एक लोटा पानी (बोध कथा) | Prerak Hindi Kahani

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एक लोटा पानी (बोध कथा) | Prerak Hindi Kahani

शिक्षाप्रद कहानी : Hindi Moral Story

★ चैतका महीना था। ग्वालियर राज्यका मशहूर डाकू परसराम अपने अरबी घोड़ेपर चढ़ा हुआ, जिला दमोहके देहातमें होकर कहीं जा रहा था। लकालक दोपहरी थी। प्यासके कारण परसरामका गला सूख रहा था। कोई तालाब, नदी या गाँव दिखायी न देता था। चलते-चलते एक चबूतरा मिला, जिसपर एक शिवलिंग रखा था। छोटे और कच्चे चबूतरे पर बरसातके पानीने छोटे-छोटे गड्ढे कर दिये थे। इसलिये महादेवजीकी मूर्ति कुछ तिरछी-सी हो रही थी। यह देख ‘परसराम घोडेसे उतरा और उसे एक पेड़से बाँधकर अपनी तलवारसे महादेवजीकी पिण्डीको ठीक बिठलाने लगा।

★ परसराम बोला-‘महादेव गुरुजी हैं। परशुरामके गुरु थे, इसलिये मेरे भी गुरु हैं। वे भी ब्राह्मण थे, मैं भी ब्राह्मण हूँ। उन्होंने अमीरोंका नाश किया था और गरीबों का पालन किया था, वही मैं भी कर रहा हूँ। मूर्ख लोग मुझे डाकू कहते हैं। धनवानुसे जबरन् धन लेकर दोनोंका पालन करना क्या डाकूपन है ? है तो बना रहे। ग्वालियर राज्यने मेरे लिये पाँच हजारका इनामी वारंट जारी किया है और भारत-सरकारने पचीस हजारका। मेरी गिरफ्तारीके लिये तीस हजारका इनाम छप चुका है। वे लोग अमीरोंके पालक और गरीबोंके घालक हैं। इसलिये मुझे डाकू कहते हैं। डाकू वे हैं या मैं? इसका निर्णय कौन करेगा?

★ खैर कोई परवाह नहीं। जबतक शंकर गुरुका पंजा मेरी पीठपर है तबतक कोई परसरामको गिरफ्तार नहीं कर सकता। लेकिन क्या मैं आज प्यासके मारे इस जंगलमें मर जाऊँगा? मेरे पंद्रह साथी–जो सब पढ़े-लिखे और बहादुर हैं-अपने-अपने अरबी घोड़ोंपर चढ़े मुझे खोज रहे होंगे। जब वे मुझे इस जंगलमें

★ मरा हुआ पायेंगे, तब वे नेत्रहीन होकर बड़े दुःखी होंगे। बाबा ! गुरुदेव ! क्या एक लोटा पानीके बिना आप मेरी जान ले लेंगे?’
तबतक एक बुढिया वहाँ आयी। उसके हाथमें एक लोटा जल था और लोटेके ऊपर एक कटोरी थी, जिसमें मिठाई रखी थी।
परसराम –बूढ़ी माई! तुम कहाँ रहती हो?
बुढ़िया-थोड़ी दूरपर सेखूपुर गाँव है। बागों में बसा है, इसलिये दिखायी नहीं देता। वहीं मेरा घर है। जातिकी अहीर हूँ बेटा !
परसराम –यहाँ क्यों आयी हो?

★ चबूतरेपर पानी और मिठाई रखकर बुढिया बैठ गयी और रोने लगी। परसरामने जब बहुत समझाया तब वह कहने लगी-‘बेटा ! मौत के दिन पूरे करती हैं। घरमें एक लड़का था और बहू थी। मेरा बेटा बिहारी तुम्हारी ही उमरका था। उसीने यह चबूतरा बनाया था और कहींसे लाकर उसीने महादेव यहाँ रखे थे। रोजाना पूजा करता था। परसाल इस गाँवमें कलमुही ताऊन (प्लेग) आयी। बेटा और बहू दोनों एक दस सालकी कन्या छोड़कर उड़ गये। रोनेके लिये मैं रह गयी। जबसे बेटा मरा, तबसे मैं रोज एक लोटा पानी चढ़ा जाती हूँ और रो जाती हैं। इस साल वैशाखमें नातिन चम्पाका विवाह है। घरमें कुछ नहीं है। न जानें, कैसे महादेव बाबा चम्पाका विवाह करेंगे।’

★ परसराम–महादेव बाबा चम्पाका विवाह खूब करेंगे। तुम यह पानी मुझे पिला दो, बड़ी प्यास लगी है।
बुढ़िया-पी लो बेटा, पी लो । मिठाई भी खा लो। यह पानी जो तुम पी लोगे तो मैं समझेंगी कि महादेवजी पर चढ़ गया। आत्मा सो परमात्मा। मैं फिर चढ़ा जाऊँगी। पी लो बेटा, पी लो, पहले यह मिठाई खा लो। इतना कहकर बुढियाने पानी का लोटा और मिठाई की कटोरी परसराम के सामने रख दिये। मिठाई खाकर और शीतल स्वच्छ जल पीकर परसराम बोले-‘चम्पाका विवाह कब होगा माई !’

