फूलों से रोगों का इलाज हिंदी में – भगवान्ने मानव को स्वस्थ रखने के लिये सृष्टिके समय ही इस संसारमें बहुत-से जंगल, वनस्पतियाँ उत्पन्न कर दीं। ईश्वर ने ऐसी अनेक वनस्पतियाँ बनायी हैं कि जिन्हें पुष्प लगे बिना फल प्राप्त नहीं होते। कुछ वनस्पतियाँ ऐसी भी हैं जिनमें पुष्प आते हैं, परंतु फल नहीं आते। पुष्पों में प्रकृतिप्रदत्त ऐसा दिव्य गुण अन्तर्निहित रहता है कि उसके यथाविधि उपयोग से हम अपने जीवन को सुखमय बना सकते हैं। उपासना में जो पुष्पों का महत्त्व है सो तो है ही, पुष्प सौन्दर्य, उल्लास और आनन्दके भी प्रतीक हैं
आध्यात्मिक दृष्टिकोण से पद्मपुराण’ में उल्लेख आया है कि व्यक्ति को जीवन में कौन से पुष्प धारण करने चाहिये और इनसे किस प्रकार भगवान् प्रसन्न होते हैं
अहिंसा प्रथमं पुष्पं द्वितीयं करणग्रहः।
तृतीयकं भूतदया चतुर्थं क्षान्तिरेव च ॥
शमस्तु पञ्चमं पुष्पं दमस्तु षष्ठमेव च।
सप्तमं तु ध्यानं सत्यमष्टै स्तुष्यति केशवः॥

अहिंसा, इन्द्रिय-संयम, भूतदया, क्षमा, शम, दम, ध्यान एवं सत्यरूपी पुष्प को जीवन में उतारना चाहिये।
ये भावपुष्प कहलाते हैं।
आयुर्वेद में रोगों के उपशमनार्थ पुष्पों के अनेक विध औषधीय प्रयोग निर्दिष्ट हैं। इनसे सामान्य रूपसे घरेलू उपचार भी सम्पन्न किया जा सकता है, यहाँ कुछ ऐसे ही पुष्पोंकी उपयोगिता संक्षेपमें दी जा रही है

कपास (रुई) के फूल:

भारत देशमें कपास की खेती बहुत बड़े पैमाने पर होती है। इसके पौधे ३ से ५ फीटतक लम्बे होते हैं। इसके फूल पीले और लाल रंग के होते हैं। कपासकी काली और सफेद दो प्रजातियाँ होती हैं। एक नारियावाली कपास होती है, जिसके पेड़ बड़े-बड़े होते हैं और फल-फूल १२ महीने होते हैं, इसकी रुई नरम तथा बिनौले हरे होते हैं।

कपास फूल के औषधीय गुण और उपयोग :

आयुर्वेदके मत से कपास के फूल मीठे, शीतल, पौष्टिक और दूध बढ़ानेवाले होते हैं। ये पित्त और कफ को दूर करते हैं। प्यास को बुझाते हैं तथा भ्रान्ति, चित्तकी अस्थिरता और बेहोशीको दूर करते हैं।
कपास के पत्ते वातरोग को दूर करते और खून को बढ़ाते हैं। ये मूत्रनिस्सारक और कान की सभी प्रकार की तकलीफों को दूर करने वाले होते हैं।
इसके बीज अर्थात् बिनौले दूध बनानेवाले होते हैं। इस वनस्पति के सभी हिस्से चर्मरोगों में, साँप और बिच्छू के जहरमें तथा गर्भाशय की पीड़ाओं में उपयोगी हैं।

कपास के फूल से रोगों का उपचार :

