Nyagrodhadi Churna ke Fayde | न्यग्रोधादि चूर्ण के फायदे ,उपयोग और नुकसान

न्यग्रोधादि चूर्ण क्या है ? : What is Nyagrodhadi Churna in Hindi

न्यग्रोधादि चूर्ण 28 प्रकार की औषधीय जड़ी बूटियों से तैयार एक आयुर्वेदिक मिश्रण है । चूर्ण (पाउडर) के रूप में उपलब्ध इस आयुर्वेदिक औषधि का विशेष उपयोग मूत्र प्रणाली से संबंधित शिकायतों ,बार-बार पेशाब लगना ,डायबिटीज ,बवासीर व रक्त में शर्करा की मात्रा को नियंत्रित करने में किया जाता है ।

घटक एवं उनकी मात्रा :

न्यग्रोध (वड़), गूलर, अश्वत्थ (पीपल), अरलु, आरग्वध, असन, आम, कैथ, जामुन, प्रियाल (चिरौंजी), अर्जुन, धव, महुआ, लोध्र, वरुण, नीम – इन सबकी अन्तर छाल

मुलठ्ठी, पटोलपत्र, गुड़मार पत्र, दन्तीमूल, चित्रकमूल, आढ़कीमूल, करञ्जफल, हरीतकी फल, बहेड़ा फल, आमला फल, इन्द्रयव, और शुद्ध भल्लातक – सभी समभाग।

प्रमुख घटकों के विशेष गुण :

  1. न्यग्रोध (वड़) : स्तंभक, रुक्ष, मूत्र संग्रहणीय, दाहशामक।
  2. उदुम्बर (गूलर) : कषाय, शीतवीर्य, रुक्ष, मूत्र संग्रहणीय, व्रण शोधक, रोपक।
  3. अश्वत्थ (पीपल) : कषाय, शीत वीर्य, रुक्ष, मूत्र संग्रहणीय, योनि शोधक।
  4. श्योनाक (Shyonak / Oroxylum Indicum) : कषाय, रुक्ष, शीतवीर्य, रक्तस्तम्भक, योनिशोधक, ग्राही, कृमिघ्न ।
  5. आरग्वध (अमलतास) : विरेचक, कुष्टघ्न, कण्डुघ्न, मूत्र जनन, दाह प्रशामक।
  6. आम : मूत्र संग्रहणीय, पुरीष संग्रहणीय, कषाय, हृद्य ।
  7. असन : मधुमेह हर, मूत्र संग्रहणीय, रक्त शोधक, रसायन ।
  8. कपित्थ (बेल पेड़) : कषाय, बृष्य, ग्राही, शीतल, विषघ्न, मधुमेहघ्न ।
  9. जम्बू (जामुन) : मूत्र संग्रहणीय, ग्राही, मधुमेह हर।
  10. प्रियाल : बृष्य, कुष्टघ्न, दाह प्रशमन, मूत्रल, शोथन्न ।
  11. अर्जुन : प्रमेहघ्न, दाहशामक, हृद्य, मेदोहर, विषघ्न ।
  12. घव : मूत्र संग्रहणीय, रक्त स्तम्भक, व्रणरोपक, शोथघ्न ।
  13. मधुक : बल्य, वृहण, मूत्रल, नाड़ी बल्य, वात शामक।
  14. मधुयष्टि : मूत्र विरजनीय, शुक्र बर्धक, बुद्धिबर्धक, रक्त शोधक
  15. लोघ्र : कषाय, रक्त स्तम्भक, मूत्र संग्रहणीय।
  16. वरुण : मूत्र शोधक, मूत्र कृच्छ्र नाशक, रुक्ष, कषाय।
  17. नीम : तिक्त, कटु, रक्त शोधक, मधुमेह नाशक, रसायन।
  18. पटोल : रक्त शोधक, पित्तशामक, कण्डूहर, दाह शामक।
  19. मेषशृङ्गी : मधुमेह हर, विषघ्न, मूत्रकृच्छ्र हर।
  20. दन्ती मूल : पित्त सारक, विरेचक, कृमिघ्न।
  21. चित्रक : दीपक, पाचक, आमनाशक, कुष्टघ्न ।
  22. आढ़की मूल : मधुर, कषाय, शीतल, कफपित्तशामक ग्राही, वर्ण्य।
  23. करंज : मूत्र संग्रहणीय, विरेचक, कृमिघ्न, ज्वरघ्न।
  24. त्रिफला : दीपक, रसायन, रेचक, मूत्र शोधक।
  25. इन्द्रयव : अर्शोघ्न, रक्तस्तम्भक, ग्रहणी नाशक।
  26. भल्लातक (भिलावा) : अग्निबर्धक, आमनाशक, अर्शोघ्न, रसायन।