★ बुढ़िया-वैशाख के उँजेरे पाख की पंचमी को टीका है। केसरीपुरसे बारात आयेगी।
परसराम-विवाहके लिये तुम चिन्ता कुछ मत करना। तुम्हारी चम्पाका विवाह महादेव ही करेंगे। बुढ़िया-तुम कौन हो बेटा? तुम्हारी हजारी उमर हो। गाँवतक चलो तो तुमको कुछ खिलाऊँ। भूखे मालूम होते हो।

★ परसराम-भूखा तो हूँ, पर गाँव मैं नहीं जा सकता। मेरा नाम परसराम है और लोग मुझे डाकू कहते हैं। आगरे के कप्तान यंग साहब, जिन्होंने सुल्ताना डाकू को गिरफ्तार किया था, तीस सिपाहियोंके साथ मेरे पीछे लगे हुए हैं। मेरे साथी छूट गये हैं, इसलिये मैं गाँवमें नहीं जा सकता। जिस दिन चम्पाका विवाह होगा, उस दिन तुम्हारे गाँवमें पाँच मिनटके लिये आऊँगा।
बुढ़िया तुम डाकू तो मालूम नहीं पड़ते-देवता मालूम पड़ते हो।

★ घोड़ेपर सवार होकर परसरामने कहा-‘अब ऐसा ही उलटा जमाना आया है माई ! उदार और बहादुर को डाकू कहा जाता है और महलों में बैठकर दिनदहाड़े गरीबोंको लूटनेवालोंको रईस कहा जाता है। धर्मात्मा भीख माँगते हैं, पापी लोग हुकूमत करते हैं। पतिव्रताएँ उघारी फिरती हैं, छिनालोंके पास रेशमी साड़ियाँ हैं। कलियुग हैं ना ! मैं जाता हूँ। मेरा नाम याद रखना पंचमीको आऊँगा।’

★ परसराम चले गये। बुढ़ियाने भी घरकी राह ली। महादेवजीपर जल चढ़ाकर उसने चम्पासे परसरामके मिलनेकी सारी कहानी बयान कर दी, गाँवका मुखिया भी वहीं खड़ा था। उसने भी सारा हाल सुना। मुखियाने सोचा-मेरा भाग जग गया, इनामका बड़ा हिस्सा मैं पाऊँगा। थानेमें जाकर रिपोर्ट लिखायी कि ‘वैशाख शुक्लपक्षकी पंचमीके दिन परसराम सेखुपुरमें चम्पाके विवाहमें शामिल होने आयेगा। पुलिसके द्वारा यह समाचार यंग साहबको मालूम करा देना चाहिये। अगर उस रोज डाकू परसराम गिरफ्तार न हुआ तो फिर कभी न हो सकेगा।’

★ चौथके दिन, बिहारी अहीरके दरवाजेपर पाँच गाड़ियाँ आकर खड़ी हुईं। एकमें आटा भरा था। एकमें घी, शक्कर और। तरकारियाँ भरी थीं। एक गाड़ीमें कपड़े ही कपड़े थे, तरह-तरह के नये थानोंसे वह गाड़ी भरी थी। चौथी गाड़ीमें नये-नये बर्तन भरे थे। | और पाँचवीं गाड़ी तरह तरहकी पक्की मिठाइयोंसे भरी थी। गाड़ीवानोंने

★ सब सामान बिहारी अहीरके घरमें भर दिया। लोगोंने जब यह पूछा कि ‘यह सामान किसने भेजा ?’ तब गाड़ीवानोंने कहा कि ‘हमलोग | भेजनेवालेका नाम-धाम कुछ नहीं जानते। हमलोग दमोहके रहनेवाले
हैं। किरायेपर गाड़ी चलाया करते हैं। हमलोगों को किराया अदा कर दिया गया। हमलोगों को केवल यही हुक्म है कि यह सामान सेखूपुरके विहारी अहीरके घरमें जबरन् भर आवें। बस, और ज्यादा तीन पाँच हमलोग कुछ नहीं जानते।’

