पूज्य बापू जी का संदेश

ऋषि प्रसाद सेवा करने वाले कर्मयोगियों के नाम पूज्य बापू जी का संदेशधन्या माता पिता धन्यो गोत्रं धन्यं कुलोद्भवः। धन्या च वसुधा देवि यत्र स्याद् गुरुभक्तता।।हे पार्वती ! जिसके अंदर गुरुभक्ति हो उसकी माता धन्य है, उसका पिता धन्य है, उसका वंश धन्य है, उसके वंश में जन्म लेने वाले धन्य हैं, समग्र धरती माता धन्य है।""ऋषि प्रसाद एवं ऋषि दर्शन की सेवा गुरुसेवा, समाजसेवा, राष्ट्रसेवा, संस्कृति सेवा, विश्वसेवा, अपनी और अपने कुल की भी सेवा है।"पूज्य बापू जी

यह अपने-आपमें बड़ी भारी सेवा है

जो गुरु की सेवा करता है वह वास्तव में अपनी ही सेवा करता है। ऋषि प्रसाद की सेवा ने भाग्य बदल दिया

प्रतिभावान बालक रमण की प्रेरक कथा | Hindi Story

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प्रतिभावान बालक रमण की प्रेरक कथा | Hindi Story

Motivational Story in Hindi / Hindi storie with moral 

★ महाराष्ट्र में एक लडका था । उसकी माँ बडी कुशल थी, सत्संगी थी । बच्चे को थोडा बहुत ध्यान सिखाती थी । लडका १४-१५ साल का हुआ तब उसकी बुद्धि विलक्षण बन गयी । आगे चलकर बडा प्रसिद्ध न्यायाधीश बना । उसका नाम था मरीआडा रमण ।

★ चोर डकैत थे । कहीं डाका डाला तो हीरे-जवाहरात का बक्सा मिल गया । उसे सुरक्षित रखने के लिये चारों पहुँचे एक खानदान बुिढया के पास । बक्सा देते हुये बोले :
‘‘माताजी ! हम चार दोस्त व्यापार-धन्धा करने निकले हैं । हमारे पास कुछ पूँजी है । यहाँ कोई जान-पहचान है नहीं । इस जोखिम को कहाँ साथ लेकर घूमें ? आप इसे रखो और जब हम चारों मिलकर एक साथ लेने के लिए आवें तब लौटा देना ।

★ बुिढया ने कहा : ‘‘ठीक है । बक्सा देकर चारों रवाना हुये । आगे गये तो एक चरवाहा दूध लेकर बेचने जा रहा था । इन लोगों को दूध पीने की इच्छा हुई । पास में बर्तन था नहीं । तीन डकैतों ने अपने चौथे साथी को कहा कि, ‘जाओ, दूर वह बुिढया का घर दिखाई दे रहा है वहाँ से बर्तन ले आओ । हम लोग यहाँ इन्तजार करते हैं ।

★ डकैत चला बर्तन लेने । रास्ते में उसकी नीयत बिगडी । बुिढया के पास आकर बोला : ‘‘माताजी ! हम लोगों ने विचार बदला है । यहाँ रुकेंगे नहीं । आज ही दूसरे नगर में चले जायेंंगे । अतः हमारा बक्सा लौटा दो । मेरे तीन दोस्त वहाँ खडे हैं सामने । मुझे बक्सा लेने भेजा है ।

★ बुिढया को जरा सन्देह हुआ । बाहर आकर उसके साथियों की तरफ देखा तो तीनों खडे हैं । बुिढया ने बात पक्की करने के लिए उनको इशारे से पूछा : ‘‘इसको दे दूँ ?

★ डकैतों को लगा : माई पूछ रही है कि इसको बर्तन दूँ । तीनों ने दूर से ही कह दिया : ‘‘हाँ हाँ उसको दे दो ।
बुिढया घर में गयी । पिटारे से बक्सा निकालकर दे दिया । वह चौथा डकैत दूसरे रास्ते से पलायन हो गया । तीनों साथी काफी इन्तजार करने के बाद बुिढया के पास पहुँचे । उन्हें पता चला कि चौथा साथी बक्सा लेकर भागा है । अब तो वे बुिढया पर ही बिगडे : ‘‘तुमने एक आदमी को बक्सा दिया ही क्यों ? चारों को साथ में देने की शर्त थी ।

★ झगडा हो गया । बात पहुँची राजदरबार में । डकैतों ने पूरी हकीकत राजा को बतायी । राजा ने माई से पूछा :
‘‘क्योंजी ! इन लोगों ने बक्सा दिया था ?
‘‘ऐसा कहा था कि जब चारों मिलकर आवें तब लौटाना ?
‘‘ऐसा कहा था कि जब चारों मिलकर आवें तब लौटाना ?
‘‘जी महाराज ।

