श्रीमद्भगवद्गीता के विषय में पाश्चात्य विद्वानों के मंतव्य | Shrimad Bhagavad Gita

(१) प्राचीन युग की सर्व रमणीय वस्तुओं में भगवद्गीता(गीता /Bhagavad Gita) से श्रेष्ठ कोई वस्तु नहीं है । गीता में ऐसा उत्तम और सर्वव्यापी ज्ञान है कि उसके रचयिता देवता को असंख्य वर्ष हो गये, फिर भी ऐसा दूसरा एक भी ग्रंथ नहीं लिखा गया ।… गीता के साथ तुलना करने पर जगत का आधुनिक समस्त ज्ञान मुझे तुच्छ लगता है ।… मैं नित्य प्रातःकाल अपने हृदय और बुद्धि को गीतारूपी पवित्र जल में स्नान कराता हूँ ।
महात्मा थोरो (अमेरिका)

(२) श्रीमद्भगवद्गीता (गीता /Bhagavad Gita)भारत के विभिन्न मतों को मिलानेवाली रज्जु तथा राष्ट्रीय-जीवन की अमूल्य संपत्ति है । भारतवर्ष का राष्ट्रीय धर्मग्रंथ बनने के लिए जिन-जिन विशेष गुणों की आवश्यकता है, वे सब श्रीमद्भगवद्गीता में मिलते हैं । इसमें केवल उपयुक्त बातें ही नहीं हैं अपितु यह भावी विश्वधर्म का सर्वोपरि धर्मग्रंथ है । भारतवर्ष के प्रकाशपूर्ण अतीत का यह महादान मनुष्य-जाति के और भी उज्ज्वल भविष्य का निर्माता है ।
– मि. एफ.टी. बू्रक्स

(३) किसी भी जाति को उन्नति के शिखर पर चढाने के लिए गीता का उपदेश अद्वितीय है ।
– वॉरेन हेस्टिंग्स (भारत का वायसराय)

(४) जगत के संपूर्ण साहित्य में चाहे सार्वजनिक लाभ की दृष्टि से देखा जाय, चाहे व्यावहारिक प्रभाव की दृष्टि से देखा जाय, भगवद्गीता के जोड का अन्य कोई भी काव्य नहीं है । दर्शनशास्त्र होते हुए भी यह सर्वदा पद्य की भाँति नवीन और रसपूर्ण है । इसमें मुख्यतः तार्किक शैली होने पर भी यह एक भक्तिग्रंथ है । यह भारतवर्ष के प्राचीन इतिहास के अत्यंत घातक युद्ध का एक अभिनयपूर्ण दृश्य-चित्र होने पर भी शांति तथा सूक्ष्मता से परिपूर्ण है और सांख्य- सिद्धांतों पर प्रतिष्ठित होने पर भी यह उस सर्वस्वामी की अनन्य भक्ति का प्रचार करता है । अध्ययन के लिए इससे अधिक आकर्षक सामग्री अन्यत्र कहाँ उपलब्ध हो सकती है ?
– जे.एन. फरख्युहर

(५) श्रीमद्भगवद्गीता योग का एक ऐसा ग्रंथ है जो किसी जाति, वर्ण अथवा धर्मविशेष के लिए ही नहीं अपितु सारी मानव-जाति के लिए उपयोगी है ।
– डॉ. मुहम्मद हाफिज सैयदShrimad Bhagavad Gita

(६) श्रीमद्भगवद्गीता समझने का एकमात्र उपाय उसे पढना और बार-बार पढते रहना, हृदयंगम करना और मन में धारण करना है, जिससे कि वह स्मृति-पटल पर अमिटरूप से अंकित हो जाय । भगवद्गीता के विचारों में निमग्न रहने पर यह अपने उपासक के आचरण को बदल देती है । इससे शीघ्र ही उसके विचार तथा कर्म स्वयमेव ही गीता के अनुसार होने लगेंगे ।
– हाल्डेन एडवर्ड सैंपसन

(७) भारतवर्ष के धर्म में गीता बुद्धि की प्रखरता, आचार की उत्कृष्टता एवं धार्मिक उत्साह का एक अपूर्व मिश्रण उपस्थित करती है । गीता सच्ची शांति एवं सच्चा सुख प्रदान करती है ।
– डॉ. मेकनिकल

(८) श्रीमद्भगवद्गीता को असंख्य मनुष्यों ने सुना, पढा तथा पढाया है और आत्मा को प्रभु की ओर अग्रसर करने में गीता अत्यंत आशाजनक सिद्ध हुई है । गीता का संदेश अनंत प्रे के अभिलाषियों के लिए प्रत्येक स्थान एवं समय पर अपनी असीम दया की वर्षा क रना तथा जीवन के सभी कार्यों का परमात्मा की निःस्वार्थ सेवा के निमित्त समर्पण करना है ।
– डॉ. लिओनेल डी. बैरट

(९) संसार में जितने भी ग्रंथ हैं उनमें भगवद्गीता जैसे सूक्ष्म और उन्नत विचार कहीं नहीं मिलते। जिस समय मैंने इसे पढा, उस समय से मैं विधाता का सदा के लिए ऋणी बन गया कि उन्होंने मुझे इस ग्रंथ का परिचय प्राप्त करने के लिए जीवित रखा । आध्यात्मिक काव्य का जो सच्चा आदर्श है, उसके जितने समीप गीता पहुँच पायी है, उतना इस विषय का कोई भी प्राचीन ग्रंथ, जो हमें आज उपलब्ध है, नहीं पहुँच सका है ।
– डॉ. विल्हेल्म फान हुम्बोल्ट (जर्मनी)

(१०) भारतवर्ष के धार्मिक-साहित्य का कोई अन्य ग्रंथ भगवद्गीता (गीता /Bhagavad Gita)के समान स्थान प्राप्त करने योग्य नहीं प्रतीत होता ।
– डॉ. रिचार्ड गार्वे

(११) प्रसिद्ध दार्शनिक स्पीनोजा के मतानुसार- ‘वह सगुण ईश्वर जगत से अलग न रहकर प्रकृति के अंदर अनुस्यूत है ।किंतु भगवद्गीता के अनुसार ‘ईश्वर जगत से बाहर भी है और जगत के भीतर भी । यही कारण है कि यूरोपीय विद्वानों को गीता का यह सिद्धांत सदा ही अनोखा लगा है ।
– डॉ. हेल्मुट ग्लाजेनप्प

(१२) भारतीय वाङ्मय के बहुशाखीय वृक्ष पर भगवद्गीता (गीता /Bhagavad Gita)एक अत्यंत कमनीय एवं शोभा संपन्न सुमन है । इस अत्युत्तम ग्रंथ में प्राचीन- से-प्राचीन और नवीन-से-नवीन प्रश्न का विविध भाँति से विवेचन किया गया है कि मोक्षोपयोगी ज्ञान कैसे प्राप्त हो सकता है । इस चमत्कारपूर्ण काव्यमय ग्रंथ में हमें उपरोक्त विचार नित्य नये रूप में मिलते हैं । भगवद्गीता में दर्शनशास्त्र और धर्म की धाराएँ साथ-साथ प्रवाहित होकर एक-दूसरे के साथ मिल जाती हैं । भगवद्गीता और भारत के प्रति हम लोग (जर्मन लोग) आकर्षित होते रहते हैं ।
– डॉ. एल्जे. ल्युडर्स (जर्मनी)

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