पूज्य बापू जी का संदेश

ऋषि प्रसाद सेवा करने वाले कर्मयोगियों के नाम पूज्य बापू जी का संदेश धन्या माता पिता धन्यो गोत्रं धन्यं कुलोद्भवः। धन्या च वसुधा देवि यत्र स्याद् गुरुभक्तता।। हे पार्वती ! जिसके अंदर गुरुभक्ति हो उसकी माता धन्य है, उसका पिता धन्य है, उसका वंश धन्य है, उसके वंश में जन्म लेने वाले धन्य हैं, समग्र धरती माता धन्य है।" "ऋषि प्रसाद एवं ऋषि दर्शन की सेवा गुरुसेवा, समाजसेवा, राष्ट्रसेवा, संस्कृति सेवा, विश्वसेवा, अपनी और अपने कुल की भी सेवा है।" पूज्य बापू जी

यह अपने-आपमें बड़ी भारी सेवा है

जो गुरु की सेवा करता है वह वास्तव में अपनी ही सेवा करता है। ऋषि प्रसाद की सेवा ने भाग्य बदल दिया

बंग भस्म के इन लाभों को सुन आप भी कह उठेंगे वाह | Bang Bhasma Benefits in hindi

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बंग भस्म के इन लाभों को सुन आप भी कह उठेंगे वाह | Bang Bhasma Benefits in hindi

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बंग भस्म टिन अर्थात स्टेनम Stannum-Tin से बनती है। टिन को आयुर्वेद में दो तरह का माना गया है, हिरनखुरी या खुरक Pure tin (Kshuraka) और मिश्रक Impure tin (Mishraka meaning mixed)। हिरनखुरी बंग सफ़ेद, कोमल, स्निग्ध, जल्दी गलने वाला होता है। यह बंग भस्म बनाने के लिए उतम होता है। मिश्रक से भस्म नहीं बनाई जाती और इसे स्वास्थ्य के लिए हानिप्रद माना गया है। बंग भस्म को आयुर्वेद में बताई गई विधि के द्वारा ही बनाया जाता है। भस्म निर्माण के लिए धातुओं का उत्तम तरीके से शोधन, मर्दन और मारण किया जाता है।

वंग भस्म का मुख्य प्रभाव मूत्र अंगों और जननांगों पर होता है। इसे पुरुषों और स्त्रियों के प्रजनन अंगों सम्बंधित रोगों में प्रयोग किया जाता है। यह पुरुष की इन्द्रिय को ताकत देती है, शुक्र धारण में सहयोग करती है, वीर्य को गाढ़ा करती है तथा नामर्दी, शीघ्रपतन, पेशाब के साथ शुक्र जाना, स्वप्न में स्खलन, हस्तमैथुन आदि में रोगों को नष्ट करती है। इसे आयुर्वेद में शुक्रक्षय, स्वप्नमेह, शुक्र स्खलन, नपुंसकता की सर्वोत्तम औषधि माना गया है।

स्त्रियों में यह डिम्बकोशों को ताकत देती है, प्रदर की समस्या को ठीक करती है, और संतोपत्ति में सहायता करती है। बंग भस्म के सेवन से योनि और गर्भ से होने वाले, शरीर के किसी भी भाग से होने वाले आसामान्य स्राव रुकते हैं। इसके सेवन से शरीर में बल की वृद्धि होती है। यह वीर्य को बढ़ाती है। यह भूख को बढ़ाने वाली भस्म है। यह मूत्राशय की दुर्बलता को नष्ट करती है।

बंग भस्म के आयुर्वेदिक गुण और कर्म Ayurvedic Properties and Action of Vang Bhasma

वंग भस्म (Bang Bhasma)स्वाद में कड़वी, गुण में हल्की, रूखी है। स्वभाव से यह गर्म है और कटु विपाक है।

यह तिक्त रस औषधि है। तिक्त रस, वह है जिसे जीभ पर रखने से कष्ट होता है, अच्छा नहीं लगता, कड़वा स्वाद आता है, दूसरे पदार्थ का स्वाद नहीं पता लगता, जैसे की नीम, कुटकी। यह स्वयं तो अरुचिकर है परन्तु ज्वर आदि के कारण उत्पन्न अरुचि को दूर करता है। यह कृमि, तृष्णा, विष, कुष्ठ, मूर्छा, ज्वर, उत्क्लेश / जी मिचलाना, जलन, समेत कफज रोगों का नाश करता है। यह क्लेद/सड़न, मेद, वसा, चर्बी, मल, मूत्र को सुखाता है। यह पाक में लघु, बुद्धिवर्धक, रूक्ष और गले के विकारों का शोधक है। तिक्त रस के अधिक सेवन से धातुक्षय और वातविकार होते हैं।
* रस (taste on tongue): तिक्त
* गुण (Pharmacological Action): लघु, रूक्ष
* वीर्य (Potency): उष्ण
* विपाक (transformed state after digestion): कटु