★ इस विचित्र घटनापर गाँव भर आश्चर्य कर रहा था। केवल मुखिया को और बुढिया को मालूम था कि यह सब काम परसराम का है। मुखियाने थाने में इस घटनाकी रिपोर्ट लिखायी और यह भी लिखाया कि ‘कल पंचमीके दिन सुबहको जब चम्पाके फेरे पड़ेंगे, उस समय कन्यादान देने खुद परसरामके आनेकी उम्मीद । है क्योंकि वह अभी तक खुद नहीं आया है। पाँच मिनटके लिये गाँवमें आनेका उसने वचन दिया है। चाहे धरती इधर-की-उधर हो जाय, पर परसरामका वचन खाली नहीं जा सकता। चौथ को रातमें ही मिस्टर यंग साहब अपने तीस मरकट सिपाहियोंके साथ सेखूपुरमें आ धमके।

★ उन सबोंने घोड़ोंके सौदागरोंका भेष बनाया था। मुखियाके दरवाजेपर वे लोग ठहर गये। गाँववालोंने जाना कि घोडेके सौदागर लोग मेले को जा रहे हैं। मुखिया और चौकीदारके सिवा असली भेद कोई नहीं जानता था।

★ पंचमीका सबेरा हुआ। परसरामने ज्यों ही घोड़ेपर चढ़ना चाहा, त्यों ही छींक हुई। एक साथीका नाम था रहीम। बी० ए० पास था। पेशावरका रहनेवाला था। घोड़ेकी सवारीमें और निशाना लगानेमें एक ही था। रहीमने परसरामको रोकते हुए कहा-‘कहाँ जा रहे हैं आप?’
परसराम-सेखूपुर,चम्पाका कन्यादान देने । तुमको तो सब हाल मालूम करा दिया था। रोको मत । रुक नहीं सकता।
रहीम-छींक हुई।
परसराम-मुसलमान होकर भी छींकको मानते हो !
रहीम- बात यह है कि यंग साहब अपने तीस सिपाहियों के साथ इधर ही गये हैं। उन लोगोंने सौदागरोंका स्वाँग बनाया है। मगर मेरी नजरको धोखा नहीं दे सकते।।

★ परसराम-घूमने दो। क्या करेगा यंग साहब?
रहीम-मालूम होता है कि मूर्ख बुढ़ियाने आपके मिलनेका हाल अपने गाँवमें बयान कर दिया है। पुलिसको आपके जानेका हाल मालूम हो गया है, तभी यंग साहबने मौका देखकर चढ़ाई की है।
परसराम–सम्भव है, तुम्हारा अनुमान सही हो। लेकिन इसी डरसे मैं अपने वचनको तोड़ नहीं सकता। एक लोटा पानी से उऋण होना है।
रहीम-अच्छा, तो मैं भी साथ चलता हूँ। जो वक्त पर साथ दे, वही साथी है।

★ परसराम- तुम्हारी क्या जरूरत है? तुम यहीं रहो। रहीम-मैं आपको अकेला नहीं जाने दूंगा। नमकहरामी नहीं करूंगा। आपकी जान जायगी तो पहली मेरी जान जायगी।
दोनों घोड़ेपर सवार होकर सेखूपुरकी ओर चल दिये। वे उस समय बिहारीके दरवाजेपर पहुँचे, जब चम्पाके फेरे पड़ गये थे और कन्यादानका समय आ गया था।

★ अपने घोड़े की बागडोर रहीमको पकड़ाकर परसराम उतर पड़े और घरमें घुस गये। पाँच मुहरोंसे परसरामने चम्पाका कन्यादान सबसे पहले दिया और वे बाहर जाने लगे। गाँववालोंने जान लिया कि इस व्यक्तिने ही पाँच गाड़ियाँ सामान भेजा था। श्रद्धाके मारे उन लोगोंने परसरामको घेर लिया। मारे खुशीके बुढियाकी बोलती बंद थी।

★ एक आदमी बोला-‘वाह मालिक! बिना जलपान किये कहाँ जाते हो!’ दूसरा आदमी लोटा लिये चरण धोने का उपाय करने लगा। तीसरा आदमी परसरामको बैठनेके लिये अपना साफा धरतीपर बिछाने लगा। चौथा आदमी दौड़ा तो एक दोनेमें मिठाइयाँ भर लाया।

★ परसरामने कहा-‘कैसे पागल हो तुमलोग! जिस कन्याका कन्यादान दिया, उसीका भोजन कैसे करूँगा?’-इतना कहकर वे घरसे बाहर आ गये। घोड़ेपर चढ़ते चढ़ते परसरामने देखा कि यंग साहबने सदल-बल उनको घेर लिया है। परसरामने उनको ललकारकर कहा ‘गाँवके बाहर आकर मरदूमी दिखलाओ।’ इसके बाद रहीमके साथ परसरामने घोड़ोंको एड़ लगायी और गाँवसे बाहर हो गये।