१-श्वेत प्रदर-कपासकी जड़को चावल के पानी के साथ पीसकर पिलाने से श्वेत प्रदरमें लाभ होता है। ( और पढ़ेश्वेत प्रदर के रोग को जड़ से मिटा देंगे यह 33 घरेलू उपाय)
२-कष्टार्तव-कपासकी जड़की छालका क्वाथ पिलानेसे मासिक धर्मके समय होनेवाला कष्ट मिट जाता है।
३-अण्डवृद्धि–बिनौलेकी मींगी और सोंठको जलके साथ पीसकर लेप करनेसे अण्डवृद्धि मिटती है।
४-पागलपन-कपासके पुष्पका शरबत पिलाने से पागलपन मिटता है और चित्त प्रसन्न होता है।
५-दन्त-पीड़ा-बिनौलेको औटाकर उनके पानीसे कुल्ले करनेसे दाँतों की पीड़ा मिट जाती है। |
६-कामला-५ माशे बिनौले रातको पानी में भिगो दे। प्रात:काल उनको पीसकर, छानकर और सैन्धव नमक मिलाकर पीनेसे कामला-रोग में लाभ होता है।( और पढ़ेपीलिया के 16 रामबाण घरेलू उपचार )
७-मूत्रदाह-कपास की जड़का काढ़ा पिलाने से पेशाब के समय की जलन और पीड़ा मिटती है।( और पढ़ेपेशाब में जलन के 25 घरेलू उपचार)
८-आमातिसार-कपासके पत्तों का रस पिलाने से आमातिसार में लाभ होता है।
९-आग से जलना-इसकी मींगी को पीसकर लेप करनेसे आगकी जलन मिटती है।( और पढ़ेआग से जलने पर आयुर्वेद के सबसे असरकारक 79 घरेलु उपचार)
१०-बदगाँठ-कपासके बीजों को पीसकर टिकिया बनाकर बदगाँठ पर बाँधने से बदगाँठ बिखर जाती है।
११-घाव-रुई की भस्म को भुरभुरा ने से घाव और टाँकिया में बहुत जल्द आराम होता है।
१२-धातुदौर्बल्य–बिनौलेकी मींगीको दूधमें खीर बनाकर खिलानेसे धातुदौर्बल्य और मस्तिष्ककी कमजोरीमें बहुत लाभ पहुँचता है।

कमल का फूल :

कमल पानी में पैदा होनेवाली वनस्पति है। यह अत्यन्त नाजुक होता है। इसका प्रकाण्ड लताकी तरह फैलनेवाला होता है। इसके पत्ते गोल, बड़े-बड़े प्याले के आकार के तथा अरवीके पत्तों की तरह होते हैं। इन पत्तोंपर पानी की बूंद नहीं ठहरती। ये चौड़े-चौड़े पत्ते थाली की तरह पानी में तैरते हुए दिखलायी देते हैं। पत्तों के नीचे जो डंडी होती है, उनको मृणाल अथवा कमल की नाल कहते हैं। कमल के पुष्प अत्यन्त सुन्दर और बड़े आकार के होते हैं। इन पुष्पों में जो पीला जीरा होता है उसको कमल-केशर कहते हैं। इसके पत्तोंको पद्मकोष और बीजोंको कमलगट्टे कहते हैं। कमल सफेद, लाल आदि रंगभेद से अनेक प्रकार के होते हैं।

कमल फूल के औषधीय गुण और उपयोग :

यह शीतल और मधुर होता है तथा रक्त-विकार, विस्फोट, विसर्प और विषको दूर करनेवाला होता है।

१-नील कमल शीतल, सुस्वादु, पित्तनाशक, रुचिकारक, रसायन-कर्म में उत्तम, देह की जड़ को दृढ़ करनेवाला और बालों को बढ़ानेवाला होता है।
२-रक्त कमल चरपरा, कड़वा, मधुर, ठंडा, रक्तशोधक, पित्त, कफ और वातको शान्त करनेवाला तथा वीर्यवर्धक है।
३-सफेद कमल शीतल, स्वादिष्ठ, नेत्रोंको लाभदायक तथा रुधिर-विकार, सूजन, व्रण और सब प्रकार के विस्फोटकों को दूर करनेवाला होता है।
४-कमलके कोमल पत्ते शीतल एवं कड़वे होते हैं। ये शरीर की जलनको दूर करनेवाले तथा प्यास, अश्मरी, बवासीर और कुष्ठ में लाभदायक होते हैं।
५-कमल की जड़-कड़वी, कफ-पित्त में लाभदायक और प्यासको बुझानेवाली होती है। इसके केशर शीतल, वीर्यवर्धक, संकोचक और कफ, पित्त, प्यास, विष, सूजन तथा खूनी बवासीर में लाभदायक हैं। इसके पुष्प शीतल, रक्तविकार, चर्मरोग और नेत्ररोगमें लाभदायक हैं।
६-कमलके बीज अर्थात् कमलगट्टे स्वादिष्ठ, रुचिकारक, पाचक, गर्भस्थापक, वीर्यवर्धक तथा पित्त, रक्तदोष,वमन और रक्तपित्तको नाश करनेवाले होते हैं। इसका शहद अत्यन्त पौष्टिक, त्रिदोषनाशक और सब प्रकारके नेत्ररोगोंको दूर करनेवाला होता है।

