पूज्य बापू जी का संदेश

ऋषि प्रसाद सेवा करने वाले कर्मयोगियों के नाम पूज्य बापू जी का संदेशधन्या माता पिता धन्यो गोत्रं धन्यं कुलोद्भवः। धन्या च वसुधा देवि यत्र स्याद् गुरुभक्तता।।हे पार्वती ! जिसके अंदर गुरुभक्ति हो उसकी माता धन्य है, उसका पिता धन्य है, उसका वंश धन्य है, उसके वंश में जन्म लेने वाले धन्य हैं, समग्र धरती माता धन्य है।""ऋषि प्रसाद एवं ऋषि दर्शन की सेवा गुरुसेवा, समाजसेवा, राष्ट्रसेवा, संस्कृति सेवा, विश्वसेवा, अपनी और अपने कुल की भी सेवा है।"पूज्य बापू जी

यह अपने-आपमें बड़ी भारी सेवा है

जो गुरु की सेवा करता है वह वास्तव में अपनी ही सेवा करता है। ऋषि प्रसाद की सेवा ने भाग्य बदल दिया

बुद्ध और बकबलि की प्रेरक कथा | Hindi Moral Story

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बुद्ध और बकबलि की प्रेरक कथा | Hindi Moral Story

तत्त्वदर्शन में ही परम कल्याण ( बोध कथा ): Hindi Short Storie

★ बुद्ध को देखकर एक युवक उन पर विमोहित हो गया । बुद्ध को देखते उसे बडा मजा आता था । श्रावस्ती नगरी का वह युवान बुद्ध के पीछे कई बार दर्शन करने को चल पडता बुद्ध के विहार तक । उसका नाम था बकबलि ।
बकबलि ने सोचा कि हररोज घर से आता हूँ, बुद्ध के दर्शन तो होते हैं, मगर घरवाले रोकटोक करते हैं, इसलिए सदा दर्शन नहीं कर पा रहा हूँ । जब नित्य दर्शन ही करने हैं तो बुद्ध के संघ में सदा के लिए भिक्षुक बन जाऊँ तब काम चलेगा ।

★ बकबलि ने बुद्ध के संघ में भिक्षुक होना स्वीकार कर लिया । वह भिक्षुक बन गया । अब तो वह संघ में ही रहने लगा । उसे रोज बुद्ध के दर्शन करने को मिलते थे ।
बुद्ध जानते थे कि यह मेरे शरीर का दर्शन करके धीरे-धीरे मोहित हो रहा है । मगर यह अभी कच्चा है, नया है । कुछ समय बीतने दो, जरा दूसरों के दर्शन से बचने के लिए मेरे दर्शन में लगने दो । फिर मेरे इस शरीर के पार जो मैं हूँ उसके दर्शन करेगा तब यह पूर्ण होगा । यह जवान है और इधर-उधर के विकारी खड्डों में गिरानेवाले दर्शन या मुलाकात की अपेक्षा अभी तो उसे मेरे शरीर के दर्शन होने दो ।

★ कुछ समय बीता । महीने बीते, वर्ष बीते । बुद्ध ने देखा कि उसका बाह्य दर्शन का आकर्षण हट गया, अब इस शरीर में तो नहीं, लेकिन प्रियतम प्रकट हुआ है उसके दर्शन में वह रुक गया है । वहाँ से उसे हटाना चाहिए । अब उसे मेरे दर्शन करा दूँ । मैं जिस घर में अभिव्यक्त हुआ हूँ, वह घर सदा नहीं रहेगा । परंतु मैं कभी मिटूँगा नहीं । मेरे उस शाश्वत स्वरूप का दर्शन इसको करा दूँ ।

★ बुद्ध ने बकबलि को बुलाकर कहा : ‘‘देख बकबलि ! तू मुझ पर मोहित हो गया है । मेरे दर्शन के बिना तुझे चैन नहीं पडता, मगर तुझे रोना पडेगा ।
भगवन् ! ऐसा क्यों । आपके दर्शन ने तो तुझे संयमी बना दिया । आपके दर्शन ने तो मुझे भिक्षुक बना दिया । आपके दर्शन ने तो मुझे इस विकारी युवावस्था से निर्विकारी साधना के रास्ते लगा दिया । यह आप क्या कह रहे हैं भन्ते !‘

