मकरध्वज के फायदे | Makardhwaj Benefits in Hindi

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मकरध्वज के फायदे | Makardhwaj Benefits in Hindi

मकरध्वज क्या है इसकी विशेषता : makardhwaj kya hai iski visesta

❈ यह एक ऐसी सर्वश्रेष्ठ महौषध है, जिसके समान सर्व रोग-नाशिनी महौषध संसार के किसी भी पैथी (चिकित्सा) में नहीं है। बड़े-बड़े डॉक्टरों ने यह बात मान ली है कि मकरध्वज के जोड़ की दवा दूसरी है ही नहीं। इसके द्वारा अगणित प्राणी काल के मुँह से बचते हैं। बहुत से डॉक्टर इसका इंजेक्शन देते तथा स्वतन्त्र रूप से सेवन भी कराते हैं।
❈ यह तो सब लोग जानते हैं कि ताकत बढ़ने से प्रत्येक रोग में फायदा होता है। मकरध्वज के सेवन से मनुष्य की ताकत बहुत बढ़ जाती है। यह हृदय और स्नायुमण्डल को यथाशीघ्र ही ताकतवर बनाता है। मकरध्वज के सेवन से शरीर का वजन निश्चित रूप से बढ़ता है। यह बल, वीर्य, कांति आदि के लिये सर्वश्रेष्ठ दवा है।
❈ शीघ्रपतन के लिये भी बहुत लाभप्रद दवा है।
❈ नपुंसकता, नामर्द के लिये भी मकरध्वज बहुत गुणकारी है।
❈ बच्चों से लेकर बुड्ढों तक को एकसा फायदा करता है।
❈ मरणासन्न रोगी को जब और किसी दवा से लाभ नहीं होता है, तब यही मकरध्वज और कस्तूरी उसके प्राण-रक्षक होते है। मकरध्वज की महत्ता इसी से जानी जा सकती है, कि जो मरते हुए रोगी को देने से उत्तम फायदा करता है, तो साधारण, साध्य और कष्टसाध्य रोगों में कितनी जल्दी लाभ कर सकता है।
❈ बहुत से धनी-मानी इसका सेवन बराबर करते हैं, जिससे वे लोग जल्दी रोगग्रस्त नहीं हो पाते। शरीर में किसी कारणवश रक्त की कमी हो जाय. तो मकरध्वज का सेवन उस हालत में अमृत के समान गुण करता है।
❈ किसी भी रोग के कारण शरीर में कमजोरी आ जाने पर मकरध्वज के सेवन से बहुत शीघ्र कमजोरी दूर हो जाती है।
❈ बालक, वृद्ध, युवा, स्त्री. पुरुष सब इसके सेवन से लाभ उठा सकते हैं। भैषज्य रत्नावली में लिखा है:
एतदभ्यासतश्चैव जरामरणग्नाशनम् ।
अनुपानविधानेत निहन्ति विविधान् गदान् ।।

❈ इसके सेवन से शरीर की झुर्रियाँ, बालों का सफेद होना आदि रोगों का नाश होता और आयु की वृद्धि भी होती है।
❈ रति के अन्त में इसके सेवन से शक्ति का ह्रास नहीं होता है।
❈ जो बराबर इसका सेवन करते हैं, उनके उपर स्थावर जंगम किसी भी प्रकार के विष का असर नहीं होता है।
❈ यह विशेषकर राजयक्ष्मा और कफजन्य बिमारियों को बहुत शीघ्र दूर करता है तथा हृदय की दुर्बलता को नष्ट कर उसे ताकतवर बनाता है ।
❈ रक्त-प्रसादन करता है।
❈ शुक्र पुष्ट करता, रोगोंतपादक कीटाणुओं का नाश करता, विष-विकार को दूर करता है, उन्माद, अपस्मार (मृगी) रोग में भी लाभ करता है।
❈ यह रसायन, बाजीकरण और योगवाही है।

