पूज्य बापू जी का संदेश

ऋषि प्रसाद सेवा करने वाले कर्मयोगियों के नाम पूज्य बापू जी का संदेशधन्या माता पिता धन्यो गोत्रं धन्यं कुलोद्भवः। धन्या च वसुधा देवि यत्र स्याद् गुरुभक्तता।।हे पार्वती ! जिसके अंदर गुरुभक्ति हो उसकी माता धन्य है, उसका पिता धन्य है, उसका वंश धन्य है, उसके वंश में जन्म लेने वाले धन्य हैं, समग्र धरती माता धन्य है।""ऋषि प्रसाद एवं ऋषि दर्शन की सेवा गुरुसेवा, समाजसेवा, राष्ट्रसेवा, संस्कृति सेवा, विश्वसेवा, अपनी और अपने कुल की भी सेवा है।"पूज्य बापू जी

यह अपने-आपमें बड़ी भारी सेवा है

जो गुरु की सेवा करता है वह वास्तव में अपनी ही सेवा करता है। ऋषि प्रसाद की सेवा ने भाग्य बदल दिया

अभ्रक भस्म के चमत्कारिक लाभ व उसकी संपूर्ण जानकारी | Abhrak Bhasma Benefits in hindi

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अभ्रक भस्म के चमत्कारिक लाभ व उसकी संपूर्ण जानकारी | Abhrak Bhasma Benefits in hindi

अभ्रक भस्म आयुर्वेद में प्रयोग की जानी वाली जानी-मानी दवाई है। इसे अकेले तथा अन्य घटकों के साथ मिलाकर देने से बहुत से रोगों का नाश होता है। यह कफ रोगों, उदर रोगों, नसों की कमजोरी, पुरुषों के विकारों में बहुत लाभप्रद है। यह त्रिदोष के रोगों, प्रमेह, कुष्ठ, टी.बी., लीवर-स्पलीन रोगों, बुखार, गुल्म, ग्रन्थि, कमजोरी, हृदय रोग, उन्माद, वीर्यपात, नपुंसकता, नसों की कमजोरी, आदि में बहुत लाभकारी है। इसके सेवन से शरीर में लोहे की कमी दूर होती है।

अभ्रक भस्म में लोहा प्रमुखता से होता है इसके अतिरिक्त इसमें मैग्नीशियम, पोटासियम, कैल्शियम, एल्युमीनियम भी कम मात्रा में पाए जाते है। यह यौन दुर्बलता को दूर करने वाली औषधि और इसमें वाजीकारक गुण हैं। यह प्रसूत रोगों में भी प्रयोग की जाती है।

अभ्रक भस्म, कसैली, मधुर, तासीर में ठंडी, आयु वर्धक, धातु वर्धक, रसायन है। यह त्रिदोष, घाव, प्रमेह, पेट रोग, कफ रोग, वीर्य विकार, गांठ, विष और कृमि को नष्ट करने वाला है। यह धातुओं में स्निग्धता उत्पन्न करती है। यह अत्यंत शीत वीर्य है।

सामान्य जानकारी

अभ्रक भारत के कई प्रदेशों में पाया जाता है। यह बंगाल के रानीगंज, बिहार में हजारी बाग़, गिरीडीह, राजस्थान के चित्तौड़ और भीलवाड़ा में खानों में मिलता है। वज्राभ्रक, हिमालय, हिमाचल, भूटान आदि में पाया जाता है। यह परतदार पारदर्शी, मुलायम, मिनरल है। आयुर्वेद में हिमालय से मिलने वाला अभ्रक उत्तम जबकि पूर्वीय देशों से प्राप्त मध्यम और दक्षिण पर्वतों से प्राप्त निषिद्ध माना जाता है।

कथा के अनुसार, जब देवराज इंद्र ने वृत्रासुर को मारने के लिए अपना वज्र उठाया तब उससे निकला प्रकाश, आकाश में फ़ैल गया और वह बादलों की तरह शब्द करता हुआ पर्वतों के शिखरों पर गिरा। इसी वज्र से निकले प्रकाश से अभ्रक की उत्पति हुई।

आयुर्वेदिक नाम: अभ्रक, गगन, भृंग, अभ्र, व्योम, वज्र, घन, गिरिज, बहुपत्र, अनन्तक, आकाश, अम्बर, मेघ।