कमल के फूल से रोगों का उपचार :

१-बवासीर-खूनी बवासीरमें इसके केशरको शक्कर और मक्खनके साथ देने से लाभ होता है।( और पढ़ेबवासीर के 52 सबसे असरकारक घरेलु उपचार )
२-गुदद्वार के निगमन-कमल के कोमल पत्ते प्रात:काल शक्कर के साथ लेना चाहिये।
३-गर्भ गिरने की शिकायत-जिन स्त्रियों को हमेशा गर्भ गिरने की शिकायत हो, उनके लिये इसके बीज बहुत ही लाभकर हैं।( और पढ़ेरक्तप्रदर को दूर करेंगे यह 77 रामबाण घरेलू उपचार)
४-रक्तप्रदर-कमल की केशर, मुलतानी मिट्टी और मिश्रीके चूर्णकी फंकी देनेसे रक्तप्रदर और रक्तार्श में लाभ होता है।
५-गर्भस्राव-कमलकी डंडी और नागकेशर को पीसकर दूधके साथ पिलाने से दूसरे महीने में होनेवाला गर्भस्राव मिट जाता है।
६-वमन-कमलगट्टे को आगपर सेंककर उसका छिलका उतारकर उसके भीतरका सफेद मगज पीसकर शहदमें चाटनेसे वमन बंद होती है।( और पढ़ेउल्टी रोकने के 16 देसी अचूक नुस्खे )
७-सर्प-विष-कमलके मादा केशरको काली मिर्चके साथ पीसकर पीने और लगानेसे साँप के विष में लाभ होता है।
८-दाद-कमल की जड़को पानी में घिसकर लेप करनेसे दाद और दूसरे त्वचा रोग मिटते हैं।
९-हैजे की मायूस अवस्था-कमलगट्टे के भीतर जो विषैली हरी पत्ती रहती है, उसका अर्क गुलाब के अंदर घिसकर देनेसे हैजे की मायूस अवस्था में लाभ होता है।
१०-रक्तातिसार युक्त पुराना ज्वर–रक्तातिसार युक्त पुराने ज्वरमें उत्पल, अनारका छिलका और कमलका केशर-ये तीनों बराबर-बराबर मात्रामें लेकर पीसकर चावल के पानी के साथ लेना चाहिये।
११-चेचक-चेचक की बीमारी में इसके पुष्पका शरबत शान्तिदायक होता है।
१२-गुदाभ्रंश-सफेद कमल के पत्ते छोटे बच्चों के गुदाभ्रंश रोगके लिये बड़े लाभदायक होते हैं। इसके पत्तों को सुखाकर शक्कर के साथ देनेसे इस बीमारीमें आश्चर्यजनक परिणाम दृष्टिगोचर होता है।
१३-नेत्र-रोग-कमलके फूलकी पंखड़ियोंको तोड़ते समय शहदके समान एक तरहका रस निकलता है, जिसको पद्म-मधु कहते हैं, इस मधुको नेत्रमें आँजने से नेत्रों के अनेक रोग मिटते हैं।
१४-गर्भाशय से निकलने वाला खून-नील कमल,श्वेत कमल और रक्त कमलके तन्तु २-२ तोला, मुलेठी २ तोला-इन सब चीजोंको लेकर १२७ तोला, पानी और ३२ तोला घीके साथ औटाना चाहिये। औटाते औटाते जब पानी जलकर घी-मात्र शेष रह जाय तब उतारकर छान लेना चाहिये। इस घृतको उत्पलादि घृत कहते हैं। यह घृत खूनी बवासीर, रक्त प्रदर और गर्भाशयमेंसे निकलने वाले खूनको रोकने के लिये बड़ा अकसीर माना जाता है।
जिस स्त्रीको हमेशा गर्भपात होनेका डर रहता है, उस स्त्रीको गर्भपातके लक्षण शुरू होते ही फौरन यह घी देना चाहिये, इसके देने से गर्भपात रुक जाता है। इसी प्रकार इस घृतको पीनेसे और शरीरपर मालिश करनेसे विस्फोट और जलनवाले रोग मिटते हैं।
आध्यात्मिक दृष्टि से सम्पन्न व्यक्ति को कमल की सुन्दरता कोमलता, प्रसन्नता, सुगन्ध, मधुरता, सरसता, तेजस्विता और अलिप्तता आदि प्राकृतिक गुणोंको जीवनमें उतारना चाहिये।

कनेर के फूल:

भारत वर्ष की पुष्पवाटिकाओं में अक्सर बोया जानेवाला पौधा कनेर है। देव-पूजा में आनेके कारण भारत में कनेर का पुष्प बहुत प्रसिद्ध है। इसके पत्ते तीखी नोकवाले और लम्बे होते हैं। इसके फूल लाल, गुलाबी, पीले और सफेद होते हैं। कनेर की दो प्रजातियाँ–शहरी और जंगली पायी जाती हैं। जंगली कनेर के पत्ते खुरपे की तरह और बहुत पतले होते हैं। इसकी शाखाएँ पतली और जमीनपर बिछी हुई होती हैं। इसके पत्तेके पास | काँटे होते हैं। शहरी कनेर में काँटे नहीं होते। अश्वमारक, | करवीर, हरिप्रिय तथा गौरीपुष्प आदि इसके कई नाम हैं।

कनेर फूल के औषधीय गुण और उपयोग :

१-कनेरकी जड़-इसकी जड़ कड़वी, कामोद्दीपक और पेटकी पुरानी पीड़ाओं के लिये लाभकारी होती है।जोड़ोंके दर्दमें भी यह लाभदायक है। यह बहुत विषैली है। सर्पविषको भी दूर करनेकी इसमें शक्ति है।
२-कनेर के पुष्प-इसके पुष्प स्वाद में कड़वे होते हैं। ये प्रदाह, मज्जा और जोड़ोंके दर्द, कटिवात, सिरदर्द और खुजली में लाभदायक होते हैं।

कनेर फूल से रोगों का उपचार :

खुजली और चर्म-रोग

१-कनेरके पत्ते या फूलको पानीमें धो दे। फिर इस पानीसे आधे वजनका जैतूनका तेल लेकर उसे पानीमें डाल दे और इसे गर्म करे। जब पानी जल करके केवल तेल मात्र रह जाय, तब उसमें चौथाई वजन मोम मिलाकर उतार ले। इस तेलको हर प्रकारको खुजलीपर मालिश करनेसे लाभ होता है।
२-कनेरकी जड़को पानीमें उबालकर उसमें राईका तेल डालकर औटावे। जब पानी जलकर तेलमात्र रह जाय, तब उसको उतारकर छान ले। इस तेलको चर्म-रोगोंपर मलने से बड़ा लाभ होता है।

केवड़े ( केतकी) के फूल :

भारतवर्ष में केवड़ेका फूल या भुट्टा प्रसिद्ध है। इसकी मनोमोहिनी खुशबू प्राचीन काल से लोकप्रिय रही है। इसका पौधा गन्ने के पौधे की तरह होता है। इसके पत्ते लम्बे-लम्बे होते हैं। इन पत्तों के किनारे पर काँटे रहते हैं। इसका भुट्टा १५ से २५ सेंटी मीटर तक लम्बा रहता है। इसके पत्ते तीक्ष्ण, कटु और सुगन्धमय होते हैं।

केवड़ा ( केतकी) फूल के औषधीय गुण और उपयोग :

ये विषनाशक, कामोद्दीपक और पथरी तथा अर्बुदमें लाभदायक होते हैं। इसका फूल कड़वा, तीक्ष्ण और शरीर के सौन्दर्य को बढ़ानेवाला होता है। इसकी केशर फेफड़ेके ऊपर की झिल्लीके प्रदाह में उपयोगी होती है। इसका फल वात, कफ और मूत्राशयकी तकलीफों में फायदा करता है।

केवड़े के फूल से रोगों का उपचार :

१-रक्तप्रदर गर्भपात-केवड़ेकी जड़ ६ माशेसे तोलाभरतक गायके दूधमें घिसकर शक्कर मिलाकर प्रतिदिन सुबह-शाम पीनेसे भयंकर रक्तप्रदर भी शान्त होता है। जिस स्त्रीको हमेशा गर्भपात होनेकी शिकायत हो, उसको भी यह औषधि गर्भ रहनेके दूसरे महीनेसे चौथे महीनेतक सेवन करानेसे गर्भपात बंद हो जाता है।
२-वायुगोलाकी दवा-केवड़ेकी सूखी जड़ोंके टुकड़े करके मिट्टीकी एक बड़ी हाँड़ीमें भरकर उस हाँड़ीपर ढक्कन लगाकर उसकी सन्धियाँ आटे से बंद कर देनी चाहिये। जिससे उसका धुआँ बाहर न जा सके।