मकरध्वज के उपयोग और फायदे : Makardhwaj ke fayde / benefits

✦ मकरध्वज में सुवर्ण को आंशिक संयोग रहता है, अंतः यह उत्तेजक, हृदय के लिये बलदायक, रक्त-दोष को दूर कर परिपुष्ट बनाने वाला और कीटाणु नाशक है।
✦क्षय (राजयक्ष्मा) की द्वितीयावस्था में जब क्षय के कीटाणु शरीर में व्यापक रूप से अपना प्रभाव जमा लिये हों, रोगी दुर्बल, कान्तिहीन हो, बुखार और खाँसी की वृद्धि हो, क्रमश: रक्त की भी कमी हो रही हो. ऐसी दशा में मकरध्वज का सेवन करना बहुत लाभदायक है। यद्यपि सुवर्ण रहने के कारण यह कुछ अपना उत्तेजक प्रभाव रक्त-वाहिनी नाड़ियों पर डालता है, जिससे रोग के उपद्रव कुछ बढ़े हुए मालूम होने लगते हैं, किन्तु जब क्रमश: रक्त सुवर्ण के उत्तेजक प्रभाव को सहन करने में समर्थ हो जाता है और यह दवा भी शरीर में उचित मात्रा में पहुँच कर अपना व्यापक प्रभाव सम्पूर्ण शरीर में फैला देती है, तब क्षय के कीटाणुओं का नाश होकर रोग को आराम होने लगता है और क्रमश: रोग की गति नीचे होने लगती है। ✦प्रारंभ में मकरध्वज की मात्रा बहुत कम रखें, क्योंकि कभी-कभी ज्वर की गर्मी इससे अधिक हो जाती है।
✦रक्तजन्य कीटाणुओं को नाश कर रक्त को सबल बनाना इस रसायन का प्रधान कार्य है। अतएव, यह आन्त्रिक क्षय, फुफ्फुसावरण प्रदाह न्यूमोनिया, उरस्तोय (प्लुरसी) तथा संक्रामक रोगों में जब हृदय की शक्ति निर्बल हो गयी हो, तो ऐसी स्थिती में हृदय का सर्वप्रथम बल पहुचाना आवश्यक हो जाता है। इसके लिये मकरध्वज विशेष उपयोगी सिद्ध हुआ है, क्योंकि यह बल्य तथा रक्तप्रसादक है।
✦कुछ मनुष्यों का अधिक वय तक भी शरीर की अवयवों का उचित विकास नहीं हो पाता अर्थात् रसरक्तादि की निर्बलता के कारण शरीर दुबला-पतला और कांतिहीन दिखाई पड़ता है। यदि लड़की हुई तो जवानी आने पर भी उसके नितम्ब (चूतड़), स्तन, मुख-मण्डल
आदि छोटी लड़की के समान ही सूखे हुए रहते हैं, हर समय वह मन्द-बुद्धि सी पड़ी या बैठी रहती है। उसका काम-काज करने को जी नहीं चाहता या बहुत धीरे-धीरे काम करती है। यदि पुरुष हुआ तो उसमें वीर्य की कमी रहने की वजह से उसका शरीर सूखा, निस्तेज तथा ठिगना सा दीख पड़ता है। ऐसी अवस्था में मकरध्वज देने से रस रक्तादि पुष्ट होकर शरीर के अवयवों में प्रवाहित होने लगते हैं और इनकी वृद्धि भी होने लगती है, सब अवयव भी पुष्ट होने लगते हैं, जिससे रोगी हृष्ट-पुष्ट हो जाता है।
✦शरीर की कोई भी इन्द्रिय जब निर्बलता के कारण अपना काम करने में असमर्थ हो जाती हैं. अर्थात् आँख से अच्छी तरह देख न सकना, कान से न सुनना आदि ऐसी अवस्था में भी मकरध्वज बहुत लाभ करता है, क्योंकि यह विकृति वात और पित्त के दूषित होने के कारण होती है। इसमें मकरध्वज देने से उक्त दोषों की विकृति दूर हो परिशुद्ध रक्त द्वारा उन इन्द्रियों की नसें पुष्ट और सबल हो जाती हैं, जिससे वे इन्द्रियाँ अपना काम करने में समर्थ हो जाती हैं।
✦धातु मिश्रित औषध का प्रभाव जैसे शरीर के अवयव अथवा रस-रक्तादिकों पर पड़ता है उसी प्रकार मन, बुद्धि, ज्ञानेन्द्रिय या कर्मेन्द्रिय पर पड़ता है।
✦अधिक शुक्र-पतन या वातवाहिनी नाड़ियां कि कमजोरी के कारण उत्पन्न हुई नपुंसकता नष्ट करने के लिए मकरध्वज का सेवन करने से विशेष लाभ होता है। – औ. गु. ध. शा.

