पूज्य बापू जी का संदेश

ऋषि प्रसाद सेवा करने वाले कर्मयोगियों के नाम पूज्य बापू जी का संदेशधन्या माता पिता धन्यो गोत्रं धन्यं कुलोद्भवः। धन्या च वसुधा देवि यत्र स्याद् गुरुभक्तता।।हे पार्वती ! जिसके अंदर गुरुभक्ति हो उसकी माता धन्य है, उसका पिता धन्य है, उसका वंश धन्य है, उसके वंश में जन्म लेने वाले धन्य हैं, समग्र धरती माता धन्य है।""ऋषि प्रसाद एवं ऋषि दर्शन की सेवा गुरुसेवा, समाजसेवा, राष्ट्रसेवा, संस्कृति सेवा, विश्वसेवा, अपनी और अपने कुल की भी सेवा है।"पूज्य बापू जी

यह अपने-आपमें बड़ी भारी सेवा है

जो गुरु की सेवा करता है वह वास्तव में अपनी ही सेवा करता है। ऋषि प्रसाद की सेवा ने भाग्य बदल दिया

श्रीकृष्ण की अनोखी गुरुदक्षिणा ( बोध कथा /Hindi Story )

Home » Blog » Inspiring Stories(बोध कथा) » श्रीकृष्ण की अनोखी गुरुदक्षिणा ( बोध कथा /Hindi Story )

श्रीकृष्ण की अनोखी गुरुदक्षिणा ( बोध कथा /Hindi Story )

श्रीकृष्ण की गुरूसेवा

कृष्ण जन्माष्टमी, Krishna Janmashtami ,motivational story in hindi ,,hindi stories with moral ,hindi story

★     गुरू की महिमा अमाप है, अपार है। भगवान स्वयं भी लोक कल्याणार्थ जब मानवरूप में अवतरित होते हैं तो गुरूद्वार पर जाते हैं।

राम कृष्ण से कौन बड़ा, तिन्ह ने भी गुरू कीन्ह।
तीन लोक के हैं धनी, गुरू आगे आधीन।।

★     द्वापर युग में जब भगवान श्रीकृष्ण अवतरित हुए और कंस का विनाश हो चुका, तब श्रीकृष्ण शास्त्रोक्त विधि से हाथ में समिधा लेकर और इन्द्रियों को वश में रखकर गुरूवर सांदीपनी के आश्रम में गये। वहाँ वे भक्तिपूर्वक गुरू की सेवा करने लगे। गुरू आश्रम में सेवा करते हुए, गुरू सांदीपनी से भगवान श्रीकृष्ण ने वेद-वेदांग, उपनिषद, मीमांसादि षड्दर्शन, अस्त्र-शस्त्रविद्या, धर्मशास्त्र और राजनीति आदि की शिक्षा प्राप्त की। प्रखर बुद्धि के कारण उन्होंने गुरू के एक बार कहने मात्र से ही सब सीख लिया। विष्णुपुराण के मत से 64 दिन में ही श्रीकृष्ण ने सभी 64 कलाएँ सीख लीं।

★     जब अध्ययन पूर्ण हुआ, तब श्रीकृष्ण ने गुरू से दक्षिणा के लिए प्रार्थना की।

“गुरूदेव ! आज्ञा कीजिए, मैं आपकी क्या सेवा करूँ ?”

गुरूः “कोई आवश्यकता नहीं है।”

श्रीकृष्णः “आपको तो कुछ नहीं चाहिए, किंतु हमें दिये बिना चैन नहीं पड़ेगा। कुछ तो आज्ञा करें !”

गुरूः “अच्छा….जाओ, अपनी माता से पूछ लो।”

★     श्रीकृष्ण गुरूपत्नी के पास गये और बोलेः “माँ ! कोई सेवा हो तो बताइये।”

गुरूपत्नी जानती थीं कि श्रीकृष्ण कोई साधारण मानव नहीं बल्कि स्वयं भगवान हैं, अतः वे बोलीः “मेरा पुत्र प्रभास क्षेत्र में मर गया है। उसे लाकर दे दो ताकि मैं उसे पयः पान करा सकूँ।”

श्रीकृष्णः “जो आज्ञा।”

★     श्रीकृष्ण रथ पर सवार होकर प्रभास क्षेत्र पहुँचे और वहाँ समुद्र तट पर कुछ देर ठहरे। समुद्र ने उन्हें परमेश्वर जानकर उनकी यथायोग्य पूजा की। श्रीकृष्ण बोलेः “तुमने अपनी बड़ी बड़ी लहरों से हमारे गुरूपुत्र को हर लिया था। अब उसे शीघ्र लौटा दो।”

★     समुद्रः “मैंने बालक को नहीं हरा है, मेरे भीतर पंचजन नामक एक बड़ा दैत्य शंखरूप से रहता है, निसंदेह उसी ने आपके गुरूपुत्र का हरण किया है।”

★      श्रीकृष्ण ने तत्काल जल के भीतर घुसकर उस दैत्य को मार डाला, पर उसके पेट में गुरूपुत्र नहीं मिला। तब उसके शरीर का पांचजन्य शंख लेकर श्रीकृष्ण जल से बाहर आये और यमराज की संयमनी पुरी में गये। वहाँ भगवान ने उस शंख को बजाया। कहते हैं कि उस ध्वनि को सुनकर नारकीय जीवों के पाप नष्ट हो जाने से वे सब वैकुंठ पहुँच गये। यमराज ने बड़ी भक्ति के साथ श्रीकृष्ण की पूजा की और प्रार्थना करते हुए कहाः “हे लीलापुरूषोत्तम ! मैं आपकी क्या सेवा करूँ ?”