न्यग्रोधादि चूर्ण बनाने की विधि :

उपरोक्त द्रव्यों में आम्र फल, और जामुन फल की बीज मज्जा (बीज का सफेद भाग) , चिरौंजी के बीज, पटोल के पत्र और महुएं के फूल लेने की परम्परा है। शेष द्रव्य जैसे लिखे हैं वैसे ही लेने चाहिये। सभी औषधियों का वस्त्रपूत चूर्ण मिलाकर एक घण्टा खरल करके सुरक्षित कर लें।

उपलब्धता : यह योग इसी नाम से बना बनाया आयुर्वेदिक औषधि विक्रेता के यहां मिलता है।

न्यग्रोधादि चूर्ण की खुराक : Dosage of Nyagrodhadi Churna

दो से पाँच ग्राम प्रातः सायं भोजन से पूर्व ।

अनुपान :

त्रिफला हिम, शीत जल।

(नोट :- हिम = इसमें अभीष्ट मात्रा में अर्थात् 24 ग्राम द्रव्य या औषधि को छह गुने सामान्य जल में पहले दिन शाम को भिगो देते हैं और सुबह हाथ से अच्छी तरह मलकर छान लेते हैं तथा पी जाते हैं)

न्यग्रोधादि चूर्ण के फायदे और उपयोग : Benefits & Uses of Nyagrodhadi Churna in Hindi

बीस प्रकार के प्रमेह में न्यग्रोधादि चूर्ण का उपयोग फायदेमंद

प्रमेह का मुख्य लक्षण “प्रभूताविल मूत्रता” मूत्र अधिक मात्रा में और गंदला आना, न्यग्रोधादि चूर्ण (Nyagrodhadi Churna) से मूत्र की मात्रा निश्चित रूप से कम हो जाती है और मूत्र निर्मल भी हो जाता है। अतः सभी प्रमेहों में लाभदायक है।

पेशाब की जलन दूर करने में लाभकारी है न्यग्रोधादि चूर्ण का सेवन

न्यग्रोधादि चूर्ण में, मूत्र शोधन की अद्भुत शक्ति है। इसी मूत्र शोधक प्रभाव के कारण यह मूत्र दाह, पीड़ा को शान्त करता है। इसकी सहायता के लिए किसी मूत्रल औषधि यथा श्वेत पर्पटी का प्रयोग भी अवश्य करवाना चाहिये। अग्निवर्धन के लिए शंख वटी का प्रयोग भी करवाना चाहिए।

( और पढ़े – पेशाब में जलन के 25 घरेलू उपचार )

मुँहासे (पिडिका) मिटाए न्यग्रोधादि चूर्ण का उपयोग

पिडिका से यहाँ प्रमेह पिडिका का ग्रहण होता है। न्यग्रोधादि चूर्ण में रक्त शोधक, प्रमेह हर, मूत्र संग्रहणीय द्रव्यों का आधिक्य है। अत: मूत्र और रक्त की निरन्तर शुद्धि होते रहने से मुँहासों की उत्पत्ती असम्भव होती है।