मकरध्वज की सेवन मात्रा और अनुपान :

१ रत्ती से ३ रत्ती तक पान के रस, शहद, घी, मिश्री, मक्खन , मलाई, दूध (गादा और औटाया हुआ ) आदि के साथ तथा रोगानुसार अनुपान के साथ देने से लाभ होता है।

सब प्रकार के मकरध्वज की साधारण सेवन-विधि :

एक रत्ती मकरध्वज को उत्तम पत्थर की खरल में डालकर ५ मिनिट तक खूब महीन पीसना चाहिए, यदि खरल न हो तो बदिया पत्थर पर सिलवट (लोदा) से पीसा जा सकता है, परन्तु पत्थर पर पीसने से उसका बहुत-सा अंश व्यर्थ चला जाता है और खरल की तरह उसकी उत्तम घुटाई भी नहीं होती – इसलिये पत्थर की खरल में ही घोंटना अच्छा है।
अच्छी तरह घुट जाने के बाद इसमें ६ माशा असली शहद मिलाकर १५ मिनट तक फिर घोंटें, क्योंकि शहद में अच्छी तरह मकरध्वज न घुटने से पूरा-पूरा लाभ नहीं करता है। फिर जिस रोग के लिये देना हो, उस रोगनाशक औषधियों का रस या चूर्ण मिला कर रोगी को खिला देना

चाहिए। ताजी-हरी दवा का रस १ तोला और सूखी दवा का चूर्ण ३ माशा मिलाना चाहिए। चूर्ण मिलाने पर शहद १ तोला मिलावें। दवा का पानी काढा २ तोला दें।

