पूज्य बापू जी का संदेश

ऋषि प्रसाद सेवा करने वाले कर्मयोगियों के नाम पूज्य बापू जी का संदेश धन्या माता पिता धन्यो गोत्रं धन्यं कुलोद्भवः। धन्या च वसुधा देवि यत्र स्याद् गुरुभक्तता।। हे पार्वती ! जिसके अंदर गुरुभक्ति हो उसकी माता धन्य है, उसका पिता धन्य है, उसका वंश धन्य है, उसके वंश में जन्म लेने वाले धन्य हैं, समग्र धरती माता धन्य है।" "ऋषि प्रसाद एवं ऋषि दर्शन की सेवा गुरुसेवा, समाजसेवा, राष्ट्रसेवा, संस्कृति सेवा, विश्वसेवा, अपनी और अपने कुल की भी सेवा है।" पूज्य बापू जी

यह अपने-आपमें बड़ी भारी सेवा है

जो गुरु की सेवा करता है वह वास्तव में अपनी ही सेवा करता है। ऋषि प्रसाद की सेवा ने भाग्य बदल दिया

रजत भस्म(चांदी भस्म) गर्मी से होने वाले विकारों को शांत कर बलवर्धक दिव्य औषधि | Rajat Bhasma Detail and health benefits In Hindi

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रजत भस्म(चांदी भस्म) गर्मी से होने वाले विकारों को शांत कर बलवर्धक दिव्य औषधि | Rajat Bhasma Detail and health benefits In Hindi

रुप्यक, रजत, कुष्ठ, तार, श्वेत, वसूत्तमम, रौप्य, चन्द्रहास आदि चाँदी के संस्कृत नाम है। इंग्लिश में इसे सिल्वर कहा जाता है। चांदी प्रायः सोने के साथ मिलती है। चांदी की सबसे ज्यादा खदानें अमेरिका, चीन और श्रीलंका में हैं। चांदी का प्रयोग भारत में आभूषण, मूर्तियाँ, बर्तन आदि के लिय किया जाता रहा है। सोने के बाद आम लोगों द्वारा यह सबसे ज्यादा प्रयोग की जाने वाली धातु है।

आयुर्वेद में चांदी को औषधि की तरह प्रयोग किया जाता है और उत्तम प्रकार की चांदी के नौ गुण बताये गए हैं। यह भारी, नर्म, तपाने और तोड़ने पर सफ़ेद, स्निग्ध, चमकदार, लचीली और देखने में अच्छी लगती है। दवाई की तरह प्रयोग करने के लिए चांदी की भस्म बनाई जाती है। भस्म बनाने के लिए पहले चांदी का शोधन और फिर मारण किया जाता है। शोधन के लिए चांदी के पत्रों को आग में तपाया जाता है और घी-तेल, गौमूत्र, छाछ, कांजी, और कुल्थी के काढ़े में अलग-अलग तीन बार बुझाया जाता है। शोधन और फिर मारण, दोनों ही विधियाँ आयुर्वेदिक तरीके से की जाती हैं।

रजत भस्म आयुर्वेद की रसायन औषधि है। यह विभिन्न रोगों को नष्ट करने वाली दवाई है। यह मुख्य रूप से वात शामक है। इसका मुख्य कार्य गुर्दों, तंत्रिकाओं nerves और मस्तिष्क पर होता है। बीसों प्रकार के प्रमेह, वात रोगों, पित्त प्रकोप, नेत्र रोग, प्लीहा वृद्धि, यकृत वृद्धि, धातु कमजोरी, मूत्र के रोगों में इसका प्रयोग उत्तम परिणाम देता है।

यह उत्तम वृष्य और रसायन है। रजत भस्म को स्मृति हानि, चक्कर आना dizziness, बहुत अधिक प्यास लगना, प्रमेह आदि में प्रयोग करते हैं।

पर्याय synonyms: Roupya Bhasma, Raupya Bhasma, Chandi Bhasma, Rajata Bhasma, Rajatha Bhasmam
दवा का प्रकार: आयुर्वेदिक धातु भस्म
प्रमुख प्रयोग: वात और कफ रोग, मस्तिष्क सम्बंधित दोष, मधुमेह, प्रमेह
प्रमुख गुण: बलवर्धक, लेखन, गर्भाशय शोधन, कांतिवर्धक, आयुष्य

