मालिश के प्रकार, विधि और लाभ

मालिश की अनेक विधियों में से प्रस्तुत हैं, कुछ विशेष उपयोगी विधियां –

1. तेल मलना

इस क्रिया में तेल को अंग पर लगाकर धीरे-धीरे नीचे से ऊपर की ओर दबाव डालकर मलना होता है। तेल सभी अंगों पर लगाना चाहिए, परंतु दबाव केवल मांसपेशियों पर ही देना चाहिए, हड्डियों पर नहीं।

प्रभाव –

  • तेल शरीर में समाएगा,
  • त्वचा नर्म होगी,
  • रक्त-संचार में वृद्धि होगी तथा मांसपेशियां शिथिल होंगी।
  • मालिश के आधुनिक तरीकों को अपनाने के लिए आपका शरीर तैयार हो जाएगा,
  • परंतु यह क्रिया केवल मांसपेशियों पर करनी चाहिए, हड्डियों पर नहीं।

2. ताल से हाथ चलाना :

अंगों के आकार के अनुसार अपने हाथ को ढीला रखते हुए तथा ताल से हाथ की हलकी, परंतु दबाव वाली ठोक देकर दिल की तरफ चलाएं। मालिश करने वाला चाहे खड़ा होकर या बैठकर मालिश कर रहा हो, परंतु उसे आरामदेह स्थिति में होना चाहिए, ताकि उसका हाथ पूरी सुविधा के साथ चल सकें।

जिस अंग की मालिश की जाए,उसके आरंभिक स्थल से हाथ चलाकर अंत तक एक ही ताल से हाथ चलाना चाहिए। मान लो कि टांग की मालिश की जा रही है, तो मालिश पांव से आरंभ करके जांघ तक हाथ को एक ही तल से चलाएं। यदि बाजू की मालिश कर रहे हैं, तो हाथ से मालिश आरंभ करके कंधे तक हाथ को चलाना चाहिए।

यदि आप किसी टूटी हड्डी वाले या किसी चोट वाले रोगी का उपचार कर रहे हैं, तो केवल चोट वाले स्थान पर हाथ न चलाकर अंग के आरंभ से आवश्यकतानुसार दबाव डालकर हाथ की हल्की ठोक ताल से मालिश करें, इससे रोगी को अवश्य लाभ होगा।

शरीर पर प्रभाव –

  • यह बेहद आरामदायक क्रिया है। यह शिराओं को उत्तेजित करती है तथा रक्त के संचार को दिल की तरफ तेज करती है।
  • अंगों में शुद्ध रक्त आता है, जिससे टूटे हुए कोषाणु रक्त में मिलकर शिराओं से होकर वापस हृदय में चले जाते हैं।
  • ताल से हाथ चलाना मालिश का प्राथमिक उपचार है।

लाभ –

यह क्रिया रक्त संचार की गड़बड़ी को दूर करती है तथा मांसपेशियों की ऐंठन, नाड़ियों की उत्तेजना, अनिद्रा चोट लगना तथा सूजन आदि रोगों में लाभ देती है।

3. थपथपाना :

इस क्रिया में पूरे हाथ को ढीला रखकर थपथपाना होता है। इसका सर्वाधिक प्रभाव नाडी-संस्थान पर पड़ता है तथा रक्त संचार पर कम। इसलिए इस क्रिया का उपयोग पीठ में ऊपर से नीचे की ओर होना चाहिए तथा अंगों में नाड़ियों के समानांतर पेट पर गोलाई से एवं बड़ी आंत पर दाएं से बांए की ओर होना चाहिए।

प्रभाव –

  • इस क्रिया में नाड़ी संस्थान को बहुत आनन्द प्राप्त होता है।
  • इसके अतिरिक्त यह क्रिया मांसपेशियों में शिथिलता लाती है एवं थकान दूर करती है।
  • आमाशय, यकृत, फेफड़ों तथा आंतों के लिए भी यह क्रिया लाभदायक है।