मकरध्वज से रोगों का उपचार : Makardhwaj se rogon ka upchar

1-वातज्वर में – बच का चूर्ण १ माशा, बड़ी इलायची के बीज १ माशा, मिश्री १ तोला, मकरध्वज १ रत्ती, सब को एकत्र मिलाकर पधु से दे। ( और पढ़ेबुखार का सरल घरेलु उपाय)
2-पित्तज्वर में – मकरध्वज आधा रत्ती, गिलोयसत्व २ रत्ती, पित्तपापड़ क्वाथ में मिश्री मिला कर उसके साथ दें।
3-कफज्वर में – मकरध्वज २ रत्ती, तुलसी, अदरक, पान- इन तीनों का रस १ – १ माशा शहद ६ माशें में मिला कर दें। ( और पढ़ेकफ दूर करने के सबसे कामयाब 35 घरेलु उपचार )
4-साधारण ज्वर में – मकरध्वज १ रत्ती. अदरख का रस १ माशा, शहद (मधु) १ माशा के साथ दें।
5-सन्निपात ज्वर में – मकरध्वज २ रत्ती. ब्राह्मी का रस १ माशा और मधु १ माशा में मिला कर दें।
6-मोतीझरा में – मकरध्वज १ रत्ती को मोतीपिष्टी आधी रत्ती के साथ मधु में मिलाकर चटा दे। ऊपर से लौंग का क्वाथ पिला देना चाहिए।
7-मलेरिया ज्वर में – मकरध्वज १ रत्ती करंजबीज का चूर्ण १ माशा मधु में मिलाकर देना चाहिए ।
8-जीर्ण ज्वर में – मकरध्वज १ रत्ती, २ नग छोटी पीपल का चूर्ण शहद के साथ दें।
9-ज्वरातिसार में – मकरध्वज १ रत्ती, शहद १ माशा, सोंठ, पानी में घिसकर १ माशा सबको एकत्र मिलाकर दें।
10-आँव के दस्त में – मकरध्वज १ रत्ती, बेलगिरी चूर्ण १ माशा मिलाकर मधु में मिला कर चटावें। ( और पढ़ेदस्त रोकने के रामबाण 13 देशी इलाज)
11-खून के दस्त में – मकरध्वज १ रत्ती को. अतीस चूर्ण २ रत्ती के साथ कुडा की छाल का रस अथवा अडूसे की जड़ की छाल का रस, शहद या अनार का रस १ तोला, शहद २ माश में मिला कर दें।
12-पतले दस्त में – मकरध्वज १ रत्ती को सफेद जीरे का चूर्ण १ माशा में मिलाकर शहद के साथ दें।
13-संग्रहणी में – मकरध्वज एक रत्ती, सफेद जीरे का चूर्ण १ माशा में मिलकर शहद के साथ दें, ऊपर से सौंफ का अर्क २ तोला पिला दें।
14-अजीर्ण रोग में – मकरध्वज १ रत्ती, शंख भस्म २ रत्ती, त्रिकटु चूर्ण ४ रत्ती के साथ मधु में मिला कर दें। ऊपर से अजवायन का अर्क २ तोला पिला दें।
15-बवासीर में – मकरध्वज १ रत्ती, सूरण (जमीकंद) का चूर्ण १ माशा, मिश्री ६ माशे के साथ दें । ( और पढ़ेबवासीर के मस्से जड़ से खत्म करेंगे यह 9 देशी घरेलु उपचार)
दें।
16-हैजा में – प्याज का रस १ तोला और शहद २ माशा मिलाकर मकरध्वज १ रत्ती की मात्रा में देने से विशेष लाभ होता है।
17-कब्जियत में – मकरध्वज २ रत्ती, ५ तोले त्रिफला के क्वाथ में शहद २ माशे मिलाकर दें।
18-अम्लपित्त में – आँवले का रस १ तोला या क्वाथ २॥ तोला, और शहद अथवा परवल के पत्तों का रस, गिलोय (गुर्च) का रस, अनार के कोमल पत्तों का रस १ तोला या मिश्री, सौंफ, धनियाँ, को १२ घण्टे भिगो कर उसके जल के साथ भी देना हितकर है। ( और पढ़ेएसिडिटी के सफल 59 घरेलु उपचार )
19-पाण्डू रोग में – कुटकी का काढ़ा २|| तोला, या कुटकी का चूर्ण ३ माशे, मकरध्वज १ रत्ती, मधु, अथवा पुराने गुड़ के साथ दें।
20-राजयक्ष्मा में – मकरध्वज २ रत्ती, प्रवाल भस्म २ रत्ती, सितोपलादि चूर्ण ३ माशे शहद के साथ दें।
21-खाँसी में – मकरध्वज १ रत्ती, मुलेठी को क्वाथ ५ तोला, या मुलेठी चूर्ण ६ माशे अथवा असे की छाल का रस या कटंकारी रस १ तोला, अथवा पीपल और बच का चूर्ण १ माशे शहद से दें।
22-श्वास में – बेल के पत्तों का स्वरस १ तोला, या अडूसे की छाल का रस १ तोला, अथवा चार-पाँच बहेड़े की गिरी का चूर्ण या पीपल और बड़ी इलायची का चूर्ण १ माशे और शहद के साथ मकरध्वज १ रत्ती, की मात्रा में दें। ( और पढ़ेदमा व श्वास का घरेलू उपचार )
23-स्वरभंग में – मकरध्वज १ रत्ती, बच या ब्राह्मी का चूर्ण १ माशा मधु के साथ दें। अरुचि में – नींबू का रस १ तोला, और शहद के साथ दें।
24-मृगी रोग में – बच का चूर्ण १ माशा और शहद के साथ दें।
25-उन्माद में – मकरध्वज १ रत्ती, को उन्मादगजांकुश रस १ रत्ती के साथ घोंटकर मांसादि क्वाथ से दें या ब्राम्ही का रस २ तोला और ३ माशे शहद के साथ दें।
