वीर्यदोष नाशक तुलसी के चमत्कारी नुस्खे | Virya Dosh Dur Karne Ke Upay

तुलसी का पौधा भारतवर्ष में प्रायः सर्वत्र देखा जाता है । यद्यपि इसका प्रयोग समूचे शरीरतन्त्र पर प्रभावकारी रहता है, इसलिये सभी रोगों के शमन की क्षमता इस वनस्पति में मानी जाती है। किन्तु प्रजनन- तन्त्र पर भी इसका अनुकूल प्रभाव देखा जाता है और इसके लिये तुलसी के विभिन्न योग व्यवहार में लाये जाते हैं । भारतवासियों की तो भावनाएँ भी तुलसी के साथ जुड़ी हैं, इसलिये इसके सेवन में औषधि प्रभाव और आस्था, दोनों ही मिल कर अधिक अनुकूलता का वातावरण उपस्थित करता है। यहाँ तुलसी के ऐसे कुछ योग, जो अपना बल- वीर्य वर्धक और बाजीकरण प्रभाव उत्पन्न करते हैं, प्रस्तुत किये जा रहे हैं।

तुलसी के वीर्यदोष नाशक योग :

1- तुलसी के बीज और काली मूसली के बीज 2-2 भाग, तुलसीदल 1 भाग लें । बीजों को महीन चूर्ण करें और फिर प्रत्ते डालकर जलयोग से घोट कर, शहद मिला कर सेवन करें। इससे शरीर में बल वीर्य की वृद्धि होती है।

2- तुलसी और गिलोय का समान भाग स्वरस शहद के साथ सेवन करने से प्रमेह में लाभ होता है।

3- तुलसीदल और गुलाब की पंखुड़ियाँ, समान भाग मिश्री मिला कर सेवन कराने से शुक्रदोष दूर होते हैं।

4- तुलसीदल के साथ दूध, दही, शहद, घृत और शर्करा मिला कर बनाया गया पंचामृत बल- वीर्य वर्धक, नवोल्लास प्रदायक और विकृत पित्त को शान्त करने वाला, तथा पित्तज प्रमेह के उपसर्गों को दूर करने वाला एवं पौष्टिक है। वैष्णव पूजा में बनाये जाने वाले पंचामृत के साथ तुलसीपत्र डालने की भावना, इस उद्देश्य की पूर्ति में भी सोने में सुगन्ध की आकांक्षा की पूर्ति करती है।

5- तुलसी की जड़ को जल- योग से घिस कर जननेन्द्रिय पर लेप करने से उस अंग की शक्ति बढ़ती है तथा बाजीकरण प्रभाव उत्पन्न होता है।

6- तुलसीपत्र 10, असगन्ध का चूर्ण 3 ग्राम, दालचीनी का चूर्ण 3 ग्राम लेकर आधापाव पानी में खौला कर उतार लें तथा ठंडा होने पर उसमें मिश्री और दूध मिला कर पीयें । इसका नित्य प्रातःकाल नियमित प्रयोग करने से कोई रोग नहीं रहता, वीर्य- विकारों से छुटकारा मिलता और शरीर में बल- वीर्य की वृद्धि होती है। निस्सारक होने के कारण आलस्य, उदासी आदि पर भी नियन्त्रण होता है तथा बाजीकरण की शक्ति भी स्वतः उत्पन्न होने लगती है।

7- नित्य प्रति प्रातः- सायं 5 से 10 नग तुलसीपत्र, कुछ मिश्री के साथ सेवन करते रहें तो भी शरीर निरोग होता है तथा प्रमेह के सभी उपसर्ग- धातुक्षय, शुक्रतारल्य, स्वप्नदोष आदि का अन्त हो जाता है तथा स्तम्भन शक्ति में भी तीव्र वृद्धि होती है।

10- तुलसीदल का स्वरस, मधु और वंगभस्म के योग से खरल में घोट कर चना के बराबर गोलियाँ बना लें । मात्रा -1-2 गोली जल के साथ, अथवा गोदुग्ध के साथ सेवन करते रहने से शरीर में बल- वीर्य की वृद्धि होती है।

11-तुलसी स्वरस में वंगभस्म मिला कर सेवन करते रहने से शरीर एवं जननेन्द्रिय शक्ति बढ़ती है। तुलसी पत्र का स्वरस और करेलों का स्वरस मिला कर सेवन करने से शर्करामेह मधुमेह में आशातीत लाभ होता है।

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