासंग को एक साथ लेकर खिरनी के रस में मिलाकर कनफेड पर लगाने से आराम आता है।

24. जनेऊ (हर्पिस) रोग: दशमूल रस 40 से 90 ग्राम रोजाना 4 बार प्रयोग में लाने से जनेऊ रोग में लाभ मिलता है।

25. सभी प्रकार के दर्द होने पर: दशमूल ( बेल, श्योनाक, गंभारी, पाढ़ल, अरलू, सरियवन, पिठवन, बड़ी कटेरी, छोटी कटेरी और गिलोय) को पकाकर काढ़ा बना लें, फिर इसमें जवाखार और सेंधानमक मिलाकर खाने से दिल के दर्द (हृदय शूल), श्वास (दमा), खाँसी, हिचकी और पेट में गैस के गोले आदि रोग समाप्त होते हैं।

26. पेट में दर्द: दशमूल (बेल, श्योनाक, खंभारी, पाढ़ल, अरलू, सरियवन, पिठवन, बड़ी कटेरी, छोटी कटेरी और गिलोय) को पीसकर काढ़ा बनाकर गाय के पेशाब में मिलाकर पीने से पित्तोदर यानी पित्त के कारण होने वाले पेट के दर्द में राहत मिलती है।

27. गठिया रोग:  घुटने के दर्द में एरण्ड के तेल को दशमूल काढ़े के साथ सेवन करना चाहिए। इससे रोगी को तुरन्त फायदा मिलता है।

28. पीलिया का रोग: दशमूल काढ़े का एक कप रस लेकर उसमें आधा चम्मच सोंठ तथा 2 चम्मच शहद मिलाकर सुबह 8-10 दिन तक सेवन करने से पीलिया का रोग दूर हो जाता है।

29. शरीर का सुन्न पड़ जाना: दशमूल के काढ़े में पुष्कर की जड़ को मिलाकर पीने से शरीर का सुन्न होना दूर हो जाता है।

30. सिर का दर्द: दशमूल के काढ़े में घी और सेंधानमक को मिलाकर सूंघने से सिर दर्द के अलावा आधासीसी (आधे सिर का दर्द) का दर्द भी खत्म हो जाता है।

31. लिंगोद्रेक (लिंग उत्तेजित होने पर): 10 से 100 ग्राम दशमूल का रस दिन में 4 बार 6-6 घंटों पर सेवन करने से लिंग उत्तेजित होने का रोग दूर हो जाता है।

दशमूल क्वाथ के नुकसान : Dashmool Kwat ke Nuksan

दशमूल क्वाथ केवल चिकित्सक की देखरेख में लिया जाना चाहिए।

(अस्वीकरण : दवा, उपाय व नुस्खों को वैद्यकीय सलाहनुसार उपयोग करें)

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