26-वातव्याधि में – एरंड की जड़ का रस १ तोला में १ माशा शहद के साथ १ रत्ती मकरध्वज दें । ( और पढ़ेवात नाशक 50 सबसे असरकारक आयुर्वेदिक घरेलु उपचार )
27-आमवात में – सोंठ का चूर्ण १ माशा और शहद अथवा केवल शहद के साथ चाट कर ऊपर से सनाय, बड़ी हरड़ और अमलतास मिलाकर २तोले, पानी ST (पावभर =२) भर में पकायें ५ तोला पानी शेष रहने पर छान कर पिला दें।
28-वायुगोला में – भुनी हुई हींग का चूर्ण २ रत्ती एवं गर्म पानी के साथ दें ।
29-हृदय रोग में – मकरध्वज आधी रत्ती को मोतीपिष्टी आधी रत्ती के साथ घोंटकर अर्जुन की छाल का रस १ तोला या चूर्ण ३ माशे शहद के साथ दें।
30-मूत्रकृच्छु में – गिलोय (गुर्च) का पानी (हिम) १० तोला और मधु में मिलाकर दें।
31-मूत्राघात में – मकरध्वज १ रत्ती, मधु में मिलाकर चटा दें। अर से तृणपंचमूल क्वाथ १ तोला पिला दें। ( और पढ़ेबंद पेशाब को खुलकर लाने वाले 11 अनुभूत आयुर्वेदिक घरेलु नुस्खे)
32-सूजाक में – मकरध्वज आधी रत्ती को ४ रत्ती यवक्षार में मिलाकर गर्म पानी के साथ दे। पथरी में – कुल्थी का क्वाथ एवं शहद के साथ दें।
33-धातुस्त्राव में – कच्ची हल्दी का रस, गिलोय और आँवला तथा नीम की छाल, सेमलमूल या शृंगराज का रस, इनमें से किसी एक चीज के रस के साथ मधु मिलाकर दें।
34-स्वप्नदोष में – रात को सोते समय कपूर चौथाई रत्ती कबाबचीनी का चूर्ण १ माशा, शहद १ तोला मिलाकर चटावें। पर से २ तोले चूने का पानी पिला दें।
35-शीघ्रपतन में – मकरध्वज १ रत्ती को कौंच के बीज का चूर्ण या असगन्ध चूर्ण १ माशा, शहद के साथ अथवा सेमल की जड़ का रस या बिदारीकन्द का रस अथवा शतावरी का रस १ तोला शहद मिलाकर दें।
36-मधुमेह में – जामुन की गुठली का चूर्ण २ माशे व शहद के साथ दें।
37-वीर्य वृद्धि एवं स्तम्भन के लिये – लौंग, अकरकरा, दालचीनी, केशर, कपूर और जायफल के चूर्ण १ माशा के साथ मकरध्वज १ रत्ती को घोंट कर गरम दूध के साथ दें। ( और पढ़ेवीर्य को गाढ़ा व पुष्ट करने के आयुर्वेदिक उपाय)
38-कृशता में – असगन्ध चूर्ण १ माशा और दूध के साथ दें।
39-रक्ताल्पता (खून की कमी में) – मक्खन और मिश्री अथवा लौह भस्म २ रत्ती के साथ मधु से दें।
40-उदर रोग में – पीपल चूर्ण १ माशा या शुद्ध कसीस चूर्ण १ रत्ती के साथ और मधु के साथ दें। अथवा छोटी हरें का चूर्ण ३ माशे, काला नमक १ माशा मिलाकर गर्म जल के साथ दें।
41-गर्मी (आतशक) में – अनंतमूल का फाण्ट ५ तोले एवं शहद के साथ दें।
42-शीतला (चेचक) में – मकरध्वज १ रत्ती को रुद्राक्ष चूर्ण १ रत्ती के साथ घोंटकर करेले के पत्तों का रस १ तोला और मधु या तुलसी की पत्ती का रस ६ माशे एवं शहद मिलाकर दें। ( और पढ़ेचेचक (बड़ी माता) के कारण लक्षण और इलाज)
43-मुखरोग में – मकरध्वज आधी रत्ती कपूर १ रत्ती और कत्था चूर्ण ३ रत्ती के साथ घोंटकर मधु अथवा मक्खन से दें।
44-शोथरोग में – मकरध्वज आधी रती को मण्डूर भस्म ३ रत्ती के साथ घोंटकर पुनर्नवा का रस और शहद के साथ दें।
45-रक्तप्रदर में – अशोक -छाल का चूर्ण ३ माशे और शहद, अथवा अशोक-छाल २ तोला डालकर औंटाया हुआ दूध १ पाव या गिलोय का रस १ तोला एवं शहद मिलाकर दें।
46-श्वेतप्रदर में – चावल के धोवन का पानी २ तोले व शहद के साथ अथवा राल का चूर्ण १ माशा, शहद में मिलाकर दें। ( और पढ़ेश्वेत प्रदर में तुरंत देते है राहत यह 17  घरेलू उपचार )
47-प्रसूत रोग में – मकरध्वज १ रत्ती को प्रतापलंकेश्वर रस १ रत्ती के साथ घोंटकर मधु के साथ दें। ऊपर से दशमूल का क्वाथ पिला दें।
48-नाड़ी छूटने की अवस्था में – मकरध्वज २ रत्ती, कस्तूरी चौथाई रत्ती, कपूर आधी रत्ती, तुलसी पत्र – स्वरस और शहद के साथ दें।
49-शक्ति बढ़ाने के लियें – मकरध्वज १ रत्ती, फौलाद भस्म आधी रत्ती के साथ घोटकर बेदाना का रस, मलाई, मक्खन, अंगूर का रस, शतावरी का रस, पान का रस और शहद उचित मात्रा में दें।