चांदी के स्थानीय नाम :

Latin: Argentum / Hindi: Chandi, Rupa /English: Silver /Bengali: Rupa/Gujarati: Rupum, Chandi/Marathi: Chandi, Rupe/ Telugu: Vendi/

चांदी के भौतिक गुण :

★ प्रकार: कोमल और लचीली धातु
★ रंग: रजत सफेद, ऑक्सीडेशन होने पर ग्रे
★ स्ट्रीक: व्हाइट
★ तोड़ने पर: दांतेदार
★ चमक: धातुई
★ पारदर्शिता: अपारदर्शी
★ कठोरता: 2.5 से 3.0
★ स्पेसिफिक ग्रेविटी: 10.1से 11.1

Rajata or Raupya or Chandi Bhasma is Ayurvedic preparation of metal silver. It is incinerated silver and used therapeutically. It is aphrodisiac, anti-ageing, scraping (Lekhana), and immunomodulatory. It gives strength, glow, longevity and intellect. It improves fertility in both gender.

Raupya Bhasma is indicated in Ayurveda for all twenty types of Prameha, vitiligo, tuberculosis, diseases of eyes, cough, piles, excessive thirst, emaciation / Shosh, poisoning and infertility.
Here is given more about this medicine, such as indication/therapeutic uses, Key Ingredients and dosage in Hindi language.

रजत भस्म के आयुर्वेदिक गुण और कर्म :

रजत भस्म स्वाद में मधुर, अम्ल, कषाय है। स्वभाव से यह शीतल है और मधुर विपाक है।

विपाक का अर्थ है जठराग्नि के संयोग से पाचन के समय उत्पन्न रस। इस प्रकार पदार्थ के पाचन के बाद जो रस बना वह पदार्थ का विपाक है। शरीर के पाचक रस जब पदार्थ से मिलते हैं तो उसमें कई परिवर्तन आते है और पूरी पची अवस्था में जब द्रव्य का सार और मल अलग हो जाते है, और जो रस बनता है, वही रस उसका विपाक है।

मधुर विपाक, भारी, मल-मूत्र को साफ़ करने वाला होता है। यह कफ या चिकनाई का पोषक है। शरीर में शुक्र धातु, जिसमें पुरुष का वीर्य और स्त्री का आर्तव आता को बढ़ाता है। इसके सेवन से शरीर में निर्माण होते हैं।

★ रस (taste on tongue): मधुर, अम्ल, कषाय
★ गुण (Pharmacological Action): शीतल, सारक, स्निग्ध
★ वीर्य (Potency): शीत
★ विपाक (transformed state after digestion): मधुर

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कर्म:

★ त्वचा के लिए उत्तम
★ वात हर और कफ हर
★ बलवर्धक
★ स्मृति बढ़ाने वाली
★ ओज वर्धक
★ कान्तिवर्धक
★ पित्तहर
★ आयुष्य

रौप्य भस्म के लाभ/फ़ायदे Benefits of Raupya Bhasma/chandi bhasma ke fayde

★ यह ओज और कान्ति वर्धक है।
★ यह शरीर को शीतलता देती है।
★ इसके सेवन से अधिक पित्त के कारण होने वाले विकारों में लाभ होता है।
★ यह त्वचा की रंगत को सुधारती है।
★ इसमें एंटी-एजिंग गुण हैं।
★ यह मस्तिष्क के विकारों, जैसे की अनिद्रा, मेमोरी लॉस, चक्कर आना, मिर्गी आदि को दूर करती है।
★ इसके सेवन से अत्यधिक प्यास लगना ठीक होता है।
★ यह प्रमेह में लाभप्रद है।
★ यह नाड़ी शूल और अपस्मार की उत्तम दवा है।