मधुमेह में न्यग्रोधादि चूर्ण के इस्तेमाल से फायदा

मधुमेह की चिकित्सा में न्यग्रोधादि चूर्ण का एक महत्त्वपूर्ण स्थान है। यह पुनः पुन: मूत्र प्रवृत्ति को कम करता है क्षुधा और पिपासा को भी कम करता है परन्तु अग्निबर्धक न होने के कारण इसका मधुमेह में स्वतन्त्र प्रयोग नहीं होता । इसे सदैव सर्वेश्वर रस, वसन्त कुसुमाकर रस, शिलाजित्वादि वटी, प्रमेह गज केसरी या पुष्प धन्वा रस के साथ किया जाता है। उपरोक्त रसों की सहायता या उपरोक्त रस इसकी सहायता से अतीव शक्तिशाली प्रभाव वाले बन जाते हैं।

आधुनिक औषधियों की मात्रा को घटाने अथवा उनके स्थान पर आयुर्वेदीय औषधियों को स्थापित करने के लिए, प्रवुद्ध वैद्य न्यग्रोधादि चूर्ण का प्रयोग करवाते हैं । यह औषधि एक सप्ताह में अपना प्रभाव दिखाती है। पूर्ण लाभ के लिए कम-से-कम चालीस दिन तक प्रयोग करवाएँ। अग्निवर्धन के लिए आरोग्यवर्धिनी वटी, लशुनादि वटी, चिंचाभल्लातक वटी, इत्यादि का प्रयोग भी करवाना चाहिए।

रक्त प्रदर में लाभकारी है न्यग्रोधादि चूर्ण का प्रयोग

न्यग्रोधादि चूर्ण 2-5 ग्राम प्रात: सायं भोजन से पूर्व, चावल का पानी (तण्डलोदक) के अनुपान से देने से असृग्दर ( मासिकधर्म का अनियमित या अधिक होना) में आश्चर्य जनक लाभ होता है। केवल दो दिन में रक्त का स्तम्भन हो जाता है। पूर्ण लाभ के लिए दो सप्ताह तक अवश्य प्रयोग करवायें, सहायक औषधियों में रक्तपित्त कुलकण्डण रस, बोलवद्ध रस, तृणकान्त मणि पिष्टि, कावली घास धन सत्व में से किसी एक या दो का प्रयोग करवाएँ।

श्वेत प्रदर मिटाए न्यग्रोधादि चूर्ण का उपयोग

न्यग्रोधादि चूर्ण श्वेत प्रदर की अत्योत्तम औषधि है । आधा चम्मच प्रातः सायं मधु में आलोडित करके चटायें अनुपान में दूध, तण्डुलोदक (चावल का पानी) , या त्रिफला हिम पिलायें।

भल्लातक (भिलावा) रहित न्यग्रोधादि चूर्ण का क्वाथ बनाकर उत्तर वस्ति (वस्ति वह क्रिया है, जिसमें गुदमार्ग, मूत्रमार्ग, अपत्यमार्ग, व्रण मुख आदि से औषधि युक्त विभिन्ना द्रव पदार्थों को शरीर में प्रवेश कराया जाता है।मूत्र मार्ग तथा अपत्य मार्ग से दी जाने वाली वस्ति उत्तर वस्ति कहलाती है) दें।

यह औषध अपना प्रभाव दो दिन में ही दिखा देती है। पूर्ण लाभ के लिए दो सप्ताह तक सेवन आवश्यक है। सहायक औषधियों में पुनर्नवादि मण्डूर, ताप्यादि लोह अथवा प्रदरान्तक लोह का प्रयोग भी करवाएँ।

मुँह के रोग में लाभकारी न्यग्रोधादि चूर्ण (Nyagrodhadi Churna)