★ साहबने पीछा किया। सब लोग घोड़ोंपर सवार थे। तड़तड़ गोलियाँ छूटने लगीं। वे दोनों भी फायर करते जाते थे। परसराम और रहीम के अचूक निशानोंने पाँच सिपाही मार डाले।

★ परसरामको भागनेका अवसर देनेके लिये रहीमने अपना घोड़ा पीछे लौटाया और वह सिपाहियों के साथ जूझने लगा। सब लोगों ने उसे घेर लिया। दनादन गोलियाँ छूटने लगीं। तीन सिपाही रहीम ने मौतके घाट उतार दिये। उसके शरीरमें चार गोलियाँ घुस चुकी थीं। एक गोली घोडेको लगी। घोड़ा और सवार दोनों ही मरकर गिर पड़े। तबतक परसराम एक कोस आगे निकल गये थे। साहबने रहीमको वहीं छोड़ा और परसराम का पीछा किया। तीन कोस के बाद परसराम दिखायी पड़े।

★ साहबकी गोलीसे परसरामका घोड़ा घायल होकर गिर पड़ा। परसराम पैदल चलने लगे। आगे था एक नाला, ५६ गज चौड़ा था और तीस हाथ गहरा था। बरसाती पानीने उस नालेको खंदकका रूप दे दिया था। परसरामने कूदकर उसे पार करना चाहा; परंतु पैर फिसल गया। वे खंदकमें गिर पड़े। किनारे यंग साहब आ खड़े हुए। नीचे अँधेरा था, साफ-साफ दिखायी न पड़ता था।

★ ज्यों ही साहबने नीचे झाँका त्यों ही परसरामने गोली छोड़ दी। विक्टोरिया के इकबाल साहब तो बच गये, मगर उनका टोप उड़ गया। सिपाहियों ने गोली छोड़ी। परसराम एक किनारे छिप गये। फायर खाली गया। साहबने कहा-‘तीस हाथ गहरे गड्ढेमें गिरा तो भी निशाना मार रहा है। शाबाश बहादुर, शाबाश! तबतक परसरामने आवाजके निशानेपर एक गोली छोड़ दी। साहबके पास एक सिपाही खड़ा था। उसकी खोपड़ी उड़ गयी।

★ साहबने कहा-‘हमारे नौ आदमी काम आ चुके हैं। मगर डाकूका एक ही आदमी मरा।’
एक सिपाही था राजपूत। उसने आगे बढ़कर कहा’मिट्टी गिराकर डाकूको दाब देना चाहिये।’ आवाजका निशाना साधकर परसरामने गोली छोड़ी। राजपूत बेचारा मरकर गिर गया। साहबने कहा-‘वेल परसराम ! टुम बाहर आ जाओ। अम टुमपर बहोत खुश हैं। टुम एक बहादुर और बातका ढनी आडमी है। अम टुमारे निशाने पर खुश हूँ।’

★ परसरामने जवाब दिया-‘मैं अपना वचन पूरा कर चुका | एक लोटा पानी से उऋण हो गया। अब मरने का डर नहीं है।’
साहब-‘अगर टुम डाका डालना बंड करने की कसम खाओ तो अम टुमको वायसराय से कहकर छुड़ा लेगा । इतमिनान करो और बाहर आओ। टुम भी बातका ढनी, अम भी बातका ढनी । आजसे टुम हमारा डोस्त हुआ।’

★ परसराम बाहर निकल आये और आत्मसमर्पण कर दिये। यंग साहब ने उनको गिरफ्तार कर लिया और आगरा ले गये। कुछ दिनों मुकदमा चला। मगर यंग साहबने परसरामको साफ बरी करा दिया। परसरामने समझ लिया- अच्छा उद्देश्य होनेपर भी आखिर डकैती थी बहुत बुरी चीज, उसका समर्थन हो ही नहीं सकता। अतएव उस कामको छोड़ दिया। वे साधु हो गये और अपने साथियोंको नेकी का जीवन व्यतीत करनेका उपदेश दिया। परसरामने हरद्वारमें जाकर पाँच सालतक घोर तपस्या की और सन् १९३५ ई० में गंगाजीको बीच धारामें खड़े-खड़े शरीर त्याग दिया। परसरामने यह दिखला दिया कि विपत्तिको देखकर भी वचनका पालन करना चाहिये।

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