रौप्य भस्म के चिकित्सीय उपयोग Uses of Raupya Bhasma in hindi

★ शोष Shosha (Cachexia)
धातु क्षय Dhatu Kshaya (Tissue wasting)
प्रमेह Prameha (Urinary disorders),
★ शराब की लत Madatyaya (Alcoholism)
★ जहर Visha (Poison)
★ पित्त रोग Pitta Roga (Disease due to Pitta Dosha)
★ तिल्ली के रोग Pliha Roga (Splenic disease)
★ मंदबुद्धि Buddhimandya (Low intelligence)
★ गर्भाशय के रोग Garbhashaya Dosha (Uterine disorder)
★ मिर्गी Apasmara (Epilepsy)
अर्श piles

सेवन विधि और मात्रा Dosage of Raupya Bhasma

★ 30 mg से लेकर 125 mg (एक चौथाई से एक रत्ती) तक, दिन में दो बार, सुबह और शाम लें।
★ इसे शहद, दूध, घी, मक्खन, मलाई, मिश्री आदि अथवा रोग अनुसार अनुपान के साथ लें।
★ इसे भोजन करने के बाद लें।
★ या डॉक्टर द्वारा निर्देशित रूप में लें।

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अनुपान :

★ रजत भस्म, को उपदंश / सूजाक के कारण हुई नपुंसकता में शिलाजीत के साथ लेते हैं।
★ स्त्रियों के बाँझपन में इसे अश्वगंधा चूर्ण अथवा शिवलिंगी के बीज के साथ लेते हैं।
★ वीर्य वृद्धि के लिये, वंशलोचन, छोटी इलाइची, केशर, मोती भस्म (प्रत्येक 1 रत्ती ~ 125 मिलीग्राम) को दो रत्ती चांदी भस्म + शहद, के साथ लेते हैं।
★ काम शक्ति, मैथुन आनंद बढाने के लिए इसे शहद के साथ चाट कर लेते हैं।
★ सभी प्रकार के प्रमेहों में रजत भस्म को मक्खन, मलाई के साथ चाट कर लेते हैं और शिलाजीत का सेवन करते हैं ऐसा तीन सप्ताह तक लगातार करते हैं।
★ मस्तिष्क की कमजोरी, बल की कमजोरी, में रजत भस्म को अश्वगंधा चूर्ण के साथ लेते हैं।
★ मस्तिष्क विकारों (मिर्गी, पागलपन) में इसे बच के चूर्ण, ब्राह्मी चूर्ण और घी के साथ लेना चाहिए।
★ वात-पित्त रोगों में, इसे त्रिफला चूर्ण के साथ लेते हैं।
★ पित्त प्रकोप में रजत भस्म को आंवले के मुरब्बे अथवा गुलकंद के साथ लेते हैं।
★ पाइल्स में इसे इसबगोल भूसी के साथ लें।।
★ पांडू रोग में इसे त्रिकटु चूर्ण के साथ लेना चाहिए।
★ आँखों के रोग में रजत भस्म को त्रिफला घृत के साथ लिया जाता है।
★ सूखी खांसी में इसे मक्खन के साथ लेते हैं।
★ यकृत-प्लीहा वृद्धि में इसे मंडूर भस्म के साथ लेना चाहिए।

उपलब्धता :

अच्युताय हरिओम रजत मालती

प्राप्ति-स्थान : संत श्री आशारामजी आश्रमों और श्री योग वेदांत सेवा समितियों के सेवाकेंद्र |

सावधानियां

★ अधिक मात्रा में इसका सेवन आँतों और गुदा को नुकसांन पहुंचाता है। इसके निवारण के लिए कतीरा, शहद, का प्रयोग करते हैं।
★ सही प्रकार से बनी रजत भस्म का ही सेवन करे।
★ अशुद्ध / कच्ची रजत भस्म से शरीर पर बहुत से हानिप्रद प्रभाव, जैसे की धातु की कमी, कब्ज़, खुजली, बुखार, खून की कमी, कमजोरी, सिर का दर्द, फर्टिलिटी की कमी आदि, होते हैं।
★ इसके सेवन से मल का रंग बदल सकता है पर इसका कोई नुकसान नहीं है।
★ इसे डॉक्टर की देख-रेख में ही लें।

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2017-06-02T15:10:40+00:00 By |भस्म(Bhasma)|0 Comments

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