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नाम: अभ्रक, अबरक, अभ्र, माइका
आयुर्वेद में इसके चार भेद माने गए हैं:

पिनाक अभ्रक: यह आग में डालने पर परतों में अलग हो जाता है।
ददूर्र अभ्रक: यह आग में डालने पर मेंढक की तरह टर्र-टर्र आवाज़ करता है।
नाग अभ्रक: यह आग में डालने पर सांप की फुंफकार की थ अव्वाज़ करता है।
वज्राभ्रक: यह आग में डालने पर न तो आवाज़ करता है और न ही अपना रूप बदलता है। यह सब अभ्रकों में श्रेष्ठ है।

आयुर्वेद में दवाई बनाने के लिए केवल वज्राभ्रक का प्रयोग किया जाता है। इसमें लोहा अधिक होता है इसलिए यह काले रंग का होता है और आग में डालने पर विकृत नहीं होता।

अभ्रक को आयुर्वेद भस्म के रूप में ही प्रयोग किया जाता है। भस्म के लिए शोधन और मारण दिए हुए तरीके से करते है। अशोधित अभ्रक या चंद्रिकयुक्त अभ्रक, का सेवन करने से अनेक रोग शरीर में उत्पन्न होते है।

अभ्रक भस्म के फायदे : abhrak bhasma benefits in hindi

<> इसके सेवन से शरीर सुदृढ़ और बलवान होता है।
<> यह बलकारक, त्रिदोषघ्न, यकृत की रक्षा करने वाली और रसायन औषधि है।
<> यह अनीमिया को दूर करती है और रक्त धातु को पोषित करती है।
<> यह उत्तम वाजीकारक है और कामेच्छा को बढाती है।
<> यह स्पर्म की संख्या बढ़ाने में मदद करती है।
<> यह धातुओं की क्षीणता को दूर करती है।
<> लीवर के रोगों, इसका सेवन करने से रोग दूर होता है और लीवर की रक्षा होती है।
<> यह कफ रोगों को दूर करने वाली औषध है।
<> यह त्वचा रोगों विशेषकर लेप्रोसी में अच्छे परिणाम देती है।
<> यह कमजोरी, मन्दाग्नि, वीर्य दोष, धातु की कमी, मानसिक और शारीरिक थकावट को दूर करने वाला रसायन है।
<> यह योगवाही है और अपने साथ मिले अवयवों के गुण बढ़ाती है।
<> यह केश्य ( बालों को पोषण) है।
<> यह वर्ण्य (त्वचा को पोषण) है।
<> यह दीपन (पाचक रस उत्पन्न) है।
<> यह सभी धातुओं का पोषण करती है।

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अभ्रक भस्म शतपुटी और सहस्रपुटी

अभ्रक भस्म को १० से लेकर १००० तक गजपुट देते हैं और उसकी के अनुसार अभ्रक भस्म को दसपुटी, शतपुटी और सहस्रपुटी कहा जाता है।

जितना अधिक पुट दिया जाता है दवा उतनी की लाभकारी बनती है।

अभ्रक भस्म शतपुटी: इसे १०० बार भस्म बनाने की प्रक्रिया से गुजारते है। यह साधारण भस्म की तुलना में विशेष गुणों से युक्त होती है। इसे रोगों के उपचार में प्रयोग किया जाता है।

अभ्रक भस्म सहस्रपुटी : इसे १००० बार भस्म बनाने की प्रक्रिया से गुजारते है। इसलिए यह शतपुटी से अधिक गुणों वाली होती है। यह मुख्यतः रोगों को फिर से न होने देने और रसायन की तरह प्रयोग किया जाता है।