★ ‘‘तुमने एक ही आदमी को बक्सा दे दिया । अब इन तीनों को भी अपना अपना हिस्सा मिलना चाहिए । अपनी माल-मिल्कियत, जमीन-जायदाद, गाय-भैंस जो कुछ हो वह बेचकर इन लोगों का हिस्सा चुकाना पडेगा । यह हमारा फरमान है । राजा ने आदेश दे दिया ।

★ बुिढया रोने लगी । विधवा थी । घर में छोटे बच्चे थे । कमानेवाला कोई था नहीं । संपत्ति नीलाम हो जायेगी तो गुजारा कैसे होगा ? अपने भाग्य को रोती-पीटती रास्ते से गुजर रही थी । १५ साल के रमण ने उसे देखा तो पूछने लगा :

★ ‘‘माताजी ! क्या हुआ ? क्यों रो रही हो ?
बुिढया ने सारा किस्सा कह सुनाया । आखिर बोली :
‘‘क्या करूँ बेटे ? मेरा तकदीर ही ऐसा फूटा है । मैं उनका बक्सा लेती ही क्यों ?
रमण ने कहा : ‘‘माताजी ! आपके तकदीर का कसूर नहीं है, राजा की खोपडी का कसूर है ।

★ संयोगवश राजा गुप्तवेश में वहीं से गुजर रहा था उसने सुन लिया । पास आकर पूछा :
‘‘क्या बात है ?
‘‘बात यह है कि नगर का राजा है, यद्यपि मैं उन्हें नहीं जानता हूँ, उन्हें न्याय करना नहीं आता । इस माताजी के मामले में गलत चुकादा दिया है । रमण निर्भयता से बोल गया ।
‘‘अगर तू न्यायाधीश होता तो कैसा न्याय देता ? राजा को किशोर रमण की बात में उत्सुकता बढ रही थी ।
रमण बोला : ‘‘राजा को न्याय करवाने की गरज होगी तो मुझे दरबार में बुलायेंंगे । फिर मैं न्याय दूँगा ।

★ दूसरे दिन राजा ने रमण को बुलाया । पूरी सभा लोगों से खचाखच भरी थी । वह बुिढया माई और तीन दोस्त भी बुलाये गये थे । राजाने पूरा मामला रमण को सौंपा । रमण ने बुजुर्ग न्यायाधीश की अदा से मुकदमा चलाते हुये पहले बुिढया से पूछा :
‘‘क्यों माताजी ? चार सज्जनों ने आपको बक्सा सँभालने के लिए दिया था ?
‘‘हाँ ।
‘‘चारों सज्जन मिलकर एक साथ बक्सा लेने आवे तो बक्सा लौटाने के लिए कबूलात की थी ?
‘‘हाँ ।

★ रमण अब तीनों डकैतों की ओर मुडकर बोला : ‘‘अरे, अब तो कोई झगडे की बात ही नहीं है । सद्गृहस्थों ! आपने ऐसा ही कहा था न कि हम चार मिलकर आवें तब हमें बक्सा लौटा देना ?
‘‘हाँ, ठीक बात है । ऐसा ही हमने इस माई से तय किया था ।
‘‘यह माताजी तो अभी भी आपको आपका बक्सा लौटाने को तैयार है मगर आप ही अपनी शर्त को भंग कर रहे हो ।
‘‘कैसे ?
‘‘आप चार साथी मिलकर आओ । अभी आपको आपकी अमानत दिलवा देता हूँ । आप तो तीन ही हैं । चौथा कहाँ है ?

★ ‘‘साहब ! वह तो… वह तो…
‘‘उसे बुलाकर लाओ । जब चार साथ में आओगे तभी आपका बक्सा मिलेगा । नाहक में इन बेचारी माताजी को परेशान कर रहे हो ?
तीनों डकैत पोपला मुँह लिये रवाना हो गये । सारी सभा दंग रह गयी । सच्चा न्याय तोलनेवाले प्रतिभा-संपन्न बालक की युक्तियुक्त चतुराई देखखर राजा भी बडा प्रभावित हो गया ।

★ प्रतिभा विकसित करने की कुँजी सीख लो । जरा-सी बात में खिन्न न होना । मन को स्वस्थ, शान्त रखना । संयम और सदाचार बढायें ऐसे पुस्तक पढना । परमात्मा का ध्यान करना । सत्पुरुषों का सत्संग करना

श्रोत – ऋषि प्रसाद मासिक पत्रिका (Sant Shri Asaram Bapu ji Ashram)

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