शरीर का कायाकल्प करने वाले 20 सूत्र | Kayakalp Sutr in Hindi

कायाकल्प करने वाले आहार-विहार के 10 सूत्र : Sharir ka Kayakalp Karne kaTarika

sharir ka kayakalp kaise kare

शरीर एक यन्त्र की भांति है जिसके सभी कलपुर्जे यानी अंग-प्रत्यंग ठीक से काम करते रहें तो यह शरीररूपी यन्त्र सही ढंग से काम करता है और भला-चंगा बना रहता है। इसे भला चंगा बनाए रखने वाले, आहार-विहार से सम्बन्धित 10 सूत्र यहां प्रस्तुत किये जा रहे हैं। इन पर पूरी तरह अमल करें तो शरीर का काया-कल्प हो सकता है।

(1). सूर्योदय होने से पहले शौच, स्नान, योगासन या व्यायाम तथा वायुसेवन के लिए 3-4 किलोमीटर तेज़ चाल से चलना आदि नित्य कर्मों से निवृत हो जाना चाहिए। इसके लिए सूर्योदय होने से डेढ़ घण्टे पहले उठना चाहिए।

(2). दोनों वक्त का भोजन ठीक समय पर करें। प्रत्येक कौर को 32 बार चबाने का ध्यान रखें, भोजन के अन्त में 1-2 बूंट से ज्यादा पानी न पिए। भोजन करने के एक घण्टे बाद एक गिलास पानी पी लें। एक वक्त में एक गिलास से ज्यादा पानी न पिएं।

(3). भोजन के अन्त में या साथ साथ छाछ अवश्य पिया करें। भोजन के अन्त में आगरे का पेठा या थोड़ा सा गुड़ खा लिया करें। इससे पित्त प्रकोप नहीं होता और एसिडिटी या हायपर एसिडिटी होने की सम्भावना समाप्त हो जाती है।

(4). भोजन करके उठे और चित्त लेट कर 8 बार लम्बी गहरी सांस लेते हुए, मन ही मन, एकाग्रचित हो कर प्रभु नाम का स्मरण करते रहें। इसके बाद दायीं करवट लेट कर 16 बार और फिर बायीं करवट लेट कर 32 बार लम्बी गहरी सांस लें। इसके बाद उठ कर काम से लग जाएं। यह अभ्यास करना इसलिए आवश्यक और उपयोगी होता है कि भोजन करने के तुरन्त बाद मानसिक या शारीरिक परिश्रम करने से पाचन क्रिया ठीक से नहीं हो पाती जिससे अपच होती है और शरीर में निर्बलता आती है। इस अभ्यास में 56 बार सांस लेने तक शरीर को विश्राम मिल जाता है और हम तत्काल श्रम करने से बच जाते हैं।

(5). पचास वर्ष की आयु के बाद आहार में शक्कर, नमक, तैल और घी का सेवन अपनी पाचन शक्ति के अनुकूल मात्रा में ही करना चाहिए, आदत के अनुसार ज्यादा मात्रा में नहीं। गरिष्ठ तले हुए और तेज़ मिर्च मसाले वाले पदार्थों का सेवन कम से कम मात्रा में करना चाहिए। भूख से थोड़ी कम मात्रा में खाना चाहिए । कम खाना और ग़म खाना । स्वास्थ्य के लिए अच्छा होता है।

(6). भोजन में चपाती (रोटी) की अपेक्षा सब्ज़ी, दाल, दही या छाछ, सलाद और कोई एक मौसमी फल अधिक मात्रा में सेवन किया करें। इससे पाचन क्रिया अच्छी रहती है और शरीर पर मोटापा नहीं चढ़ता।

(7). दो बार खाना और दो बार पाखाना – जरूरी समझे यानी सुबह और शाम को या रात को
सोने से पहले पाखाने के लिए जरूर जाया करें। कई लोग सिर्फ सुबह एक बार ही पाखाने के लिए जाते हैं शाम को नहीं जाते। यह आदत हानिकारक है । पाखाना आये न आये, फिर भी जाकर शौचालय में 5 मिनिट बैठना चाहिए । जोर न लगाएं, सिर्फ बैठ कर 5 मिनिट प्रतीक्षा करें।

(8). सुबह छाछ और सोते समय दूध अवश्य पीना चाहिए। रात को दही नहीं खाना चाहिए, खट्टा दही नहीं खाना चाहिए, दही में थोड़ा पानी मिलाए बिना नहीं खाना चाहिए, बाज़ार का दही नहीं खाना चाहिए। सिर्फ घर में जमाया हुआ दही, खाना चाहिए और जब तक खाएं नहीं तब तक दही कटना नहीं चाहिए। कटा हुआ दही खट्टा होता जाता है जिससे रोगकारक हो जाता है।

(9). दिन में 7-8 बार 1-1 गिलास पानी पीना चाहिए, 5-6 बार मूत्र त्याग करना चाहिए और सुबह-शाम मल विसर्जन करना चाहिए।

(10). आहार को बहुत शान्त, एकाग्र और प्रसन्न मन से खूब चबा चबा कर ग्रहण करना चाहिए। चिन्ता, शोक, क्रोध या ईष्या करते हुए भोजन नहीं करें। अभक्ष्य पदार्थ न खाएं। जल्दी-जल्दी, गप्पें लड़ाते हुए और खड़े-खड़े न खाएं, हाथ पैर धोकर, कुल्ले करके मुंह साफ़ करके पूरे मनोयोग के साथ भोजन किया करें।भोजन के आरम्भ और अन्त में प्रभु का स्मरण कर धन्यवाद देना चाहिए।