नोट – शास्त्रानुसार उत्तम बनाये गये मकरध्वज में सर्व रोग नाश करने की शक्ति है। आजकल बहुत से धूर्त लोग नकली मकरध्वज बनाकर बेचने लगे हैं। उस मकरध्वज के सेवन से लाभ की जगह नुकसान होता है। जिन रोगों में मकरध्वज की मात्रा नहीं लिखी गयी है, वहाँ साधारणतया १ से २ रत्ती का उपयोग करें। इसके अतिरिक्त वैद्य को चाहिए कि देश-काल और रोगी के बलाबल के अनुसार दें। मकरध्वज साधारण से मकरध्वज षडगुणबलिराजित, सिद्ध मकरध्वज, सिद्ध मकरध्वज (स्पेशल) उत्तरोत्तर श्रेष्ठ है।

शास्त्रीय मतानुसार तथा अनुभव सिद्ध है कि “मर्दनम् गुणवर्धनम्’ अर्थात् रसरसायन एवं कूपीपक्व रसायनों को अच्छी तरह घोंटकर सेवन करने से उनके गुणों में अपूर्व वृद्धि होती है।

सावधानियां :

★ अधिक मात्रा में इसका सेवन शरीर को नुकसान पहुंचाता है।
★ सही प्रकार से बनी मकरध्वज का ही सेवन करे।
★ अशुद्ध / कच्ची मकरध्वज से शरीर पर बहुत से हानिकारक प्रभाव उत्पन्न होतें है |
★ इसे डॉक्टर की देख-रेख में ही लें।

2018-08-05T13:19:09+00:00 By |भस्म(Bhasma)|0 Comments