लाभ –

मालिश स्नायु-दुर्बलता, उच्च रक्तचाप, अनिद्रा, मानसिक उद्विग्नता, खांसी, दमा, मिर्गी तथा हिस्टीरिया आदि रोगों में बेहद शांतिदायक प्रभाव डालती है।

4. मसलना :

इस क्रिया में मांसपेशियों को अपनी अंगुलियों और अंगूठे से पकड़कर मसला जाता है। मांसपेशी को हड्डी के ऊपर से उठाकर हृदय की ओर मसलते हुए गति करनी होती है। हाथ को मांसपेशी के संपर्क में रखते हुए ही पेशी को पकड़ते एवं मसलते जाते हैं। सबसे पहले मांसपेशी को अंगुलियों और अंगूठे से पकड़िए, फिर मसलिए तथा फिर हाथ को ढीला छोड़कर, आगे बढ़कर अगले भाग को पकड़कर मसलिए।

इसी प्रकार एक साथ एक अंग से दूसरे अंग पर आगे बढ़ना है। ध्यान रखें कि यह क्रिया मांसपेशियों के समानांतर होनी चाहिए। मांसपेशी जहां से आरंभ होती है तथा जिस तरफ जाती है, उसी के अनुसार चलना चाहिए। इस बात का भी विशेष ध्यान रखना चाहिए कि आपके मसलने से रोगी को पीड़ा का अनुभव न होकर, आराम मिलना चाहिए।

प्रभाव –

  • इस क्रिया का प्रभाव मांसपेशियों पर अधिक पड़ता है और उनकी थकान दूर होती है।
  • मांसपेशियों के जो कोशाणु टूट जाते हैं, वे रक्त में मिलकर वहां से हट जाते हैं और उनके बदले नया रक्त वहां आ जाता है।
  • इससे नस-नाड़ियों के विकार दूर होते हैं तथा उन्हें भी नई शक्ति मिलती है।

लाभ –

नस-नाड़ियां जाग्रत होती हैं, मांसपेशियां सबल बनती हैं तथा उनके विकार भी दूर हो जाते हैं।

5. दलन :

इस क्रिया में विशेषकर पीठ, कमर और नितंबों पर मालिश की जाती है। रोगी को उलटा लिटाकर उसके ऊपर सवारी करके बैठते हैं। अपने घुटने जमीन पर टिका कर रखें तथा अपना भार रोगी के सिर पर न डालकर अपने घुटनों पर रखें। अपने दोनों हाथ रोगी की रीढ़ की हड्डी के दोनों ओर रखें। तत्पश्चात अपने शरीर का दबाव हाथों पर रोगी की शारीरिक शक्ति के अनुसार डालें तथा अपने हाथों को घुमाते हुए ऊपर को ले जाएं।

यह क्रिया कई बार करें। रोगी की कमर व नितंबों को भी घुमाव के साथ दबाव देकर मसलें। ध्यान रखें कि यह मसलना आपके हाथों की अंगुलियों द्वारा न होकर हथेलियों के गद्दे वाले भाग से होना चाहिए।

अब दूसरी क्रिया में अपने दोनों हाथ रीढ़ पर रखिए और अपने शरीर का दबाव डालकर मांसपेशियों को मसलते हुए अपने दोनों हाथों को दोनों तरफ से नीचे की ओर ले जाएं। यह क्रिया पीठ तथा नितंबों पर भी करें। यदि रोगी की पीठ पर बैठकर इस क्रिया को करना कठिन हो, तो आप रोगी के बाईं और बैठकर या खड़े होकर, दोनों तरफ एक-सा दबाव डालकर यह क्रिया कर सकते हैं।

प्रभाव –

  • इस क्रिया का प्रभाव मसलने वाली क्रिया जैसा ही है।
  • इससे मांसपेशियों में खिंचाव पड़ता है तथा शिराएं एकदम खाली हो जाती हैं और फिर तेजी से रक्त आता है।
  • नाड़ियों का विकार दूर हो जाता है तथा त्वचा में सुंदरता आती है।
  • तनी मांसपेशियों में नरमी व शिथिलता आती है तथा सुस्ती भी दूर होती है।

