सितोपलादि चूर्ण के 8 लाजवाब फायदे व सेवन विधि | Sitopaladi Churna Benefits

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सितोपलादि चूर्ण के 8 लाजवाब फायदे व सेवन विधि | Sitopaladi Churna Benefits

सितोपलादि चूर्ण के लाभ, नुकसान व उपयोग करने के विधि : Sitopaladi Churna ke labh ,nuksan aur lene ka tarika

★ सितोपलादि चूर्ण(ayurvedic medicine for cough) एक हर्बल आयुर्वेदिक औषधि है। इसे सोलह भाग मिश्री, आठ भाग बंशलोचन, चार भाग पिप्पली, दो भाग इलाइची के बीज और एक भाग दालचीनी को मिलाकर बनाया गया है।
★ सितोपलादि चूर्ण एक शास्त्रीय योग है जिसे शारंगधर संहिता (मध्यमखंड अध्याय 6, 134-137) से लिया गया है तथा इसका कई आयुर्वेदिक फार्मेसियों निर्माण करती है।
★ सितोपलादि चूर्ण के सेवन से कफ और पेट सम्बन्धी रोगों में लाभ होता है। यह चूर्ण अस्थमा, सांस की तकलीफ, सूखी-गीली खांसी, कोल्ड, कफ, साइनोसाइटिस, ब्रोंकाइटिस आदि तकलीफों में लाभप्रद है। इसके अतिरिक्त यह भूख न लगना, अग्निमांद्य, जीभ की शून्यता, पसली के दर्द आदि को दूर करता है।
★ सितोपलादि चूर्ण पित्त और कफ दोनों को ही शांत करता है। बढ़े हुए कफ के कारण होने वाले बुखार में भी यह लाभ करता है। जब कफ सूख कर छाती में बैठ जाता है, हाथ-पैर में जलन होती है तथा खांसी आने लगती है ऐसे में इस दवा का प्रयोग उपयोगी है। यह पाचक पित्त बढ़ा भोजन को पचने में मदद करता है और शरीर को बल देता है।
★ इसके सेवन से कफ रोगों के कारण शरीर में होने वाला आलस, कमजोरी, माथे में दर्द आदि दूर होते है।
★ इसे बच्चों के सूखा रोग, टी.बी., और बार-बार आने वाले बुखार जैसे की टाइफाइड, मलेरिया में भी दिया जाता है।
★ यह आम सर्दी, खांसी, जुखाम, ज्वर, दुर्बलता, गले में खराश, साइनस आदि के लिए एक सुरक्षित हर्बल आयुर्वेदिक दवा है।

सितोपलादि चूर्ण के प्रमुख घटक और उनके फायदे : Ingredients of Sitopaladi Churna

1. सितोपला Sitotpala 192 g
2. वंशलोचन Vamsha Locana 96 g
3. पिप्पली Pippali 48 g
4. छोटी इलाइची Ela 24 g
5. दालचीनी Tvak 12 g

सितोपला:
★ इसमें मुख्य घटक सितोपला होने से इस दवा को सितोपलादि कहा जाता है।
★ सितोपला, मिश्री का ही आयुर्वेदिक नाम है। इसे रॉक कैंडी और रॉ शुगर भी कहा जाता है। यह बड़े, सफ़ेद, क्रिस्टल के रूप में उपलब्ध होती है।
★ सौंफ के साथ इसे माउथ फ्रेशनर की तरह भी प्रयोग किया जाता है।
★ मिश्री का सेवन शरीर को उर्जा देता है। यह स्वाद में मीठी होती है तथा शरीर में वात को कम करती है। दवा में डालने पर यह दवा का स्वाद अच्छा करती है। यह भोजन के प्रति अरुचि को भी दूर करने में सहायक है।
★ इसे खांसी, कफ और पाचन विकार में अन्य जड़ी-बूटियों के साथ प्रयोग किया जाता है।

वंश लोचन/ बांस मन्ना / तवाशीर / तुगा / तुगाक्षीरी:Vanshlochan (Tabasheer)ke fayde
★ वंश लोचन सफेद नीलापन लिए हुए, मोटे फीमेल बांस की गांठों में पाया जाने वाला पदार्थ है। आयुर्वेद में इसे बहुत सी दवाएं बनाने के लिए प्रयोग किया जाता है। ★ ★ वंशलोचन, तासीर में ठंडा होता है। इसका सेवन खांसी, कफ, शरीर में बढ़ी गर्मी, हाथ-पैर की जलन, पसली के दर्द, और कमजोरी को दूर करता है।
★ इसमें मुख्यतः सिलिका होता है जो की मांसपेशियों, उतकों, बालों, टेंडन आदि के लिए ज़रूरी है।
★ यह शरीर की इम्युनिटी को बढ़ाता है। यह एंटीबैक्टीरियल भी है। यह शरीर के लिए पौष्टिक भी है।