कर्म:

* शोथहर: द्रव्य जो शोथ / शरीर में सूजन, को दूर करे।
* मूत्रकृच्छघ्न: द्रव्य जो मूत्रकृच्छ strangury को दूर करे।
* कफहर: द्रव्य जो कफ को कम करे।
* पाचन: द्रव्य जो आम को पचाता हो लेकिन जठराग्नि को न बढ़ाये।
* दीपन: द्रव्य जो जठराग्नि तो बढ़ाये लेकिन आम को न पचाए
* बाजीकरण: द्रव्य जो रति शक्ति में वृद्धि करे।
* शुक्रल: द्रव्य जो शुक्र की वृद्धि करे।
* पित्तकर: द्रव्य जो पित्त को बढ़ाये।
* वाताघ्न: द्रव्य जो वात को कम करे।
* शुक्रवर्धक, बलवर्धक, वीर्यवर्धक

बंग भस्म के सेवन से होने वाले लाभ Health Benefits of Vanga Bhasma

1) यह शरीर को पुष्ट करती है।
2) यह अंगों को ताकत देती है।
3) यह रूचि, पाचन, त्वचा की रंगत, बल आदि में वृद्धि करती है।
4) यह रस, रक्त, ममसा, अस्थि और शुक्र धातु पर काम करती है।
5) बंग को आयुर्वेद में हल्का, दस्तावर, और गर्म माना गया है।
6) यह पित्तवर्धक है।
7) यह कफ रोगों को नष्ट करती है।
8) इसके सेवन से पेट के कृमि नष्ट होते हैं।
8) यह खून की कमी अर्थात पांडू को दूर करती है।
9) यह नेत्रों की ज्योति बढ़ाती है।
10) यह मुख्य रूप से urinary organs, blood and lungs मूत्र – प्रजनन अंगों, रक्त और फेफड़ों सम्बंधित रोगों में लाभप्रद है।
11) इसके सेवन से प्रमेह (पुराने जिद्दी पेशाब रोग, डायबिटीज आदि) दूर होते हैं।
12) इसका मुख्य प्रभाव कफ दोष को कम करना है।
13) यह दर्द निवारक है।
14) यह गठिया में लाभकारी है।
15) यह जीवाणुरोधी और रोगाणुरोधी है।
16) यह सूजन को कम करने वाली द्व है।
17) यह कामोद्दीपक है।
18) यह पुरुषों के लिए प्रमेह, शुक्रमेह, धातुक्षीणता, वीर्यस्राव, स्वप्नदोष, शीघ्रपतन, नपुंसकता, क्षय आदि में लाभप्रद है।
19) यह टेस्टिकल की सूजन को नष्ट करती है।
20) यह इन्द्रिय को सख्ती देती है और वीर्य को गाढ़ा करती है।
21) यह वातवाहिनी नसों, मांसपेशियों और इन्द्रिय की कमजोरी को दूर कर शुक्र के अनैच्छिक स्राव को रोकती है।
22) यह स्त्रियों के लिए गर्भाशय के दोष, अधिक मासिक जाना, मासिक में दर्द, डिम्ब की कमजोरी आदि में लाभप्रद है।
23) यह रक्त के दोषों को दूर करती है।

वंग भस्म निम्न रोगों में लाभप्रद है:

पुरुषों के रोग Male Disorders:

बीसों प्रकार के प्रमेह

* धातुक्षीणता
* पुरुषों का प्रमेह
* शुक्रमेह
* शीघ्रपतन(shighra patan)
* स्वप्न दोष(swapn dosh)
* वीर्यस्राव
* किसी रोग के कारण शुक्रस्राव
* नपुंसकता(napunsakta)
* गोनोरिया, सूजाक, उपदंश

स्त्रियों के रोग Female Disorders:

* स्त्रियों की प्रदर समस्या
* गर्भाशय के दोष
* मासिक की दिक्कतें
* संतानहीनता

पेशाब सम्बन्धी रोग Urinary Disorders:

बहुमूत्रता
पेशाब के साथ शुक्र जाना

अन्य रोग:

मोटापा
अस्थमा
अनीमिया
कास-श्वास, कोल्ड-कफ-खांसी
रक्त दोष
त्वचा दोष

बंग भस्म की औषधीय मात्रा Medicinal Doses of Vanga Bhasma

इस भस्म को लने की मात्रा 1 रत्ती = 125mg से लेकर 2 रत्ती = 250mg है।
इसे मुख्य रूप से अभ्रक भस्म और शिलाजीत के साथ अथवा गिलोय सत्त्व और शहद के साथ दिया जाता है।
रोगानुसार वंग भस्म का अनुपान भी भिन्न हो सकता है।

* प्रमेह, शुक्रजन्य बहुमूत्रता, क्षीण शुक्र, अल्पशुक्र, शुष्कशुक्र, दुर्बल शुक्र, वीर्य की कमी आदि में में वंग भस्म को निरंतर एक महीने तक शिलाजीत चार रत्ती, गुडूची सत्व चार रत्ती में मिलाकर शहद के साथ चाटना चाहिए। अथवा

* प्रमेह में एक रत्ती वंग भस्म को चार रत्ती हल्दी चूर्ण और एक रत्ती अभ्रक भस्म के साथ लेना चाहिए। अथवा

* प्रमेह में एक रत्ती बंग भस्म को तुलसी के रस या पेस्ट के साथ के साथ लेना चाहिए।

* अनैच्छिक वीर्यस्राव, शुक्र का पतलापन, स्वप्नदोष, शुक्र की कमजोरी, आदि में वंग भस्म का सेवन मलाई के साथ करना चाहिए।

* स्वप्नदोष में वंग भस्म को इसबगोल की भूसी के साथ लेना चाहिए। अथवा एक रत्ती वंग भस्म को एक रत्ती प्रवाल पिष्टी, और चार रत्ती कबाब चीनी के चूर्ण में शहद मिलाकर लेना चाहिए।

* हस्त मैथुन, अप्राकृतिक मैथुन की आदत में वंग भस्म को प्रवालपिष्टी और स्वर्णमाक्षिक भस्म के साथ दिया जाता है।

* वीर्यस्तम्भन के लिए, एक रत्ती बंग भस्म को आधा रत्ती कस्तूरी के साथ देना चाहिए।

* सुजाक में इसे मोती पिष्टी, रुपया भस्म, इला और वंशलोचन के साथ दिया जाता है।

* नपुंसकता में एक रत्ती बंग भस्म को अपामार्ग चूर्ण के साथ लेना चाहिए।

* शुक्र धातु के पतलेपन में बंग भस्म को मूसली चूर्ण के एक महीने तक निरंतर सेवन करना चाहिए।

* स्त्रियों की सफ़ेद पानी की समस्या, डिम्ब की निर्बलता, इनफर्टिलिटी में इसे शृंग भस्म के साथ मिलाकर दिया जाता है।

* श्वेत प्रदर में बंग भस्म को लोह भस्म, शुक्ति भस्म के साथ दिया जाता है।

* रक्तपित्त में वंग भस्म को प्रवाल पिष्टी के साथ दिया जाता है।

* मानसिक कमजोरी में वंग भस्म को ब्राह्मी अवलेह और अभ्रक भस्म के साथ लेना चाहिए।

* अग्निमांद्य में इसे दो रत्ती पिप्पली चूर्ण और शहद के साथ लेना चाहिए।

* शरीर के बल को बढ़ाने के लिए इसे दो रत्ती जायफल के चूर्ण और शहद के साथ लेना चाहिए।

* पांडू रोग में एक रत्ती वंग भस्म को दो रत्ती मंडूर भस्म, त्रिफला और शहद के साथ लेना चाहिए। अथवा इसे गो घृत में मिलाकर खाना चाहिए।

* मुख पर झाइंयां होने पर, काले दागों पर बंग भस्म को हल्दी, केसर, और दूध में मिलाकर उबटन बना कर चेहरे पर लगाते हैं।

उपलब्धता Availability

संत श्री आशारामजी आश्रम के आयुर्वेदिक दवाखानों से इसे प्राप्त किया जा सकता है

सावधनियाँ/ साइड-इफेक्ट्स/ कब प्रयोग न करें Cautions/Side effects/Contraindications

>इस दवा को डॉक्टर की देख-रेख में ही लें।
>इसे बच्चों की पहुँच से दूर रखें।
>यह हमेशा ध्यान रखें की जिन आयुर्वेदिक दवाओं में पारद, गंधक, खनिज आदि होते हैं, उन दवाओं का सेवन लम्बे समय तक नहीं किया जाता। इसके अतिरिक्त इन्हें डॉक्टर के देख-रेख में बताई गई मात्रा और उपचार की अवधि तक ही लेना चाहिए।
>इसका अधिक सेवन पेट में जलन कर सकता है क्योंकि यह कुछ पित्तवर्धक है।

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