★ ‘‘नहीं बकबलि ! जब यह शरीर नहीं रहेगा तब तेरा हाल क्या होगा ?
भगवन् ! ऐसी बात न करें । हम पहले मर जायेंगे । मगर आप के दर्शन…
बुद्ध ने देखा, इसका मोह तोडने के लिए उपदेश असर नहीं कर रहा है । मेरे सत्संग का असर नहीं हो रहा है । यह मुझे बाहर देखता है, मुझे भीतर नहीं देखता है । जब तक मेरे भीतर का ज्ञान इसे नहीं होगा तब तक यह पूरा सनाथ नहीं होगा । अभी अर्ध सनाथ होगा तो मेरा सहारा छूटते ही न जाने किसके संपर्क में आ जाये, कैसे गिर जाय, कोई पता नहीं ।

★ देखो, उन महापुरुषों की कितनी गहरी समझ होती है ! वे कैसे परम हितैषी होते हैं, नहीं तो जो अपने को देखकर भावविभोर होकर सब न्यौच्छावर कर रहा है ऐसे आदमी को फिर स्वार्थी आदमी थोडे ही ऐसा उपदेश करेगा कि मेरा यह शरीर नश्वर है ? महापुरुष इसलिए आदरणीय हैं, पूजनीय हैं, बंदनीय हैं कि वे परम हितैषी हैं । उनके चित्त में पूर्ण निःस्वार्थ है । उनके मन में यही भावना होती है कि यह जीव कब अपनी महिमा में जगेगा । जैसे एक शराबी दूसरे व्यक्ति को शराबी बनाकर आनंदित होता है, एक जुआरी दूसरे को जुआरी बना देता है, ऐसे ही महापुरुष दूसरे को महापुरुष बना देखकर प्रसन्न होते हैं । गुरु शिष्य का नाता बडा पवित्र है सेठ नौकर को प्यार करता है तो काम लेने के लिए और नौकर सेठ को चाहता है । तो रूपया लेने के लिए । इस जमाने की विलासी पत्नी अगर पति को प्यार करती है तो रात को कमर तोडेगी और पति पत्नी को प्यार करता है तो नौंच लेगा । मगर गुरु शिष्य को प्यार करते हैं तो उसकी कमर मजबूत कर देंगे, उसका मन मजबूत कर देंगे, उसका जीवन मजबूत कर देंगे । जिसके आगे मौत भी घुटने टेकने लग जाय ऐसे पद में खडा करने के लिए बुद्ध अपने शिष्य बकबलि से कह रहे हैं : ‘‘तू मेरे उपदेशों को सुन ।

★ बकबलि कहता है : ‘‘हमें तो साक्षात् भगवान के दर्शन हो रहे हैं, अब उपदेशों को क्या करना है ?
बुद्ध ने कहा : ‘‘बकबलि ! मेरा शरीर नहीं रहेगा तब तू लाचार हो जायेगा ।
‘‘ऐसा न कहो भन्ते !
‘‘मेरे उपदेशों को सुन । मैं जो हूँ वह मुझे अपने दिल में देख ले ।
बकबलि को कोई असर नहीं हुआ । बुद्ध ने समय का थोडा इंतजार किया । कुछ समय बीता । किसी राजा का आमंत्रण आया चातुर्मास करने के लिए । बुद्ध ने जान-बूझकर वह आमंत्रण स्वीकार कर लिया ।

★ बकबलि ने कहा : ‘‘आप जब वहाँ पधारेंगे तो मैं तो नित्य आप का दर्शन करके ही भोजन करता हूँ और दिन में भी कई बार आपका दर्शन करता हूँ । अब मेरा क्या होगा ? मैं आपके साथ चलूँगा ।
बुद्ध ने कहा : ‘‘देख बकबलि ! मुझे अकेला ही जाना है । गुरु की आज्ञा को काटना शिष्य का कर्तव्य नहीं, शिष्य की शोभा नहीं । मैं अकेला ही जाऊँगा ।
तब तो वह फूट-फूटकर रोने लगा । तब बुद्ध बोले : ‘‘बकबलि ! मैं तुझे पहले ही कह रहा था । यह तो अभी मैं तीन महीने के लिए जा रहा हूँ । जब सदा सदा के लिए मेरा शरीर चला जायेगा तब तेरा हाल क्या होगा ?

★ अब बकबलि की आँखें खुली । उसने भगवान बुद्ध के तात्त्विक उपदेशों को बडे आदर से, बडी तत्परता से सुना और वह बुद्धत्व की ओर चल पडा ।

श्रोत – ऋषि प्रसाद मासिक पत्रिका (Sant Shri Asaram Bapu ji Ashram)
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