कायाकल्प करने वाले आचार-विचार के 10 सूत्र :

शरीर जो भी चेष्टा करता है वह मन के आदेश पर करता है, इन्द्रियांजो भी कर्म करती हैं वह मन के आदेश पर करती हैं इसलिए हमारे द्वारा किये गये किसी भी कर्म के लिए हमारा शरीर या इन्द्रियां ज़िम्मेदार नहीं बल्कि हमारा मन, हमारी विचारधारा, हमारी मनोवृत्ति, हमारा स्वभाव ज़िम्मेदार होता है। जैसे हमारे विचार होते हैं वैसा ही हमारा आचरण होता है इसलिए हमें हमारे मन पर, हमारे विचारों पर विवेक का नियन्त्रण रखना होगा ताकि मन शुभ-शुभ सोचे, शुभ-शुभ विचार करे। आचार-विचार से सम्बन्धित 10 सूत्र यहां प्रस्तुत किये जा रहे हैं।

(1). कोई भी काम करने से पहले, आगा पीछा अच्छी तरह सोच लें कि काम का परिणाम क्या होगा क्योंकि कार्य वही अच्छा होता है जिसका हेतु और परिणाम अच्छा हो।

(2). इन्द्रियों को वश में रखने के लिए मन को एकाग्र और नियन्त्रित रखना बहुत ज़रूरी होता है और ऐसी कोशिश सतत रूप से करते रहना चाहिए क्योंकि मन का क्या भरोसा, कब बहक जाए, कब मचल जाए और सही राह से भटक जाए।

(3). वक्त की पाबन्दी बहुत बड़ी चीज होती है। जहां तक सम्भव हो सके, हर काम को नियत समय पर ही करना चाहिए। इससे काल सिद्ध होता है जिससे कई लाभ होते हैं।

(4). अपने दैनिक कार्यों को ‘क्रीड़ा’ समझ कर रुचि और उत्साह के साथ करना चाहिए। दत्त चित्त होकर काम करने से काम कुशलता पूर्वक सम्पन्न किया जा सकता है। कार्य को मनोरंजन समझ कर करने से न तो थकावट होती है और न उकताहट ही।

(5). कोई भी काम कितना ही अच्छा हो, आनन्ददायक हो फिर भी उस काम में अति नहीं करनी चाहिए। अति करने से अच्छा काम भी बुरा फल देने वाला हो जाता है और मजेदार काम दुःख देने वाला।

(6). किसी का बुरा न चाहें और न किसी का बुरा करें क्योंकि इसका नतीजा आज नहीं तो कल बुरा ही होगा। गुजरी हुई बुरी बात या घटना का शोक नहीं करना चाहिए सिर्फ आगे के लिए शिक्षा ग्रहण कर लेना चाहिए।

(7). मन में दया, करुणा, ममता, हमदर्दी, परोपकार और दानशीलता की भावना रखना चाहिए और क्रूरता, कठोरता, परायापन, बेरहमी, स्वार्थीपन, कंजूसी और क्रोध की भावना आदि दुर्गुणों से बच कर रहना चाहिए।

(8). यदि काम करते करते थकावट और निर्बलता का अनुभव होतो तत्काल काम रोक कर थोड़ी देर शवासन की मुद्रा में लेट कर विश्राम कर लेना चाहिए। नींद, प्यास,मल व मूत्र त्याग, भूख, छींक और जम्भाई – इनके वेग को रोकना नहीं चाहिए।

(9). दूसरे की निन्दा करना, पीठ पीछे आलोचना करना, अकारण बेकार का वाद – विवाद करना, चुगली करना, बात का बतंगड़ बनाना – ये सब काम अशान्ति एवं उपद्रव कराते हैं अतः ऐसे काम नहीं करना चाहिए।

(10). काम करते हुए हमेशा मन में प्रभु का स्मरण करते रहना चाहिए।जब भी कोई काम न हो, मन खाली हो तब नाम का जप करने लगना चाहिए । इस भावना को मजबूत करना चाहिए कि मैं अकेला नहीं है। ईश्वर मेरे साथ है, मुझे उसकी कृपा और शक्ति प्राप्त है। Trust in God & Do the Right यानी ईश्वर पर भरोसा रखो और सद्कर्म करो इस सूत्र पर सुदृढ़ विश्वास रख कर प्रबल पुरुषार्थ करते रहना चाहिए।

प्रत्येक काम विवेक, धैर्य और साहस के साथ करते हुए फल ईश्वर पर छोड़ देना चाहिए। “हिम्मते मर्दा मददे खुदा” के अनुसार हमेशा हिम्मत से काम लेकर ईश्वर पर अटल विश्वास रखना चाहिए और इस धारणा को निःशंक तथा सुदृढ़ बनाए रखना चाहिए कि “जिसका साथी हो भगवान, उसको क्या रोकेगा, आंधी या तूफान” । किसी शायर ने यही भावना अपने शब्दों में व्यक्त करते हुए बहुत लाजवाब और कहा है –
फानूस बनके जिसकी, हिफ़ाज़त हवा करे।
वह शमा क्या बुझे जिसे रोशन खुदा करे।

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