उसके बाद उसे चूल्हे पर चढ़ाकर नीचेसे आग जलाकर राख कर लेना चाहिये। जितनी राख हो उससे चौगुना
पानी लेकर उस राखको उसमें अच्छी तरह से घोल देनी चाहिये। उसके बाद उस बर्तन को २४ घंटे स्थिर पड़ा रहने देना चाहिये। फिर जब राख नीचे बैठ जाय तब उसका पानी निखारकर आगपर चढ़ाकर उसका क्षार निकाल लेना चाहिये। यह केवड़ेका क्षार १ माशा, सोडा बायकार्ब १ माशा और कूट १ माशाइन तीनों को मिलाकर ४ तोले तिल्ली के तेल के साथ पीनेसे अत्यन्त भयंकर वायुगोले का दर्द भी नष्ट हो जाता है।
केवड़ा दिलकी गर्मी, मेदे (पेट) की गर्मी और मूच्र्छाको दूर करता है। दिल और दिमाग को ताकत देता है और खूनको साफ करता है।
केवड़े के पत्ते कुष्ठ, छोटी माता, उपदंश, खुजली और हृदय तथा मस्तिष्ककी बीमारियों में लाभदायक हैं। इसका केशर कानके दर्द, कुष्ठ, विस्फोटक और रक्तविकारमें फायदा करता है। इसके भुट्टोंसे निकाला हुआ तेल उत्तेजक और आक्षेप-निवारक माना जाता है।

कदम्ब-पुष्प :

सुगन्धित पुष्पोंमें कदम्बका बड़ा महत्त्व है। इसका पुष्प भगवान् श्रीकृष्ण को बहुत प्रिय है। कदम्ब एक प्रकारका मध्यम आकार का पेड़ होता है, इसका पुष्प सफेद और पीले रंगका होता है। इस पुष्पपर पँखड़िया नहीं होती हैं, बल्कि सफेद-सफेद सुगन्धित तन्तु इसके चारों ओर उठे हुए रहते हैं। इसका फल गोल नीबूके समान होता है। कदम्बमें राजकदम्ब, धाराकदम्ब, धूलिकदम्ब, भूमि कदम्ब इत्यादि उल्लेखनीय प्रजातियाँ हैं।

कदम्ब फूल के औषधीय गुण और उपयोग :

औषधि-द्रव्यमें इसकी छाल तेज, कड़वी, मृदु और कसैली होती है। यह कामोद्दीपक, शीतल, दुष्पाच्य, दूध बढ़ानेवाला, संकोचक, विष-निवारक और घावको भरनेवाला होता है। गर्भाशयकी शिकायत, रक्त-रोग, वात, कफ, पित्त और जलनमें यह लाभदायक है। इसका फल गरम, उद्दीपक और पकनेपर पित्तकारक होता है।

कदम्ब फूल से रोगों का उपचार :

१-नेत्रों का प्रदाह-नेत्र-प्रदाह में इसकी छाल के रसका अफीम और फिटकि री के साथ उपयोग किया जाता है।
२-ज्वर–इसकी छालका काढ़ा पिलाने से ज्वर में लाभ होता है।
३-मुँह के छाले-इसके पत्तों के क्वाथ से कुल्ले करनेसे मुँहके छाले मिटते हैं।
४-कदम्ब के छिल के का ताजा रस बच्चोंके मस्तक के ऊपर ब्रह्मरन्ध के बैठ जानेपर मालिश करनेके काममें लिया जाता है। इसके पत्तोंका काढ़ा मुँह के छाले और मुँहकी सूजनमें कुल्ले करनेके लिये उपयोगमें लिया जाता है। इसका फल ज्वर, तृषा और रक्त-दोषोंका निवारण करनेवाला होता है,
आयुर्वेदिक चिकित्सक इसका उपयोग ज्वर की बीमारी में करते हैं। इसकी छाल सर्प के विषमें भी लाभदायक होती है। इसमें (सिन्कोटेनिक एसिड) नामक संकोचक तत्त्व रहता है।

यूनानी मत से इसकी कच्ची कोप लें सर्द और पचने में हलकी होती है। ये बदहजमी में फायदा पहुँचाती हैं। बच्चोंके बदनपर लाल चकत्ते पड़नेकी बीमारी में यह फायदेमन्द होती है। इसके फल गरम, चिकने, क्षुधावर्धक और वीर्य तथा कफ को बढ़ाने वाले होते हैं। इसके पके हुए फूल बादी, पित्त और कफ में लाभ पहुँचाते हैं। इसके फल और पत्ते रक्तविकार और पित्तकी बीमारीमें लाभदायक होते हैं।