आई चेकअप : किस उम्र में कौन-सी आंखों की जांच कराना जरूरी

आँखों की जाँच किस उम्र में आवश्यक है? (चार आयु-समूह) :

प्रश्न उठता है कि वे आयु-समूह क्या हैं, जब आँख की बीमारियों का पता लगाने और उन्हें बढ़ने से रोकने के लिए आँखों की जाँच आवश्यक होती है ?

1). स्कूल जाने से पहले चार से छह वर्ष की आयु में – बच्चे को स्कूल में प्रवेश दिलाने से तुरन्त पहले दृष्टि के (Snellen’s) शेलेन के चार्ट पर एक समय में एक आँख बन्द करके आँख की जाँच अवश्य करा ली जानी चाहिए। दृष्टि की त्रुटि का पता इससे चल जाता है और नेत्र क्लिनिक में उपचार के लिए प्रयास शुरू कर दिए जाते हैं।

स्कूल जाने वाले करीब 25% बच्चे त्रुटिपूर्ण नेत्र दृष्टि से पीड़ित होते हैं और 10% या लगभग बच्चों को समय पर पता लग जाने पर सरल उपचार से ठीक किया जा सकता है। शेष 50% बच्चों को ठीक करने के लिए आँखों के अस्पताल में विशेष उपचार कराना पड़ता है। जाँच से पता चलता है कि जिन खराबियों को ठीक करने में लापरवाही बरती जाती है, उनसे कभी भी ठीक न हो पाने वाला अंधापन आ जाता है।

भैगेपन, अपवर्तन की त्रुटियों (माइनस या प्लस नम्बर), चिरकारी संक्रमण, जन्मजात और बढ़ने वाले रोगों जैसे आलसी आँखें, मोतियाबिन्दु, कॉर्निया की खरोंच, वंश पारंपरिक अन्धता, ग्लूकोमा और ऐसे ही अन्य गंभीर रोगों से ग्रस्त बच्चों की आँखों का पता इन जाँचों से लग जाता है।

2). कॉलेज जाने से पहले और 15 से 20 वर्षों के किशोरों और युवकों की आँखों की आम जाँच से चश्मों के साथ सही की जा सकने वाली त्रुटि-पूर्ण नेत्र दृष्टि का पता चल जाता है। यदि बचपन में आँख की कोई बीमारी पकड़ी नहीं जाती है और अनजाने ही बढ़ती जाती है, तो उसके गंभीर होने से पहले ही इस उम्र में आँख की जाँच के समय उसका पता चल जाता है।

3). 40-45 वर्षों – की आयु एक ऐसी सबसे महत्त्वपूर्ण आयु होती है, जब नजदीक से काम करने के लिए प्रेस्वायोपिक यानी करीब दृष्टि चश्मे लगते हैं। इस उम्र में ही मोतियाबिंद, ग्लोकोमा और मधुमेह के पहले लक्षण नजर आते हैं। शुद्ध जाँच से आँखों की इन बड़ी बीमारियों का पता चल जाता है और उचित इलाज से व्यक्ति 60 वर्षों की आयु तक निश्चिन्त होकर अपनी जिन्दगी बिता सकता है।

4). बुढ़ापे की उम्र में (60 वर्ष के लगभग में) – आँखों की कई बीमारियाँ होती हैं, जैसे – मोतियाबिंद, ग्लूकोमा, रेटिना की कमजोरी और नेत्र-तंत्रिका के रोग। इनके लिए भी आँखों की विशेष जाँच और उपचार कराना अत्यन्त अनिवार्य कार्य हो जाता है।

इस तरह से यह कहा जा सकता है कि बच्चों (4-6), युवकों (15-20), प्रौढ़ों (40-45) और वृद्धों (60 के लगभग) के मामलों में आखों की जाँच अलग-अलग रूप में और विशेष तरह से अत्यन्त जरूरी होती है।

आँखें और आप – क्या करें और क्या न करें ? :

  1. किसी नेत्र चिकित्सक की सलाह लिए बिना आँख की किसी भी दवा का उपयोग न करें । सभी दवाइयों में अधिकृत नामों और उनकी समाप्ति तारीख के लेबल होने चाहिए।
  2. सूजन व संक्रमण ग्रस्त आँख पर कभी पट्टी न बाँधे। केवल उस आँख पर पट्टी बाँधे जिसमें चोट लग गई है।
  3. आँख के इलाज या ऑपरेशन के लिए किसी अज्ञानी शल्यचिकित्सक के पास न जाएँ।
  4. नेत्र क्लिनिक में आँख की उचित जाँच के बिना नम्बर वाला चश्मा न लगाएँ। आँखों के कई छिपे रोगों का पता ही नहीं चलेगा व चश्मा लग जाएगा।
  5. ठंडे पानी को केवल सामान्य आँख के ऊपर छिड़कें।
  6. संक्रमण ग्रस्त आँख या ऑपरेशन वाली आँख या घायल आँख को रूमाल या तौलिए से न पोंछे। केवल उबाले जा चुके रूई के फोहे को काम में लाएँ।
  7. सामान्य रूमाल का उपयोग केवल सामान्य आँख के लिए करें।
  8. सड़क विक्रेताओं या अनधिकृत दुकानों से धूप के चश्मे या नजर के चश्मे न खरीदें।
  9. संक्रमणग्रस्त आँख या ऑपरेशन वाली आँख में कोई काजल या सुरमा न लगाएँ।
  10. बताए गए दिनों से ज्यादा समय तक आँखों में दवा न डालें। अपने नेत्र चिकित्सक से यह पूछ लें कि दवा कितने दिनों तक डालनी है और समय के बारे में पूछताछ करते रहें। दवाइयों को लम्बे समय तक डालने से आँखें सूख जाती हैं। खासकर एंटीबायोटिक व कार्टिजान वाली दवाएँ।
  11. थक जाने वाली या खुजली वाली आँखों में सादी सफाई वाली बूंदें डालें और एंटीबायोटिक व कार्टिजान जैसी शक्तिशाली बूंदें न डालें। यदि आराम न मिले, तो डॉक्टर की राय लें।
  12. घर में रखी हुई दूसरों के लिए दवा का इस्तेमाल खुद न करें। इन सभी बातों में अपने डॉक्टर की देख रेख व सलाह से ही सही दवा का उपयोग करें।

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