(मुख, जिह्वा, गल, तालु, पाक) इन सभी रोगों में न्यग्रोधादि चूर्ण का क्वाथ बनाकर गण्डूष (कूल्ला) धारण करने से तत्काल लाभ होता है। यदि क्वाथ को दो बूंट पी लिया जाए तो और भी शीघ्र लाभ होता है, व्रणों का कारण यदि कोई अन्य रोग संग्रहणी इत्यादि हो तो उसका भी प्रतिकार करें।

योनि गत रोगों में लाभकारी है न्यग्रोधादि चूर्ण का प्रयोग

विवृता (‘विवृता’ अर्थात् महायोनि, जिसका कि मुख बहुत चल वा खुला हो ) एवं अन्य योनि गत रोगों में यहाँ योनि संकोचन अथवा योनि दृढी करण की आवश्यकता हो तो न्यग्रोधादि चूर्ण के क्वाथ अथवा शृत शीत फाण्ट से उत्तर वस्ति देने या योनि प्रक्षालन करने से तत्काल लाभ मिलता है, योनि शुष्क, दृढ़ और संकुचित हो जाती है।

( और पढ़े – योनि रोग के कारण और उनकी चिकित्सा )

घाव (व्रण) ठीक करने में न्यग्रोधादि चूर्ण फायदेमंद

चिरकारी गन्दे हठीले व्रण जिनसे सदैव पूय निकलता हो जिनके किनारे ऊँचे हो गए हों को न्यग्रोधादि चूर्ण के क्वाथ से धोने से व्रण सिकुड़ने लगते हैं । पूयोत्पत्ती रुक जाती है और व्रण भरने लगते हैं। सहायक औषधियों में जात्यादि तैल का पिचु और गंधक रसायन खाने को दे।

पायरिया मिटाता है न्यग्रोधादि चूर्ण

मसूड़े फूलने, उनसे रक्तस्राव, वेदना, चलित दन्त इत्यादि में न्यग्ग्रेधादि चूर्ण क्वाथ के गण्डूष धारण करवाएँ। न्यग्रोधादि के अत्यन्त श्लक्षण चूर्ण से मञ्जन करवायें और 2-5 ग्राम न्यग्रोधादि चूर्ण प्रात: सायं, शीतल जल से सेवन करवाने पर पायरिया की समस्या का समाधान हो जाता है। चिकित्सावधि चालीस दिन।

( और पढ़े – पायरिया का आयुर्वेदिक इलाज )

बवासीर में फायदेमंद न्यग्रोधादि चूर्ण का औषधीय गुण

बवासीर एवं उनकी सूजन में न्यग्रोधादि क्वाथ में बैठाने (Sitz Bath) में मस्से सिकुड़ने लगते हैं। सूजन और वेदना समाप्त हो जाती है।

न्यग्रोधादि चूर्ण के दुष्प्रभाव और सावधानीयाँ : Nyagrodhadi Churna Side Effects in Hindi

  • न्यग्रोधादि चूर्ण लेने से पहले अपने चिकित्सक से परामर्श करें ।
  • न्यग्रोधादि चूर्ण, कषाय रस प्रधान औषधियों का योग है । कषाय रस से अग्निमान्द्य संभव है। अत: इसके प्रयोग काल में अग्नि का ध्यान रखना आवश्यक है। वैसे ग्रंथकार ने अग्निवर्धन के लिए चित्रक और भल्लातक (भिलावा) की योजना की है, परन्तु यह मात्र दो द्रव्य है, अन्य 25 द्रव्य कषाय रस प्रधान है। अतः अग्नि पर अवश्य ध्यान दें।
  • भल्लातक (भिलावा) कुछ लोगों को अनुकूल नहीं रहता, अत: उसकी प्रतिक्रिया पर भी दृष्टि रखना आवश्यक है। भल्लातक का हीन मात्रा में प्रयोग करवाने से कोई प्रतिक्रिया नहीं होती, फिर भी उत्तर वस्ति Sitz Bath और गण्डूष के लिए प्रयोग किए जाने वाले कल्पों में अनुभवी चिकित्सक भल्लातक नहीं मिलाते।

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