★    श्रीकृष्णः “तुम तो नहीं, पर तुम्हारे दूत कर्मबंधन के अनुसार हमारे गुरूपुत्र को यहाँ ले आये हैं। उसे मेरी आज्ञा से वापस दे दो।”

‘जो आज्ञा’ कहकर यमराज उस बालक को ले आये।

★     श्रीकृष्ण ने गुरूपुत्र को, जैसा वह मरा था वैसा ही उसका शरीर बनाकर, समुद्र से लाये हुए रत्नादि के साथ गुरूचरणों में अर्पित करके कहाः

“गुरूदेव ! और जो कुछ भी आप चाहें, आज्ञा करें।”

★     गुरूदेवः “वत्स ! तुमने गुरूदक्षिणा भली प्रकार से संपन्न कर दी। तुम्हारे जैसे शिष्य से गुरू की कौन-सी कामना अवशेष रह सकती है ? वीर ! अब तुम अपने घर जाओ। तुम्हारी कीर्ति श्रोताओं को पवित्र करे और तुम्हारी पढ़ी हुई विद्या नित्य उपस्थित और नित्य नवीन बनी रहकर इस लोक तथा परलोक में तुम्हारे अभीष्ट फल को देने में समर्थ हों।”

★     गुरूसेवा का कैसा सुंदर आदर्श प्रस्तुत किया है श्रीकृष्ण ने ! थे तो भगवान, फिर भी गुरू की सेवा उन्होंने स्वयं की है।

★     सत्शिष्यों को पता होता है कि गुरू की एक छोटी सी सेवा करने से सकामता निष्कामता में बदलने लगती है, खिन्न हृदय आनंदित हो उठता है, सूखा हृदय भक्तिरस से सराबोर हो उठता है। गुरूसेवा में क्या आनंद आता है, यह तो किसी सत्शिष्य से ही पूछकर देखें।

गुरू की सेवा साधु जाने, गुरूसेवा कहाँ मूढ़ पिछानै।
गुरूसेवा सबहुन पर भारी, समझ करो सोई नरनारी।।
गुरूसेवा सों विघ्न विनाशे, दुर्मति भाजै पातक नाशै।
गुरूसेवा चौरासी छूटै, आवागमन का डोरा टूटै।।
गुरूसेवा यम दंड न लागै, ममता मरै भक्ति में जागे।
गुरूसेवा सूं प्रेम प्रकाशे, उनमत होय मिटै जग आशै।।
गुरूसेवा परमातम दरशै, त्रैगुण तजि चौथा पद परशै।
श्री शुकदेव बतायो भेदा, चरनदास कर गुरू की सेवा।।
हरि सेवा कृत सौ बरस, गुरू सेवा पल चार।
तो भी नहीं बराबरी, बेदन कियो विचार।।

विशेष :

<>  गर्भवती देवी के लिये – जन्माष्टमी व्रत (krishna Janmashtami  Vrat)

जो गर्भवती देवी जन्माष्टमी का व्रत करती है….. उसका गर्भ ठीक से पेट में रह सकता है और ठीक समय जन्म होता है….. ऐसा भविष्यपुराण में लिखा है |

<>  ये चार तिथियाँ आती है …कैसा भी आदमी हो …अपना भाग्य बनाना चाहे तो बना सकता है । ४ महा-रात्रियाँ हैं – दिवाली, शिवरात्रि, होली, जन्माष्टमी – यह सिध्ध रात्रियाँ हैं, इन रात्रियों का अधिक से अधिक जप कर के लाभ लेना चाहिए |

<> सावधान – पति पत्नी का व्यवहार अमावस्या, पूनम, एकदशी, अष्टमी, जन्माष्टमी, शिवरात्रि, दिवाली, होली, एसे पवित्र दिनों में और अपना जन्म दिवस, श्राद्ध पक्ष के दिन करते तो अकाल मृत्यु को बुलाते हो या जीव लेवा बीमारी बुलाते हो , और अगर संतान रह गयी तो विकलांग संतान ही होगी ।

श्रोत : श्रीकृष्ण-जन्माष्टमी किताब (Sant Shri Asaram Bapu ji Ashram)

मुफ्त हिंदी PDF डाउनलोड करें Free Hindi PDF Download

Summary
Review Date
Reviewed Item
श्रीकृष्ण की अनोखी गुरुदक्षिणा ( बोध कथा /Hindi Story )
Author Rating
51star1star1star1star1star

Leave a Reply