लाभ –

यह क्रिया मोटापा, वात रोग, अधरंग, नाड़ी दौर्बल्य आदि रोगों में विशेष लाभदायक है, लेकिन नाड़ी के फूलने व उनमें सूजन आने पर यह मालिश नहीं करनी चाहिए।

6. घर्षण :

यह क्रिया रोगी के समस्त शरीर पर की जाती है। अपनी अंगुलियों को खुला रखकर दोनों हाथों को रोगी के नीचे शरीर पर रखें एवं जल्दी-जल्दी रगड़ देते हुए नीचे से ऊपर की ओर दिल की तरफ बढ़ें। पहले अपने पूरे शरीर का दबाव अपने हाथों पर रखें, उसके बाद घर्षण देकर हाथ चलाएं। प्रत्येक क्रिया के बाद घर्षण दें।

यह क्रिया एक जोड़ से दूसरे जोड़ तक करते हुए आगे बढ़ना चाहिए। जैसे, आप टांगों की मालिश कर रहे हैं, तो यह क्रिया पहले टखनों से घुटनों तक, उसके बाद घुटनों से जांघों तक करते जाएं। इसी तरह शरीर के अन्य भागों पर घर्षण करें।

प्रभाव –

  • इस क्रिया से ग्रंथियों के कार्य करने की क्षमता में वृद्धि होती है,
  • त्वचा पुष्ट होती है तथा उसका ताप बढ़ता है यदि
  • जोड़ों के आस-पास सूजन हो, तो वह दूर हो जाती है।
  • मांसपेशियों का तनाव दूर होकर वहां शुद्ध रक्त का संचार होता है।

लाभ –

घाव वगैरह से हुई गांठे एवं निशान दूर होते हैं। जोड़ों का दर्द, कमर का दर्द, साइटिका का दर्द तथा चेहरे के लकवे में यह क्रिया बेहतर परिणाम दिखाती है।

7. दबाना :

इस क्रिया में रोगी के अंगों को अपने हाथों में लेकर अपने दबाव से आवश्यकतानुसार दबाना होता है। यह भी एक प्रकार की मालिश है।

प्रभाव –

  • यह क्रिया वृद्ध व्यक्तियों के लिए विशेष लाभदायक है।
  • इससे रक्त संचार बढ़ता है। शिराएं तेजी से खाली होती व भरती हैं।
  • अंगों के दर्द से छुटकारा मिलता है।
  • अचेतन अवस्था को दूर करने के लिए भी इस क्रिया का प्रयोग किया जा सकता है।

8. मरोड़ना :

यह क्रिया मात्र टांगों, बाजुओं व गर्दन पर की जाती है। अपने दोनों हाथों की अंगुलियों को ऐसे मिलाएं कि अंगुलियां चूड़ी की शक्ल में आ जाएं। उसके बाद टांगों के टखने से आरंभ करके, मांसपेशियों पर दबाव डालते हुए, पूरी गोलाई के साथ घुमाते हुए ऊपर की ओर बढ़ें। एक ही अंग पर यह क्रिया कई बार करनी चाहिए, परंतु इस बात का ध्यान रखें कि आपके हाथों का पूरा दबाव केवल मासपेशियों पर ही पड़े, हड्डी पर नहीं।

यह क्रिया एक साथ एक जोड़ से दूसरे जोड़ तक की जाती है-पहले टखनों से घुटनों तक, फिर घुटनों के चारों ओर, उसके बाद घुटने से जांघों तक तथा बाजुओं की कलाई से कोहनी तक, फिर कोहनी से कंधों तक करें।

प्रभाव –

  • इस क्रिया से मांसपेशियों में शिथिलता आती है तथा तनाव दूर होता हैं ।
  • नस-नाड़ियां जागृत होती हैं और उनमें नई चेतना आती है।
  • रक्त-संचार में भी वृद्धि होती है।

लाभ –

यह क्रिया स्वस्थ व्यक्ति की थकावट दूर करने में बहुत लाभकारी है, साथ ही अधरंग, वात रोग तथा बच्चों के लकवे में विशेष लाभ देती है।

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