अभ्रक भस्म के चिकित्सीय उपयोग Abhrak Bhasma Therapeutic Uses

<> अग्निमांद्य (Digestive impairment)
<> ग्रहणी (Malabsorption syndrome)
<> प्लीहा रोग (Splenic disease)
<> उदर रोग (Diseases of abdomen / enlargement of abdomen)
<> कृमि रोग (Helminthiasis/Worm infestation)
<> यकृत रोग Diseases of liver
<> कफ़रोग (Disease due to Kapha dosha)
<> कास (Cough)
<> श्वास (Dyspnoea/Asthma)
<> ज्वर (Fever)
<> रक्तपित्त (Bleeding disorder)
<> प्रमेह (Urinary disorders)
<> मूत्रकृच्छ Burning urination
<> मूत्राघात Retention of urine
<> किडनी रोग Renal diseases
<> पाण्डु (Anemia)
<> केशपतन (Falling of hair)
<> त्वचा रोग (Skin disease)
<> जरा (Senility/Progeriasis)
<> नपुंसकता (Impotency)
<> वीर्यपात Spermatorrhea
<> स्पर्म की कम संख्या Low sperm count
<> यौन दुर्बलता Sexual weakness, Improving fertility and vigour
<> कुष्ठ (Diseases of skin)
<> ग्रंथि (Cyst), विषा (Poison)
<> रसायन Used as Rasayana (Nutrient to body and mind with adapto-immuno-neuro-endocrino-modulator properties)
<> मानसिक रोग, मिर्गी, उन्माद, स्म्रितिनाश, नींद न आना, हिस्टीरिया
हृदय की दुर्बलता

अभ्रक की औषधीय मात्रा :

abhrak bhasma uses

<> अभ्रक भस्म की औषधीय मात्रा १-२ रत्ती या 125 mg-250mg है।

<> अभ्रक भस्म को रोग अनुसार अनुपान के साथ दिया जाता है।

<> बीसों प्रकार के प्रमेह, में इसे शिलाजीत या गिलोय के सत्व के साथ दिया जाता है।

<> चमड़ी के विकारों में इसे खदिरारिष्ट के साथ दिया जाता है।

<> पेट के रोगों में इसे कुमार्यासव के साथ लेना चाहिए।

<> संग्रहणी में इसे कुटजावालेह के साथ लेना चाहिए।

<> मन्दाग्नि में इसे त्रिकटू के साथ और ब्लीडिंग पाइल्स में शुक्तिपिष्टी के साथ लेना चाहिए।

<> अनीमिया, पीलिया में इसे मंडूर + अमृतारिष्ट के साथ लेना चाहिए।

<> टी. बी. में इसे गिलो के सत्व + प्रवाल पिष्टी + श्रृंग भस्म के साथ लेना चाहिए।

<> दमे, सांस रोग, इसे पिप्पली चूर्ण + शहद के साथ लेना चाहिए।

<> कफ वाली खासी में इससे वासवालेह के साथ और सूखी खांसी में इसे प्रवाल पिष्टी + सितोपलादि चूर्ण के साथ लेना चाहिए।

<> दिमागी कमजोरी और थकान में इसे मुक्तापिष्टी के साथ लेना चाहिए।

<> हृदय रोग में शहद के साथ लेना चाहिए।

<> प्रसव के बाद के रोगों में दशमूल के काढ़े के साथ लेना चाहिए।

<> साधारण ज्वर में इसे रस सिन्दूर के साथ लेना चाहिए।

<> पुराने बुखार में इसे पिप्पली चूर्ण + शशाद के साथ लेना चाहिए।

<> आँखों की रौशनी बढ़ाने के लिए, त्रिफला + शहद के साथ लेना चाहिए।

<> ब्लीडिंग डिसऑर्डर में इसे वासा के रस के साथ लें।

<> कमजोरी में इसे च्यवनप्राश के साथ, लीवर डिसऑर्डर में मंडूर भस्म के साथ लेना चाहिए।

<> धातु वृद्धि के लिए, सोना चांदी की भस्म ३० mg + छोटी इलाइची का चूर्ण + शहद/मक्कन के साथ लें।

<> धातु की कमी में इसे, लौंग के चूर्ण + शहद के साथ लें।

<> वीर्य के लिए इसे भांग के चूर्ण के साथ लें।

<> धातुक्षय, मधुमेह में इसे कान्त लौह भस्म १२५ mg + शुद्ध शिलाजीत १२५ mg के साथ, दिन में दो बार लें।

<> पुराने बुखार, संग्रहणी, पीलिया, में अभ्रक भस्म 375 mg + कान्त लौह भस्म 375 mg + सोने की भस्म 125 mg मिलकर ६ खुराकें बनाकर दिन में दोबार दाड़ीमावालेह के साथ लें।
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