पिप्पली:Pepper (Pipli)ke fayde
★ पिप्पली, उत्तेजक, वातहर, विरेचक है तथा खांसी, स्वर बैठना, दमा, अपच, में पक्षाघात आदि में उपयोगी है. यह तासीर में गर्म है।
★ पिप्पली पाउडर शहद के साथ खांसी, अस्थमा, स्वर बैठना, हिचकी और अनिद्रा के इलाज के लिए प्रयोग किया जाता है। यह एक टॉनिक है।

छोटी इलायची: Elaichi ke fayde
इला / इलायची, त्रिदोष-हर, पाचन, वातहर, पोषक, विरेचक और कफ को ढीला करती है।
★ यह मूत्रवर्धक है। उलटी, अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, गले के विकार, बवासीर, गैस, पाचन विकार और खाँसी में उपयोगी है।

दालचीनी: dalchini ke fayde
दालचीनी या दारुचिनी एक पेड़ की छाल है। यह वात और कफ को कम करती है, लेकिन पित्त को बढ़ाती है।
★ यह मुख्य रूप से पाचन, श्वसन और मूत्र प्रणाली पर काम करती है।
★ इसमें दर्द-निवारक / एनाल्जेसिक, जीवाणुरोधी, ऐंटिफंगल, एंटीसेप्टिक, खुशबूदार, कसैले, वातहर, स्वेदजनक, पाचन, मूत्रवर्धक, उत्तेजक और भूख बढ़ानेवाले गुण है। ★ दालचीनी पाचन को बढ़ावा देती है और सांस की बीमारियों के इलाज में भी प्रभावी है।

सितोपलादि चूर्ण के फायदे /labh : sitopaladi churna ke labh / fayde

1. यह वात-पित्त-कफ संतुलित करती है।
2. यह दवा कफ को दूर करती है।
3. इसके सेवन से हाथ-पैर की जलन में आराम होता है।
4. यह भूख को बढ़ाती है।
5. यह खांसी, जुखाम में लाभदायक है।
6. यह कफ के कारण कमजोरी, थकावट, और आलस्य में लाभकारी है।
7. यह स्वाद में मधुर, गुण में लघु, स्निग्ध और वीर्य में उष्ण है।
8. यह पूरी तरह से हर्बल है।

सितोपलादि चूर्ण के चिकित्सीय उपयोग : Uses of Sitopaladi Churna

★ सर्दी, खांसी, जुखाम, कफ के रोगों में यह लाभदायक है |
★ श्वास / अस्थमा में यह लाभदायक है |
★ पुराना बुखार रोगों में लाभकारी है।
★ फेफड़ों में विकार में यह लाभदायक है |
★ खून की कमी में इसका सेवन हितकारी है |
★ अरोचक रोगों में लाभकारी है।
★ अग्निमांद्य अपच को दूर कर भूख को बढाती है।
★ पित्तज श्वास में यह लाभदायक है |
★ हाथ-पैर की जलन को दूर करता है |
★ पार्श्वशूल में यह लाभदायक है |
★ क्षय रोग में इसका सेवन लाभदायक है |
★ सुप्तजिह्वा रोग में यह लाभदायक है |
★ उर्ध्वागत रक्तपित्त रोग में यह लाभदायक है |
★ ब्रोंकाइटिस में इसका सेवन हितकारी है |
★ पल्मनरी टी. बी. में यह लाभदायक है |
★ अस्थमा श्वास संबंधी रोगों में लाभकारी है।
★ रायनाइटिस में यह लाभदायक है |

सितोपलादि चूर्ण खाने की विधि: Dosage of Sitopaladi Churna

• २ ग्राम दिन में तीन बार, सुबह, दोपहर और शाम लें।
• इसे शहद के साथ लें।
• या डॉक्टर द्वारा निर्देशित रूप में लें।

सितोपलादि चूर्ण के नुकसान : sitopaladi churna ke nuksan

★ सितोपलादि चूर्ण किसी भी दुष्प्रभाव से रहित है।
★ परंतु कई बार ये देखा गया है कि यदि खाली पेट लिया जाए तो यह कुछ रोगियों में जठरशोथ को बढ़ा देता है। यह आयुर्वेदिक औषधि मधुमेह के रोगियों के लिए आदर्श नहीं है क्योंकि इसमें लगभग आधी मात्रा मिश्री की होती है, जो कुछ मधुमेह रोगियों के अनुकूल नहीं होती।
★ इसे लगातार एक वर्ष तक प्रयोग ना करें। हर दो से तीन महीने के बाद बीच में एक माह का अंतर रखें, या फिर जैसे आप का चिकित्सक कहे।

विशेष : असली वंशलोचन युक्त “अच्युताय हरिओम सितोपलादि चूर्ण(Achyutaya Hariom sitopaladi churna)” अब सभी संत श्री आशारामजी आश्रमों( Sant Shri Asaram Bapu Ji Ashram ) व श्री योग वेदांत सेवा समितियों के सेवाकेंद्र पर उपलब्द है |

2018-03-17T11:57:05+00:00 By |Ayurveda|0 Comments

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