आत्मतीर्थ की महिमा (बोध कथा) | Prerak Hindi Kahani

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आत्मतीर्थ की महिमा (बोध कथा) | Prerak Hindi Kahani

प्रेरक हिंदी कहानी : Motivational Storie in Hindi

★ महाभारत में एक प्रसंग आता है ।
जब पांडव तीर्थयात्रा करने के लिए जाते हैं तब भगवान श्रीकृष्ण उनको सलाह देते हैं :‘‘तुम्हें तीर्थयात्रा करने के लिए जाना है तो भले जाओ, मैं मना नहीं करूँगा । किंतु युद्ध में तुम्हें जो पाप लगा है, तुम्हारा मन जो मलिन हुआ है और चित्त में तुम्हें जो क्षोभ हुआ है वह तीर्थयात्रा करने से दूर होनेवाला नहीं है । फिर भी मैं तुम्हें दुराग्रह करके मना नहीं करता । तुम मेरा एक तुम्बा भी तुम्हारे साथ लेते जाओ और उसे भी तीर्थों में स्नान करवाना ।

★ अर्जुन और युधिष्ठिर ने भगवान की बात को मानकर तुम्बे को अपने साथ लिया । जिन-जिन तीर्थों में उन्होंने स्नान किया, उन-उन तीर्थों में उन्होंने तुम्बे को भी तीन-तीन, चार-चार बार डुबकियाँ लगवा कर स्नान करवाया ।

★ वे लोग जब तीर्थयात्रा करके वापस आये तब भगवान ने तुम्बा माँगा और उसका चूर्ण बनाया । भगवान ने वह चूर्ण प्रसाद के रूप में पांडवों को दिया, परंतु सबने थूक दिया । भगवान ने पूछा : ‘‘क्यों थूक डाला ?

★ तब पांडवों ने कहा : ‘‘भगवान ! यह तो कडवा है । तब भगवान ने कहा : ‘‘तुम्बे ने इतने सारे तीर्थों में स्नान किया उसके बावजूद वह कडवे का कडवा ही रहा । ऐसा क्यों हुआ ? गंगा के पवित्र जल में उसने स्नान किया है, फिर भी उसका चूर्ण कडवा क्यों लगता है ?

★ पांडवों ने जवाब दिया : ‘‘तुम्बे ने तीर्थों में बाहर से स्नान किया है । पानी बाहर से आया और स्पर्श करके गया । इस चूर्ण में तो तुम्हे की गहराई में उसका जो स्वभाव होगा वही आयेगा न ?

★ तब भगवान कहते हैं : ‘‘इसी प्रकार तीर्थों में स्नान करने से तुम्हारा शरीर पवित्र होता है यह तो ठीक है, परंतु चित्त के दोष तो आत्मरूपी तीर्थ में स्नान करने से ही दूर होते हैं । आत्मरूपी तीर्थ सत्संग में मिलता है, और कहीं नहीं । सच्चे ब्रह्मज्ञानी संतों के सत्संग से ही आत्मसुख मिलता है । इसलिए सच्चा तीर्थ तो आत्मतीर्थ ही है ।

★ वसुन्धरा पर गंगा का अवतरण हुआ । थोडे ही दिनों में उसका अन्तःकरण भारी हो गया । अतः गंगा भगवान ब्रह्माजी के पास गयी और उनसे प्रार्थना की : ‘‘लोग ‘गंगेहर” कहकर मुझमें स्नान करते हैं और अपने पाप मुझमें डाल जाते हैं । वे तो पवित्र हो जाते हैं किंतु कालांतर में उससे मेरा हृदय और मेरा चित्त दूषित हो जायेगा और मेरी दुर्गति हो जायेगी । इसलिए मुझे निष्पाप होने का कोई उपाय बताइये ।

★ भगवान ब्रह्माजी ने कमंडलु में से जल लेकर तीन आचमन किये और पद्यासन लगा कर, जो आत्मा-परमात्मा तीर्थों को तीर्थत्व प्रदान करता है, उस परब्रह्म परमात्मा के ध्यान में तन्मय हो गये । एकाध मिनट के बाद भगवान ब्रह्मा ने कहा :
‘‘हे गंगे ! लोग तुझमें ‘गंगे हर” कहकर स्नान करेंगे और तुझमें पाप डालेंगे, जिससे तू दूषित तो होगी, किंतु जब आत्मतीर्थ में नहाये हुये आत्म-साक्षात्कारी पुरुष तुझमें स्नान करेंगे तब तू पवित्र हो जायेगी ।

★ आत्मतीर्थ की महिमा बहुत बडी है । युद्ध के मैदान में भगवान आत्मतीर्थ की सरिता बहाते हैं । जो ज्ञान घोर जंगल में मिलता था, उसी ज्ञान को भगवान ने अर्जुन को युद्ध के मैदान में सुनाया और वही गीता बनी । जो योग गिरि-गुफाओं में सिद्ध होता था, उसी योग को सोलह कलाधारी भगवान ने युद्ध के मैदान में सिद्ध करने की कला बतायी । जो धर्म मंदिर में या यज्ञ को चालू व्यवहार में भी संपन्न किया जा सकता है, युद्ध के मैदान में भी अनुभव में लाया जा सकता है ।

श्रोत – ऋषि प्रसाद मासिक पत्रिका (Sant Shri Asaram Bapu ji Ashram)
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